महेश्वर – नर्मदा का हर कंकर है शंकर. नमामि देवी नर्मदे – भाग 2 |
Table of contents for A Trip to Holy city Maheshwar
साथियों,
देश की सभी नदियों की अपेक्षा नर्मदा विपरित दिशा में बहती है. नर्मदा एक पहाड़ी नदी होने के कारण कई स्थानों पर इसकी धारा बहुत ऊँचाई से गिरती है. अनेक स्थानों पर यह प्राचीन और बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से सिंहनाद करती हुई गुजरती हैं.
भारत की नदियों में नर्मदा का अपना महत्व है. न जाने कितनी भूमि को इसने हरा-भरा बनाया है, कितने ही तीर्थ आज भी प्राचीन इतिहास के गवाह है. नर्मदा के जल का राजा है मगरमच्छ जिसके बारे में कहा जाता है कि धरती पर उसका अस्तित्व 25 करोड़ साल पुराना है. माँ नर्मदा मगरमच्छ पर सवार होकर ही यात्रा करती हैं, तो आओ चलते हैं हम भी नर्मदा की यात्रा पर.
धार्मिक महत्त्व:
नर्मदा, समूचे विश्व मे दिव्य व रहस्यमयी नदी है, इसकी महिमा का वर्णन चारों वेदों की व्याख्या में श्री विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण के रेवाखंड़ में किया है. इस नदी का प्राकट्य ही, विष्णु द्वारा अवतारों में किए राक्षस-वध के प्रायश्चित के लिए ही प्रभु शिव द्वारा अमरकण्टक के मैकल पर्वत पर कृपा सागर भगवान शंकर द्वारा १२ वर्ष की दिव्य कन्या के रूप में किया गया. महारूपवती होने के कारण विष्णु आदि देवताओं ने इस कन्या का नामकरण नर्मदा किया. इस दिव्य कन्या नर्मदा ने उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर काशी के पंचक्रोशी क्षेत्र में १०,००० दिव्य वर्षों तक तपस्या करके प्रभु शिव से निम्न ऐसे वरदान प्राप्त किये जो कि अन्य किसी नदी और तीर्थ के पास नहीं है -
प्रलय में भी मेरा नाश न हो. मैं विश्व में एकमात्र पाप-नाशिनी प्रसिद्ध होऊं. मेरा हर पाषाण (नर्मदेश्वर) शिवलिंग के रूप में बिना प्राण-प्रतिष्ठा के पूजित हो. विश्व में हर शिव-मंदिर में इसी दिव्य नदी के नर्मदेश्वर शिवलिंग विराजमान है. कई लोग जो इस रहस्य को नहीं जानते वे दूसरे पाषाण से निर्मित शिवलिंग स्थापित करते हैं ऐसे शिवलिंग भी स्थापित किये जा सकते हैं परन्तु उनकी प्राण-प्रतिष्ठा अनिवार्य है. जबकि श्री नर्मदेश्वर शिवलिंग बिना प्राण के पूजित है.
अकाल पड़ने पर ऋषियों द्वारा तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर दिव्य नदी नर्मदा १२ वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हो गई तब ऋषियों ने नर्मदा की स्तुति की. तब नर्मदा ऋषियों से बोली कि मेरे (नर्मदा के) तट पर देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर तपस्या करने पर ही प्रभु शिव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है.
ग्रंथों में उल्लेख:
रामायण तथा महाभारत और परवर्ती ग्रंथों में इस नदी के विषय में अनेक उल्लेख हैं. पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा ने निकाली थी जिससे उसका नाम सोमोद्भवा भी पड़ गया था. गुप्तकालीन अमरकोश में भी नर्मदा को ‘सोमोद्भवा’ कहा है. कालिदास ने भी नर्मदा को सोमप्रभवा कहा है. रघुवंश में नर्मदा का उल्लेख है. मेघदूत में रेवा या नर्मदा का सुन्दर वर्णन है.
गंगा हरिद्वार तथा सरस्वती कुरुक्षेत्र में अत्यंत पुण्यमयी कही गई है, किन्तु नर्मदा चाहे गाँव के बगल से बह रही हो या जंगल के बीच से, वे सर्वत्र पुण्यमयी हैं.
सरस्वती का जल तीन दिनों में, यमुनाजी का एक सप्ताह में तथा गंगाजी का जल स्पर्श करते ही पवित्र कर देता है, किन्तु नर्मदा का जल केवल दर्शन मात्र से पावन कर देता है.
