केदार यात्रा: ऋषिकेश – रुद्रप्रयाग – केदारनाथ

January 26, 2013 By:

Table of contents for केदार यात्रा

  1. केदार यात्रा: दिल्ली – ऋषिकेश
  2. केदार यात्रा: ऋषिकेश – रुद्रप्रयाग – केदारनाथ

आज सुबह करीब 2 बजे अलार्म बजने से पहले ही मेरी आँख खुल गयी, लगता था जैसे हमारे मच्छर मित्र भी चाहते थे कि हम रात भर माँ गंगा के अलौकिक रूप का दर्शन करते रहे और इसमें इन मच्छरों ने कोई कसर बाकी ना छोड़ी. ये मच्छर मित्र ही थोड़ी थोड़ी देर में हमें जगा दिया करते, ऐसे में भला अलार्म की क्या जरुरत! उठते ही कुंदन को जगाया कि चल भाई, कहीं ये बस भी निकल गई तो फिर कहीं मझधार में ना लटक जाएँ. कुंदन कल रात की थकान के मारे उठने के मूड में नहीं था पर फिर हिम्मत दिखाकर उठ ही गया. गंगा की दो चार बूँदें अपने ऊपर छिडकी और हो गया गंगा स्नान…तीन बजे से पहले ऋषिकेश बस स्टैंड पर पहुँचना था दिन की पहली बस पकड़ने के लिए, इसलिए जल्दी जल्दी अपने अपने झोले टांगकर निकल पड़े हम लोग. सुनसान गलियों से गुजरते हुए, शुरुआत में ही हमें कुछ कुत्तों से दो चार होना पड़ा जिन्हें देखकर अपनी हालत थोड़ी ढीली हो जाती है, बिना कोई प्रतुय्तर दिए और ऐसा ढोंग रचकर कि जैसे इन्हें देखा ही नहीं पतली गली से निकल लिए. थोड़ी दूर तक तो ये पीछा करते रहे, पर जब इनका प्रातःकालीन राग बंद हुआ, तब कहीं जाकर जान में जान आयी. झूला पुल पर पहुँचकर, सुबह के दो बजे गंगा की पावन लहरें असीम शान्ति और शीतलता सी प्रदान करती प्रतीत हो रही थी, ऐसे में कुछ क्षण यहाँ इस अप्रतिम आनंद का सुख भोगकर फिर यात्रा शुरू कर दी. लोजी पुल पार करते ही कुत्तों का एक और झुंड हमारा स्वागत करने को तत्पर बैठा था, पर यहाँ कुछ और लोग मौजूद थे जिससे हमें कुछ साहस मिला और हम इन कुत्तों से पीछा छुड़ाकर मुख्य सड़क पर पहुँच गए. प्रातः के इस पहर में भी अध्यात्मिक नगरी में हमारे सिवा कुछ अन्य लोगों के चहलकदमी जारी थी. घूमते घामते इस प्रातःकालीन बेला का मजा लेते हुए और फोटो खींचते हुए चले जा रहे थे, ऐसे में समय का पता ही नहीं चला. देखा तो तीन बजने में लगभग 15 मिनट ही बाकी थे. ऐसे में कुछ उतावली सी होने लगी और कदमों की रफ़्तार बढ़ाने लगे, चलते चलते सोचा की कोई वाहन आदि मिल जाता तो अच्छा रहता. वैसे इस समय भी यहाँ सडकों पर कुछ वाहन चल रहे थे. एक विक्रम वाला आता दिखाई दिया तो हाथ देकर रोका और पूछा कि बस स्टैंड चलोगे और वो सहर्ष ही राजी हो गया और रास्ते से कुछ और सवारियाँ भी उठा ली.

ऋषिकेश में प्रातः पद यात्रा के दौरान...

