खजियार – भारत का छोटा स्विट्ज़रलैंड

December 25, 2012 By:

डलहौज़ी की रात इतनी ठंडी थी, कि सुबह बिस्तर से बाहर निकलने का मन ही नहीं हो रहा था ! अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँक कर देखा तो सूर्योदय हो चुका था, फिर तो आलस को एक तरफ रखकर फटाफट बिस्तर से बाहर निकले, और अपने कमरे की छत पर पहुँच गए सुबह का नज़ारा देखने के लिए ! हमारे होटल की छत से बहुत ही सुन्दर नज़ारा दिखाई दे रहा था, सूरज की किरणें घने पेड़ों को चीर कर आ रही थी !

होटल की छत पर शशांक

होटल की छत पर शशांक

हम लोग थोड़ी देर वहीँ छत पर बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता को निहारते रहे,  फिर मोबाइल में समय देखा तो सुबह के सात बज चुके थे ! डलहौज़ी में आज हमारे पास घूमने जाने के लिए तीन जगहें थी, कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी, डायन कुण्ड,  और खजियार ! इन जगहों में सबसे दूर खजियार था, और एक दिन में इन सभी जगहों को घूमा नहीं जा सकता था ! हम आज का दिन छोड़ कर डलहौज़ी में एक दिन और रुकने वाले थे ! क्यूंकि डायन कुण्ड, और कालाटोप सेंचुरी आस-पास ही थे तो हमने सोचा कि आज का दिन खजियार घूम लिया जाए, और बाकी दो जगहों को अगले दिन घूमने के लिए छोड़ दिया !

खजियार जाने के इरादे से हम लोग छत से नीचे उतरे, और अपने कमरे में आकर तैयार होने लगे ! नहा-धोकर, सुबह का नाश्ता लेने के बाद हम लोग एक बैग में अपनी ज़रूरत की चीज़ें लेकर खजियार जाने के लिए निकल पड़े ! खजियार जाने के लिए डलहौज़ी से गिनती की बसें ही चलती है और ये बसें गांधी चौक से होकर जाती है, ये बात हम पिछली शाम को ही पता कर चुके थे !  हम लोग खजियार जाने के लिए नौ बजे वाली बस के इंतज़ार में गाँधी चौक पहुँच गए ! आप लोगों की जानकारी के लिए बता दूं कि खजियार को इसकी सुन्दरता की वजह से छोटा स्विट्ज़रलैंड भी कहा जाता है, ये हिमाचल का बहुत ही प्रसिद्ध दर्शनीय स्थान है ! डलहौज़ी से खजियार की  दूरी लगभग 22 किलोमीटर है, और डलहौज़ी से यहाँ आने के लिए प्राइवेट टैक्सी के अलावा पब्लिक बसें भी चलती है !

बस स्टैंड पर काफी भीड़ हो चुकी थी, और हम लोग भी अन्य यात्रियों की तरह बस के इंतज़ार में खड़े थे ! बस अपने निर्धारित समय से पांच मिनट लेट आई, हम लोग तुरंत बस में सवार हो गए, बस में भीड़ तो बहुत थी पर हमें दो सीटें मिल गई, और हम चारों लोग उन दो सीटों पर ही एडजस्ट हो गए !

गाँधी चौक पर बस के इंतज़ार में शशांक

गाँधी चौक पर बस के इंतज़ार में शशांक

जैसा कि मैं आपको पिछले लेख में बता चुका हूँ कि गाँधी चौक से आगे बढ़ने पर मुख्य सड़क दो हिस्सों में विभाजित हो जाती है, पिछली शाम को हम नीचे वाले रास्ते से पंच-पुला गए थे, और आज हम ऊपर वाले रास्ते पर जा रहे थे ! जो लोग अपनी गाडी से डलहौज़ी जाना चाहते है, उनकी जानकारी के लिए बता दूं कि खजियार, कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी, और डायन-कुण्ड जाने के लिए आपको इसी ऊपर वाले रास्ते पर जाना होता है ! 

