2012-12-31 / Comments (25)
बीकानेर-रायसर कैम्प में राजस्थानी कालबेलिया नृत्य के संग मदहोश शाम
असली घटना जिसके बारे में मैं आपसे कह रहा था वह यहाँ से शुरु होती है। हमने ट्रेन के अपने डिब्बे में जाकर अपनी सीट पर डेरा जमा दिया था, हमें अपना डेरा जमाये मुश्किल से दो-तीन मिनट ही हुये थे कि वहाँ पर एक पूरा परिवार जिसमें पति पत्नी के अलावा, दो लडकी, एक लडका जिनकी उम्र क्रमश: 12-13-14 के आसपास रही होगी। जिस बन्दे का यह परिवार था उसने आते ही हम पर राशन पानी लेकर हमला शुरु कर दिया कि यह सारी सीट हमारी है हटो या से, कहाँ तो हम सीट मिलने की खुशी में अब तक अपना सामान फ़ैलाये जा रहे थे, और अब कहाँ हमारे सिर आफ़त टूट गयी थी। मैं निराश नजरों से कमल भाई की ओर देखता रहा। इस दौरान उस परिवार ने उन सीट पर अपना सारा सामान फ़ैला दिया था। अब शर्म के मारे हमारा बुरा हाल हो गया था, कमल भाई ने जितनी बीयर पी थी वो सारी उतर गयी थी। मैंने उन महाशय से कहा कि हम आपका टिकट देखना चाहते है। वो तो टिकट भी हाथ में लेकर ही हमारी छाती पर चढने को तैयार खडे थे। जैसे ही उन्होंने मुझे टिकट दिया और मैंने टिकट पर उनका उसी डिब्बे में कनफ़र्म सीट नम्बर देखा तो मानो मेरा खून शर्म के मारे पानी-पानी हो गया था। मुझे बेहद दुखी मन से वह सीट छोड़नी पडी थी, मुझे सीट छोड़ने का दुख नहीं था, दुख तो इस बात पर हो रहा था कि उनके बच्चे हमें देखकर हँस रहे थे, और तो और जब हम सीट से जा रहे थे, वो आपसी वार्तालाप में हमारी मजाक भी उडा रहे थे।
आज मेरी 100 पोस्ट पूरी हो गयी है। इ्सी कारण एक जबरदस्त घोषणा भी कर रहा हूँ, लेकिन मेरी इस घोषणा में एक तकनीकी पेंच है कि यह सिर्फ़ उन लोगों को ही दिखाई देगी, जिन्होंने मेरी इस पोस्ट पर कमेन्ट किया है।









