मथुरा एवं गोकुल – नन्हे कन्हैया की मधुर स्मृतियाँ……….. |
प्रिय साथियों,
लीजिये आज फिर से उपस्थित हूँ मैं अपनी अगली यात्रा कहानी के साथ। छः भागों की इस विस्तृत श्रंखला में मैं आपको ले कर चलूँगा भगवान् कृष्ण की पवित्र भूमि यानी बृज भूमि मथुरा, गोकुल, वृन्दावन तथा उसके बाद आगरा एवं आगरा से होते हुए हम चलेंगे भगवान् विश्वनाथ की नगरी यानी वाराणसी।
कई दिनों से हमारी इच्छा थी की एक एक धार्मिक यात्रा अपने तथा कविता के मम्मी पापा के साथ भी की जाए, तो इस बार निर्णय लिया गया की अपनी अगली यात्रा पर कविता के मम्मी पापा को साथ में लेकर चला जाए और जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने भी बड़ी ख़ुशी से हमारे साथ जाने में अपनी सहमती जाहिर कर दी। अब अगला कदम था स्थान के चयन का सो सबसे पहले अपने सास ससुर जी से पूछा और उन्होंने गंगा जी के दर्शन तथा स्नान की इच्छा जाहिर की।
चूँकि उन्हें गंगा स्नान की इच्छा थी और हमें वर्ष में कम से कम एक ज्योतिर्लिंग की यात्रा करनी ही होती है, अतः अब यह बात स्पष्ट हो गई की ऐसी जगह का चुनाव किया जाए जहाँ गंगा भी हो और ज्योतिर्लिंग भी, और ऐसी जगह तो बस एक ही है काशी या वाराणसी। उनकी गंगा स्नान की इच्छा तथा हमारे प्रतिवर्ष कम से कम एक ज्योतिर्लिंग के संकल्प को ध्यान में रखते हुए हम लोगों ने फटाफट निर्णय लिया की काशी ही जाना है।
इधर पिछले कुछ वर्षों से मथुरा वृन्दावन तथा आगरा (ताज महल) की इच्छा भी बलवती हो रही थी तो मैंने सोचा की उत्तर प्रदेश ही जा रहे हैं तो बृज भूमि, भारत की शान ताज महल तथा वाराणसी का एक सम्मिलित टूर बनाया जाए, और बस बन गया एक अच्छा सा प्लान, जिसके तहत हमें सबसे पहले ट्रेन द्वारा इंदौर से मथुरा (निजामुद्दीन एक्सप्रेस) जाना था, मथुरा में दो दिन रुक कर मथुरा गोकुल तथा वृन्दावन के स्थलों के दर्शन करने थे तथा तीसरे दिन सुबह आगरा के लिए निकलकर आगरा में ताज महल तथा आगरा का किला देखना था और उसी दिन रात में ट्रेन से (मरुधर एक्सप्रेस) वाराणसी पहुंचकर दो दिन यहाँ रूककर वाराणसी के घाट, काशी विश्वनाथ तथा अन्य मंदिर एवं आखिरी दिन सारनाथ के दर्शन करके दोपहर में वाराणसी से इंदौर के लिए ट्रेन (पटना इंदौर एक्सप्रेस) पकड़कर इंदौर पहुंचना था। यात्रा की तारीखें थीं 20 से 27 अक्टूबर।
टूर प्लान फाइनल हो जाने के बाद तुरंत ही मैंने तीनों ट्रेनों में अपना रिजर्वेशन करवा लिया। ग्रुप में मेरे परिवार से हम चार कविता के मम्मी पापा तथा मेरी साली की बेटी शाना शामिल थे, इस तरह छोटे बड़े मिला कर हम सात लोग हो गए थे।
जल्दी जल्दी एक के बाद दूसरी यात्रा पर जाने तथा वह भी तीर्थ स्थलों पर जाने की वजह से अब हमारे बच्चों का यात्राओं से मन भर गया है या यह कह लीजिये की वे बोर हो चुके हैं अतः इस टूर के मामले में भी वे कोई रूचि नहीं दिखा रहे थे, लेकिन जब उन्हें यह बताया गया की हम लोग आगरा भी जा रहे हैं ताज महल देखने के लिए तो वे ख़ुशी से झूम उठे।
कविता के मम्मी पापा पहली बार कहीं तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे अतः वे बहुत खुश थे, कविता इसलिए खुश थी की काशी में भगवान् विश्वनाथ के दर्शन होने वाले थे, बच्चे इसलिए खुश थे की उन्हें ताज महल देखने को मिलने वाला था, और मैं इसलिए खुश था क्योंकि ये सब खुश थे।
जैसे जैसे हमारी यात्रा की तारीखे करीब आ रही थीं, वैसे वैसे हमारा उत्साह एवं उत्सुकता बढती जा रही थी। यहाँ पर एक चीज़ बताना चाहूँगा की घुमक्कड़ी एक ऐसा शौक है जिससे व्यक्ति कभी भी बोर नहीं होता है, हर नए टूर पर जाने से पहले न जाने कहाँ से उतना ही उत्साह, उतनी ही उमंगें उतनी ही खुशियां दिलो दिमाग पर हावी हो जाती है जितनी हमने कभी हमारे पहले टूर के दौरान महसूस की होती है।
सासु मां ने दो नए बड़े साइज़ के बैग ख़रीदे और ज़रूरत का सारा सामान लेकर वे लोग हमारे यहाँ दो दिन पहले यानी 18 अक्तूबर को आ गए। सफ़र में साथ ले जाने के लिए कविता ने कुछ नाश्ता तैयार कर लिया था तथा कुछ हमने बाज़ार से खरीद लिया था। शनिवार 20 अक्तूबर को हमारी ट्रेन शाम साढ़े चार बजे थी। चूँकि तीन बजे तक इंदौर पहुंचना था अतः मैंने आज हाफ डे ले लिया था बच्चों को स्कूल नहीं भेजा था। दोपहर का खाना खाकर तथा शाम का खाना घर से ही पैक करके ले जाने का प्लान था।
रितेश गुप्ता जी से मिलना- एक अद्भुत संयोग:
यहाँ पर मैं जिक्र करना चाहूँगा हमारे एक घुमक्कड़ मित्र का जिन्हें आप सभी बहुत अच्छे से जानते ही होंगे, अपने हिन्दी यात्रा वृत्तांतों से घुमक्कड़ के पाठकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ने वाले, पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाले तथा घुमक्कड़ के हिन्दी खजाने को अपनी रचनाओं से समृद्ध करने के लिए जाने जानेवाले घुमक्कड़ के एक सशक्त आधार स्तम्भ, हम सबके प्रिय श्री रितेश गुप्ता जी आगरा वाले। आप सोच रहे होंगे की मैं अपनी पोस्ट में रितेश जी का उल्लेख क्यों कर रहा हूँ? तो जी बात ऐसी है की रितेश जी से हमारी दोस्ती घुमक्कड़ के माध्यम से हुई थी और अक्सर ही उनसे फोन पर या फेसबुक पर बातें होती रहती थीं।अब अगर ब्रज भूमि एवं आगरा की यात्रा करनी हो और रितेश जी से इस बारे में सलाह न ली जाए तो फिर आखिर घुमक्कड़ से हुई इस दोस्ती का क्या मतलब, सो ऐसी ही एक बातचीत में हमने उन्हें बताया था की हम लोग मथुरा एवं आगरा आने का प्लान कर रहे हैं, यह सुन कर वे भी बड़े खुश हुए, उन्होंने हमारे इस टूर में बहुत रूचि दिखाई और मुझसे यह कहा की इस टूर के दौरान कहीं न कहीं वे अपने परिवार सहित हमसे ज़रूर मिलेंगे अतः उन्होंने मुझे अपने टूर प्लान की एक कॉपी भेजने के लिए कहा। मैंने तुरंत ही मेल के द्वारा उन्हें अपनी इस यात्रा योजना की प्रति भेज दी। तो इस तरह से इस टूर में हमारा रितेश गुप्ता जी से मिलना तो लगभग तय हो ही गया था।
अंततः हमारी यात्रा की तिथि आ ही गई और 20 नवम्बर की दोपहर को हम सब अपनी स्पार्क से इंदौर के लिए निकल पड़े।यहाँ पर एक अप्रिय घटना घटी, हुआ ये की इंदौर शहर में घुसते ही हमारा सामना एक बेहद ईमानदार (????) पुलिस वाले से हुआ, इंदौर की एक व्यस्ततम सड़क पर गुजरते समय उसने मुझे इशारा करके गाडी साइड में खड़ी करने के लिए कहा मैंने उसके आदेश का पालन करते हुए गाडी साइड में खड़ी कर दी, उसने मुझसे पेपर दिखने के लिए कहा, वैसे तो गाडी के सारे दस्तावेज मेरे पास मौजूद थे लेकिन ड्राइविंग लाइसेंस तथा रजिस्ट्रेशन के पेपर्स की फोटोकॉपी थीं, और वो मुझसे कह रहा था की ओरिजिनल दिखाओ या फिर गाडी यहीं खड़ी कर दो और कल कोर्ट से आकर ले जाना।
वास्तव में वो मुझे हर हाल में रोकना चाह रहा था, मैं उसका मंतव्य समझ गया और बिना ज्यादा बहस किये जेब में से सौ का नोट निकाल कर उसकी और बढ़ा दिया, सौ का नोट देखते ही उसके चेहरे पे मुस्कान आ गई और उसने मुझे आगे बढ़ने का संकेत दे दिया, तब तक साढ़े तीन बज चुके थे और हमारी ट्रेन साढ़े चार बजे निकलनेवाली थी, कुछ ही देर में हम रेलवे स्टेशन पहुँच गए। पहले मैंने बाकी लोगों तथा सामान को रेलवे स्टेशन पर छोड़ा तथा मैं अपनी कंपनी के हेड ऑफिस अपनी गाडी पार्क करने के लिए चला गया।
ट्रेन अपने सही समय पर थी तथा स्टेशन पर एक घंटे के इंतज़ार के बाद अपने नियत समय पर ट्रेन चल पड़ी और अब ट्रेन चलने के बाद हमें भी सुकून मिल रहा था। ट्रेन में ही घर से लाया खाना खाने के बाद करीब नौ बजे हम लोग अपनी अपनी बर्थ पर लेट गए। रात में रितेश जी का फ़ोन आया और उन्होंने पूछा की अब तक के सफ़र में कोई परेशानी तो नहीं आई, और उन्होंने हमें सुबह का कार्यक्रम बता दिया की वे सुबह आगरा से मथुरा पहुँच जायेंगे तथा हमें मथुरा में ही मिलेंगे।
सुबह 3.35 पर ट्रेन का मथुरा पहुँचने का समय था और हमें भी मथुरा ही उतरना था अतः मैंने अपने तथा कविता दोनों के मोबाइल में 3.00 बजे का अलार्म लगा दिया क्योंकि सुबह के तीन बजे उठना टेढ़ी खीर थी। इस ट्रेन में अक्सर ये होता है की जिन पेसेंजर्स को मथुरा उतरना होता है, सुबह साढ़े तीन बजे वे जाग नहीं पाते और जब नींद खुलती है तब तक दिल्ली पहुँच चुके होते हैं। चूँकि हम लोग 3.35 बजे मथुरा पहुँचने वाले थे और ये एक बड़ी समस्या थी अतः मथुरा में मैंने पहले से ही फ़ोन के द्वारा एक होटल में रूम बुक करवा रखा था (लेकिन उसे पेमेंट नहीं किया था) और उससे बात भी कर रखी थी की हम लोग सुबह 4.00 बजे चेक इन करेंगे ।