ऋषिकेश में प्रातः पद यात्रा के दौरान…

हम लोग समय से पहले ही यहाँ पहुँच गए थे पर टिकट काउंटर अभी भी बंद था, लेकिन एक मिनी बस चलने को तैय्यार खड़ी थी. पता चला कि रुद्रप्रयाग तक जाएगी, बिना समय गवाँए, हम लोग बस में चढ़ गए. मैंने बस में चढ़ने से पहले ही कुंदन को बताया था कि देख भाई अगर खुबसूरत दृश्यों का आनंद लेते हुए सफ़र करना हो तो आगे कि सीट में बैठेंगे और अगर सोना हो तो पीछे वाली किसी भी सीट पर बैठ जाना. मैंने हमेशा की तरह अपनी पसंदीदा चालक के साथ वाली सीट चुनी और कुंदन ने भी इसमें मेरा साथ दिया. बस के चलने के साथ ही हमारी केदार यात्रा को हरी झंडी मिली और हम बड़े उत्साहित से यात्रा का आनंद लेने लगे. आज का हमारा लक्ष्य केदारधाम में बसेरा करने का था. फिर भी अगर कहीं फंस गए तो कम से कम गौरीकुंड तो पहुँचना ही था. रास्ता सीधा साधा था देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, गुप्तकाशी होते हुए सीधा गौरीकुंड जहाँ से केदारधाम की 14 किमी की पैदल यात्रा शुरू होती है.

जैसा कि मुझे पता था थोड़ी देर में जब नींद सताने लगेगी तो कुंदन अपने आगे बैठने के निर्णय पर पछतायेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही. उजाला होते ही कुंदन अपने लिए पीछे एक सीट की तलाश करने लगा और भाग्यवश एक सीट पर उसने कब्ज़ा जमा ही लिया. बस इस बार ब्यासी ना रूककर सीधे देवप्रयाग जाकर रुकी जहाँ हम लोगों ने शौच आदि से निवृत होकर, एक ढाबे पर जमकर चाय पराँठे पेले. बस फिर श्रीनगर होते हुए रुद्रप्रयाग की और अग्रसर हो चली. यहाँ पहुँचकर हमें गौरीकुंड की बस लेनी थी, बस का पता किया तो इसके आने में अभी थोडा समय था. पर समय हमारे लिए बड़ा कीमती था, इसलिए जीप वालों से पूछतात करने पर एक जीप सीधा गौरीकुंड के लिए मिल ही गयी, पर वो भी फिलहाल सवारियों की बाट जोह रही थी. हालाँकि मेरी पसंदीदा आगे वाली सीट पर पहले ही किसी और ने कब्ज़ा किया हुआ था, इसलिए पीछे की सीट से ही संतुष्ट रहना पड़ा. जल्द ही जीप फुल हो गयी और यात्रा फिर शुरू. यहाँ से आगे की यात्रा में हमें सौभाग्यवश कहीं कुछ खास ट्रैफिक जाम नहीं मिला. और हम लोग अगस्तमुनि, गुप्तकाशी होते हुए लगभग दो बजे गौरीकुंड पहुंचे. हमारी आज की प्लानिंग सफल रही, ऋषिकेश से गौरीकुंड हमें कुल मिलाकर लगभग 11 घंटे लगे बस/जीप में सफ़र करते हुए.

एक पहाड़ी दंपत्ति अपने बाजों के साथ...

एक पहाड़ी दंपत्ति अपने बाजों के साथ…

 

तप्त कुंड...

तप्त कुंड…

 

