बीकानेर-रायसर कैम्प में राजस्थानी कालबेलिया नृत्य के संग मदहोश शाम |
बीकानेर में दिन में हम करणी माता चूहों वाला मन्दिर, जूनागढ़ किला, राजमहल, रिजार्ट, सहित कई सारे होटल देखने के बाद शाम को हमारी बारी बीकानेर की रेत के टीलों पर एक कैम्प में रंगीन नशीली शाम बिताने की देखने की इच्छा हो गयी थी। इस प्रकार की जगह पर लगने वाले कैम्प रात को अंधेरा होने के बाद शुरु होते थे, जिस कारण हम भी अंधेरा होने से पहले ही वहाँ पहुँच गये थे। चलिये आपको भी इसी शानदार मस्त स्थल की सैर करवा देता हूँ। (वैसे आज मेरी 100 पोस्ट पूरी (यानि शतक) हो गयी है। इ्सी कारण एक जबरदस्त घोषणा भी कर रहा हूँ, कि अपना सफ़र यहाँ विश्राम करता है। इसे देखकर आपको दुबई याद आ जायेगा। मैंने नहीं देखा, लेकिन जिसने देखा होगा, वो यही कहेगा।
सबसे पहले हम लोग कार से बीकानेर-जयपुर राजमार्ग पर चलते रहे, इस पर कुछ दस किमी चलने पर हमें रायसर गाँव दिखाई दिया था यहाँ से हमें सीधे हाथ पर गाँव के बीच से होते हुए यहाँ तक पहुँचना था। पहले तो हमने सोचा कि रेत के टील यहाँ से नजदीक ही होंगे, लेकिन जब हमॆं कार से चलते हुए दो-तीन किमी हो गये तो मैंने कार चालक से कहा “क्यों महाराज, कहाँ रह गये रेत वाले टीले?” कार चालक ने कहा कि बस दो चार मिनट में आने वाले है। और सही में कुछ देर बाद ही रेत के टीले दिखाई देने लगे थे।
ऊपर के फ़ोटो में आपको यहाँ का कैम्प दिखाया गया है, जब हम कार से यहाँ आ रहे थे तो कच्चे वाले मार्ग पर हमे कुछ विदेशी ऊँट व ऊँट गाडी पर सवार होकर यहाँ इसी दिशा में आते हुए मिले थे। जब विदेशी लोग इस ओर आ रहे थे तो मैंने सोचा था कि यह लोग यहाँ रेत पर टाइम-पास करने के लिये घूम रहे है। लेकिन जब उन्हें मैंने यहाँ इस कैम्प पर आते देखा तो समझ आया कि यह लोग भी हमारी तरह आज की शाम यहाँ के मेहमान बनकर आये है।
एक फ़ोटो मैंने लगभग यहाँ से ही लिया था जिसमें यहाँ की ऊँचाई दे नीचे खडी गाडियाँ दिख रही है। जबकि इसमें सिर्फ़ खेत ही दिख रहे है।
नीच वाले चित्र से आप समझ सकते हो कि रेत के टेल कितने ऊँचे थे क्योंकि जहाँ से खड़े होकर यह नीचे वाला फ़ोटो लिया गया था वहाँ से कार व बस भी नन्ही सी छोटी-छोटी सी ही दिख रही थी। सभी लोग नीचे ही जहाँ पर पार्किंग बनी हुई थी वहाँ से ऊपर तक पैदल ही आये थे। रेत में चलना एक अलग बात है और रेत की चढ़ाई चढ़ना उससे भी अलग अनुभव करने वाली बात होती है यह हमने यहाँ पर रेत पर चढ़कर जाना था।
ऊपर आकर देखा तो वहाँ पर लोगों के रात में ठहरने के लिये टैन्ट भी बने हुए थे। जिस समय हम वहाँ पहुँचे थे उस समय तक वहाँ सिर्फ़ वहां पर काम करने वाले कर्मचारी मौजूद थे। विदेशी लोग तब तक वहाँ नहीं आये थे। जैसे-जैसे अंधेरा होता रहा वैसे-वैसे वहाँ आने वाले मेहमानों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही थी। यहाँ आने वाले ज्यादातर मेहमान विदेशी ही थे, इनमें से भारतीय तो छ:-सात ही दिख रहे थे।