बस जैसे ही गांधी चौक से आगे बढ़ी तो दस-पन्द्रह मिनट की यात्रा के बाद ही डलहौज़ी पब्लिक स्कूल था, जो बाहर से देखने में बहुत ही सुन्दर लग रहा था ! ऐसी जगहों पर स्कूल-कॉलेज में पढने का अलग ही मजा होता है, शहर से दूर, एकदम शांत माहौल में ! खैर छोड़िए ये पढ़ाई-लिखाई की बातें, मैं भी आपको खजियार घुमाते-2 कहाँ ये पढ़ाई की बातें लेकर बैठ गया !  

डलहौज़ी पब्लिक स्कूल (सौजन्य www.dpsdalhousie.com)

डलहौज़ी पब्लिक स्कूल (सौजन्य www.dpsdalhousie.com)

करीब दो घंटे की यात्रा के बाद हम लोग खजियार पहुँचे, बस में से ही खजियार का पहला दृश्य देख कर मन खुश हो गया ! नज़ारा ही कुछ ऐसा दिखाई दे रहा था कि शब्दों में बयां नहीं कर सकता, ये नज़ारा किसी को भी अपनी और आकर्षित करने के लिए काफी था ! नीचे इस फोटो में आप खुद ही वो नज़ारा अपनी आँखों से देख लो !

बस में से लिया गया खजियार का एक दृश्य

बस में से लिया गया खजियार का एक दृश्य

बात-चीत के दौरान ही बस में बैठे एक सहयात्री ने मुझे बताया था कि खजियार से एक किलोमीटर आगे भगवान शिवजी का एक मंदिर है ! उसने मुझे सुझाव भी दिया कि खजियार घूमने से पहले तुम इस मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन कर सकते हो, उसके बाद पैदल ही वापस खजियार आ जाना ! जब मंदिर के बारे में मैंने अपने साथियो को बताया तो सबने कहा कि बात तो सही है, आए तो घूमने ही है, और हमारे पास दिन भी पूरा है, तो कहीं से भी शुरुआत करें, क्या फर्क पड़ता है ! यही सोच कर खजियार का स्टॉप आने के बाद भी हम लोग बस में ही बैठे रहे, और मंदिर के सामने पहुँच कर ही बस से उतरे !

बस से उतर कर शिव मंदिर के बाहर लिया गया फोटो

बस से उतर कर शिव मंदिर के बाहर लिया गया फोटो

मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन करने के बाद थोड़ी देर तक मंदिर के आस-पास घूम कर ही वहां का जायजा लिया ! मंदिर के प्रांगण में ही भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है, ऐसी ही एक विशाल प्रतिमा दिल्ली-आगरा हाईवे पर हमारे पलवल से बारह किलोमीटर पहले भी है !

मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव की प्रतिमा

मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव की प्रतिमा

एक भक्तजन से बातचीत के दौरान ही हमें पता चला कि लोग यहाँ देश के अलग-2 हिस्सों से सेवाभाव लिए आते  है, कुछ दिन रुक कर यहाँ मंदिर में सेवा करते है, और फिर अपने घर लौट जाते है ! जिस  भक्तजन से हम बात कर रहे थे, वो पंजाब से थे और उनका अपना एक्सपोर्ट का बिज़नस था, वो भी यहाँ सेवाभाव से हर साल ही आते है ! उन्होंने ही हमे ये जानकारी भी दी कि ये मंदिर भक्तजनों के दान की राशि से ही बनाया गया है ! यहाँ भक्तजनों के रुकने और खाने-पीने की भी निशुल्क व्यवस्था है, जो भक्तजन यहाँ आते है वो कुछ दिन यहीं रुक कर मंदिर में सेवा करते है, और फिर वापस चले जाते है ! 

