जैसलमेर- सुनहरा किला Jaisalmer- Golden Fort

December 10, 2012 By:

रात को बारह बजे के करीब हमारी ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर उपस्थित हो चुकी थी। हम अपने डिब्बे में सवार होकर जैसलमेर की ओर प्रस्थान कर गये। चूंकि शाम के समय ही हमने टिकट बुक किया था जिस कारण हमारी सीट पक्की नहीं हो पायी थी, हाँ इतना जरुर था कि हमारी दोनों सीटे RAC में उसी समय हो गयी थी, जब हमने बुक करायी थी। दिल्ली से यहाँ आते समय तो हम साधारण डिब्बे में बैठकर आये थे। अत: RAC टिकट मिलना भी हमारे लिये कम खुशी की बात नहीं थी। हम अपनी सीट पर जाकर बैठ गये थे। आज की रात हम आराम से सीट पर बैठकर जाने की सोच ही रहे थे, कुछ ऐसी ही बाते कर रहे थे। कि तभी टीटी महाराज भी दिखाई दे गये।

पहुँच गये जैसलमेर भी

 

 

किले की दीवारे

 

थोडी देर बाद ही टिकट चैकर महोदय हमारे पास भी आ गये। उन्होंने अन्य सवारियों के साथ हमारे टिकट भी चैक किये और कहा कि आप में एक बन्दा यहाँ बैठ जाओ और दूसरा बन्दा मेरे साथ आओ। मैंने कहा आपके साथ क्यों? टीटी ने कहा कि आपकी सीट कन्फ़र्म हो चुकी है। आपकी सीट का नम्बर यह है। कमल भाई अपने साथ अपना लैपटॉप भी लेकर आये थे। हमने रेल आने से  पहले ही वेटिंग हॉल में बैठे-बैठे ही नेट चलाकर अपनी सीट का स्थान देख लिया था। नेट अनुसार हमारी सीट आर.ए.सी. में ही थी। मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि सन 1999 में सरकारी खर्चे से होने वाली LTC यात्रा में मैं अपनी पत्नी के साथ दक्षिण भारत की पन्द्रह दिन की यात्रा पर गया था। जाते समय हमारा टिकट निजामुददीन-त्रिवेन्द्रम राजधानी में था। राजधानी में वेटिंग टिकट नहीं मिलता है। वापसी में बंगलौर से शिर्डी जाने के लिये कोपरगाँव  उतरना होता है, वहाँ तक थर्ड AC में सत्तर दिन पहले से सात की वेटिंग थी, जो आखिरी समय तक भी कन्फ़र्म नहीं हो पायी थी। वो यात्रा बहुत बुरी बीती थी, बताऊँगा कभी उसके बारे में भी।

किले का प्रवेश मार्ग

 

इसपर जैसलमेर दुर्ग के बारे में लिखा हुआ था

 

जब टीटी ने कहा था कि आपकी सीट कन्फ़र्म हो गयी है तो एक बार तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। जब मैं टीटी के साथ अपनी सीट पर जा रहा था तभी एक युवक TT के पास आया और दो सीट देने के लिये कहा। टीटी ने उसे कहा कि पहले RAC वालों को सीट दे दू, उसके बाद देखता हूँ कि कितनी सीट बचती है? अब मैं समझा कि हमारी सीट कन्फ़र्म कैसे हुई थी। रेलवे में होता क्या है कि कुछ स्टाफ़ का, कुछ मन्त्री का, कुछ संतरी का, इस तरह मिलाकर कई प्रकार का आरक्षण होता है। इस प्रकार काफ़ी सीट आखिर तक बचा कर रखी जाती है। जबकि आम जनता को वेटिंग का टिकट दे दिया जाता है।

अन्दर प्रवेश करने पर यह नजारा

 

अन्दर एक और दरवाजा

 