अपने सही समय पर ट्रेन मथुरा पहुंची और हम सब सकुशल मथुरा स्टेशन पर उतर गए। प्लेटफोर्म से बाहर आते ही कई सारे ऑटो वाले हमारे पीछे लग गए, मुझे आश्चर्य हुआ की रात के तीसरे प्रहर में भी यहाँ इतने सारे ऑटो वाले उपलब्ध हैं। खैर एक मारुती ओमनी वेन वाले से बात करके हम उसमें सवार हो गए, सबसे पहले तो उसी होटल को खोजा जिसमें मैंने कमरा बुक करवाया था लेकिन यह होटल मुझे पसंद नहीं आया अतः मैंने वेन वाले से कुछ और होटल दिखाने को कहा तो वह हमें एक अच्छे होटल में लेकर गया जहाँ हमें 800 रु में एक चार बेड वाला बड़ा कमरा मिल गया जिसमें अटैच लेट बाथ, गीजर, टीवी जैसी आधारभूत सुविधाएँ शामिल थीं। सुबह के चार बज रहे थे अतः हमने सोचा की एक नींद और ले ली जाए, वैसे भी इस समय जाग कर भी कुछ हासिल नहीं होना था, अतः हम सब सो गए, सुबह करीब सात बजे नींद खुली, उठते ही मैंने सबसे पहले रितेश जी को फ़ोन लगाया तो उन्होंने बताया की वे लोग दस बजे के करीब अपनी फेमिली के साथ मथुरा पहुँच जायेंगे और हमें जन्मभूमि मंदिर के बाहर मिलेंगे।
मथुरा – एक परिचय:
मथुरा, भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और भारत की परम प्राचीन तथा जगद्-विख्यात नगरी है। पौराणिक साहित्य में मथुरा को अनेक नामों से संबोधित किया गया है जैसे- शूरसेन नगरी, मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा आदि। यह वर्तमान उत्तर प्रदेश में आगरा और दिल्ली से क्रमश: 58 कि.मी उत्तर-पश्चिम एवं 145 कि. मी दक्षिण-पश्चिम में यमुना के किनारे राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर स्थित है।
वाल्मीकि रामायण में मथुरा को मधुपुर या मधुदानव का नगर कहा गया है तथा यहाँ लवणासुर की राजधानी बताई गई है. इस नगरी को इस प्रसंग में मधुदैत्य द्वारा बसाई, बताया गया है। लवणासुर, जिसको शत्रुघ्न ने युद्ध में हराकर मारा था इसी मधुदानव का पुत्र था। इससे मधुपुरी या मथुरा का रामायण-काल में बसाया जाना सूचित होता है। रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन है। इस नगरी को लवणासुर ने भी सजाया संवारा था । प्राचीनकाल से अब तक इस नगर का अस्तित्व अखण्डित रूप से चला आ रहा है।
वराह पुराण में कहा गया है - विष्णु कहते हैं कि इस पृथिवी या अन्तरिक्ष या पाताल लोक में कोई ऐसा स्थान नहीं है जो मथुरा के समान मुझे प्यारा हो- मथुरा मेरा प्रसिद्ध क्षेत्र है और मुक्तिदायक है, इससे बढ़कर मुझे कोई अन्य स्थल नहीं लगता।
भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि का ना केवल राष्द्रीय स्तर पर महत्व है बल्कि वैश्विक स्तर पर जनपद मथुरा भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान से ही जाना जाता है। वर्तमान में पंडित मदनमोहन मालवीयजी की प्रेरणा से यह एक भव्य आकर्षण मन्दिर के रूप में स्थापित है। पर्यटन की दृष्टि से विदेशों से भी भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए यहाँ प्रतिदिन आते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को विश्व में बहुत बड़ी संख्या में नागरिक आराध्य के रूप में मानते हुए दर्शनार्थ आते हैं। (जानकारी आभार : http://hi.brajdiscovery.org)
अब हम सब लोग करीब आठ बजे तक तैयार होकर सबसे पहले यमुना नदी की ओर चल दिए, यमुना नदी का विश्राम घाट हमारे होटल से पैदल दुरी पर ही था अतः हम सब पैदल ही चल दिए। इस घाट का नाम विश्राम घाट इसलिए पड़ा क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण ने कंस का वध करने के बाद यहीं पर यमुना के किनारे विश्राम किया था। यहाँ घाट पर हमने सबसे पहले यमुना जी के दर्शन किये, यहाँ पर बहुत सारे नाव वाले खड़े थे अतः एक नाव वाले से किराया ठहरा कर हम सब उस नाव में सवार हो गए। अब हमें इस नाव से ही मथुरा के एक प्रसिद्ध मंदिर श्री द्वारकाधीश मंदिर के दर्शनों के लिए जाना था। कुछ पांच मिनट में हम नाव से द्वारकाधीश मंदिर पहुँच गए। इस समय करीब नौ बज रहे थे और यहाँ मंदिर में पहुँच कर पता चला की मंदिर दस बजे खुलेगा, अब बच्चों एवं बड़ों सभी को भूख भी लग रही थी अतः हमने सोचा की इस खाली समय में नाश्ता कर लिया जाए अतः हम मंदिर के ही बगल में स्थित एक नुक्कड़ वाली स्टालनुमा दुकान में पहुंचे।
मथुरा में मैंने एक विशेष बात देखी की यहाँ नाश्ते के स्टालों पर बैठने की सुविधा नहीं होती, बस खड़े खड़े नाश्ता करो, पैसे दो और चलते बनो जबकि हमारे मध्य प्रदेश में हर रेस्तौरेंट पर कम से कम बैठने की व्यवस्था तो होती ही है। खैर नाश्ता करके हम पुनः मंदिर की ओर चल दिए अब तक मंदिर खुलने का समय भी हो चूका था और मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ भी बढ़ने लगी थी।
द्वारकाधीश मंदिर :