ऊपर के चित्रों में आप देख रहे है कि कैसे रात मदहोश-रंगीन करने के लिये तरह-तरह के ब्रान्ड उपलब्ध कराये गये है। नीचे एक फ़ोटो और है जहाँ आप और ज्यादा संख्या में मदिरा का खजाना देख सकते है, आप सोच रहे होंगे कि जाट भाई तो इन मदिराओं को पीते नहीं है फ़िर क्यों दिखा रहे है? क्या हुआ मैं नहीं पीता तो दुनिया में बहुत से ऐसे लोग है जो इन्हें पीते है क्या पता उन्हें मेरा लेख देखकर यहाँ जाने की तमन्न जाग उठे।
ऊपर वाले फ़ोटो में जरा ध्यान से देख लेना क्या पता आपका पसन्दीदा ब्रान्ड दिखायी दे रहा हो? मेरी पसन्द वाला तरल पदार्थ सबसे दाँये हाथ रखा हुआ है जरा ध्यान से कही समझने में कुछ चूक ना हो जाये नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। संतरी कागज वाला डिब्बा जिसमें संतरे का रस पैक होता है वो मेरी पसन्द है। यहाँ कमल भाई की पसन्द नहीं दिख रही है क्योंकि वो मदिरा नहीं पीते है। अगर पीते भी होंगे तो मेरे सामने उन्होंने मन्दिरापान नहीं किया था।
इस ऊपर वाले फ़ोटो में देखकर आप अंदाजा लगा सकते हो महफ़िल अपने पूरे शबाब पर आ चुकी थी। जैसे-जैसे अंधेरा होता जा रहा था मेहमान आते जा रहे थे और साथ ही अपनी-अपनी सीट पर विराजमान होते जा रहे थे। एक ऐसी ही मेज पर वहाँ के कैम्प मालिक के साथ हमारी भी सीट रिजर्व हो चुकी थी, पहले घन्टे तो ढ़ेर सारी कामकाजी बाते होती रही उसके बाद खाने-पीन का दौर चला था जिसमें जिसको जो पसन्द आया था उसने वो खाया-पिया था। खाने-पीने का दौर समाप्त होते ही राजस्थान की जान वहां की पहचान कालबेलिया नृत्य का प्रदर्शन करने वाले कलाकार अपनी सीट सम्भालने में लगे हुए थे।
इन कलाकारों ने पहले पहल तो वहां पर मौजूद दो महिला नर्तकी ने बारी-बारी से अपना राजस्थानी हुनर दिखाकर हम सबको अपना दीवाना बना लिया था। यह कार्यक्रम लगभग दो घन्टे चला होगा लेकिन समय कैसे कटा हमें पता ही नहीं लग पाया था। इन कलाकारों के तीन पुरूष साथी थे जो क्रमश: ढ़ोलक, बांसुरी व ढ़पली बजाने की ताल देने में सहयोग कर रहे थे।
इन महिला कलाकारों की हिम्मत को देखकर दाँतो तले अंगुली दबाने को जी चाहता था (लेकिन अंगुली कट ना जाये इसलिये दबाई नहीं) पहले साधारण नाच-गाने के बाद इनका प्रदर्शन कुछ खतरनाक होता गया था जिसमें उन्होंने सिर पर सात-आठ घड़े ल्गाने के बाद कील के प्लेटफ़ार्म पर खड़े होकर अपना जोखिम वाला नृत्य दिखाया था। इसके साथ ही इनके कारनामें समाप्त नहीं हुए थे इसके बाद इन्होंने कील वाले स्थान पर काँच बिखेर कर उस पर नाचना शुरु कर दिया था।
अब आपके लिये दूसरा सवाल यह है कि इस गिलास में बियर भरी हुई है। यह किसने पीया होगा।
अब आखिरी सवाल यह है कि मेरी पसन्दीदा पेय पदार्थ को मैंने कितने गिलास पिया होगा?