नर्मदा में स्नान से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है. प्रात:काल उठकर नर्मदा का कीर्तन करता है, उसका सात जन्मों का किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है. नर्मदा के जल से तर्पण करने पर पितरोंको तृप्ति और सद्गति प्राप्त होती है. नर्मदा में स्नान करने, गोता लगाने, उसका जल पीने तथा नर्मदा का स्मरण एवं कीर्तन करने से अनेक जन्मों के घोर पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं. नर्मदा समस्त सरिताओं में श्रेष्ठ है. वे सम्पूर्ण जगत् को तारने के लिये ही धरा पर अवतीर्ण हुई हैं. इनकी कृपा से भोग और मोक्ष, दोनो सुलभ हो जाते हैं.
नर्मदा में प्राप्त होने वाले लिंग (नर्मदेश्वर)का महत्त्व :
धर्मग्रन्थों में नर्मदा में प्राप्त होने वाले लिंग (नर्मदेश्वर) की बडी महिमा बतायी गई है. नर्मदेश्वर(लिंग) को स्वयंसिद्ध शिवलिंग माना गया है. इनकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती. आवाहन किए बिना इनका पूजन सीधे किया जा सकता है. कल्याण के शिवपुराणांक में वर्तमान श्री विश्वेश्वर-लिंग को नर्मदेश्वर लिङ्ग बताया गया है. मेरुतंत्रके चतुर्दश पटल में स्पष्ट लिखा है कि नर्मदेश्वरके ऊपर चढे हुए सामान को ग्रहण किया जा सकता है. शिव-निर्माल्य के रूप उसका परित्याग नहीं किया जाता. बाणलिङ्ग(नर्मदेश्वर) के ऊपर निवेदित नैवेद्य को प्रसाद की तरह खाया जा सकता है. इस प्रकार नर्मदेश्वर गृहस्थों के लिए सर्वश्रेष्ठ शिवलिंग है. नर्मदा का लिङ्ग भुक्ति और मुक्ति, दोनों देता है. नर्मदा के नर्मदेश्वरअपने विशिष्ट गुणों के कारण शिव-भक्तों के परम आराध्य हैं. भगवती नर्मदा की उपासना युगों से होती आ रही हैं.
ये तो था एक परिचय माँ नर्मदा से और आइये अब पुनः रुख करते हैं हमारे यात्रा वृत्तान्त की ओर -
चूँकि नर्मदा में पानी बहुत ज्यादा था और बड़ी बड़ी लहरें चल रही थी, हमारी बोट बड़े जोर जोर से लहरों के साथ हिचकोले खा रही थी. हमें डर भी लग रहा था की कहीं कोई अनहोनी न हो जाए, अभी इसी वर्ष अप्रेल में महेश्वर में इसी जगह एक नौका पलट गई थी और उस हादसे में कुछ लोगों की जान चली गई थी अतः हमारा मन एन्जॉय करने में नहीं लग रहा था और हम दोनों सहमे हुए थे, बच्चों को कोई डर नहीं था वे दोनों तो फुल मस्ती कर रहे थे. नाव सीधी बिलकुल भी नहीं चल रही थी और लगातार दोनों तरफ झुकती जा रही थी कभी दायें तो कभी बाएं, हमारी तो जान सुख रही थी. नाव वाले ने हमारी स्थिति समझ ली थी और अब वह हमें आश्वस्त कर रहा था की आप लोग किसी तरह का टेंशन मत लीजिये आपलोगों को सही सलामत किनारे तक पहुंचाने की मेरी जिम्मेदारी है. उसके इस आश्वासन से हमारी जान में जान आई और अब हम भी नर्मदा माँ की लहरों के साथ आनंद उठा तरहे थे.
यहाँ सबसे अच्छी बात यह थी की नाव से यानी नर्मदा जी के बीचोबीच से अहिल्या घाट पर स्थित महेश्वर फोर्ट (किला) के फोटो बड़े ही अच्छे आ रहे थे अतः हमने जी भर के नाव से ही किले के बहुत सारे फोटो खींचे. अब हम उस शिव मंदिर के करीब पहुँच गए थे जो नर्मदा नदी में स्थित है.
यह मंदिर पहले एक खँडहर के रूप में था लेकिन सन 2006 में होलकर साम्राज्य के अंतिम शासक महाराजा यशवंतराव होलकर के पुत्र प्रिन्स रिचर्ड होलकर की बेटी राजकुमारी सबरीना के विवाह के उपलक्ष में स्मृति स्वरुप इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया.
