Dharamshala

Dharamshala is a hill station in one of the picturesque valleys of Himachal Pradesh surrounded on three sides with snow capped mountains. Enchanting forests of oak and conifer trees are found here that complete the scenic beauty.
Lower Dharamshala has civil offices and business establishments with courts as it is the district headquarters of Kangra district and the winter capital of Himachal Pradesh. Kotwali bazaar and Upper Dharamshala comprise of places with names which bear witness to its history like McLeod Ganj and Forsythe Ganj. Mcleod Ganj rose to international fame after it became the temporary headquarters of His Holiness Dalai Lama.
In and around Dharamshala, one can visit the Kangra Art museum at Kotwali bazar, War memorial, Kunal Pathri temple and tea gardens on way to Kunal Pathri. A day’s trek to the nearest snowline is also possible. There is also a beautiful Cricket stadium in the city facing the mighty Dhauladhar ranges.
Dharamshala is easily accessible by road with the nearest airport at Gaggal and broad gauge railway station at Pathankot.
Best time to visit: January to June, September to December
Languages spoken: Hindi, Pahari, English
Climate: Pleasant summers and very cold winters
Places to see: McLeodganj, Kangra Art Museum, War Memorial, Kunal Pathri Temple

An ancient church - St.John in the wilderness

McLeodganj – The mystical hub of Himachal

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We then moved to the church of St. John in the Wilderness between Forsyth Ganj and Mcleod Ganj. This neo-gothic stone shrine was made in 1852 following Anglian structure. It was named after John the Baptist. As the structure lies deep inside dense woods, during the olden times, they appropriately named it as St. John In The Wilderness. There is a memorial devoted to Lord Elgin, who was Viceroy of India during British raj.

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The deep forest behind Subhas bowli

Chamba and Mani Mahesh got replaced by Dalhousie

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While checking out from Hotel Asia, we were surprised when we were asked to pay the bill. We told that rooms were booked through Travelguru long back and we handed over printout of booking confirmation with my ID copy. But hotel authority told that they did not receive payment from Travelguru, so we must pay before we leave.

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हिमाचल का अनमोल रत्न  ‘त्रिउण्ड’ : आकर्षक पर्वतारोहण क्षेत्र

हिमाचल का अनमोल रत्न ‘त्रिउण्ड’ : आकर्षक पर्वतारोहण क्षेत्र

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जिस प्रकार स्वादिष्ट व्यंजनों की चर्चा भूखे व्यक्ति की भूख को ओर अधिक बढ़ा देती है उसी प्रकार त्रिउण्ड के प्राकृतिक सौंदर्य की चर्चा ने घुमक्कड़ों की लालसा को भी बढ़ा दिया होगा. जिन्होंने त्रिउण्ड की घुमक्कड़ी नहीं की है उनके मन में अवश्य ही ये प्रश्न उठ रहे होंगे कि त्रिउण्ड कैसे पहुंचा जाए,

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Chiller Chilling Summer Trip- Dharamsala & Dalhousie, Khajjiar

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The route was full of Danger & natural beauty. It is the most exotic and scenic beauty place around 22 Km from Dalhousie. Khajjiar is officially proclaimed the mini-Switzerland of India. At an altitude of 6450 ft, this saucer shaped green meadow, ringed by Devadar Trees has a lake in the middle complete with floating island. I liked horseback riding and strolling. It’s the best place to spend more time as compare to the other places. We spent around 2 hrs & enjoyed Horse riding there. We saw something that interested us. People were getting inside a big plastic ball, and being rolled till the lake. That was very interesting, something we haven’t seen before. We left in the late afternoon bidding goodbye to the charming glade of Khajjiar and our next destination was the town of Dalhousie.

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Kareri Lake ~ a poetic trail

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Gaddis are basically a nomadic tribe who mainly lead a pastoral life depending on their cattle for their livelihood and wander in the high altitude alpine meadows for green and protein rich grass for their cattle and the nectar like pure water. These gaddis seem to be the happiest souls in the world without any worry cheering and living life happily in the lap of mother nature enjoying her eternal and purest beauty to the fullest. You envy at their life for a moment and then wish if you were born a gaddi, maybe in your next life…:)

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धर्मशाला से दिल्ली – खूबसूरत यादों के साथ वापसी

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यहाँ के खूबसूरत पहाड़, कल-कल करते झरने, हरी-भरी वादियाँ और दूर तक दिखाई देती हिमालय पर्वतमाला हमारी आँखों में बस गई थी ! यहाँ बिताए गए हर एक पल की यादें बहुत लंबे समय तक हमारे मन में रहने वाली थी ! इतना समझाने के बाद जाकर कहीं मन शांत हुआ !

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मक्लोडगंज – हिमालयन वाटर फाल

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मैं ठहरा बेवकूफ़ इंसान, जिस दिन सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी उसी दिन दिमाग़ की जगह दिल से काम ले लिया ! मन में हिमालयन वॉटर फॉल देखने की इच्छा इतनी प्रबल थी कि ये भी नहीं सोचा कि पहाड़ों पर चढ़ाई के लिए जा रहा हूँ और वो भी स्लीपर पहन कर ! होटल से चले तो सबकुछ ठीक था, पर आधे रास्ते में ही मेरे स्लीपर ने मुझे धोखा दे दिया जिसका वर्णन मैं इस लेख में आगे करूँगा !