दोस्तों, इस शानदार रंगीन शाम को बिताने के बाद हमारी बारी इस बीच में अधूरी छोड़कर वहाँ से चलने की थी क्योंकि बीकानेर से रात दस बजे हमारी ट्रेन दिल्ली के चल देनी थी जिस कारण हमने वहाँ अपने दोस्तों को पहले ही सूचित कर दिया था, जैसे ही रात के नौ बजे हमने अपनी सीट छोड़ दी थी। वैसे यह शानदार कार्यक्रम बीच में अधूरा छोड कर उठने का मन तो नहीं कर रहा था। जब हम वहां से विदा होने लगे तो वहाँ की परम्परा अनुसार वहाँ के कैम्प संचालक ने हमें पानी की एक-एक बोतल देकर हमें विदा किया था।
कार चालक ने हमें स्टेशन पर उतारा, यहाँ हमनें प्रेम सिंह जी से विदा ली, प्रेम सिंह भाई लगभग पूरा दिन हमारे साथ रहे थे, उनका व्यवहार उन्हें बहुत अच्छा इनसान बनाता है। एक ऐसे मानव जो हमेशा याद रहेंगे, जब भी कभी मैं बीकानेर गया तो इनसे मिलकर जरुर आऊँगा। अब हम स्टेशन तो आ गये थे लेकिन यहाँ हमारे साथ एक मजेदार घटना घटित होने वाली थी जिसका हमें अंदाजा भी नहीं था। हुआ कुछ ऐसे कि जैसा मैंने आपको पहले के लेखों में बता दिया था कि हमने पहले दिन ही यहाँ से वापसी का टिकट बुक किया था जो बुक करते समय वेटिंग में था, हम ट्रेन चलने से लगभग आधे घन्टे पहले स्टेशन पहुँच चुके थे। मैने कमल भाई से कहा कि कमल अपना लैपटॉप निकालो क्योंकि अब अब तक हमारी सीट रिजर्व हुई या नहीं इस बात का पता लगाने के लिये हमें लैपटॉप से बेहतर उपाय दूसरा नहीं लगा, वहाँ पर रिजर्व चार्ट भी लगा हुआ था लेकिन उसमें अपना नाम तलाश करना टेडी खीर साबित होने वाला था। कमल ने लेपटॉप निकाल कर मुझे दे दिया था। मैंने नेट चलाकर उसमें अपना टिकट नम्बर डालकर अपनी सीट के बारे में जान लिया था कि अपनी सीट किस डिब्बे में है।
असली घटना जिसके बारे में मैं आपसे कह रहा था वह यहाँ से शुरु होती है। हमने ट्रेन के अपने डिब्बे में जाकर अपनी सीट पर डेरा जमा दिया था, हमें अपना डेरा जमाये मुश्किल से दो-तीन मिनट ही हुये थे कि वहाँ पर एक पूरा परिवार जिसमें पति पत्नी के अलावा, दो लडकी, एक लडका जिनकी उम्र क्रमश: 12-13-14 के आसपास रही होगी। जिस बन्दे का यह परिवार था उसने आते ही हम पर राशन पानी लेकर हमला शुरु कर दिया कि यह सारी सीट हमारी है हटो या से, कहाँ तो हम सीट मिलने की खुशी में अब तक अपना सामान फ़ैलाये जा रहे थे, और अब कहाँ हमारे सिर आफ़त टूट गयी थी। मैं निराश नजरों से कमल भाई की ओर देखता रहा। इस दौरान उस परिवार ने उन सीट पर अपना सारा सामान फ़ैला दिया था। अब शर्म के मारे हमारा बुरा हाल हो गया था, कमल भाई ने जितनी बीयर पी थी वो सारी उतर गयी थी। मैंने उन महाशय से कहा कि हम आपका टिकट देखना चाहते है। वो तो टिकट भी हाथ में लेकर ही हमारी छाती पर चढने को तैयार खडे थे। जैसे ही उन्होंने मुझे टिकट दिया और मैंने टिकट पर उनका उसी डिब्बे में कनफ़र्म सीट नम्बर देखा तो मानो मेरा खून शर्म के मारे पानी-पानी हो गया था। मुझे बेहद दुखी मन से वह सीट छोड़नी पडी थी, मुझे सीट छोड़ने का दुख नहीं था, दुख तो इस बात पर हो रहा था कि उनके बच्चे हमें देखकर हँस रहे थे, और तो और जब हम सीट से जा रहे थे, वो आपसी वार्तालाप में हमारी मजाक भी उडा रहे थे।