वैसे यह मंदिर नर्मदा जी में ही स्थित है लेकिन थोड़े किनारे पर जहाँ आम तौर पर उथला पानी होता है, और भक्त जन सीढियों से चढ़ कर मंदिर के दर्शन करते हैं, लेकिन आज नर्मदा का जलस्तर बहुत अधिक होने के कारण यह मंदिर आधा जल में डूब गया था. जब हमारी नाव उस मंदिर के करीब पहुंची तो हमने नाविक से निवेदन किया की थोड़ी देर के लिए मंदिर के पास नाव रोकना हमें दर्शन करने हैं लेकिन नाविक ने बताया की मंदिर की सीढियां पूरी तरह से जलमग्न हैं आपलोग मंदिर में जाओगे कैसे, और फिर कुछ ही देर में हमारी नाव मंदिर के एकदम सामने थी और अब हमने अपनी आँखों से देख लिया की मंदिर में प्रवेश करने संभव नहीं है और हमने नाव में से ही भगवान् के हाथ जोड़ लिए और हमारी नाव वापस अहिल्या घाट की और चल पड़ी.
कुछ ही देर में हम लोग वापस अहिल्या घाट पर आ गए. सभी के चेहरों पर अपार प्रसन्नता दिखाई दे रही थी, और थकान का कोई नामोनिशान नहीं था क्योंकि हम थके ही नहीं थे, बड़े ही आराम का सफ़र था यह. महेश्वर का यह घाट इतना सुन्दर है की बस घंटों निहारते रहने का मन करता है. चारों और शिव जी के छोटे और बड़े मंदिर, हर जगह शिवलिंग ही शिवलिंग दिखाई देते हैं. सामने देखो तो मां नर्मदा अपने पुरे वेग से प्रवाहित होती दिखाई देती है, आस पास देखो तो शिव मंदिर दिखाई देते हैं और पीछे की और देखो तो महेश्वर का एतिहासिक तथा ख़ूबसूरत किला होलकर राजवंश तथा रानी देवी अहिल्या बाई के शासनकाल की गौरवगाथा का बखान करता प्रतीत होता है.
यह घाट पूरी तरह से शिवमय दिखाई देता है. पुरे घाट पर पाषाण के अनगिनत शिवलिंग निर्मित हैं. यह बताने की आवश्यकता नहीं है की महेश्वर की महारानी देवी अहिल्या बाई से बढ़कर शिवभक्त आधुनिककाल में कोई नहीं हुआ है और उन्होंने पुरे भारत वर्ष में शिव मंदिरों का तथा घाटों का निर्माण तथा पुनरोद्धार करवाया है, जिनमें प्रमुख हैं वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, एलोरा का घ्रश्नेश्वर ज्योतिर्लिंग, सोमनाथ का प्राचीन मंदिर, महाराष्ट्र का वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर आदि. अब आप सोच सकते हैं अपनी राजधानी से इतनी दूर दूर तक उन्होंने मंदिरों तथा घाटों का निर्माण करवाया तो उनके अपने शहर, अपने निवास स्थान के घाट को जहाँ वे स्वयं नर्मदा के किनारे पर शिव अभिषेक करती थीं उसे कैसा बनवाया होगा? सोचा जा सकता है, वैसे ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है, यहाँ आइये और स्वयं देखिये…. हिन्दुस्तान का दिल (MP) आपको बुला रहा है.
लम्बा चौड़ा नर्मदा तट एवं उस पर बने अनेको सुन्दर घाट एवं पाषाण कला का सुन्दर चित्र दिखने वाला किला इस शहर का प्रमुख पर्यटन आकर्षण है. समय समय पर इस शहर की गोद में मनाये जाने वाले तीज त्यौहार, उत्सव पर्व इस शहर की रंगत में चार चाँद लगा देते हैं जिनमें शिवरात्रि स्नान, निमाड़ उत्सव, लोकपर्व गणगौर, नवरात्री, गंगादाष्मी, नर्मदा जयंती, अहिल्या जयंती एवं श्रावण माह के अंतिम सोमवार को भगवान् काशी विश्वनाथ के नगर भ्रमण की शाही सवारी प्रमुख हैं. यहाँ के पेशवा घाट, फणसे घाट, और अहिल्या घाट प्रसिद्द हैं जहाँ तीर्थयात्री शांति से बैठकर ध्यान में डूब सकते हैं. नर्मदा नदी के बालुई किनारे पर बैठकर आप यहाँ के ठेठ ग्रामीण जीवन के दर्शन कर सकते हैं. पीतल के बर्तनों में पानी ले जाती महिलायें, एक किनारे से दुसरे किनारे सामान ले जाते पुरुष एवं किल्लोल करता बचपन……….