यह मथुरा का सबसे विस्तृत पुष्टिमार्ग मंदिर है। भगवान कृष्ण को ही द्वारिकाधीश (द्वारिका का राजा) कहते हैं । मथुरा नगर के राजाधिराज बाज़ार में स्थित यह मन्दिर अपने सांस्कृतिक वैभव कला एवं सौन्दर्य के लिए अनुपम है । ग्वालियर राज के कोषाध्यक्ष सेठ गोकुल दास पारीख ने इसका निर्माण 1814–15 में प्रारम्भ कराया, जिनकी मृत्यु पश्चात इनकी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी सेठ लक्ष्मीचन्द्र ने मन्दिर का निर्माण कार्य पूर्ण कराया । श्रावण के महीने में प्रति वर्ष यहाँ लाखों श्रृद्धालु सोने–चाँदी के हिंडोले देखने आते हैं। मथुरा के विश्राम घाट के निकट ही असकुंडा घाट के निकट यह मंदिर विराजमान है। (सन्दर्भ: http://hi.brajdiscovery.org)
मंदिर में भगवान् द्वारकाधीश के दर्शन कर लेने के बाद अब हम मंदिर से बाहर आ चुके थे और अब हमारा अगला पड़ाव था श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर।
इस बीच रितेश जी से फ़ोन से लगातार संपर्क हो रहा था और हम जैसे ही साइकिल रिक्शा पर सवार हुए वैसे ही उनका फ़ोन आ गया और उन्होंने बताया की वे लोग जन्मभूमि मंदिर पहुँच चुके हैं तथा मंदिर के बाहर खड़े हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। अब कुछ ही मिनटों में हम एक ऐसे व्यक्ति तथा उनके परिवार से मिलने जा रहे थे जिनसे हम घुमक्कड़, फेसबुक तथा फ़ोन के माध्यम से बहुत अच्छे तरीके से परिचित थे लेकिन कभी मिले नहीं थे, मन में एक अलग ही तरह का रोमांच तथा अनुभूति हो रही थी, अंततः वह क्षण आ गया।
जैसे ही हम जन्मभूमि मंदिर पहुँच कर रिक्शा से निचे उतरे, हमें रितेश गुप्ता जी अपने परिवार सहित मिल गए, चूँकि उन्हें तथा उनके पुरे परिवार को हम घुमक्कड़ की पोस्ट्स के द्वारा देख ही चुके थे अतः पहचानने में किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं आई, उनसे तथा उनके परिवार से मिलकर हमें जो ख़ुशी मिली उसे शब्दों में बखान करना मेरे लिए नामुमकीन है। कुछ ही देर की औपचारिक बातचीत के बाद हम सब एक दुसरे से बहुत अच्छी तरह से घुल मिल गए थे, और अब हम सब मिलकर श्री जन्मभूमि मंदिर के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ चले।
यहाँ पर एक बात बताना चाहूँगा की हम लोगों ने अब तक कई बड़े बड़े मंदिरों एवं अनेक धार्मिक स्थलों के दर्शन किये हैं लेकिन मथुरा के जन्मभूमि मंदिर जितनी सख्त चेकिंग एवं सिक्यूरिटी (सुरक्षा व्यवस्था) मैंने अपने जीवन में पहली बार देखी, खैर यहाँ के बाद हम आगरा ताज महल देखने भी गए और काशी विश्वनाथ मंदिर भी लेकिन पहरेदारी का जो आलम मैंने मथुरा के इस जन्मभूमि मंदिर का देखा वह और कहीं नहीं देखने को मिला। कतार में लगने के बाद कम से कम तीन बार मुझे तथा कविता के पापा को सुरक्षा चेक पोस्ट से लाइन से बाहर निकलना पड़ा क्योंकि हर बार कुछ न कुछ समस्या बता कर पुलिस वाले हमें लाइन से बाहर निकाल देते, आखिरी बार तो हमें इसलिए बाहर कर दिया क्योंकि मेरी पेंट की पिछली जेब में सुपारी का एक पाउच रह गया था। जबकि सारा बड़ा सामान जैसे मोबाइल, केमेरा पर्स आदि तो हम सबसे पहले ही क्लॉक रूम में जमा करा चुके थे। खैर इस खतरनाक चेकिंग से गुजरने के बाद हम मंदिर में पहुंचे। यहाँ मंदिर दो भागों में बंटा हुआ है, एक तरफ तो कंस के काराग्रह का वह संकरा कमरा है जहाँ भगवान् श्री कृष्ण का जन्म हुआ था और दूसरी और श्री राधा कृष्ण का सुन्दर मंदिर है।
श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर/ केशव देव मंदिर :
भगवान श्रीकृष्ण का यह जन्मस्थान कंस का कारागार था, जहाँ वासुदेव ने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात अवतार ग्रहण किया था। आज यह कटरा केशवदेव नाम से प्रसिद्व है। यह कारागार केशवदेव के मन्दिर के रूप में परिणत हुआ। इसी के आसपास मथुरा पुरी सुशोभित हुई। यहाँ कालक्रम में अनेकानेक गगनचुम्बी भव्य मन्दिरों का निर्माण हुआ। इनमें से कुछ तो समय के साथ नष्ट हो गये और कुछ को विधर्मियों ने नष्ट कर दिया।
कटरा केशवदेव-स्थित श्रीकृष्ण-चबूतरा ही भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य प्राक्ट्य-स्थली कहा जाता है। मथुरा के राजा कंस के जिस कारागार में वसुदेव-देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ने जन्म-ग्रहण किया था, वह कारागार आज कटरा केशवदेव के नाम से विख्यात है और ‘इस कटरा केशवदेव के मध्य में स्थित चबूतरे के स्थान पर ही कंस का वह बन्दीगृह था, जहाँ अपनी बहन देवकी और अपने बहनोई वसुदेव को कंस ने कैद कर रखा था।
