Dalhousie

Situated in the high mountain ranges of Pir Panjal and Dhauladhar, the beautiful Chamba Valley offers an experience of exotic mountain ranges, luxuriant forests and deep valleys. Nestling in these high altitudes is the quaint town of Dalhousie blessed with natural splendour and embellished with architectural grandeur.
For a rejuvenating holiday in the lap of nature or a romantic getaway far from the madding crowd, Dalhousie would be the best place to be. Easily accessible by well built roads, and airways, Dalhousie is known for its picturesque landscape and old glory which is reflected in the architecture of the city.
Best time to visit: March to June
Languages spoken: Hindi, Pahari, English
Climate: Cool summers and very cold winters with heavy snowfall
Natural Wonders: Dainkund Peak, Satdhara, Khajjiar, Bakrota Hills, Village Lohali

Dalhousie – how we made the most before the onward journey

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The church just stood behind, surrounded by tall and dense trees. It was an old Catholic church built in 1894 exhibiting elegance of Victorian architecture. This church is a look alike of a church of England. Construction of the church was financed by people posted there during that time and local inhabitants. That is why its door remains open for all.

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The deep forest behind Subhas bowli

Chamba and Mani Mahesh got replaced by Dalhousie

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While checking out from Hotel Asia, we were surprised when we were asked to pay the bill. We told that rooms were booked through Travelguru long back and we handed over printout of booking confirmation with my ID copy. But hotel authority told that they did not receive payment from Travelguru, so we must pay before we leave.

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The twin beauty of Dalhousie and Khajjiyar

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The best thing he told us was that zorbing and paragliding takes place 1km down the road. So we headed there straight and yeah it was happening. We could see the zorbing ball but no gliders. After talking to the organizers we came to know paragliding happens early morning 9-10am as winds speeds are less at that time.

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Chiller Chilling Summer Trip- Dharamsala & Dalhousie, Khajjiar

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The route was full of Danger & natural beauty. It is the most exotic and scenic beauty place around 22 Km from Dalhousie. Khajjiar is officially proclaimed the mini-Switzerland of India. At an altitude of 6450 ft, this saucer shaped green meadow, ringed by Devadar Trees has a lake in the middle complete with floating island. I liked horseback riding and strolling. It’s the best place to spend more time as compare to the other places. We spent around 2 hrs & enjoyed Horse riding there. We saw something that interested us. People were getting inside a big plastic ball, and being rolled till the lake. That was very interesting, something we haven’t seen before. We left in the late afternoon bidding goodbye to the charming glade of Khajjiar and our next destination was the town of Dalhousie.

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डलहौज़ी से धर्मशाला की बस यात्रा

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द्वार पार करते ही एक कैफ़े भी है, जहाँ आपको ज़रूरत के अनुसार खाने-पीने की वस्तुएं मिल जाएँगी ! यहाँ से एक रास्ता सीधे भाग्सू वाटर फाल की तरफ जाता है ! मंदिर परिसर के पास से ही हितेश और शशांक तो लगभग दौड़ लगाते हुए बहुत तेजी से वाटर फाल की तरफ बढ़ गए, और मैं विपुल के साथ चलते हुए पीछे रह गया ! द्वार के उस पार जाते ही ना तो हमें हितेश दिखाई दे रहा था और ना ही शशांक ! विपुल को लगा कि कहीं ये दोनों लोग पीछे न रह गए हो, इसलिए थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद हम लोग भी वाटर फाल की तरफ बढ़ गए !

कैफ़े से थोड़ा आगे बढ़ते ही हम दोनों ने सीधे रास्ते पर आगे ना जाकर नीचे उतरकर पानी के बहाव की विपरीत दिशा में आगे बढ़ना शुरू किया ! मेरा तर्क है कि ऐसी यात्रा में बिना रोमांच के आगे बढ़ने में मजा नहीं आता, और जिस रास्ते से सभी लोग आगे बढ़ रहे थे मुझे उस रास्ते पर कुछ रोमांच नज़र नहीं आ रहा था ! पत्थरों पर चढ़ते-उतरते हुए उबड़-खाबड़ रास्तों और झाड़ियों के बीच में से होते हुए हम लोग मंजिल की परवाह किए बिना ही आगे बढ़े जा रहे थे !

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The Devdar Prayers

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Down to earth from heaven, our vehicle proceeded through roads making inroads into sea of deodars. Crossing the valleys and forests our next stop was the famous Khajjiar. This is a relatively small Himalyan meadow and a shallow lake surrounded by mighty pines and devdars all around. One of the most favoured tourist stop was but a bit of disappointment. The meadow was dull and lake looked like a pit of stagnated water with lot of rubbish thrown around. And to add to it, there were stalls selling anything from popcorn to buddhee ke baal on the meadow itself. May be it would be more enchanting when it is monsoon green or winter white. Here again a temple awaited us namely KhajjiNag. A typical Himachali temple in wood and sloping roof has a black stone idol of the Nag devta. Nag worship is quite common in this part of Himalaya with Khajji nag, BhagsuNag and many more.
Again travelling down in setting sun and through darkening valleys we finally reached Chamba, located on the banks of river Ravi. Chamba is a part of settlement between 2 mighty Himalayan ranges Dhauladhar in the south and Pir Panjal in the North. Chamba got its name from Champavati, daughter of Shailavarma. The town was founded in 10’Th or 11’Th century. The name of the king is written differently in many places, Sahilvarma, Shalivahan and Shailverma. Chamba looked like a cheerful town with packed shops of fabric, chappals, mithais and chaat. Not to forget the roadside sellers with radishes and oranges and berries. This temple town is home to some of the exquisite stone architecture blended with intricate wood carvings.