इंदौर के बाद देवी अहिल्या बाई ने महेश्वर को ही अपनी स्थाई राजधानी बना लिया था तथा बाकी का जीवन उन्होंने यहाँ महेश्वर में ही बिताया (अपनी मृत्यु तक). मां नर्मदा का किनारा, किनारे पर सुन्दर घाट, घाट पर कई सारे शिवालय, घाट पर बने अनगिनत शिवलिंग, घाट से ही लगा उनका सुन्दर किला, किले के अन्दर उनका निजी निवास स्थान यही सब देवी अहिल्या को सुकून देता था और उनका मन यहीं रमता था और शायद इसी लिए इंदौर छोड़ कर वे हमेशा की लिए यहीं महेश्वर में आकर रहने लगी एवं महेश्वर को ही अपनी आधिकारिक राजधानी बना लिया. यहाँ के लोग आज भी देवी अहिल्या बाई को “मां साहेब” कह कर सम्मान देते हैं. महेश्वर के घाटों में, बाजारों में, मंदिरों में, गलियों में, यहाँ की वादियों में यहाँ की फिजाओं में सब दूर, हर तरफ देवी अहिल्या बाई की स्मृतियों की बयारें चलती हैं. आज भी महेश्वर की वादियों में देवी अहिल्या बाई अमर है और अमर रहेंगी.
मां नर्मदा सदियों से एक मूकदर्शक की तरह अपने इसी घाट से देवी अहिल्या बाई की भक्ति, उनकी शक्ति, उनका गौरव, उनका वैभव, उनका साम्राज्य, उनका न्याय अपलक देखती आई हैं और आज भी मां रेवा का पवित्र जल देवी अहिल्या बाई की भक्ति का साक्षी है और मां रेवा की लहरें जैसे देवी अहिल्या का गौरव गान करती प्रतीत होती है. नमामि देवी नर्मदे…..नमामि देवी नर्मेदे…….नमामि देवी नर्मदे.
भगवान् शिव, देवी अहिल्या बाई और मां नर्मदा का वर्णन लिखते लिखते मेरी आँखें भर आई हैं अतः माहौल को थोडा हल्का करने के लिए लौटती हूँ अपने यात्रा विवरण की ओर.
तो हमने अहिल्या घाट पर लगी एक दूकान से कुछ भुट्टे ख़रीदे और चल पड़े ऊपर किले की ओर. घाट पर ही सीढियों के पास एक घोड़े वाला बच्चों को घोड़े की सवारी करवा रहा था, जिसे देखकर शिवम् घोड़े पर घुमने की जिद करने लगा, हमने भी बिना किसी ना नुकुर के उसकी बात मानने में ही भलाई समझी क्योंकि अगर वो किसी चीज की जिद पकड़ लेता है तो फिर पुरे समय तंग करता है और सफ़र का मज़ा किरकिरा हो जाता है. घोड़े वाले ने शिवम् को घाट के एक दो चक्कर लगवाए और अब हम बिना देर किये किले में प्रविष्ट हो गए.
यह किला आज भी पूरी तरह से सुरक्षित है तथा बहुत ही सुन्दर तरीके से बनाया गया है और बड़ी मजबूती के साथ माँ नर्मदा के किनारे पर सदियों से डटा हुआ है. किले के अन्दर प्रवेश करते ही कुछ क़दमों की दुरी तय करने के बाद दिखाई देता है प्राचीन राज राजेश्वर महादेव मंदिर. यह एक विशाल शिव मंदिर मंदिर है जिसका निर्माण किले के अन्दर ही देवी अहिल्याबाई ने करवाया था. यह मंदिर भी किले की ही तरह पूर्णतः सुरक्षित है एवं कहीं से भी खंडित नहीं हुआ है. आज भी यहाँ दोनों समय साफ़ सफाई पूजा पाठ तथा जल अभिषेक वगैरह अनवरत जारी है. देवी अहिल्या बाई इसी मंदिर में रोजाना सुबह शाम पूजा पाठ करती थी. मंदिर के अन्दर प्रवेश वर्जित था अतः हमने बाहर से ही दर्शन किये तथा बाहर से ही जितने संभव हो सके फोटो खींचे. अब हमें थोड़ी थकान सी होने लगी थी क्योंकि काफी देर से पैदल ही घूम रहे थे.