अगर आखिरी समय तक कोई स्टाफ़, संतरी व मन्त्री अपने कोटे के टिकट पूरे ना कर पाये तो चार्ट बनाते समय यह टिकट वेटिंग वालों को दे दिये जाते है। आजकल तत्काल टिकट का भी चलन है इस प्रकार के टिकट का भी, हर डिब्बे में कुछ ना कुछ कोटा अवश्य होता है। जब इस प्रकार का कोटा भी खाली रह जाता है तो वेटिंग वालों की किस्मत खुल जाती है। कुछ लोग ऐसे भी होते है जो गाडी का चार्ट बनने के बाद अपना टिकट कैंसिल करवा देते है। ऐसे टिकट रदद कराने से जो सीट खाली होती है उसे गाडी चलने पर टीटी RAC वालों को दे देता है। वैसे तो सीट खाली होने पर पहला हक आर.ए.सी वालों का है उसके बाद वेटिंग वालों का होता है। कई बार टीटी अपनी ऊपर की कमाई के चक्कर में आर ए सी वालों को छोडकर वेटिंग वालों को टिकट दे देता है। भ्रष्टाचार हर विभाग में है। सन्तरी से लेकर मन्त्री तक अधिकतर इसमें शामिल रहते है। कुछ गिने चुने मेरे जैसे उल्टी खोपडी के लोग ही ऐसे मिलेंगे जो ऊपर की कमाई की आस नहीं करते होंगे।

किले की प्राचीर से लिया गया चित्र

 

सूर्य की पहली किरण में चमकता हुआ किला

 

हमें सीट मिल गयी थी, अब हमें रात को बैठकर जागते हुए जैसलमेर जाने की परेशानी नहीं थी। हम आराम से अपनी सीट पर लम्बे पैर फ़ैलाकर खर्राटे भरते हुए, सोते हुए जैसलमेर की ओर यात्रा करते रहे। हमारी ट्रेन सुबह साढे पाँच बजे जैसलमेर पहुँच चुकी थी। यह इस ओर का आखिरी स्टेशन था। अत: इस बात का डर नहीं था कि हमारा स्टेशन सोते हुए निकल ही ना जाये। जब गाडी स्टेशन पर खडी हो गयी तो लोगों की आवाजे सुनकर हम भी अपना-अपना थैला उठाकर स्टेशन से बाहर आ गये थे।

किले से सूर्योदय का भव्य नजारा

 

विकीपीडिया अनुसार- (जैसलमेर के क़िले का निर्माण 1156 में किया गया था और यह राजस्‍थान का दूसरा सबसे पुराना राज्‍य है। ढाई सौ फीट ऊंचा और सेंट स्‍टोन के विशाल खण्‍डों से निर्मित 30 फीट ऊंची दीवार वाले इस किले में 99 प्राचीर हैं, जिनमें से 92 का निर्माण 1633 और 1647 के बीच कराया गया था। इस किले के अंदर मौजूद कुंए पानी का निरंतर स्रोत प्रदान करते हैं। रावल जैसल द्वारा निर्मित यह क़िला जो 80 मीटर ऊंची त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है, इसमें महलों की बाहरी दीवारें, घर और मंदिर कोमल पीले सेंट स्‍टोन से बने हैं। इसकी संकरी गलियां और चार विशाल प्रवेश द्वार है जिनमें से अंतिम एक द्वार मुख्‍य चौक की ओर जाता है जिस पर महाराज का पुराना महल है। इस कस्‍बे की लगभग एक चौथाई आबादी इसी क़िले के अंदर रहती है। यहां गणेश पोल, सूरज पोल, भूत पोल और हवा पोल के जरिए पहुंचा जा सकता है। यहां अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब्‍दी के बीच बनाए गए थे।)

 

कुछ पल आराम हो जाये

 

स्टेशन से बाहर आते ही कई गाडी वाले सवारियों को आवाज लगा रहे थे। एक ने हमसे कहा कि कहाँ जाओगे? हमने किले जाने के बारे में कहा तो उसने कहा कि वह किले के पास ही जा रहा है। किले के बाहर छोड देगा। वह चलने को तैयार ही था। अत: हम भी अन्य सवारियों के साथ उसमें सवार हो गये। जीप वाला हमें लेकर दो-तीन किमी दूर लेकर चला आया था। अभी तक दिन का उजाला पूरी तरह नहीं हुआ था। यहाँ जीप वाले ने जीप एक होटल नुमा घर के सामने रोक दी थी। जीप वाले ने जब हमसे कहा कि रुम देख लो तो हमारी समझ में आ गया कि यह होटल वालों के एजेंट है जो स्टेशन से सवारियाँ लेकर आते है यहाँ यात्री कमरा लेते है तो इनका कमीशन मिलना तय होता है।

अब इन्हें संग्रहालय में रख देना चाहिए

 