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कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी – प्रकृति की ओर

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ये पगडंडी वाला रास्ता घने जंगलों के बीच से जाता है और इस रास्ते पर गाडी नहीं जा सकती ! अगर आप कभी इस रास्ते से अन्दर जाना चाहें तो आपको पैदल ही जाना होगा और हम लोग तो इसी रास्ते से अन्दर जाने वाले थे, पर जैसे ही हम लोग उस रास्ते पर आगे बढे, कुछ स्थानीय बच्चे जोर-2 से चिल्लाने लगे, वहां मत जाओ, अन्दर जंगल में भालू है ! पर हम जानते हैं कि अक्सर लोग अपने बच्चों को जंगली जानवरों की ऐसी झूठी कहानियाँ सुना देते है ताकि बच्चे जंगल में ना जाए !

हम उन बच्चों की बातों पर ध्यान दिए बिना ही आगे बढ़ गए, वो रास्ता शुरुआत में तो थोडा खुला, पर बहुत ही गन्दा था, मगर आगे बढ़ने पर वो रास्ता संकरा हो गया ! हम लोगों ने जंगल में से ही मजबूत लाठीनुमा लकड़ियाँ ले ली, ताकि अगर कोई जंगली जानवर मिले तो हम अपनी रक्षा कर सके !

जिस रास्ते पर हम चल रहे थे उसके दाईं तरफ तो ऊँचे पेड़ों से घिरी पहाड़ी थी और बाईं तरफ घने पेड़ों से घिरी गहरी खाई थी, और इस खाई में नीचे गिरने का मतलब था मौत से सामना ! इसलिए हम बहुत ही संभल कर आगे बढ़ रहे थे और अपने चारों तरफ भी नज़र रखे हुए थे !

हम लोगों ने आपस में ही तय कर लिया था कि जो आगे चलेगा वो सिर्फ आगे के रास्ते पर ध्यान देगा, बीच में चलने वाले दोनों लोग दाएँ-बाएँ नज़र रखेंगे, और सबसे पीछे चलने वाला पीछे के रास्ते पर निगाह रखते हुए आगे बढेगा !

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खजियार – भारत का छोटा स्विट्ज़रलैंड

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खजियार जाने के इरादे से हम लोग छत से नीचे उतरे और अपने कमरे में आकर तैयार होने लगे ! नहा-धोकर, सुबह का नाश्ता लेने के बाद हम लोग एक बैग में अपनी ज़रूरत की चीज़ें लेकर खजियार के लिए निकल पड़े ! खजियार जाने के लिए डलहौज़ी से गिनती की बसें ही चलती है और ये सारी बसें गांधी चौक से होकर जाती है, ये बात हम पिछली शाम को ही पता कर चुके थे !  हम लोग खजियार जाने के लिए नौ बजे वाली बस के इंतज़ार में गाँधी चौक पहुँच गए ! आप लोगों की जानकारी के लिए बता दूं कि खजियार को इसकी सुन्दरता की वजह से छोटा स्विट्ज़रलैंड भी कहा जाता है, ये हिमाचल का बहुत ही प्रसिद्ध दर्शनीय स्थान है ! डलहौज़ी से खजियार की  दूरी लगभग 22 किलोमीटर है, और डलहौज़ी से यहाँ आने के लिए प्राइवेट टैक्सी के अलावा पब्लिक बसें भी चलती है !

बस स्टैंड पर काफी भीड़ हो चुकी थी और हम लोग भी अन्य यात्रियों की तरह बस के इंतज़ार में खड़े थे ! बस अपने निर्धारित समय से पांच मिनट लेट आई, हम लोग तुरंत बस में सवार हो गए, बस में भीड़ तो बहुत थी पर हमें दो सीटें मिल गई और हम चारों लोग उन दो सीटों पर ही एडजस्ट हो गए !