(जानकारी आभार : http://hi.brajdiscovery.org)
मंदिर में हम लोगों को बहुत अच्छी तरह से दर्शन हुए, कंस के कारागार के उस कमरे जहाँ श्री कृष्ण का जन्म हुआ था, के दर्शन करके तो बस मन प्रसन्न हो गया। यह कमरा आज भी जेल की कोठडी के सामान ही लगता है। दर्शनों के बाद मंदिर परिसर में स्थित अमानती सामान गृह से हमने हमारा सामान लिया और बाहर निकल आये। बाहर आकर हमने मंदिर के सामने स्थित दुकान से मथुरा के प्रसिद्द पेड़े घर ले जाने के लिए ख़रीदे। अब चूँकि खाने का समय भी हो चूका था और हम सभी को जोरों की भूख भी लग रही थी अतः एक अच्छा सा भोजनालय देखकर हम सभी ने खाना खाया।
खाना खाने के बाद अब हमारा विचार था गोकुल दर्शन का, सो हमने गोकुल जाने के लिए दो ऑटो रिक्शे तय किये क्योंकि अब रितेश जी का परिवार मिलाकर हम ग्यारह लोग हो गए थे। उत्तर प्रदेश के ऑटो रिक्शा में एक खूबी होती है की आगे ड्राईवर के आजू बाजू दोनों तरफ एक एक सीट लगी होती है अतः एक ऑटो में आसानी से पांच से छः लोग समां जाते हैं जबकि हमारे यहाँ एम पी में ऑटो रिक्शा में ये सुविधा नहीं होती अतः तीन ही लोग बैठ पाते हैं।
तो इस तरह से हम सब गोकुल के लिए रवाना हो गए। करीब पौन घंटे में हम गोकुल पहुँच गए, यहाँ पहुँच कर ऑटो वाले ने हमें एक गाइड करने की सलाह दी क्योंकि यहाँ की कुञ्ज गलियों के रास्ते बहरी पर्यटकों को नहीं मालुम होते तथा मंदिरों की जानकारी भी नहीं होती अतः यहाँ गाइड करना एक फायदे का सौदा होता है क्योंकि इनका चार्ज भी बहुत ज्यादा नहीं होता है, 100 रुपये में अगर आपके साथ कोई दो घंटे रहकर आपको सारे मंदिर घुमाये और जानकारी भी दे तो क्या बुरा है?
सबसे पहले हम उस कदम्ब के पेड़ के करीब पहुंचे जिस पर बैठ कर कन्हैया बांसुरी बजाया करते थे, और उसके बाद हम नन्द महल पहुंचे जहाँ भगवान कृष्ण पले बढे थे। इसी गोकुल की गलियों में भगवान कृष्ण का बचपन बीता था। सचमुच यहाँ बहुत सारी छोटी छोटी गलियां देखने को मिली। इन गलियों को देखकर मुझे अनायास ही किसी हिंदी फिल्म का वो गाना याद आ गया ” गोकुल की गलियों का ग्वाला, नटखट बड़ा नंदलाला”
नन्द महल में हमने भगवान के छठी पूजन का स्थान देखा एवं वह स्थान भी देखा जहाँ उन्होंने घुटनों के बल चलना सिखा था। गोकुल में एक संस्था है जो विधवा स्त्रियों के भरण पोषण तथा रोज़गार के लिए कार्य करती है, यहाँ बहुत सारी विधवा स्त्रियाँ भगवान् का भजन कीर्तन करती हैं तथा यह संस्थान उनकी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। गोकुल में बन्दर बहुतायत में पाए जाते हैं तथा उनसे सावधान रहने की सख्त आवश्यकता होती है वर्ना वे आपके हाथ का सामन छीन कर भाग जाते हैं। यहाँ के बंदरों को मनुष्यों के चश्मों से बहुत लगाव है, वे आपके पहने हुए चश्मे को भी छीन कर भाग सकते हैं।
गोकुल :
यह स्थल मथुरा से 15 किमी की दूरी पर यमुना के पार स्थित है। यह वैष्णव तीर्थ है। यथार्थ महावन और गोकुल एक ही है। नन्द बाबा अपने परिजनों को लेकर नन्दगाँव से महावन में बस गये। गो, गोप,गोपी आदि का समूह वास करने के कारण महावन को ही गोकुल कहा गया है। नन्दबाबा के समय गोकुल नाम का कोई पृथक् रूप में गाँव या नगर नहीं था। यथार्थ में यह गोकुल आधुनिक बस्ती है। यहाँ पर नन्दबाबा की गौशाला थी। विश्वास किया जाता है कि भगवान कृष्ण ने यहाँ की गलियों में अपने बाल सखाओं तथा बलदाऊ के साथ खेला करते थे तथा गाँव से लगे वनों में गौएँ चराया करते थे।
यह ब्रज का एक बहुत महत्वपूर्ण स्थल है। यहीं पर रोहिणी ने बलराम को जन्म दिया था। बलराम देवकी के सातवें गर्भ में थे जिन्हें योगमाया ने आकर्षित करके रोहिणी के गर्भ में डाल दिया था। मथुरा में कृष्ण के जन्म के बाद कंस के सभी सैनिकों को नींद आ गयी और वासुदेव की बेड़ियाँ खुल गयी थीं। तब वासुदेव कृष्ण को गोकुल में नन्दराय के यहाँ छोड़ आये थे। नन्दराय जी के घर लाला का जन्म हुआ है, धीरे-धीरे यह बात गोकुल में फैल गयी। सभी गोपगण, गोपियाँ, गोकुलवासी खुशियाँ मनाने लगे। सभी घर, गलियाँ चौक आदि सजाये जाने लगे और बधाइयाँ गायी जाने लगीं। कृष्ण और बलराम का पालन पोषण यही हुआ और दोनों अपनी लीलाओं से सभी का मन मोहते रहे।