गौरीकुंड पहुँचकर बड़ा सुकून मिला पर थोडा अचरज भी जरुर हुआ जब हमने यहाँ सेना की टुकड़ियों को इतनी तादात में काम करते हुआ पाया. सारा माजरा थोड़ी देर में वहां हो रही अनाउंसमेंट से समझ में आया. दरअसल केदारनाथ में कपाट खुलने के पहले से ही लगातार बर्फ़बारी हो रही थी और 50 साल से ऊपर के लोगों और ह्रदय के मरीजों को ऊपर जाने से रोका जा रहा था जिसका कारण था अब तक यहाँ ठण्ड के कारण हुई यहाँ 5 मौतें, यह एक ह्रदय विदारक घटना थी. सेना के जवान यात्रियों को सभी प्रकार की मेडिकल सुविधाएँ प्रदान कर रहे थे. चूँकि कुंदन इस तरह की ऊंचाई पर पहली बार आया था, इसलिए उसने भी सेना के शिविर में जाकर अपनी डॉक्टरी जाँच कराई और अपने लिए कुछ आवश्यक दवाईयाँ ली. गौरीकुंड से केदारनाथ की 14 किमी की पद यात्रा कोई भी स्वस्थ व्यक्ति लगभग 6 या 7 घंटे में पूरी कर सकता है. पद यात्रा के अलावा यात्रियों के लिए खच्चर, पालकी और हेलिकॉप्टर की सुविधा भी मौजूद है. यात्रा के शुरू में ही डंडी व कंडी वाले काउंटर हैं जहाँ से आप इनकी बुकिंग करा सकते हैं जबकि हेलिकॉप्टर की बुकिंग फाटा से की जा सकती है.

 

खच्चर मंडी...

खच्चर मंडी…

 

पालकी...

पालकी…

 

अभी लगभग 2 ही बजे थे हमने सोचा पद यात्रा शुरू करते हैं, केदार ना सही तो कम से कम रामबाड़ा तक तो पहुँच ही सकते हैं रात बिताने के लिए. तप्त कुंड के पास पहुंचे तो एक बार मन किया कि एक डुबकी लगा ही ली जाये, पर फिर समय की दुहाई देकर स्नान रद्द कर दिया गया. रंगबिरंगे बाज़ार से गुजरते हुए, हम लोगों ने चढ़ाई शुरू कर दी. चूँकि यात्रा अभी शुरुआती दौर में ही थी इसलिए यात्रियों से ज्यादा सामान ढोने वाले लोगों की तादात ज्यादा थी जो अपनी दुकानों और यात्रियों के लिए आवश्यक सामग्री ले जा रहे थे. हमारे लिए ये अच्छा ही था, कम भीडभाड में यात्रा का ज्यादा आनंद लिया जा सकता है.

पहाड़ों को चीरकर आती माँ मन्दाकिनी...

पहाड़ों को चीरकर आती माँ मन्दाकिनी…

 

एक मील के पत्थर के पास कुंदन...

एक मील के पत्थर के पास कुंदन…

 

हरीभरी घाटी...

हरीभरी घाटी…

 

कुछ मेहनतकश कदम...

कुछ मेहनतकश कदम…

 

रास्ते भर कुछ तीर्थ यात्रियों के अलावा कई संतों की टोली के भी दर्शन हुए. पर एक विदेशी महिला यहाँ लोगों के आकर्षण का केंद्र लगातार बनी रही, ये भगवा वस्त्रधारी महिला भक्ति भावना से अभिभूत नंगे पैर ही पद यात्रा कर रही थी और थोड़ी थोड़ी हिंदी भी जानती थी, हमारे लिए ये अनुभव किसी प्रेरणा से कम नहीं था. मनमोहक वादियाँ, कलकल बहती हुई मन्दाकिनी, खुबसूरत झरने और सहयात्रियों का उत्साह सब मिलकर यात्रा को आनंददायी बना रहा था, अब बस इंतज़ार था बर्फ़ीली चोटियों के दर्शन का. और रामबाड़ा पहुँचने से पहले ही इस विस्मयकारी दृश्य के दर्शन हो गए. लगभग 5 बजे से पहले ही हम लोग रामबाड़ा पहुँच चुके थे, ऐसे में कुंदन का थकान से बुरा हाल था. पर फिर भी हम दोनों ने यात्रा जारी रखने का निश्चय किया. जैसे जैसे रामबाड़ा से परे जा रहे थे कुदरत हम पर अपना जादू बिखेरे जा रही रही थी.

खुबसूरत झरना...

खुबसूरत झरना…

 

घाटी में रामबाड़ा और पीछे हिमशिखर...

घाटी में रामबाड़ा और पीछे हिमशिखर…

 

सामान ले जाते लोग...

सामान ले जाते लोग…

 

खुबसूरत घाटी...

