About : kamlansh

Full Name Kamlansh rastogi

I am working in garments industry in Noida as manager accounts. living in NCR region. बचपन मे कहानी, उपन्यास धार्मिक ग्रंथ जो भी मिल गया बस पढ़ने बैठ गया . . चाहें वह मुंशी प्रेम चन्द की कहानियाँ हो, या जय शंकर प्रसाद की कामायनी, या देवकी नंदन खत्री का उपन्यास. चंद्रकान्ता , चंद्रकान्ता के लिए कहते है इसको पढ़ने के लिए कई लोगों ने हिन्दी पढ़ना सीखा था. घर मे विशालकाय महाभारत ग्रंथ 2 भागो मे रखे थे, कुछ नही मिला तो उसे ही पढ़ना शुरू कर दिया. सच तो यह है की पढ़ना भी एक कला है. हर कोई धैर्य से पढ़ नही सकता. और इसी तरह से लिखना भी एक कला है. हर कोई पढ़ तो सकता है पर लिख नही सकता. पर लिखने वाले मे पढ़ने की आदत होना ज़रूरी है. अन्यथा वह कभी भी अच्छा नहीं लिख पाएगा. My phylosphy is " मनुष्य को अपने कर्मो का फल अवश्य मिलता है. हम जैसा दूसरे के साथ करते है वैसा हमारे साथ होता है.

Ghumakkar Since 2012-07-25 06:05:47

Google Talk / Jabber
https://plus.google.com/u/0/
Website
http://rastogi-yatra.blogspot.in/

Total Number of travel stories by kamlansh at Ghumakkar (9)
Total Number of comments by kamlansh at Ghumakkar (185)

2012-10-31 / Comments (19)

धनोल्टी , सहस्त्रधारा ,ऋषिकेश और फिर हरिद्वार

रात की नीरवता मे गंगा की लहरो की तट की पैकडियो से टकराने की आवाज आ रही थी. इसी बीच मेरी श्रीमती जी ढुढती हुई आ गयी. आते ही बोली यहाँ कहाँ लेटे हो, मै बोला क्या करू यहाँ पर ठंडक है इसलिये इन सबके साथ यहीं लेट गया हूँ पर नींद तो आ नही रही है. बोली चलो बस मे ही आरम करना. यहाँ के ठंडे फर्श पर लेटे रहे तो कमर अकड जायगी. अब मुझे लगा, इससे तो अच्छा वापस दिल्ली चलते हैं, यहाँ परेशन होने से क्या फायदा. इतनी रात मे भी कई लोग गंगा नहा रहे थे. मैने गंगा का जल अपने उपर छिड़का और बस मे पहुंचकर जब सबसे वापस दिल्ली चलने के लिये कहा तो कुछ लोग बोले जब इतना परेशान हो ही चुके हैं तो अब कल गंगा नहाकर ही चलेंगे. मैने कहा ठीक है जैसी तुम सबकी मर्जी. बस मे बैठे हुए पता नही कब नींद लग गयी. दिन निकल आने के बाद ही नींद खुली.

अब सभी हर की पोड़ी पर चल दिये. तभी हमारे साथ के मनोज जी हर की पोड़ी के सामने बने धर्मशाला मे दो कमरे तय कर आये. बोले 500-500 रुपये मे मिल रहे हैं लेना है. मैने कहा ले लो भई थोड़ी देर के लिये ही सही बरसात के करण गंगा का पानी मटमैला था कुछ लोग नखरे करने लगे. पर बाकी सभी ने तो गंगा मे ढंग से स्नान किया. . नहा कर तैयार होने मे ही सभी को दस बज गये. अब भी कुछ एक तैयार नही हुए थे, मैने कहा मै तो नाश्ता कर के बस मे बैठने जा रहा हूँ तुम सब लोग भी जल्दी से आ जाओ. जब इतने सारे लोग होते हैं तब सारे अपनी- अपनी मर्जी चलाते हैं. करीब 12 बजे बस मे पहुंचे. अब वापस दिल्ली लौटना था.