घुटनों के बल चलते हुए दोनों भाई को देखना गोकुल वासियों को सुख देता था, वहीं माखन चुराकर कृष्ण ब्रज की गोपिकाओं के दुखों को हर लेते थे। गोपियाँ कृष्ण जी को छाछ और माखन का लालच देकर नचाती थीं तो कृष्ण जी बांसुरी की धुन से सभी को मन्त्र मुग्ध कर देते थे। कृष्ण ने गोकुल में रहते हुए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त आदि असुरों को मोक्ष प्रदान किया।
गोकुल में दो तीन घंटे बिताने के बाद शाम तक हम लोग वापस मथुरा आ गए। रितेश जी एवं एवं उनका परिवार हमारे साथ ही हमारे होटल तक भी आये ताकि हम लोग कुछ वक़्त और साथ में बिता सकें। रितेश जी हमारे लिए उपहार स्वरुप आगरे के प्रसिद्द पेठे के दो पैकेट भी लेकर लाए थे जो उन्होंने हमें सप्रेम भेंट किये। यह गिफ्ट पाकर हमें बहुत ख़ुशी हुई, केशर फ्लेवर वाला पेठा सचमुच बहुत स्वादिष्ट था।
कुछ देर हमारे साथ और बिताने के बाद वे हमें अपने घर आगरा आने का निमंत्रण देकर बस से आगरा के लिए निकल गए। इस तरह यह दिन मथुरा तथा गोकुल घुमने में बिता और अगले दिन सुबह हमें वृन्दावन के लिए निकलना था।
अगले दिन वृन्दावन भ्रमण के लिए आपको अगले संडे (09′ December) तक इंतज़ार करना होगा ……………………





























जय हो मुरली वाले की! बहुत सुन्दर प्रस्तुति, मुकेश जी…फोटोज भी खुबसूरत हैं खासतौर पर यमुना के घाट का….और कदंब के वृक्ष की फोटो देखकर तो सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्य पंक्तियाँ “यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे, मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे” बरसों बाद स्वतः ही स्मृति पटल पर लौट आयी, इसके लिए शुक्रिया…
दो घुमक्कड़ परिवारों का आपस में मिलना और साथ घुमक्कड़ी का आनंद लेना घुमक्कड़.कॉम को सार्थक बनाता है…और हाँ आपकी यात्रा नवम्बर में थी या अक्तूबर में…आपकी यात्रा की तारीख कहती है नवम्बर और आपकी ट्रेन कहती है अक्तूबर…कृपया इसे ठीक कर लें…:)…
विपिन जी,
जय श्री कृष्ण.
इतने सुन्दर शब्दों के साथ उत्साहवर्धन करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। यह यात्रा अक्टूबर में ही की गई थी, गलती से नवम्बर टाइप हो गया। गलती की ओर ध्यान आकर्षित करवाने के लिए धन्यवाद। घुमक्कड़ के द्वारा हमारे अलावा अब तक कई और सदस्य भी एक दुसरे से मिल चुके हैं, आपने बिलकुल सही कहा यही बात घुमक्कड़ को सार्थक बनती है।
mukesh ji kya aap bata sakte hai apne post me picture kaise upload karte hai..i m new user
हेमंत जी,
घुमक्कड़ पर अपनी पोस्ट प्रकाशित करवाने के लिए शुरुआत की कुछ पोस्ट्स आपको घुमक्कड़ के सम्पादक मंडल (Editorial Board) की सहायता से प्रकाशित करवानी होंगी, तथा साथ ही साथ आपको एक बूट कैंप कोर्स करना होगा जो की घुमक्कड़ के संपादकों के द्वारा तीन किश्तों में आपको भेजा जाएगा। जब आप बूट केम्प सफलतापूर्वक पूरा कर लेंगे तभी आप स्वयं अपनी पोस्ट घुमक्कड़ के डेश बोर्ड पर अपलोड तथा शेड्यूल कर पायेंगे। अपनी पहली पोस्ट तैयार तथा शेड्यूल करवाने के लिए अपना लेख तथा फोटोग्राफ्स इस आईडी पर मेल कर दीजिये – [email protected]
धन्यवाद।
मुकेश जी
नमस्कार,चुकि आपकी इस यात्रा के बारे में मुझे पहले से जानकारी थी, इसलिए आपके इस लेख का बहुत दिनों से इंतजार था ,वो इंतजार आज जा के खत्म हुआ, आपके लेख की में क्या तारीफ़ करू वो हर बार की तरह जानकारी से पूर्ण है ,तस्वीर सचमुच बहुत खुबसूरत है, जो खुद एक कहानी कहती है , राकेश जी और आपने यात्रा का पूरा आनंद लिया है,
आपके अगले लेख के इन्तजार में
किशन (यात्रा द यादे )
किशन जी,
आपकी प्रेमभरी चिट्ठी पढ़कर मन को बड़ी प्रसन्नता हुई। आपने पोस्ट को पढ़ा तथा पसंद किया उसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। अगली पोस्ट अगले रविवार।
शु्क्रिया कृष्ण कन्हैया की इस जन्मभूमि से हमें रूबरू कराने के लिए।
मनीष जी,
आपकी इस मनभावन प्रतिक्रिया के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।
Mukesh jee… Bahut he badiya varnan kiya hai apne… photographs ekdum Braj bhoomee le jate hain hame…
Agle post ka intzaar ho raha hi..
देसी घुमंतू जी,
आपकी इस प्यारी सी टिप्पणी के लिए आपको आभार।
mukesh ji, aapki yatra ka lekh bhut hi achcha lga .gokul ki photo bhut achchi par thori km thi Aapki lekhni bhut achchi hai. Aapki Agli post ka intjar rhega.
