Jodhpur-Hotel The Gate Way जोधपुर होटल द गेट वे

December 07, 2012 By:

हम जोधपुर महाराज का वर्तमान निवास स्थान उम्मेद भवन देखने जा रहे थे। हालांकि हम उम्मेद भवन में प्रवेश करने का तय समय शाम पाँच बजे, समाप्त होने के बाद पहुँचे थे। जैसे ही हमने जोधपुर के निर्वतमान महाराजा परिवार का वर्तमान निवास देखने के लिये, उनके भवन में अन्दर प्रवेश करना चाहा, तो वहाँ के सुरक्षा कर्मचारियों ने हमें अन्दर जाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि आप अब अन्दर नहीं जा सकते हो। हमने कोशिश की, कि शायद कुछ देर के लिये ही सही वे हमें अन्दर जाने दे, लेकिन हमारा उम्मेद भवन जाना बेकार साबित हुआ। आखिरकार हम मुख्य दरवाजे से ही दो चार फ़ोटो खींच-खांच कर वापिस लौटने लगे। वैसे तो यह भवन काफ़ी बडा बना हुआ है। इसके बारे में बताया जाता है कि एक बार यहाँ अकाल जैसी स्थिति आ गयी थी जिस कारण यहाँ के तत्कालीन महाराजा ने आम जनता की मदद के लिये अपना खजाना खोलने का निश्चय कर लिया था। चूंकि राजा बडा चतुर था वह ऐसे ही जनता पर अपना धन बर्बाद भी नहीं करना चाहता था। अत: राजा ने जनता को धन देने के लिये एक तरीका निकाल लिया था। वह तरीका आपको बताऊँ उससे पहले यह बात बता देता हूँ कि उस तरीके का परिणाम ही यह उम्मेद भवन था।

होटल का मुख्य फ़ोटो

अन्दर लॉन से

 

राजा ने आम जनता को धन देने के बदले, अपने यहाँ एक पहाडी पर काम करने को कहा, ताकि लोगों को धन मिले और राजा को उसका परिणाम मिले। लोग राजा के यहाँ काम करते थे। बदले में राजा उन्हें मजदूरी के रुप में नगद नारायण दिया करता था। अब हमें उस सूखे का तो पता नहीं चल पाया कि वह कितने साल तक चला था? लेकिन इस महल के बारे में पता लग गया कि इसे बनाने में पूरे १६ साल लगे थे। खैर जब हमें उस उम्मेद भवन में नहीं जाने दिया गया तो हम वहाँ से बनार रोड, जयपुर राजमार्ग पर स्थित एक अन्य होटल देखने चल दिये। उम्मेद भवन से काफ़ी अलग, उससे कई किमी दूर, मुख्य शहर से भी काफ़ी हटकर बना हुआ, एक अन्य विशाल भव्य सुन्दर होटल देखने हम जा रहे थे। जैसे ही हमारे कार चालक ओम सिंह ने मुख्य सडक से दाये हाथ की ओर कार मोडी तो वहाँ एक बोर्ड दिखाई दिया था जिस पर लिखा था होटल “दा गेट वे” THE GATE WAY यहाँ इस होटल तक जाने में भी सडक से थोडा आगे होटल की अपनी बनी हुई सडक पर चलना होता है।

अन्दर गैलरी से

 

एक स्विट के सामने का

 