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पंच-पुला की हसीन वादियाँ

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अगले दस मिनट में हम पंच-पुला पहुँच चुके थे, समय देखा तो शाम के साढ़े चार बज चुके थे और मौसम अभी भी बारिश का ही बना हुआ था ! सच कहूँ तो पंच-पुला पहुँच कर इतनी ख़ुशी नहीं हुई जितना कि यहाँ आते वक़्त रास्ते में हुई थी ! पंच-पुला के पास बच्चो के खेलने के लिए पूरा इंतज़ाम था, कहीं झूलने के लिए झूले, कहीं पिकनिक के लिए पार्क और कहीं पानी में घूमने के लिए नाव ! अरे चौंकिए मत, नाव के लिए कोई बड़ी झील नहीं थी बस एक छोटा सा तालाब था और उसी तालाब में बच्चे नौकायान का आनंद ले रहे थे ! आप भी कभी अपने बच्चो के साथ यहाँ घूमने आयें तो नौकायान का आनंद तो ले ही सकते है !

हम लोग जब पंच-पुला पहुंचे तो वहां पहले से ही काफी लोग थे, हम लोग भी खाली जगह देख कर पास ही बैठ गए  !  कुछ स्थानीय लोगो ने कैंप लगा कर यात्रियों के मनोरंजन के लिए बहुत बढ़िया इंतज़ाम कर रखे थे ! कहीं दो छोटी-2 घाटियों को रस्सी के पुल से जोड़ा गया था तो कहीं दो छोटे-2 पहाड़ो को रस्सी से जोड़ा गया था ! इस कैंप में एंट्री टिकट लेकर जाने के बाद लोगो को इस रस्सी के पुल को पार करना था और रोपवे से भी जाना था ! कुछ भी हो एक्टिविटीज तो मजेदार थी, हम लोग वहीँ बैठ कर लोगो को वो रस्सी का पुल पार करते देख ही रहे थे की अचानक बारिश शुरू हो गयी !  सब लोग बारिश से बचने के लिए इधर-उधर भागने लगे, पर एक लड़की थी जो इस बारिश में  भी रस्सी का पुल पार करके ही वापस आई ! खैर बारिश ने एक बार रफ़्तार  तो फिर जम कर बरसी, सभी लोग बारिश के रुकने का इंतज़ार करने लगे !

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ग्रीष्मावकाश यात्रा – दिल्ली से डलहौज़ी

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हम लोग दस दिन के लिए जा रहे थे और 13 जुलाई 2012 हम लोगो की यात्रा का दिन फाइनल हुआ ! इस यात्रा में हम चार लोग जा रहे थे, मैं (प्रदीप), शशांक, विपुल और हितेश ! बस  फिर तो जाने की तैयारियां शुरू हो गयी और शुक्रवार शाम को हम लोग निकल पड़े गर्मियों से राहत पाने के लिए ! हमारी ट्रेन धौलाधार एक्सप्रेस पुरानी दिल्ली से रात दस बजे की थी पर हम लोग डलहौज़ी जाने के लिए इतने उत्सुक थे कि हम रात को 8:30 बजे ही स्टेशन पर पहुँच गए! थोड़ा समय तो हमने प्लेटफार्म पर घूम कर ही व्यतीत किया और इतने में ही हमारी ट्रेन भी प्लेटफार्म पर आ गयी ! हमारी टिकट कन्फर्म थी इसलिए हम लोगो को आरक्षण तालिका देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी ! हम लोग ट्रेन में घुसे और फटाफट अपनी सीट पर पहुँच गए, थोड़ी देर बाद ही ट्रेन प्लेटफार्म से चल दी ! रात्रि का भोजन करने के बाद हम लोग अपनी-2 सीट पर जाकर सो गए !

सुबह जब नींद खुली तो ट्रेन जालंधर से आगे निकल चुकी थी पठानकोट आने में अभी काफी समय था पर डलहौज़ी के बारे में सोच कर ही मन रोमांचित हो रहा था ! डलहौज़ी के बारे में वैसे तो बहुत पढ़ चुका था और अपने दोस्तों से भी काफी सुना था, पर मन ये सोचकर खुश हो रहा था कि आज तो मैं भी डलहौज़ी की खूबसूरती को अपनी आँखों से देखूंगा ! इसी उधेड़-बुन में कब वक़्त गुजर गया पता ही नहीं चला और ट्रेन पठानकोट पहुँच गई ! हम लोगो ने अपना सामान उठाया और ट्रेन से बाहर आ गए !

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घुमक्कड़ी – कुछ खट्टी…. कुछ मीठी (2)

घुमक्कड़ी – कुछ खट्टी…. कुछ मीठी (2)

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क्या है घुमक्कड़ी…
पढ़ो तो इक किताब है घुमक्कड़ी
देखो गर तो इक ख्वाब है घुमक्कड़ी
हंसो तो आसान बन जाती घुमक्कड़ी
सुनो तो ज्ञान बन जाती घुमक्कड़ी

Dear friends, in my previous post of the series, you saw how important the reminiscences are in our travelling. Many a times, we forget other details of our travellings and remember it by the sweet & sour memories of that travelling. Travelling is not simply going to some places or reaching the heights of Himalayas… when we rewind the films of our travels and see it frame by frame … we find that it has changed our life altogether. It has made us more confident, given us more tolerance, given us more strength and sometimes even changed our perspective towards life and its aim.

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