अब मैं अपनी लेखनी को यहीं विराम देती हूँ, फिर मिलेंगे इस श्रंखला के तीसरे एवं अंतिम भाग में 19 सितम्बर शाम छः बजे महेश्वर के किले, महेश्वरी साड़ी, महेश्वर राजवाड़ा, महेश्वर का हिन्दी सिनेमा से सम्बन्ध जैसे कई अनछुए पहलुओं की जानकारी के साथ…….तब तक के लिए हैप्पी घुमक्कड़ी.
(नोट- कुछ चित्र तथा जानकारी गूगल से साभार)































kavitaji adbhut adbhut adbhut itna adbhut sundar kila(aapka lekh bhi) dekh kar hairan rah gaya.ghat se lagi hui ye kila oh kamal hai,aaj ke architect to college me 5 saal padhai kar degree lete hai tab jakar engineer kehlate hain,us samay wo log koun si padhai kie honge jo itna adbhut kila bana kar humlogo ko virasat me de dia. aaj bhi aan baan shan se data hua,garv se sina tane.beech nadi me mandir ye kaise kalakar rahe honge jo itni sundar kala ka parichay beech nadi me mandir bana kar diye hain.agar photo aapke mukeshji ne kheenche hain to bas itna hi keh sakta hun ki wo professional photographer hain kya?
राजेश प्रिया जी,
आप किला देखकर हैरान रह गए और मैं आपकी इतनी सुन्दर कमेन्ट पढ़कर हैरान रह गई. आपने बिलकुल सही कहा भारत की पुरातन स्थापत्य तथा वास्तु कला का तो कोई जवाब ही नहीं है. नर्मदा के बीचोबीच टापू पर बनाये गए इस मंदिर की बाणेश्वर महादेव मंदिर कहा जाता है, सचमुच यह मंदिर बहुत सुन्दर है.
जी हाँ फोटो तो मुकेश जी ने ही क्लिक किये हैं और वे प्रोफेशनल फोटोग्राफर नहीं हैं, प्रशंसा के लिए मुकेश जी की ओर से आप को बहुत बहुत शुक्रिया. और इस प्यारी सी कमेन्ट के लिए मेरी ओर से आपको बहुत बहुत धन्यवाद.
Aapne bahut accha likha…Padh ke accha laga. Man kar raha hai ki ab humne humara next trip Maheshwar ke liye banana chahiye…
Keep writing…
अभीरूचि,
इस प्यारी सी कमेन्ट के लिए आपको बड़ा सा थैंक्स. हाँ आप उज्जैन (महाकालेश्वर), ओंकारेश्वर, महेश्वर और मांडू के लिए एक तीन चार दिन की ट्रिप बना सकते हैं. आपका स्वागत है.
kavita ji bahut sunder lekh aur varnan kiya aapne Maheshwar ka…. barso se saadh thee Omkareshwar , Maheshwar aur Mandu jaane ki par ho nahi paa raha he……..bulawa nahi aaya mahadev ka……..par aapki post ke photo dekh kar man ho raha he turnt vahan pahuch jayu…….. itni achi jankari hetu dhanyawad………
दीपिका जी,
इतने सुन्दर शब्दों में की गई कमेन्ट के लिए आपको ढेर सारा धन्यवाद. मैं भोले बाबा से प्रार्थना करती हूँ की वे जल्द से जल्द आपको अपने दर्शनों के लिए बुलावा भेजें और आपके मन की साध पूरी हो.
बहुत ही सुन्दर और विहंगम दृश्य व लेखन, जय माँ नर्मदा. इस ककड़ी को हमारे यंहा खीरा बोलते हैं. इस को खाने के साथ सलाद में प्रयुक्त किया जाता हैं. धन्यवाद, वन्देमातरम….
प्रवीण जी,
प्रशंसायुक्त इस प्रतिक्रिया के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद.
वन्देमातरम….
शिवम् घोड़े पर बहुत अच्छा लग रहा है. इतनी सुंदर यात्रा वर्णन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
शुक्रिया सुरिंदर जी.
आप लगातार अपनी कमेंट्स के जरिये घुमक्कड़ पर लेखकों का उत्साहवर्धन करने का जो नेक काम कर रहे हैं उसके लिए मेरी ओर से आपको एक स्पेशल थैंक्स.
कविताजी ,
माँ नर्मदा के बारे में इतनी विस्तृत जानकारी देने के लिए बहत बहुत धन्यवाद. देवी नर्मदा मैया का फोटो बहुत सुन्दर है कौनसे मंदिर का है ?
नाव से फोटो बहुत अच्छे आये है. सुन्दर घाट है. पानी में वह मंदिर जाना चाहिए था. लेकिन अगली बार सही.