हम दोनों अपना सामान लपेट(यहाँ समेटना शब्द भी काम नहीं आ रहा है) कर डिब्बे से बाहर आ गये थे। बाहर आकर मैंने सोचा चलो एक बार डिब्बे के बाहर लगा चार्ट देख लेते है। हो सकता है कि हमने सीट नम्बर देखने में गलती की हो। जैसे ही हमने चार्ट देखा तो उसमें हमें अपना नाम मिल गया था, गजब यह कि नाम के सामने सीट नम्बर भी वही दर्शा रहा था जो हमने नेट से देखकर लिखा था। अब मामला मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि एक सीट को रेलवे वाले दो बन्दों को कैसे दे सकते है? तभी मुझे वहाँ एक टीटी दिखाई दिये मैंने उन्हें अपनी परॆशानी बतायी तो उन्होंने कहा कि आप उस परिवार का टिकट दुबारा चैक करे उसमें कुछ गडबड है। मैंने खिडकी से ही उस परिवार का टिकट लेकर दुबारा देखा तो पाया कि इस परिवार की गाडी तो यह है ही नहीं जिसमें हम जा रहे है। उनकी गाडी तो दो घन्टे पहले जा चुकी है। जैसे ही मुझे इस बात का पता लगा तो अब उनके ऊपर हावी होने की मेरी बारी थी। मैंने उनका टिकट उन्हे देकर कहा कि जल्दी करो सीट खाली करो आपकी ट्रेन यहाँ से दो घन्टे पहले जा चुकी है। उस परिवार की बेहूदा खूशी अब मुझे कही नहीं दिख रही थी, मैंने कही सुना तो था जैसे को तैसा, उस दिन मैं खुद वहाँ यह देख भी लिया था। जिस प्रकार उन्होंने हमें वहाँ से रुखसत किया था उसी प्रकार उन्हे वहाँ से रुखसत होना पडा था। हम अपनी सीट पर आराम से सोते हुए दिल्ली पहुँचे थे। हमारी राजस्थान यात्रा यहाँ समाप्त हो जाती है।
कुल शब्द 2425
आज मेरी 100 पोस्ट पूरी हो गयी है। इसके साथ ही साल भी समाप्त, आप सबको साल सहित अलविदा, आपके जवाब, मैं गोवा से आने के बाद दूँगा। तब तक राम राम, अलविदा दोस्तों,
आपको यह स्पष्ट कर देता हूँ कि मैं अंग्रेजी नव वर्ष मनाने गोवा नहीं जा रहा हूँ, मैं तो वहाँ पर ट्रेकिंग करने जा रहा हूँ। क्योंकि ट्रेकिंग खासकर पहाड़ो की व लम्बी ट्रेकिंग मेरा प्यार है। मैं आज सुबह गोवा पहुँच चुका हूँगा, जब आप इस लेख को पढ़ रहे होंगे, मैं चला, सैंचुरी का जश्न मनाने। गोवा से आते ही कमेन्ट में आपको एक धमाका भी दिखाई देगा। जिसके लिये मैं आपके पास तीन option छोड़ कर जा रहा हूँ, जिसमें से आपको यह बताना है कि मैंने इनमें से कौन सा option करने की ठान रखी है। आपके मन की शंका का समाधान आपको 10 जनवरी को शाम तक कमेन्ट के जवाब के रुप में मिल जायेगा। आपके कमेन्ट में मुझे नीचे दिये तीनों option में से किसी एक का जिक्र चाहिए। देखते है कि गोवा वापसी तक मेरा मन बदलता है कि नहीं, तब तक राम-राम।
A– मैं आगे से सप्ताह में सिर्फ़ एक पोस्ट ही लिखूँगा।, अपने लेख पर आये कमेन्ट का जवाब नहीं दूँगा।