यादगार मसूरी – धनोल्टी की यात्रा

जन्माष्टमी का दिन होने के करण मेरी श्रीमती जी ने व्रत रखा था. शाम ढल चुकी थी मैने सोंचा कुछ फल वगैरह ला दू. होटेल से बाहर आकर पूछने पर पता लगा थोड़ा सा आगे बस स्टॅंड है वहां पर फल मिल सकते हैं. थोड़ा सा आगे जाने पर भी दुकाने नही नजर आई फिर वहां से गुजरते पहाड़ी लोगो से पूछा, उनका वही जबाव , बस थोड़ा सा आगे चले जाओ. हमारे जैसे लोगो के लिये पहाड़ो पर 100-200 गज चलना ही काफी दूर हो जाता है पर पहाड़ी लोग एक किलोमीटर की दूरी भी थोड़ा सा आगे ही बताते है. जैसे-तैसे बस स्टॅंड पहुँचा. यहाँ पर केवल 2-3 दुकाने ही थी जिसमे से एक मे थोड़ी सी सब्जी, फल रखे थे. फल खरीद कर वापस लौटते समय तक शाम काफी गहरी हो गयी थी. बरसात का मौसम होने के कारण बादलो ने आस-पास का वातावरण ढक दिया था. दूर का साफ नही दिख रहा था. इस समय सड़क पर कोई चहलकदमी नही हो रही थी. मेरे आगे – आगे दो लड़के बाते करते हुए जा रहे थे अन्यथा वातावरण मे नीरवता छाई हुई थी. मै तेज कदमो से होटेल की तरफ बढ रहा था. ऐसे समय पर पुरानी बाते याद आ जाती हैं. इससे पिछले वर्ष मै मुक्तेश्वर गया था. मुक्तेश्वर उत्तराखंड मे ही एक हिल स्टेशन है. यहाँ से नेपाल की तरफ का हिमालय दिखता है. तो बात कर रहा था मुक्तेश्वर की ( बताना आवश्यक हो गया था , कई लोग मुक्तेश्वर के नाम से ग़ह्र मुक्तेश्वर समझने लगते हैं.) यहाँ मै रेड रूफ रिज़ॉर्ट मे ठहरा था. रिज़ॉर्ट के मलिक मिस्टर. प्रदीप विष्ट से बातो ही बातो मे पता लगा की शाम के समय कभी-कभी रिज़ॉर्ट के सामने ही बाघ आ जाता है. उन्होने एक बाघ की फोटो भी अपने रिज़ॉर्ट मे लगा रखी थी जो कि जाड़े के समय उनके रिज़ॉर्ट के सामने बैठा हुआ धूप सेक रहा था. उनके रिज़ॉर्ट के पास ही एक महिला को होटेल है. बताने लगे कि एक दिन शाम का अंधेरा ढल गया था, वह अपनी कार से मेरे रिज़ॉर्ट के सामने से गुजर रही थी कि तभी अचनक बाघ उनकी कार के सामने आकर खड़ा हो गया. उन्होने ने कार के ब्रेक लगाये, बाघ थोड़ी देर तक खड़ा कार को घूरता रहा फिर छलांग मार कर दूसरी तरफ चला गया. इस समय मुझे वही बात याद आ रही थी कि कहीं यहाँ पर भी अचनक बाघ आ गया तब क्या करेंगे. चलते समय होटेल वाले से पूछना भूल गया था कि इस इलाके मे बाघ तो, वह नही है. खैर रास्ते मे बाघ तो नही मिला, सकुशल होटेल पहुंच गया. अगर मिल जाता तो गया था श्रीमती जी के खाने का इंतजाम करने और बाघ के खाने का इंतजाम कर बैठता. वापस आकर पहले होटेल वाले से पूछा पता लगा यहाँ पर बाघ नहीं है.

यात्रा सालासर हनुमान जी

बीदासर से लौटते समय हम छापर गाँव उतर गये . मैने पूछा कितना चलना पड़ेगा, बोले करीब 2-3 किलोमीटर सड़क से अंदर की तरफ है. मै मन ही मन सोंच रहा था कि खेतो के बीच से , मिट्टी की पगडंडी से होते इनके यहाँ पहुचना होगा. पर करीब एक- दो किलोमीटर चलने के बाद भी खेत नजर नही आये. काफी बड़ी पक्की सड़क थी और सड़क के दोनो तरफ पक्के सीमेंट के अच्छे – अच्छे मकान बने हुए थे. मैने फिर पूछा अभी कितनी दूर तुम्हारा गॉँव है , वह बोले यह गाँव ही तो चल रहा है. मैने आश्चर्यचकित होकर कहा अगर यह गाँव है तो शहर कैसा होता है,

केदारनाथ से बद्रीनाथ

हरिद्वार से केदारनाथ

यमनोत्री से गंगोत्री

हरिद्वार से यमनोत्री

अमरनाथ यात्रा ( शेषनाग – पंचतर्णी – अमरनाथ गुफा – पहलगाम)

अमरनाथ यात्रा (पहलगाम – चंदनवाड़ी – शेषनाग )