इस जगह एक बार तो आना है , अब देखते है कब बुलाती है मैया.
विशाल जी,
कमेन्ट के लिए धन्यवाद. आपको जानकारी पसंद आई समझो मेरा ध्येय पूर्ण हुआ. नर्मदा माता का यह चित्र अमरकंटक के नर्मदा मंदिर का है. पानी के अन्दर उस मंदिर (बाणेश्वर महादेव) में हम पहले एक बार जा चुके हैं. आपकी महाकाल की भी दुसरे राउंड की ट्रिप अभी बाकी है तो बस आ जाइए, आपके साथ हम भी एक बार और महेश्वर घूम लेंगे.
कविता इस लेख व पहले वाले लेख में सबसे बढिया फ़ोटो शिवम के आये इस लेख में घोडे पर घुडसवारी करते हुए तथा पहले लेख में सीढियों पर बैठा नाराज शिवम बहुत प्यारा लग रहा था।
अब बात करते है दोनों लेख की,
आपके हिन्दी लेखन के प्रेम की कोई बराबरी नहीं कर सकता है, क्योंकि आप बेहद ही संतुलित व गलतियाँ विहिन लेख लेकर आती है। अरे हाँ यह मत समझना कि मैं बढाई कर रहा हूँ यदि आप गलतियाँ करेंगी तो उसे भी बताऊँगा, फ़िर चाहे आप बुरा मान लेना। मैंने दोनों लेख कल ही पढ लिये थे। लेकिन लगता है कि कल कमेन्ट ना करके सही किया, क्योंकि सुबह-सुबह के पढे गये पहले तीनों लेख पर सब कुछ गडबड था। अत: तीनों लेख पर मैंने कमेन्ट भी गडबड वाले दिये थे। फ़िर जब आपका लेख देखा तो मन प्रसन्न हुआ, कि चलो कोई तो है जो हिन्दी का झन्डा बुलन्द किये हुए है।
ताजी मसालेदार ककडी? हमारे यहाँ तो इसे खीरा कहते है। ककडी इससे पतली व लम्बी होती है।
चलिये देखते है हमारा यहाँ का कार्यक्रम कब बनता है? तब तक राम-राम। (अगले लेख तक)
जयपुर से मालेगाँव की यात्राओं के दौरान उज्जैन में महाकालेश्वर के दर्शन फिर अगली यात्रा में औंकारेश्वर-दर्शन के पश्चात महेश्वर व माण्डू के लिये जानकारी एकत्रित कर कई बार प्रोग्राम बनाया परंतु नजदीक से गुजरते हुये भी जाना नही हो पाया, यह बिल्कुल सही है कि ‘बाबा’ बुलाते हैं तभी जाना हो पाता है।
लेख में इतनी विस्तृत जानकारी कोई भक्त ही दे सकता है और शिव भक्ति के प्रति आप दोनों की आस्था का आपके अनेक यात्रा-वृतांतों में मन को अभिभूत करने वाला परिचय मिला है।
आपका लेख पढकर महेश्वर में घाट पर 2-3 दिन बिताने की ईच्छा और बलवती हो गई है।
शर्मा साहब,
आपकी टिप्पणी पढ़कर मन प्रसन्न हो गया. इस बात में कोई शक नहीं की भगवान के बारे में विस्तृत जानकारी एक भक्त ही दे सकता है लेकिन यह भी सच है की भक्ति की खुले दिल से प्रशंसा भी एक भक्त ही कर सकता है. अगर आपकी इच्छा बलवती है तो भगवान आपको जरुर एवं जल्द ही बुलाएँगे. कमेन्ट के लिए हार्दिक धन्यवाद.
क्षमा करना कविता जी, भगवान आपको दर्शन हेतू जरूर एवं जल्द ही बुलाएगे.
जी त्रिदेव जी, दर्शनों के ही लिए ही बुलायेंगे (आशय स्पष्ट है) क्योंकि शर्मा जी की इच्छा दर्शनों के लिए ही बलवती है.
awsum experience shared here..
thanks..
i always wanted to see the origin place of mother Narmada.. and u brought it..
nice description..
Abhishek ji,
Thanks for your lovely comment.
बहुत बढ़िया विवरण कविता जी… मेरे लिये तो आपके बताए सारे स्थान नये है.. क्योकि मै तो केवल हिमालय मे पाया जाने वाला जन्तु हूं.. धन्यवाद
साइलेंट जी,
इस सुन्दर सी कमेन्ट के लिए आपको शुक्रिया. आप हिमालय में पाए जाने वाले जंतु हैं और हम वो जंतु हैं जिनके कदम अब तक हिमालय पर पड़े ही नहीं है.