B––मैं अब एक भी लेख ना लिखू, ना ही किसी लेख पर कमेन्ट करने आया करुँ, सिर्फ़ घुमक्कड़ी करुँगा।
C-—मैं खुद कोई लेख ना लिखकर, अन्य लेखकों के अच्छे लेखों पर केवल कमेन्ट करने ही आया करुँगा।
करिये इन्जार।
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.option C पर मैंने पक्का इरादा कर लिया है, अब मैं आगे सिर्फ़ अपने ब्लॉग jatdevta.blogspot.in पर ही लिखा करूँगा। जिसे आप google में jatdevta टाइप करके भी पहुँच सकते हो।
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जाट देवता,
100 पोस्ट के लिए आप को बहुत बहुत मुबारकवाद। आप गिलास में संतरे का जूस पी रहे हैं। बीकानेर का वर्णन काफी अच्छा है, और फोटो भी सुंदर हैं . मैं ऑप्शन “A–मैं आगे से सप्ताह में सिर्फ़ एक पोस्ट ही लिखूँगा।, अपने लेख पर आये कमेन्ट का जवाब नहीं दूँगा।” सेलेक्ट करता हूँ, आप से भी गुजारिश है, ऐसा कोई सख्त फैसला ना लें, जो बाद में बदलना मुश्किल हो. पाठक एक लेखक का सरमाया होते हैं, पाठक ही लेखक को महान बनाते हैं।
धन्यवाद
100 पोस्ट के लिए आप को बहुत बहुत मुबारकवाद।
फैंसले तो बदलते रहते है. उम्मीद करते है की जल्दी से २०० वे पोस्ट पर पैर जमा डालें.
प्रवीण जी फ़ैसला कब बदलता है इन्तजार करे।
संदीप जी शतक पूरा करने के लिए बहुत बहुत बधाई…राम राम, वन्देमातरम…
2012 ends with a bang; Jat Devta scores the first ever century in ghumakkar history.
शतक पूरा करने की शुभ अवसर पर हमारे मान्यवर जाट देवता संदीप पंवर को हार्दिक शुभकामनाएं।
आशा है की आप आने वाले सालों में ऐसे ही सुन्दर एंड ज्ञानवर्धक वृत्तान्त लिखते रहेंगे।
Hope that you are having a great time in Goa and wishing you and my fellow ghumakkars a very happy, prosperous and peaceful new year. May the Almighty bless the world with an era of peace, prosperity and harmony.
एक से बढकर एक यात्रा लेख आते रहेंगे, लेकिन यहाँ नये लेखकों को मौका देना ज्यादा उचित है।
संदीप भाई,
शतक पूरा होने पर आपको लख लख बधाइयां। और मैं भी आपके प्रश्न के जवाब में आप्शन A को चुनना चाहता हूँ, आप भले ही हफ्ते में एक पोस्ट लिखें लेकिन लिखते रहें और हमारी कमेंट्स का जवाब देते रहें।
घुमक्कड़ के सभी पाठकों को इस कमेन्ट के माध्यम से नए वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं। नव वर्ष आप सब के जीवन में सुख, ऐश्वर्य एवं खुशियाँ लाये ………………..
संदीप भाई, घुमक्कड़ पर पहला शतक जड़ने पर हार्दिक शुभकामनाएँ! नए साल का अच्छा जश्न है, कालबेलिया नृत्य एक बार मेने भी देखा था राजस्थान के किसी ऐसे ही रिसोर्ट में…कई खतरनाक करतब करते हैं ये लोग!
हमारी तो ये दुआ है कि घुमक्कड़ और घुमक्कड़ी का आपका सफ़र चलता रहे बरसों बरस यूहीं लगातार…आपको और समस्त घुमक्कड़ साथियों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!