जैसे ही होटल वालों की हरियाली से घिरी हुई सडक समाप्त हुई, वैसे ही एक विशाल मैदान में एक शानदार ईमारत दिखाई देने लगी थी। मैंने पहली नजर में समझा कि यहाँ चारों और किले ही किले बने हुए है। लेकिन जब हम कार से उतर कर अन्दर गये तो पता लगा कि हम एक होटल में आये है। वहाँ होटल में सबसे पहले हमारा स्वागत ठन्डा पिलाकर किया गया। गर्मी में ठन्डा बहुत अच्छा लगता है। उस गर्मी में मन तो आइसक्रीम खाने का कर रहा था, लेकिन वह उस समय हमें नजर नहीं आ रही थी। ठन्डा पीने के बाद मैनजर ने हमारे साथ अपना टीम लीडर भेज दिया था। टीम लीडर को हमें पूरा होटल दिखाने की जिम्मेदारी दे दी गयी थी। होटल में प्रवेश करने से पहले ही कमल सिंह मोबाईल से होटल के मैनजर से सम्पर्क कर अपने आने की सूचना दे दिया करते थे। जिस कारण हमॆं अपने बारे में ज्यादा नहीं बताना पडता था। इस होटल में जैसे-जैसे हम घूमते रहे, वैसे ही यह महसूस होता रहा कि वाह होटल हो तो ऐसा। वैसे तो मैंने दिल्ली के होटल अशोका व होटल ताज का भ्रमण भी किया हुआ है। लेकिन इस होटल के सामने दिल्ली वाले दोनों होटल पानी भरते नजर आये। दिल्ली वाले होटल व इस होटल में सबसे बडा अन्तर तो क्षेत्रफ़ल का लगा। दिल्ली के पाँच सितारा होटल व इस तीन सितारा होटल में क्षेत्रफ़ल में ही कई गुणा का अन्तर है। यह देखने में ही एक किले जैसा दिखाई देता है।

मस्त व शानदार पलंग

 

साफ़-सफ़ाई सब कुछ चकाचक

 

होटल के कमरे मे प्रवेश करते समय होटल की साफ़-सफ़ाई भी दिल को छू गयी थी। सारा होटल बेहद ही खूबसूरत तरीके से साफ़ व स्वच्छ रखा गया था। हम जिस होटल में जाते थे वहाँ के सिर्फ़ दो तरह के कमरे देखते थे। पहला सबसे सस्ता कमरा, दूसरा सबसे महँगा कमरा। बडे-बडे होटलों में महँगे कमरों को सूइट suite बोला जाता है। यहाँ का सबसे सस्ता कमरा आठ हजार रुपये प्रतिदिन किराये वाला है। कमरे देखने के बाद हम होटल का विशाल तरणताल देखने चल पडे। यहाँ इस शानदार होटल में खुले में विशाल सुन्दर तरणताल swimming pool बनाया हुआ है। इस पूल के ठीक सामने ही यहाँ इसी होटल का विशाल हरा भरा मैदान भी है। जहाँ एक साथ कई हजार लोग आराम से पिकनिक मना सकते है। होटल देखने के बाद हम वहाँ से स्टेशन की ओर चल पडे।

 

 

उसी स्वीट में यह भी था

 

हमारी ट्रेन रात को ग्यारह बजे के बाद थी। जब हम स्टेशन पहुँचे तो घडी में समय देखा तो पाया कि अभी तो आठ बज रहे है। हमारे पास अभी भी कई घन्टे थे जिसे हम जोधपुर में बिता सकते थे। सबसे पहले हमारे कार चालक ने कार रेलवे रिजर्वेशन पार्किंग में लगायी। उसके बाद हम तीनों वहीं नजदीक मॆं ही वहाँ की मशहूर दुकान से वहाँ के अच्छे अच्छे खाने-पीने की चीजे खाने पहुँच गये थे। यहाँ हमने कई प्रकार की खाने की वस्तुएँ चखी थी। जोधपुर की मलाईदार लस्सी का स्वाद भी मस्त था। और एक मिठाई जैसा कुछ खाया था नाम याद नहीं आ रहा है। एक-एक पकौडा और साथ में लस्सी वाह क्या पार्टी हुई थी।

अन्दर आंगन में दूसरा किनारा

 

होटल में पार्क में जाकर लिया गया

 