कविता जी, मैं तो आपके पिछले लेख से ही माता अहिल्या का परम् भक्त बन चुका हूँ, आज कुछ और जानकारी मिल गयी, शत् शत् नमन है ऐसी देवी को, ऐसी देवी को मैं कोटि कोटि दंडवत कर्ता हूँ. माँ नर्मदा के दर्शन कराकर आपने पूर्ण घुमक्कड़ परिवार को निर्मल बना दिया तथा पाप मुक्त कर दिया. एक साथ इतने सुंदर और मनमोहक शिवलिंग के दर्शन ! बहुत ही सुंदर जानकारी तथा अति सुंदर चित्र. धन्यवाद.
त्रिदेव जी,
यह मेरे लिए किसी गोल्ड मेडल से कम नहीं है की आप मेरे इस छोटे से प्रयास से देवी अहिल्या के भक्त बन गए हैं. सचमुच वे एक महान महिला तथा शिवभक्त थीं. आपकी इस कमेन्ट का एक एक शब्द मेरे लिए बहुमूल्य है. आपके लिए ये लिंक्स लगा रही हूँ जिससे आपको देवी अहिल्या बाई के बारे में और जानकारी प्राप्त हो सके.
http://ahilyabaiholkar.wordpress.com/
http://en.wikipedia.org/wiki/Ahilyabai_Holkar
kvita ji maheshwer bhag 2 aapke sunder lekh aur photo dekhkr lagtahai 2010 main ki gai yatra adhuri thi ydi ho saketo bhag 3 main devi ahilya ke jnm aur jivan pr likhna. dhanyvad.
होलकर जी,
बड़ी ख़ुशी की बात है की होलकर राज परिवार तथा देवी अहिल्या बाई होलकर से सम्बंधित पोस्ट पर किसी होलकर की ओर से कमेन्ट आई है. आपकी इस सुन्दर कमेन्ट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. देवी अहिल्या बाई तथा उनके जीवन से सम्बंधित जानकारी मैंने अपनी इंदौर (राजवाड़ा) की पोस्ट में लिखी है, आप उस पोस्ट को पढने के लिए लॉग ऑन कीजिये –
http://www.ghumakkar.com/author/kavitabhalse/
धन्यवाद.
कविताजी,
नर्मदाजी और महेश्वर के ऊपर इस सुन्दर लेख के लिए बधाईया.
अमरकंटक (जिसके बारे में आपने यहाँ उल्लेख किया) के साथ भी हमारी काफी यादें जुड़ी हुई है. उन दिनों अमरकंटक, अनुपपुर – दोनों ही शहडोल जिला के अंतर्गत होते थे.
महेश्वर का नाम तो काफी सुना हुआ था पर उसके बारे में इतनी विस्तृत जानकारी आपके आलेख को पढ़कर ही मिली. नर्मदा जी के बारे में भी जानकारी बड़ी रोचक थी. महेश्वर किला की तस्वीर बढ़िया है.
धन्यवाद्,
Auro.
ओरोजित जी,
सबसे पहले तो आपको जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनायें. आपको लेख पसंद आया इसके लिए धन्यवाद. मध्यप्रदेश में महेश्वर का नाम काशी की तरह लिया जाता है और बॉलीवुड की भी कई फिल्मों एवं सीरियल्स की शूटिंग यहाँ पर हो चुकी है.
थैंक्स.
Kavitajee,
A very nice post and supported by excellent photographs.
I have never been in MP, except passing through different stations mostly at night.
‘ll definitely visit this place and your post will be of great help.
My apology for not replying in Hindi.
Regards,
अमिताव जी,
पोस्ट पढने, पसंद करने तथा कमेन्ट करने के लिए हार्दिक धन्यवाद. मध्य प्रदेश में महेश्वर एवं और भी बहुत अच्छे पर्यटन स्थल हैं घुमक्कड़ी के लिए जैसे उज्जैन, ओंकारेश्वर, मांडू, साँची, खजुराहो, पचमढ़ी, मैहर आदि.
कविता जी…..
जय भोले की….जय माँ नर्मदे !