मंदिर के प्रांगण में लिया गया एक फोटो

मंदिर के प्रांगण में लिया गया एक फोटो

प्राप्त जानकारी के अनुसार यहाँ गर्मियों में बहुत श्रद्धालु आते  है, इसलिए अगर कभी आप गर्मियों में यहाँ आएं तो अपने रुकने की व्यवस्था करके ही आएं, क्यूंकि मंदिर के सभी कमरें फुल रहते है ! आधा घंटा वहां रुकने के बाद हम लोग मंदिर के प्रांगण से बाहर आ गए, और खजियार की ओर पैदल ही जाने लगे !

मंदिर से खजियार जाने का रास्ता

मंदिर से खजियार जाने का रास्ता

मंदिर से खजियार जाने का रास्ता तो बहुत ही सुन्दर है, मुख्य सड़क के दोनों ओर ऊँचे-2 चीड के पेड़, यहाँ की सुन्दरता को चार चाँद लगा देते है ! सड़क के दोनों ओर चीड के पेड़ो का घना जंगल है ! 

दोनों ओर ऊँचे पेड़ों से घिरा खजियार जाने का रास्ता

दोनों ओर ऊँचे पेड़ों से घिरा खजियार जाने का रास्ता

मैं भी फोटो खिचवाने में लग गया

मैं भी फोटो खिचवाने में लग गया

बाईं तरफ के जंगल सड़क से थोडा ऊँचाई पर  है, थोड़ी दूर तक तो हम लोग सड़क पर ही चलते रहे, और फिर बाईं ओर के जंगल में घुस गए,  हम लोगों का विचार इस जंगल में से होकर खजियार में प्रवेश करने का था !

जंगल में से गुजरते हुए लिया गया एक फोटो

जंगल में से गुजरते हुए लिया गया एक फोटो

जंगल में घुसते ही एक ऊँची जगह पर खड़े होकर हमने देखा कि आगे उसी जंगल में बड़े-2 चीड के पेड़ टूट कर गिरे हुए थे, शायद ये  पेड़ आंधी में टूटे थे ! हम टूटे हुए उन पेड़ों में से कुछ पर चढ़-कर तो कुछ के नीचे से होते हुए खजियार पहुँचे !

जंगल में टूट कर गिरे हुए पेड़

जंगल में टूट कर गिरे हुए पेड़

पेड़ों के ऊपर चल कर जाते हुए मैं और शशांक

पेड़ों के ऊपर चल कर जाते हुए मैं और शशांक

टूटे हुए पेड़ों के नीचे से लिया गया एक फोटो

टूटे हुए पेड़ों के नीचे से लिया गया एक फोटो

खजियार में घुसते ही दूर तक खुला हरा मैदान दिखाई देता है, और उस मैदान के दूसरी ओर विशाल चीड के पेड़, जिन्हें देख कर ऐसा लगता है कि ये चीड के पेड़ खजियार की सुन्दरता को अपने अन्दर समेटने की कोशिश कर रहे हो !

खजियार के मैदान की एक झलक

खजियार के मैदान की एक झलक

फोटोग्राफी का आनंद लेते हुए मैं, विपुल, और हितेश (बाएँ से दाएँ)

फोटोग्राफी का आनंद लेते हुए मैं, विपुल, और हितेश (बाएँ से दाएँ)

इस मैदान में पहुँचते ही मन में एक अजीब सी ख़ुशी हुई, जिसका अंदाज़ा आप लोग भी वहां पहुँच कर ही लगा पाओगे !  मैदान के चारों तरफ चलने के लिए पक्की सड़क बनाई गई है, और जगह-2 फेरी वाले खाने-पीने का सामान बेचते रहते है !