एस.आर. होलकर जी,
आपकी टिप्पणीयां हमेशा से ही मेरे लिए उत्साहवर्धक तथा मार्गदर्शक रही हैं। पोस्ट की सराहना के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। आशा है आप अपनी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इसी तरह मेरा उत्साहवर्धन भविष्य में भी करते रहेंगे।
Mukesh Jee, a very good comprehensive description of Mathura and its temples. I spend so much time in Delhi but never been to Mathura and never before found any other guide that tell more.
So your’s is a complete travel guide.
Thanks and keep travelling.
Praveen ji,
Thanks a lot for your encouraging and motivating comment. I am also a big fan of your writings on ghumakkar.
Thanks.
Thanks, Mukesh, for taking us through the magical places which are associated with the legend of Lord Krishna like Mathura and Gokul. Sad that there is so much of needless security there. It must be highly disturbing for devotees to undergo such an ordeal. Great to know that you had the pleasure of Ritesh Gupta’s company during this trip.
DL,
Thank you very much for your lovely comment. DL’s comment means mark of approval and acceptance.
Once again Two Ghumakkars together………………….
Nice and detailed description Mukesh, of each and every part of your day with Ritesh . How was Yamuna looking as far as cleanliness was concerned .Was it polluted ?
Good to know places in Mathura and Gokul This post will help me in my trip.
No Vishal not two ghumakkars together, Its three ghumakkars together, Don’t forget Kavita ji.
Thank you very much for your sweet comment. Yes it was a great experience to be in company of Ritesh. Yamuna was good at Mathura, Clean and clear water.
Thanks.
मुकेश भाई आपकी इस श्रृंखला में हम साथी बन चलते रहेंगे। कन्हैया के हर ठिकाने का दर्शन भी इसी बहाने हो जायेगा।
संदीप भाई,
हमारी यात्रा में आप हमारे साथ हैं ये आपकी मोहब्बत का असर है।
जो कुछ भी लिख रहे हैं घुमक्कड़ पर आपकी सोहबत का असर है।
मुकेश जी,
बहुत अच्छा यात्रा विर्तान्त है , फोटो भी बहुत सुंदर हैं , धन्यावाद
सुरिंदर जी,
इज्ज़त अफजाई का शुक्रिया, इस नाचीज़ को आपने काबिल तो समझा।
what is Author Bootcamp ? and how can i insert pictures in my post? i am new on ghumakkar.com
pls help me
Hemant,
Please see my reply on your first comment and you’ll find answer to your question. Initially You are not authorized to upload the pictures in ghumakkar dashboard, You need to get your initial posts published through ghumakkar editorial board and simultaneously complete our author bootcamp. Please contact [email protected] for this.
Thanks.
मुकेश जी….
हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की…!
मथुरा के श्री कृष्ण भगवान से हमारे हृदय में बसते हैं और आपने बहुत ही खूबसूरती से मथुरा और गोकुल नगरी बखान बहुत ही सुन्दर शब्दों से किया हैं ….जो काफी सराहनीय और अतुलनीय है | बृज प्रदेश में रहने के कारण मुझे यहाँ के बारे में पढ़ना काफी अच्छा लगता हैं | काफी दिनों से इस लेख की प्रतीक्षा थी….आज वो प्रतीक्षा खत्म हुई….और इस लेख को बड़े चाव से पढ़ा | खूबसूरत फोटो देखकर आपके साथ हुई मुलाकात और मथुरा/गोकुल की यात्रा का फिर एक एक पल स्मरण हो आया | नाव पर बच्चो वाला फोटो काफी अच्छा लगा |
मुकेश जी ! मेरा आप से मिलना भी मेरे लिए एक अदभुत अनुभव ही था , जिसे आजतक हम केवल अंतर्जाल के माध्यम से ही जानते थे | मुझे भी आप और आपके परिवार से मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई थी और मिलने बाद हमे बिल्कुल भी नहीं लगा था, हम और आप पहली बार मिले हैं | लेख में आपने काफी कुछ मेरे बारे में लिख दिया, उसके लिए मैं आपका हृदय से शुक्र गुजार हूँ |
घुमक्कड़ी जिंदाबाद….वन्देमातरम !
सधन्यवाद ….अगले लेख की प्रतीक्षा में …..रीतेश …आगरा से …!
रितेश जी,
इस विस्तृत टिप्पणी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। पोस्ट को चाव से पढने के लिए एक बार पुनः धन्यवाद। और मैंने आपके बारे में जो भी और जितना भी लिखा है, आप उसके हक़दार हैं।
धन्यवाद।
नमस्ते मुकेश जी,
सुन्दर व सचित्र वर्णन के साथ मथुरा दर्शन करवाने के लिए धन्यवाद। आपकी यह पोस्ट निश्चित ही मेरा मार्गदर्शन करेगी।
मुझे पहचाना या नहीं?
अंकित,
आपको पोस्ट पसंद आई, मेरे लिए बड़ी ख़ुशी की बात है, सराहना के लिए हार्दिक आभार। और आपने ये पूछने की जुर्रत कैसे की की हमने आपको पहचाना या नहीं। आप भी कोई भूलने की चीज़ हो? हाँ अंकित आपने अपनी पोस्ट पर काम शुरू किया की नहीं? और वैष्णो देवी टूर की प्लानिंग कहाँ तक पहुंची है?
मुकेश जी,
गुस्ताखी के लिए क्षमा। :-)
पोस्ट पर काम चालू है पर रफ्तार थोड़ी धीमी है। वैष्णोदेवी के लिए 1 फ़रवरी का रिजर्वेशन हो चुका है। विशाल जी से बात करके काफी अच्छा लगा और उन्होंने एक नई जगह बताई है “शिवखोड़ी”, उसे भी यात्रा में सम्मिलित कर लिया है और वापसी में अमृतसर भी जुड़ गया है।
प्रवीण गुप्ता जी का नंबर ले लिया गया है और कुछ दिनों में उन्हें भी परेशान किया जाएगा। :-)
Dear Mukesh,
Nice post about Braj Bhoomi.
Though we are from Mathura, I have not seen any of these places.