नर्मदा नदी की महिमा और देवी अहिल्या बाई होल्कर जी की शिव भक्ति और समर्पण से परिपूर्ण लेख को आपके सुन्दर लेखनी में पढ़कर धन्य हुआ….| इससे पहले नर्मदा और देवी अहिल्या बाई होल्कर के बारे में मुझे इतना ज्ञान नही था…जानकारी देने के लिए धन्यवाद | सचमुच हिंदुस्तान के दिल में बसे महेश्वर के बारे बहुत कुछ जाना …..नर्मदा के किनारे के घाट , मंदिर, किला सचमुच बड़े सुन्दर लगे….पानी के बीच बने मंदिर बहुत अच्छा लगा….कुल मिलाकर आपकी यात्रा के सभी फोटो और लेख बहुत पसंद आया….| वैसे नर्मदा नदी की शांत और रौद्र रूप जबलपुर में देखने को मिलता हैं |…..सचमुच महान नदी हैं……|
धन्यवाद !
रितेश जी,
इतनी सुन्दर कमेन्ट के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद. आपकी कमेन्ट का हमें हमेशा इंतज़ार रहता है…………..इसी तरह हौसला अफजाई करते रहिये.
कविता जी , माँ नर्मदा के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए साधुवाद | एक गीत है माँ नर्मदा के ऊपर , एक बैंड के द्वारा, (Indian Ocean) , बोल हैं , “माँ रेवा तेरा पानी निर्मल झरझर बहतो जाए रेवा ….”, आपको पसंद आयगा |
महेश्वर के बारे मिने और जानने की उत्सुकता में | जय हिंद |
नंदन जी,
इतनी सुन्दर कमेन्ट के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद. आपने जो गीत बताया उसे यु ट्यूब पर ढूंढ़ कर सुनने की कोशिश करुँगी.
कविता जी
बहुत ही सुन्दर आपने नर्मदा जी की महिमा का वर्णन किया और दर्शन करवाये. एक बात जानना चाहता हूँ यह शिवलिंग तराशे हुए है. या प्राक्रतिक
रस्तोगी जी,
सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद. ये शिवलिंग प्राकृतिक तौर पर इतने चिकने तथा इतने सुन्दर आकार के नहीं होते हैं बल्कि नर्मदा नदी से प्राप्त पत्थर जो पहले से ही कुछ हद तक इसी तरह का शेप लिए हुए होते हैं उन्हें अच्छी तरह से तराश कर पॉलिश किया जाता है तथा विक्रय के लिए तैयार किया जाता है. लेकिन हाँ कुछ छोटे आकार के (डेढ़ से दो इंच) प्राकृतिक तौर पर इतने ही सुन्दर तथा चिकने शिवलिंग नर्मदा नदी में आसानी से मिल जाते हैं जिन्हें शालिग्राम पत्थर भी कहा जाता है.
Dear kavita jee,
I have no words to comment , so beautifully presented ,all compliments to you. Basically As shiv bhakt, I have Namardeshwar Ling in my pooja room , you have so beautifully written about the Namardeshwar and Narmda that every body must want to visit that place,
Waiting for next post,
Baldev swami
बलदेव जी,
पोस्ट पढने, पसंद करने तथा प्रतिक्रिया भेजने के लिए हार्दिक आभार. मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी हुई की मेरा लेख एव तस्वीरें किसी शिव भक्त को पसंद आईं तथा उसके काम आई. हौसला बढाने तथा उत्साहवर्धन के लिए एक बार फिर धन्यवाद.
ॐ नमः शिवाय……………..
कविताजी,
मां नर्मदे का इतना सुन्दर एवम विस्तृत वर्णन देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. नर्मदा नदी के दुसरे तट पर खरगोन जिले का एक अन्य नगर कसरावद बसा है. १९९२ में मुझे कसरावद में दो महीने रहने का मौका मिला तब महेश्वर देखने का अवसर प्राप्त हुआ. नदी के उस तट से नौकाएं आती हैं. हम अपनी बाइक को नौका में रखकर महेश्वर तट पर आये थे. महेश्वर के फोटो देखकर यादें पुन जीवित हो गयी. दूसरी बार इंदौर में रहने के दौरान परिवार के साथ भी २००१ में जाने का अवसर प्राप्त हुआ. बहुत ही शांत एक रमणीक स्थल है. पोस्ट में उच्च दर्जे की हिंदी का प्रयोग करने के लिए भी आपको धन्यवाद. देवनागरी लिपि का प्रचलन काफी कम हो गया है. अब लोग हिंदी भी अंग्रेजी वर्णमाला में लिखने लगे है. इससे देवनागरी लिपि को खतरा हो गया है कि कहीं आने वाले पचास या सौ वर्षों में लिपि अपना अस्तित्व न खो दे. हम सभी का यह कर्त्तव्य है कि हम इसे जिन्दा रखें. इतनी सुन्दर पोस्ट के पुन बधाई.