खुबसूरत घाटी…

 

गरूड़चट्टी के नजदीक ही हमें प्रकृति की तरफ से एक खुबसूरत उपहार मिला, हमारे जीवन की पहली बर्फ़बारी. ऐसा मंज़र आज से पहले कभी नहीं देखा था, हलके हलके रुओं की तरह गिरती बर्फ एक खुबसूरत एहसास दिला रही थी. ये मौका भला हम अपने हाथ से कैसे जाने देते और हम लोग बर्फ़बारी का आनंद लेते हुए आगे बढ़ने लगे. धीरे धीरे अंधेरा सा होने लगा और अब रास्ता देखने में भी दिक्कत आने लगी थी. पर चिंता की कोई बात नहीं थी क्योंकि हम केदारधाम से नजदीक ही थे.

रामबाड़ा ऊपर से...

रामबाड़ा ऊपर से…

 

बर्फ़बारी का आनंद लेता कुंदन...

बर्फ़बारी का आनंद लेता कुंदन…

 

बर्फ़बारी जारी है...

बर्फ़बारी जारी है…

 

चूँकि रास्ते भर हलकी हलकी पिघली हुई बर्फ पड़ी थी जिस पर चलना थोडा मुश्किल हो रहा था, पर हमने कर डाला और आखिरकार हम पहुँच ही गए भोले के द्वारे लगभग 8 बजे. स्वागत द्वार से पहले और इसके बाद बर्फ का अम्बार लगा था, किसी तरह एक दुसरे को सहारा देते देते हम लोग ऊपर पहुंचे. चूँकि अभी यात्रियों की आवाजाही ज्यादा नहीं हुई थी इसलिए हमें 300 रुपए में रात बिताने का एक ठिकाना मिल गया. थकान और ठण्ड के मारे हाल इतना बुरा हाल था का कि दुबारा बाहर जाने की हिम्मत ही नहीं पड़ी और हम लोग कल सुबह जल्दी उठकर भोले के दर्शन का वायदा करके सो गए…क्रमशः…

About Vipin

Vipin Gaur has written 14 posts at Ghumakkar.

Love jungles, mountains, lakes, rivers, flowers, animals (including social animals). In one word, i'm a 'junglee' and my name approves of this. Wandering in the hills energises and refreshes me, gives me an opportunity to discover and understand myself......

Getaway Jungle Camp

26 Responses to “केदार यात्रा: ऋषिकेश – रुद्रप्रयाग – केदारनाथ”


  1. SilentSoul says:

    रोचक व त्वरित यात्रा थी… हमारी भी पुरानी यादें ताजा हो गयी … तुम इतना घूमने वाले और बर्फबारी पहली बार देखी ???

    काली मठ रास्ते में कहां से आ गया ?? उसका रास्ता तो गुप्तकाशी से अलग हो जाता है.. कोइ ऐसा रास्ता तो नही जिसकी मुझे जानकारी नहीं है.

    अगले भाग की इंतजार में

    • Vipin says:

      लेख पसंद करने व टिप्पणी के लिए शुक्रिया, एस एस जी. वैसे मैं अभी ज्यादा घूमा नहीं हूँ आप लोगों की तरह…पहली बर्फ़बारी हमने लगभग 10 बरस पहले वैष्णो देवी में देखी थी लेकिन दर्शन के लिए पंक्तिबद्ध होने के कारण हम उसका आनंद नहीं ले पाए थे…

      आपने सही पकड़ा, कालीमठ का रास्ता थोडा सा अलग है…दरअसल कई बरस पहले की गई केदार की यात्राओं में कालीमठ भी शामिल था जिस कारण ये शब्द दिमाग के किसी कोने में केदार के साथ जुड़ गया…इस बार भी इस रूट पर केदार के साथ इसे शामिल करने की योजना तो थी पर हम अपने प्रोग्राम से एक दिन पीछे थे इसलिए इस बार इसे छोड़ दिया गया…इसे उपरोक्त लेख में ठीक कर लिया गया है…धन्यवाद!

  2. Abheeruchi says:

    Apka Post padh kar accha laga, himshikhar ka pic bahut hi sundar hai.