Thanks for the trip.
Dear Nirdesh ji,
Thank you very much for your kind words , Its great to read that you are from Mathura.
Thanks.
प्रिय मुकेश,
आपकी सुन्दर पोस्ट और फोटो देख कर मुझे 1984 में अपनी बरबादी की, ओह सॉरी, मेरा मतलब था, अपनी शादी की और शादी के बाद आगरा – मथुरा की यादें ताज़ा हो गईं !
अयोध्या, मथुरा और काशी विश्वनाथ – देश के बहुसंख्य समाज के लिये अति पूज्य इन तीनों ही पावन तीर्थस्थलों से जुड़ी अप्रतिम आस्था को आहत करने के राजनीतिक उद्देश्य से विदेशी आक्रान्ताओं ने यहां आक्रमण किये और अपने ’पूजा स्थल’ जबरदस्ती बना डाले थे । जैसा कि प्रत्येक स्वाभिमानी समाज करता है, हमारे समाज में भी इन तीनों पावन तीर्थों को वापस पाने के लिये आन्दोलन चल रहा है पर हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति के चलते कुछ तथाकथित सेकुलर नेता अल्पसंख्यक समुदाय को भड़काते रहते हैं और अनावश्यक तनाव को जन्म दे रहे हैं ! वास्तव में यदि इन तीनों तीर्थ स्थलों की महत्ता को देखते हुए और विश्व भर के हिन्दू समाज की भावनाओं को सम्मान देने के लिये इनको मुक्त कर दिया जाये और यहां राजनीतिक कारणों के खड़े किये गये structures को हटा लिया जाये तो हिन्दू – मुस्लिम सामंजस्य और आपसी प्रेम का एक नया अध्याय आरंभ हो सकता है ! पर हमारे सेकुलर नेताओं की दुकान फिर कैसे चलेगी जिनकी दुकानदारी हिन्दू और मुसलमानों के मध्य द्वेष भावना को भड़का कर ही चलती है ?
अतः ये सिक्योरिटी जो पावन कृष्ण जन्मभूमि स्थल पर आपने देखी, वह अकारण नहीं है !
सुशान्त सिंहल
सुशांत जी,
विस्तृत टिप्पणी के लिये हार्दिक आभार। आपके इतने अच्छे तथा सुलझे विचार जानकर बड़ा हर्ष हुआ। हाई सिक्यूरिटी वाले इन तीनों स्थानों के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए धन्यवाद।
एक बात समझ नहीं आई ! जब दिल्ली में मथुरा इतनी भयानक रूप से प्रदूषित है कि वहां मछलियों का जीवित रहना असंभव हो चला है तो मथुरा और आगरा पहुंच कर वही यमुना साफ और सुन्दर कैसे होगई?
दिल्ली का तो हमें नहीं मालूम, लेकिन मथुरा में जो यमुना हमें दिखाई दी वह तो साफ़ सुथरी ही थी …………….
मुकेश जी , मथुरा के ऊपर एक बढ़िया लेख। सभी गणों ने उचित प्रशंसा की है । एक दो शिकायत हैं , आपके समक्ष रख रहा हूँ । कृपया अन्यथा न लें । मेरे हिसाब से आगाज़ को थोडा कम किया जा सकता था और जल्दी मथुरा स्टेशन पहुँचने से लेख और कसा हुआ लगता । हालांकि मुझे शुरू में ऐसा लगा की कहीं लेख ट्रेन ही में तो ख़तम नहीं हो जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ , इसलिए लेख में मसाला भरपूर है पर शायद शुरूआती पक्ष में थोडा काट-छांट की गुंजाईश है । दूसरी शिकायत ये है की आपने होटल के बारे में कम बताया और कोई फोटो नहीं लगाया ।
ऐसा लगता है की सुरक्षा विभाग ने आपको थोडा परेशान किया । शायद ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गुण ज्यादा है, यहाँ इतने वर्षों से रहने के बाद ऐसा लगता है मुझे । :-) सभी मंदिरों की स्पष्ट तस्वीरे और यमुना जी पर नाव का सफ़र मनोहारी है । धन्यवाद ।
@ सुशांत जी – आमिर खान के प्रोग्राम “सत्येमेव जयते” के अनुसार मथुरा में यमुना को नदी कहना ग़लत है क्योंके उसमे जीवन नहीं हैं जितना के पारिभाषिक नदी में होना चाहिए ।
नंदन,
इस प्यारी सी टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद। आपके सुझावों को अन्यथा लेने का सवाल ही नहीं उठता, आपकी सलाह सर आँखों पर …………… अगली पोस्ट में सुधार कर लिया जाएगा। आपने शायद ध्यान नहीं दिया एक फोटो है गेस्ट हाउस का, इस फोटो में गेस्ट हाउस का नाम पता तथा फ़ोन नंबर भी लिखा हुआ है।
धन्यवाद।
बहोत ही सुंदर और रोचक यात्रा वर्णन किया है आपने, मैं भी २००९ में मथुरा गया था पर यहाँ पर मैं सिर्फ़ वृंदावन गया और बाद में आगर जाकर ताजमहल देख सका. वैसे यदि मथुरा जाया जाए और सभी दर्शनीय स्थल को देखना हो तो इसके के लिये मेरे ख्याल से दस दिन तो होना ही चाहिये.
कई दिनों बाद आपका लेख पढ़ा इसके लिये क्षमाप्रार्थी. मेरे ख्याल से अब आपके कई पोस्ट हो गये होंगे और मुझे अब एक रोचक यात्रा वर्णन की किताब पढ़ने को मिलेगी :-)
आपके अगले लेख के इंतजार में……….
आशीष मिश्रा
आशीष,
आपको हमारी ओर से शुभ आशीष। आपकी इस सुन्दर सी टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। किताब का तो नहीं मालुम, लेकिन घुमक्कड़ पर यह संग्रह अवश्य फले फूलेगा ……………