कुछ परिवार तो मैदान के ही किसी कोने में बैठकर खाने-पीने का आनंद ले रहे थे, तो कुछ लोग मैदान के चारो तरफ घुड़सवारी का आनंद ले रहे थे ! घुड़सवारी के लिए आपको घोड़े वाले मैदान  के किनारे ही घुमते हुए मिल जाएंगे, जो आपसे कुछ रुपये लेकर आपको घोड़े पर बिठाकर पूरे मैदान का चक्कर लगवा देंगे ! हम लोगों ने तो पैदल ही पूरे मैदान के 2 चक्कर लगा दिए, और उसके बाद मैदान के बीच में ही बैठ कर प्रकृति के नज़ारे का आनंद लेने लगे !

"शशांक,

फिर जब भूख लगी तो खाना खाने खजियार के मुख्य दरवाजे की तरफ चल दिए ! आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि खजियार में वैसे तो खाने-पीने के लिए फेरी वाले काफी कुछ बेचते रहते है, पर आपकी सुविधा के लिए यहाँ खजियार में दो-तीन होटल भी है, जहाँ आप भारतीय व्यंजनों का आनंद ले सकते  है ! हम लोगों ने तो दही के साथ गोभी और पनीर के पराठों का आनंद लिया !

अक्सर घूमने-फिरने की जगहों पर खाने-पीने के सामान इतने स्वादिष्ट नहीं मिलते, पर यहाँ ऐसा नहीं था यहाँ के पराठें स्वादिष्ट थे, और हमने भी पेट भर-कर खूब खाया ! खाने के बाद हम लोग फिर से मैदान के एक हिस्से में जाकर बैठ गए !

चारों लोग विश्राम की मुद्रा में

चारों लोग विश्राम की मुद्रा में

समय देखा तो दोपहर के दो बज चुके थे, डलहौज़ी जाने के लिए यहाँ खजियार से आखिरी बस दोपकर तीन बजे चलती है, जिसकी जानकारी हम यहाँ आते हुए बस कंडक्टर से पहले ही ले चुके थे ! आधा घंटा और मैदान में बैठने के बाद हम लोग खजियार के मुख्य प्रवेश द्वार के पास आकर बस के इंतज़ार में बैठ गए ! 

खजियार के मुख्य द्वार से लिया गया एक दृश्य

खजियार के मुख्य द्वार से लिया गया एक दृश्य

बस अपने निर्धारित समय पर आकर खजियार के बस स्टॉप पर खड़ी हो गई, जब सभी यात्री बस में सवार हो गए  तो बस चल दी ! वापस जाते हुए हमें ड्राईवर के साइड वाली सीट मिली, जहाँ से हम बाहर के नजारों का आनंद आसानी से ले सकते थे ! बस में बैठे-2 प्रकृति के नजारों का आनंद लेते हुए पता ही नहीं चला कि कब समय बीत गया, और हम गाँधी चौक पहुँच गए !

वापसी में बस के अन्दर से लिया गया एक फोटो

वापसी में बस के अन्दर से लिया गया एक फोटो

हम जब गाँधी चौक पहुँचे तो अभी अँधेरा नहीं हुआ था, और लाइब्रेरी भी खुली हुई थी, तो हमने सोचा कि क्यों ना थोड़ी देर लाइब्रेरी में ही बैठ लिया जाए ! माफ़ कीजिए, मैं आपको इस लाइब्रेरी के बारे में बताना तो भूल ही गया !

गाँधी चौक पर ही सेंट जोन्स चर्च के दाईं ओर एक पब्लिक लाइब्रेरी है, पिछली शाम जब हम पंच-पुला से घूम कर वापस आए थे तो ये बंद हो चुकी थी, पर आज ये अभी तक खुली हुई थी ! हमें लगा कि शायद लाइब्रेरी में डलहौज़ी के बारे में विस्तृत जानकारी मिले, और यही सोच कर हम लोग लाइब्रेरी की ओर चल दिए !