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मक्लोडगंज – मोनेस्ट्री और भाग्सू नाग वाटर फाल

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देखने में जितनी सुंदर ये मोनेस्ट्री बाहर से लगती है उस से कहीं अधिक सुंदर ये अंदर से भी है !  जब हम लोग अंदर पहुँचे तो वहाँ कोई प्रार्थना चल रही थी,  इसलिए वहाँ  काफी भीड़ थी ! पूछने पर पता चला कि आज का उत्सव उन वीरों की याद में मनाया जा रहा है, जिन्होनें अपने प्राणों की आहुति तिब्बती क्रांति के दौरान दे दी !

इस जानकारी के अनुसार 1959 में जब चीन ने तिब्बत पर हमला किया, तो बहुत से तिब्बती क्रांतिकारी इस युद्ध की भेंट चढ़ गए !  तत्कालीन चीनी सरकार ने तिब्बती क्रांतिकारियों को पकड़ कर उन्हें बहुत यातनायें दी और अंतत उनके प्राण ले लिए !  अपने धर्म और देश की रक्षा के लिए हज़ारों क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की बलि दे दी !

इन क्रांतिकारियों की बलि भी काम ना आई और अंतत दलाई लामा (बोद्ध भिक्षुओं के मुखिया) तिब्बत छोड़ कर हिमालय के रास्ते भारत में यहाँ धर्मशाला आ गए !  दलाई लामा का अनुसरण करते हुए ही लगभग 80000 तिब्बती नागरिक भी यहाँ भारत आ गए ! तत्कालीन भारत सरकार ने इन शरणार्थियों को आश्रय दिया ! ये शरणार्थी तभी से यहीं के होकर रह गए ! तिब्बती लोगों की आबादी ज़्यादा होने के कारण इस जगह को मिनी ल्हासा के नाम से भी जाना जाता है !

हम लोग जब सभागार में पहुँचे तो वहाँ  बहुत सारे बोद्ध भिक्षु बैठे थे, और ये सभी लोग कोई पूजा संपन्न करने में लगे थे  !  हम लोगों ने पहले तो मोनेस्ट्री के चारों ओर घूम कर इसका निरीक्षण किया और फिर  एक लाइन में दीवार के पास  कालीन बिछाकर वहीं बैठ गए !

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त्रिउंड – खुली वादियों का जहाँ

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अक्सर पहाड़ों पर चढ़ाई के दौरान शरीर का सारा पानी पसीने के रूप में बाहर आ जाती है ! इस कमी को पूरा करने के लिए लगातार पानी पीते रहना चाहिए ! वर्ना शरीर में पानी की कमी के कारण आपकी घुमक्कड़ी का सारा आनंद काफूर हो सकता है !

मक्लोड़गंज से त्रिउंड की दूरी लगभग 9 किलोमीटर है, पता नहीं क्यूँ पर मुझे तो ये दूरी 10 किलोमीटर से भी ज्यादा लगी ! त्रिउंड जाने का रास्ता गालू मंदिर से होकर जाता है, और मक्लोड़गंज से गालू मंदिर जाने के 2 रास्ते है ! एक रास्ता तो डल-झील, नड्डी से होकर जाता है, और दूसरा रास्ता धर्मकोट से होकर है !

हम लोग धर्मकोट के रास्ते से जाने वाले थे, ये रास्ता थोड़ा छोटा है पर एकदम खड़ी चढ़ाई और थका देने वाला है ! वैसे अगर आप गाडी से जाना चाहें तो गालू मंदिर तक गाडी से जा सकते है पर उस से आगे का रास्ता आपको पैदल ही तय करना होगा !

 जिस रास्ते से हम लोग जा रहे थे, ये रास्ता उसी ओर था जिस ओर भाग्सू नाग मंदिर जाने का रास्ता है ! मक्लोड़गंज के मुख्य चौराहे से थोड़ा सा आगे निकल कर मुख्य सड़क दो भागों में विभाजित हो जाती है ! नीचे वाली सड़क भाग्सू नाग मंदिर की ओर जाती है और अगर ऊपर वाली सड़क पर आगे बढ़ने पर आप धर्मकोट पहुँच जाओगे !

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डलहौज़ी से धर्मशाला की बस यात्रा

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द्वार पार करते ही एक कैफ़े भी है, जहाँ आपको ज़रूरत के अनुसार खाने-पीने की वस्तुएं मिल जाएँगी ! यहाँ से एक रास्ता सीधे भाग्सू वाटर फाल की तरफ जाता है ! मंदिर परिसर के पास से ही हितेश और शशांक तो लगभग दौड़ लगाते हुए बहुत तेजी से वाटर फाल की तरफ बढ़ गए, और मैं विपुल के साथ चलते हुए पीछे रह गया ! द्वार के उस पार जाते ही ना तो हमें हितेश दिखाई दे रहा था और ना ही शशांक ! विपुल को लगा कि कहीं ये दोनों लोग पीछे न रह गए हो, इसलिए थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद हम लोग भी वाटर फाल की तरफ बढ़ गए !

कैफ़े से थोड़ा आगे बढ़ते ही हम दोनों ने सीधे रास्ते पर आगे ना जाकर नीचे उतरकर पानी के बहाव की विपरीत दिशा में आगे बढ़ना शुरू किया ! मेरा तर्क है कि ऐसी यात्रा में बिना रोमांच के आगे बढ़ने में मजा नहीं आता, और जिस रास्ते से सभी लोग आगे बढ़ रहे थे मुझे उस रास्ते पर कुछ रोमांच नज़र नहीं आ रहा था ! पत्थरों पर चढ़ते-उतरते हुए उबड़-खाबड़ रास्तों और झाड़ियों के बीच में से होते हुए हम लोग मंजिल की परवाह किए बिना ही आगे बढ़े जा रहे थे !

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