शतक लगाने के लिए हार्दिक मुबारकबाद जाट देवता जी।
Congratulation apki 100 post ke liye.
Wish you and your family very happy and prosperous new year.
Keep travelling, keep writing.
Mera vote hai Option D ke liye….yaani aap likhte bhi rahiye AUR pratikriya bhi dete rahiye. Hamare liye OR ka nahin, AUR ka hona chahiye.
धुआंधार शतक की, नव वर्ष की, और गोवा में घुमक्कड़ी की बहुत बहुत बधाई एवं शुभ कामनायें !
संदीप भाई,
शतक पूरा करने की आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं।
मुझे तो आपके तीनो आप्शन पसंद नही आये है आपको आगे भी लिखना पड़ेगा और कमेन्ट भी करना पड़ेगा हमारे जेसे हिंदी प्रेमी लोगो के लिए.
भूपेंद्र
संदीप भाई….सबसे पहले सौवे लेख पर आपको बधाई …दूसरा बीकानेर-रायसर कैम्प की सैर कराने के लिए धन्यवाद……
तीसरा कैम्प के मदहोश करने वाले चित्र पसंद आये और चौथा मुझे आपको तीनों क्या कोई भी option पसंद नहीं….आप जैसे पहले थे वैसे ही अब भी रहो…..बस…|
रितेश भाई समय अनुसार बदलना सही रहता है।
congrats for your excellent century with such a beautiful post.
A well deserved century Sandeep and very nice series indeed.
Neither we have any Harold Larwood here nor there is (was) any bodyline series ahead, so why there is a suspense/guessing game of retiring so soon from here, Mr. Ghumakkar (courtesy Mr. Cricket, Mike Hussey).
Personally, I would like a combination from all the options or a new option altogether, i.e.:
Option E: One post in a week (still 52 posts in a year) from Option ‘A’ + Keep Travelling a lot (Ghumakkari) from Option ‘B’ + coments on good post(s) from Option ‘C’.
छोरे जाट के ने घुमक्कड़.कॉम पे सब ते पेल्या सेंचुरी लगाई, भाई घना बदिया कर्या, गल ते ला के मबारक दूँ सूँ. दूसरी मबारक इस बात की के तेरी लेख/भाषा लोकधर्मी (vernacular) स. तीसरी मबारक या स अक तू गोवा में अँगरेजी साल मनाने ना बल्कि सेंचुरी मनाने जा रया स. अब तन्ने या बुझ्झू सूं अक कभी ‘अखिल भारतीय जाट पत्रिका’ भी पड़े स, एक से एक जाट विद्वान, इंजीनीयर, डॉक्टर और बेरा ना के के. सब के अग्रिया श्रद्धा से नमन करण ने जी चा से. पर टोटा न्यून हो स जब अच्छा भला पद्या लिख्या कह अक मैं तीन ऑप्शन दे रिया हूँ अर तम बाताओ, लेख लख्खून अक ना, जवाब द्यू अक ना, घोड़े पे चडू अक ना, गधे पे बैठा अक ना.
हे परम् श्रधेय जाट देवता, आपको क्या हो जाता है, अकस्मात आप विकल्प पूछने लगते हैं, इस घुमक्कड़ परिवार का आपसे अथाह प्रेम है और इस मंच ने आपका कद शायद आपकी इच्छाओं के अनुरूप ही बढ़ाया होगा. किस शेर की वजह से किस जंगल की पह्चान है या किस जंगल की वजह से किस शेर की पह्चान है यह एक यक्ष प्रश्न है इसलिए :
रे जाट बिबा राणा बन के जिसा म्हारा जाट पेह्ले था उसी त्रियान बना रह. म्हारी बात अच्छी लागे तो मान लिए, ना तो भई आपणे घ्ररा सो. तू कह तो भाई माफी मांगू सूं
घुमक्कड़ परिवार को मेरी और से नव वर्ष की बहुत बहुत बधाई तथा मंगल कामनाये |
@ श्रद्धेय त्रिदेव चरण जी,
बीच में कूद पड़ने के लिए माफ़ी चाहता हूँ। मैं तो बस आपसे ये पूछना चाहता हूँ की आप ये कौन सी भाषा लिखते हैं? मुझे आपकी यह भाषा पढने में बड़ा मज़ा आता है और मैं बड़ा रस तथा आनंद लेकर आपकी इस भाषा की कमेन्ट के एक एक शब्द को चाव से पढता हूँ। मुझे नहीं मालुम यह किस क्षेत्र की भाषा है लेकिन बस इतना कहना चाहता हूँ की मुझे पढने में इतना मज़ा आता है तो सुनने में कितना मज़ा आता होगा ? कृपया बताने का कष्ट करें की यह भाषा किस क्षेत्र में बोली जाती है?