इतना खाने-पीने के बाद, जब हम वहाँ उस दुकान से बाहर निकले ही थे कि हमें स्टेशन के बाहर एक गोल-गप्पे वाला दिखाई दे गया था। दुकान में मीठी-मीठी चीजे खाने के बाद चटपटा गोलगप्पे वाला दिख जाये और गोलगप्पा ना जाये, ऐसा नहीं हो सकता था। ओम सिंह ने गोलगप्पे खाने में हमारा साथ नहीं दिया। जाट देवता व नारद जी दोनों जुट गये गोल-गोल गप्पे खाने में। गोल गप्पे वाला बोला कि कितने के खिलाऊँ? मैंने कहा अरे ताऊ पहले खाने तो दे अगर तेरे गप्पे मस्त हुए तो पेट भरकर खायेंगे नहीं तो एक-दो से तौबा कर लेंगे। गोलगप्पे वाला बोला आप एक खाकर दस मांगोगे।

तरण ताल

 

तरण ताल किनारे मेरा भी

 

एक खाओगे तो दस मांगोगे, उसकी यह बात सुनकर लगा कि गोलगप्पे बहुत मस्त चटपटे बनाये होंगे। जैसे ही मैंने पहला गोल गप्पा खाया तो मैं गोल गप्पा खाकर चुप हो गया। नारद जी बोले क्यों जाट देवता कैसा स्वाद है? मैंने कहा खाकर देख लो अगर उसके बाद भी मन करे तो दूसरा ले लेना। जैसे ही नारद जी ने पहला गोल गप्पा खाया तो मैंने गोलगप्पे वाले को कह दिया था कि तु बनाता रह और साथ ही गिनता रह कि कितने खाये? गोल गप्पे वाले ने बेहद ही चटपटे टैस्टी गोलगप्पे बनाये थे। हम दोनों ने कुल मिलाकर चालीस रुपये के गोल गप्पे चट कर दिये थे। भारत में कई जगह इन्हें पानी पूरी कहीं-कहीं पानी पताशे भी बोला जाता है। इसके बाद हमने ओमसिंह को भी विदा कर दिया। जाते-जाते कार चालक व मालिक ओमंसिंह का विजिटिंग हमने ले लिया था। इसके बाद हम स्टॆशन स्थित वेटिंग हॉल पहुँच गये।

शानदार व खूबसूरत तरण ताल

 

विशाल व खूबसूरत मैदान

 

दो घन्टे ट्रेन का इन्तजार किया रात को बारह बजे के करीब हम अपनी रेल में सवार होकर जैसलमेर की ओर प्रस्थान कर गये।

सामूहिक भोजन कक्ष

 

मुख्य सड़क पर प्रवेश द्धार

 

जोधपुर यात्रा समाप्त होती है, अब चले जैसलमेर

 

सुबह-सुबह उजाला होने से पहले हम जैसलमेर पहुँच गये थे। जैसलमेर यात्रा अगले लेख में करायी जायेगी। ………….(क्रमश:)

 

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About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

9 Responses to “Jodhpur-Hotel The Gate Way जोधपुर होटल द गेट वे”


  1. Praveen Wadhwa says:

    Well, Ghumakkar might be grateful to have a Hotel Inspector now.

    • JATDEVTA says:

      ना प्रवीण जी मैं तो घुमक्कड रुप में ही खुश हूँ। जिसे निरीक्षक बनना हो वो बने।

  2. हे जाट देवता,
    Super duper. इतने महंगे होटल को तो देख कर ही खुश हुआ जा सकता है। वैसे suite में सिर्फ एक कमरा नहीं होता बल्कि कमरों का सैट होता है जिसमें आप परिवार के साथ रह सकें। मैने जैसलमेर के बारे में बहुत सुना है, वहां का आंखों देखा हाल सुनने के लिये बेताब हूं !

    सुशान्त

  3. Amitava Chatterjee says:

    A very nice property and very good review.
    ‘Fuchca’ (in Bengali), ‘Pani Puri’, ‘Gol-goppa’…very tempting…great going – way to Jaisalmer

  4. Nandan Jha says:

    संदीप जी – ये लेख तो करीब करीब फोटो-ब्लॉग हो गया । थोडा और बताएं ।



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