हमें कमरा नहीं लेना था, हमने पहले तो उसे खूब सुनायी, उसके बाद उससे कहा कि तुम हमें किले तक छोडने वाले थे। यहाँ किला तो कहीं नहीं दिख रहा है। वहीं उसी गली में जा रहे एक बन्दे से हमने पूछा कि किला कहाँ है? उसने बताया कि किला यहाँ से एक किमी दूर है। हमारे साथ जीप में दो विदेशी भी आये थे। वे भी हमारे साथ पैदल हो लिये थे। दिन का उजाला होना शुरु हो गया था। उस समय मुश्किल से एक दो मानव जाति के प्राणी वहाँ दिख रहे थे। उन्ही से पूछताछ करते हुए, हम किले तक जाने वाले गलियों से होते किले तक पहुँच गये थे। सबसे पहले हम किले के अन्दर प्रवेश दरवाजे से होते हुए ऊपर की ओर चढते गये।

तोप का मुँह

 

एक गाय हमें रास्ता देती हुई

 

जब हम किले की ओर चढ रहे थे तो हमॆं तभी महसूस हो गया था कि यह किला ज्यादा बडा नहीं है। आखिरकार हम किले में एक मैदान नुमा जगह पर जा पहुँचे। वहाँ जाकर हमें एक चाय की दुकान खुली हुई दिखायी दी थी। मैं तो चाय आदि पीता नहीं, कमल भाई ने भी वहाँ चाय नहीं पी थी कमल ने कहा कि किले का एक चक्कर लगाकर आते है उसके बाद कहीं बैठकर चाय पीयेंगे। सबसे पहले हमने एक सीधी सी दि्खायी दे रही गली में चलना शुरु कर दिया था आखिरकार वह गली किले की चारदीवारी पर जाकर समाप्त हो गयी। यहाँ से हमने चारदीवारी के चारों ओर पैदल ही चलना शुरु कर दिया। हम मुश्किल से तीन सौ मीटर ही चले होंगे कि पूर्व दिशा से सूर्य उगता हुआ दिखायी दे रहा था। किले का चक्कर बीच में रोककर हम सूर्योदय का इन्तजार करने लगे। वही हमें किले की सुरक्षा में लगायी हुई तोप भी दिखायी दे गयी थी। सूर्योदय के समय जैसलमेर का किला एकदम सोने का बना हुआ लग रहा था। जिस प्रकार जोधपुर को नीला शहर क्यों कहा जाता है पता लगा था इस जगह सूर्योदय देखकर यह पता लग गया था कि इसे सोने का किला क्यों कहते है? सूर्योदय देखकर हम वहाँ से चल पडे तभी कमल भाई को एक चाय वाली (चाय वाला नहीं) दिखायी दे गयी। चाय वाली की दुकान किले की चारदीवारी के ठीक ऊपर बनी हुई थी। कुछ देर चाय के बहाने हम एक बार फ़िर वहाँ बैठ गये। इसके बाद किले का चक्कर लगाना शुरु कर दिया था।

 जैसलमेर यात्रा में अगले लेख में जैसलमेर की मशहूर हवेलियाँ व हो सका तो यहाँ सैम के रेत के टीले दिखाये जायेंगे।  ………….(क्रमश:)

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About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

12 Responses to “जैसलमेर- सुनहरा किला Jaisalmer- Golden Fort”


  1. Thank u ji. Very useful description for everyone who wishes to go to Jaisalmer. But please don’t sit on canons like this. I am waiting for the pics of sand dunes.

    • JATDEVTA says:

      ठीक है सुसांत जी भविष्य में ऐसा दुबारा ना हो ध्यान रखा जायेगा।

  2. Ravindra Sharma says:

    राष्ट्रिय तथा ऐतिहासिक महत्त्व की वस्तुओं (तोप आदि) पर इस तरह से बैठना नहीं चाहिए।

  3. Ritesh Gupta says:

    जैसलमेर और किले का विवरण चित्र सहित अच्छा लगा….|
    धन्यवाद !

  4. ashok sharma says:

    beautiful post.

  5. Nandan Jha says:

    सही कहा संदीप जी । ये शायद अपने आप में (थोडा बहुत चित्तोर में भी देखा मैने) एक ऐसा किला है जो अब तक रहने के इस्तेमाल में आता है । किले के बारे में और जानकारी के इंतज़ार में ।

    • JATDEVTA says:

      किले में आबादी के अलावा राजा का निवास ही था जो आज वाली पोस्ट में दिखा दिया है। चित्तौर गढ़ का किला मैंने नहीं देखा है।

  6. Amitava Chatterjee says:

    Nice post.
    Since the day, I read / saw ‘Sonar Kella’ – it was always in my radar and may be very soon, we will also be there. Enjoying the series.

  7. Nirdesh says:

    Dear Sandeep,

    The setting sun does turn the fort golden. Beautiful.



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