    Aage wale post ki pratiksha me.

    Keep travelling, keep writing.

    • Vipin says:

      लेख पसंद करने के लिए शुक्रिया, अभीरुची जी. अगले लेख में हिमशिखर को और करीब से देख पाएंगे, उम्मीद है आपको पसंद आएगा…

  3. D.L.Narayan says:

    वाह विपिन भाई, आप ने ग़ज़ब कर दिया। बहुत ही सुन्दर वर्णन, ख़ास करके बर्फ़बारी का। वाकई में मज़ा आ गया,धन्यवाद।

  4. केदार बाबा की जय हो .

    मजेदार यात्रा रही . काफी बड़ा सफर तय कर लिया . मैं होता तो यकीनन गौरीकुंड में रुक जाता. केदारनाथ जाने की इच्छा बहुत होती है देखते है बाबा कब बुलाते है .

    • Vipin says:

      भोले बाबा का बुलावा आपके लिए जल्द ही आये, ऐसी कामना है….धन्यवाद, विशाल भाई!

  5. bhupendra singh raghuwanshi says:

    Dear Vipin jee,
    bhut hi shandar varnan. aapke lekh se hamari kedar yatra ki yad taza ho gayee.hamne bhi jamin par barf sabse pahle manali (rohtang) me aur aasman se girti hue barf kedarnath se vapas utrte samay dekhi thee.
    aapse ek nivedan hai ki es site ke res manager ko boliyega ki kuch esa serch adjusment kare ki hindi aur english ke yatra vivran alag alag ho jaye aur koi bhi agar kisi place ko search kare to language ke hisab se sare vivran ek sath mil jaye.

    bhupendra singh raghuwanshi

    • Vipin says:

      लेख पसंद करने और टिप्पणी के लिए शुक्रिया, भूपेंद्र जी!

  6. vinaymusafir says:

    Well written post with well clicked pics.
    Waiting for next part.
    Minimum how many days needed for Kedarnath yatra, if one travels in public transport?

    • Vipin says:

      Thanks Vinay bhai for liking the post. Minimum this trip can be done in 4 nights (2 nights in buses & other 2 nights at Gaurikund & Kedarnath)/5 days on a hectic program (not recommended for family travelling together). Leisurely a week (from Delhi) is enough to see Kedarnath & surrounding places.

  7. Ritesh Gupta says:

    विपिन जी…..
    कुदरत का काम तो है ही जादू बिखेरना और केदारनाथ जी के रास्ते में प्रकृति ने अपना अनुपम सौंदर्य लुटा रखा हैं । आपकी यात्रा काफी मजेदार रही सुबह अंधेंरे में चलकर काफी लंबा रास्ता तय किया हैं, यह पहाड़ी सफ़र बहुत थका देने वाला होता हैं । हम जैसे मैदानी इलाके में रहने वालो को यदि कही बर्फ पड़ते हुए मिल जाए तो अनूठा संयोग ही होता हैं….हमने पहली बार पटनीटॉप में बर्फ पड़ते देखी थी….. ।
    अच्छे लेख और जानकारी के लिए धन्यवाद !

    • Vipin says:

      शुक्रिया रितेश भाई, पहाड़ों में जाकर शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार हो जाता है, थकान मिटाने के लिए कुदरती नज़ारे काफी होते हैं…

  8. Nandan Jha says:

    कमाल की उर्जा रखतें हैं विपिन भाई । पहले तो गंगा तट पर रात बिताना , फिर बीच रात में सोये हुए शहर में , मुश्किल का सामना करते है, एक बहुत ही लम्बी जीप यात्रा से आप गौरीकुंड पहुंचे और फिर जैसे की अभी कुछ ख़ास हुआ न हो, आप केदार पहुँच गए । बम बम भोले है ये तो । इस बात के लिए सलामी है । :-) , अंग्रेजी में कहतें हैं की .”Take a Bow”

    @ भूपेंद्र जी – इस बारे में कोशिश की जायेगी । आप चाहे तो गूगल में हिंदी में सर्च करें “केदार नाथ ghumakkar.com” और आपको सभी संगत लिंक मिल जायेंगे । आपसे आग्रह भी है की देवनागरी में लिखें , पढने में सुविधा रहती है ।