प्रिय मुकेश जी, जिज्ञासा का स्वागत है, यह भाषा हरियाणा प्रदेश की है (जो सन 1966 में पंजाब के तीन हिस्से हिमाचल-हरियाणा-पंजाब में से एक है) जैसे हर प्रांत में थोड़ी थोड़ी दूरी पर भाषा बदल जाती है उसी प्रकार यह क्षेत्रीय भाषा सोनीपत-पानीपत-करनाल क्षेत्र की है. यहाँ की भाषा को खड़ी/लथ्थ्मार भाषा कहा जाता है मगर वास्तव में यहाँ के लोग बड़ा हो या छोटा, बड़े ही सम्मान पूर्वक कटाक्ष करते हैं. इस प्रांत के बारे में कहा जाता है : “देसा मैं देश हरयाणा, जित दूध दही का खाना; प्यार के भूक्खे भोले मानस, सम्झेन खद ने स्याणा.
मुबारक हो संदीप जी । अंग्रेजी में कहें तो ‘गुड शो’ ,हे हे ।
मुझे नहीं मालूम था की सम के ही तरह बीकानेर में भी इस तरह की व्यवस्था है । धन्यवाद ।
आपके दो सवाल हैं इस लेख में, पहले उस पर आतें हैं । पहले सवाल (की बियर किसने पी) का जवाब थोडा कठिन है क्योंकि पिछले एक लेख में आपने ज़िक्र किया की कमल भाई को बियर तलबी हुई पर उपलब्ध नहीं हो पायी , इस लेख में आपने कहा की उन्होंने आपके सामने किसी मदिरा का सेवन नहीं किया और फिर फाइनली आप कह रहे हैं की ट्रेन के उहा पोह में उनका नशा काफूर हो गया । तो मिला जुला कर लगता है की कमल भाई या प्रेम सिंह या उस होटल / कैम्प के अधिकारी में से किसी ने सेवन किया होता । दूसरा सवाल का जवाब है की आपने करीब 2-3 गिलास जूस लिया होगा ।
और अब आपके द्वारा दिए गए ओप्शन्स । मेरा सुझाव ये है की समय का आभाव है तो कम लिखिए पर लिखिए ज़रूर, और बेहतर लिखिए, कमेंट्स का जवाब दीजिये और अपने पसंदीदा लेखों पर टिपण्णी करके लेखकों की हौसला अफजाही कीजिये । जय हिन्द ।
नन्दन जी अपने पसन्द के लेखों पर समय मिलने पर टिपप्णी कर दिया करुगा,
अपना option C पहले ही ok हो चुका था।
Hi Sandeep,
Congratulations on your century.
Do keep writing.
एक मनमौजी लेखक के नाते अपनी यहाँ से अलविदा, खुदा हाफ़िज,
कोई लेख अच्छा लगा तो कमेन्ट कर दिया नहीं तो बिना कमेन्ट किये, जै राम जी की।
तीन महीने हो गये, यहाँ लिखना बन्द किये। सोचा था कोई तो 100 पोस्ट से आगे बढ़ेगा, चलो खैर वो दिन भी आयेगा जब कोई 100 पोस्ट पार करेगा और मैं एक बार फ़िर नया धमाका कर सकूँगा।