हंसराज मैमोरियल ट्रस्ट लाइब्रेरी गाँधी चौक, डलहौज़ी

हंसराज मैमोरियल ट्रस्ट लाइब्रेरी गाँधी चौक, डलहौज़ी

इस लाइब्रेरी के बाहर ही एक एटीएम भी है, जहाँ से आप ज़रूरत पड़ने पर पैसे निकाल सकते है ! लाइब्रेरी में घुसते ही सामने की ओर एक कंप्यूटर रूम था, जहाँ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे ! मुख्य दरवाजे के पास ही एक विजिटर एंट्री रजिस्टर रखा हुआ था, हमने अपनी जानकारी इस रजिस्टर में भरी और अन्दर दाखिल हो गए ! 

आगे बढ़ने पर देखा कि लाइब्रेरी के एक कोने में दीवार पर चार्ट के माध्यम से डलहौज़ी के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी, आजादी से पहले के डलहौज़ी को भी चित्रों के माध्यम से दिखाया गया था ! चार्ट के दाईं ओर लोहे की अलमारियाँ रखी हुई थी, जिनमें बहुत ही दुर्लभ किताबों का संग्रह था !

हम लोगों ने अपनी-2 रूचि के अनुसार अलमारियों से कुछ किताबें  निकलवाई, और वहीँ लाइब्रेरी में ही बैठ कर पढने लगे ! इन किताबों को पढ़कर हमें डलहौज़ी के इतिहास के बारे में भी जानकारी प्राप्त हुई ! लगभग आधा घंटा लाइब्रेरी में बैठने के बाद हम लोग बाहर आ गए, और बहुत देर तक गाँधी चौक के पास ही बाज़ार में घूमते रहे ! 

बाज़ार से थोड़ी-बहुत खरीददारी की, और जब अँधेरा हो गया तो वहीँ गाँधी चौक के पास ही टैक्सी स्टैंड में बैठ कर बातें करने लगे !

गाँधी चौक मुख्य बाज़ार में लिया गया एक फोटो

गाँधी चौक मुख्य बाज़ार में लिया गया एक फोटो

हमें वहां बैठे हुए थोड़ी देर ही हुई थी कि अचानक बारिश शुरू हो गई, हम लोग बारिश से बचने के लिए वहीँ एक रेस्टोरेंट में घुस गए ! भूख भी बहुत लगी थी तो वहीँ खाने का आर्डर भी दे दिया  ! खाना खाने के बाद हमने रेस्टोरेंट से  बाहर झाँक कर देखा, तो अभी भी तेज़ बारिश हो रही थी, और इसके रुकने के कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे थे !

बारिश में गाँधी चौक के मुख्य बाज़ार का एक दृश्य

बारिश में गाँधी चौक के मुख्य बाज़ार का एक दृश्य

क्यूंकि हमारा होटल गाँधी चौक से ज्यादा दूर नहीं था तो हमने सोचा कि यहाँ इंतज़ार करने से कोई फायदा नहीं है ! वहीँ पास की दुकान से दो छाते खरीदे, और बारिश से बचते हुए अपने होटल पहुँच गए ! जब होटल पहुँचे तो समय काफी हो गया था और हम लोग थक भी गए थे, फिर हमें अगले दिन भी तो घूमने जाना था, इसलिए बिना देरी दिए हम लोग अपने-2 बिस्तर में आराम करने चले गए !

हमारा आज का खजियार का सफ़र यहीं ख़त्म होता है, कल आपको कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी की सैर पर लेकर चलूँगा !

About Pradeep Chauhan

Pradeep Chauhan has written 4 posts at Ghumakkar.

मैं पेशे से एक कंप्यूटर इंजिनियर हूँ और पलवल (हरियाणा) में रहता हूँ ! अपने काम की वजह से मेरी ज़िन्दगी काफी व्यस्त है, पर इस व्यस्त ज़िन्दगी से कुछ पल चुरा कर मैं कहीं ना कहीं घूमने निकल जाता हूँ ! वैसे तो मैं भारत में कई जगह घूम चुका हूँ पर उत्तर भारत में उत्तराखंड और हिमाचल मेरी पसंदीदा जगह है ! अपनी यात्रा के बारे में लिखने का शौक भी मुझे आप लोगों के लेख पढ़ कर ही लगा !