    • Vipin says:

      शुक्रिया नंदन, इसे सिर्फ और सिर्फ कुदरत का करिश्मा ही मानिए इन वादियों की आबो हवा एक जोश, उत्साह और नई उर्जा पैदा कर देती है. यकीन मानिए जब में सिर्फ पहाड़ों की फोटो भर भी देख लेता हूँ तो एक प्रेरणा और उत्साह सा जाग जाता है…”a great Bow to mother nature”…

  9. Stone says:

    विपिन भाई, दिल खुश हो गया यह लेख पढ़ कर .
    सचमुच आपके stamina और जोश का ज़वाब नहीं , अब लगता है मुझे पहले कुछ महीने ट्रेनिंग करनी पड़ेगी आपके साथ किसी यात्रा पर जाने से पहले :-)
    अगले अंक की प्रतीक्षा में।

    • Vipin says:

      संदीप जी, आप खुश हुए तो हमारा लेख सफल रहा. वैसे मेरा मानना है, साधारण पहाड़ी यात्राओं में ट्रेनिंग से ज्यादा इच्छाशक्ति की जरुरत पड़ती है, गढ़वाल की इस यात्रा और पिछली यात्रा, दोनों में वो लोग मेरे साथ थे जो शायद पहली बार पहाड़ों की इन ऊँचाईयों पर आये थे, फिर आप तो घुमक्कड़ प्रजाति से हैं…:)…वैसे भी अब फिलहाल कम से कम एक साल तक तो कोई कठिन यात्रा करना थोडा मुश्किल है, उम्मीद है आपके साथ जल्द ही किसी पहाड़ी सफ़र पर जाने का सौभाग्य प्राप्त होगा…

  10. Wonderful post Vipin and very good description.
    what more shall I say.
    I just wish to write a similar post sometime by mid of this year…pending for almost a decade now!
    anxiously waiting for the next one.

  11. Mukesh Bhalse says:

    विपिन,
    आपने तो बस आज मेरा दिन ही बना दिया। बहुत ही रोचक वर्णन था, बड़े शौक तथा रूचि से मैंने इसका एक एक शब्द पढ़ा और आनंद लिया। बर्फ़बारी का चित्र सचमुच बहुत ही ख़ूबसूरत लग रहा है। चित्र से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की आपलोगों ने उन लम्हों का कितना आनंद उठाया होगा। अगली पोस्ट में बाबा केदारनाथ के दर्शनों की लालसा तथा प्रतीक्षा रहेगी।

    “भोले की फौज करेगी मौज”

    • Vipin says:

      उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया, मुकेश जी. केदार दर्शन जल्द ही…

  12. kavita Bhalse says:

    विपिन जी ,
    पहले भी बहुत लेख केदारनाथ के पढ़ चुके है पर हर बार एक रोमांच बढ़ता जाता है और पढने और देखने की इच्छा बढ़ जाती है .उम्दा लेखन और फोटो भी लाजवाब . बर्फ़बारी का बहुत ही अच्छा लगा .
    वैसे यह जगहे तो हमारे लिए स्वप्न जैसे सी है बहुत जल्द ही साकार होने की आशा है .अगली कड़ी के इंतजार में .
    धन्यवाद .

    • Vipin says:

      शुक्रिया, कविता जी…जिस तरह आप लोग शिवालयों के दर्शन करते जा रहे हैं, उम्मीद है भालसे परिवार केदार में जल्द ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा और भोले के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करेगा…

  13. Saurabh Gupta says:

    You are great Vipin Ji.

    कहा से लाते हो इतना जोश और हिम्मत। और टीवी सीरियल की तरह ” शेष अगले भाग मे ” लिखकर सस्पेंस बढ़ा देते हो।

    What a good style you have of writing but don’t keep us waited for the rest part and in last” Saadhu baba ki jai ho” a good watchman for ladies on ghat.

    thanks for sharing the wonderful trip.



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