Getaway Jungle Camp

17 Responses to “खजियार – भारत का छोटा स्विट्ज़रलैंड”


  1. JATDEVTA says:

    मस्त यात्रा बिल्कुल हमारे जैसी, जो हमने जुलाई में मणिमहेश जाते समय की थी, केवल एक अन्तर रहा कि हमें बारिश नहीं मिली थी।
    मस्त लेखन लिखते रहो, बस थोडा सा ध्यान यह रखो कि अपने फ़ोटो कोशिश करो कि कम हो।

  2. Vipin says:

    बढ़िया यात्रा वृतांत, प्रदीप भाई. हम लोगों ने भी खूब मस्ती की थी यहाँ…स्मरण कराने के लिए शुक्रिया…अगले लेख की प्रतीक्षा में…

  3. D.L.Narayan says:

    Thanks, Pradeep, for taking us to Khajiar. It indeed looks like a mini Switzerland.

  4. Surinder Sharma says:

    Very nice description about Shiv Mandir. First Time I am reading about it. Nice Photos. Thanks a lot for share journey.

  5. Ritesh gupta says:

    very nice post and your writing style is very interesting. Pictures are very beautiful and they are taking me to my earlier journey of these places. Thanks for remember me and good post also..
    Ritesh from Agra.

  6. Silentsoul says:

    good travelogue. has the lake in \Khajjiar dried up ??

  7. Praveen Wadhwa says:

    There are other posts on Khajiar but your’s is the best.

  8. प्रदीप जी बहुत ही सुन्दर पोस्ट हैं, खजियार की खूबसूरती को आपने बहुत ही अच्छे तरीके से दिखाया हैं, वाकई दूसरा स्वित्ज़र्लैंड हैं, इसके सामने तो गुलमर्ग भी फीका लगता हैं. और बरसात के मौसम में तो पहाडो का हुस्न निखर के सामने आ जाता हैं. असली मज़ा घूमने का बरसात में ही हैं. धन्यवाद बहुत बहुत, वन्देमातरम…

  9. Mukesh Bhalse says:

    प्रदीप,
    बहुत सुन्दर पोस्ट। अच्छा लेखन एवं मनमोहक चित्र। चौथे नंबर का फोटो (बस से लिया गया खजियार का फोटो) मुझे सबसे अच्छा लगा। घूमते रहो ………..लिखते रहो ………….

  10. आप सभी लोगों के प्यार और सुझाव के लिए बहुत-2 धन्यवाद !!

  11. Pushpinder Singh says:

    It was nice to visit khajiar thru your eyes. I have visited khajiar twice once when I was in MBA and second time last June but there was a stark difference between the the first time and last year. first time around 15 years back it was exquisite and natural but last year I found it too! commercialized as during first time there were only around 10 horses and a small kiosk selling pakoras and now you have Zorbing, para sailing, horse riding etc I still miss the untouched Khajjiar of my University days.Last time we stayed at Kalatop wild life sanctuary and there guest house location is the most beautiful spot in the whole area. Regards
    Pushpinder

  12. Saurabh Gupta says:

    Great writing, great photography.

    Thanks. It seems I am also at Khajiar. Keep Travelling.

    Regards

  13. ashok sharma says:

    beautiful post complemented with very good photographs.

  14. Nandan Jha says:

    Pradeep – I liked the pace at which you travel. By having a full day for Khajihar ensured that you were able to go to Shiv Temple as well spend some time in Library. Though you could have easily covered these places as well as the sanctuary in one day, but that might have meant more like touch-n-go. I am going to learn this from you. :-)

    Look fwd to next part. Warmly.

  15. s.s.kushwaha says:

    मुझें डलहौजी के बारे में पता नहीं है गूगल का नक्सा नहीं है पर पढ़ कर मजा आया



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