केदारनाथ से बद्रीनाथ |
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केदारनाथ से बद्रीनाथ
सीतापुर से चल कर ड्राइवर ने बस गुप्त काशी मे रोक दी बोला आप लोग उपर पहाड़ी पर मंदिर मे जा कर दर्शन कर आए. थोड़ा सा चढ़ने के बाद सोंचा कहाँ जाएँगे फिर हिम्मत कर के मंदिर तक पहुँच ही गये.मंदिर के बाहर ही दो-चार पंडा बैठे थे. हम लोंगो को देख कर बोले पूजा की थाली ले ले . चलिए आपको पूजा करवा देते हैं. मैने भी सोंचा की धर्म कर्म के लिए ही तो यहाँ आए हैं, वैसे भी इन पंडा पुजारी का खर्च भी तो हम लोगों की दान दच्छिना से ही तो चलता है. केदारनाथ के पाट खुलते समय भगवान की डोली यहाँ इस मंदिर की परिक्रमा करके ही आगे बढ़ती है. गुप्त काशी के मुख्य मंदिर के अंदर शिवलिंग स्थापित है साथ मे ही केदारनाथ की छोटी प्रतिक्रती भी विराजित है. मंदिर के सामने एक छोटा सा कुंड बना है इस कुंड मे अलग अलग दो जल धाराए गिर रही है. वहाँ पंडा जी ने बताया बाईं ओर की धारा से यमञोत्री का जल आ रहा है और दाई ओर की धारा से गंगोत्री का जल निकल रहा है. मुख्य मंदिर के साथ मे अर्धनारीश्वर का मंदिर है. भगवान शिव ने पांडवो को अर्धनारीश्वर के रूप मे दर्शन दिए थे. यहाँ से पूजा के बाद हम आगे के लिए चल दिए. कुंड से आगे चोपटा के मार्ग पर बढ़ते ही दोनो ओर हरे- भरे पेड़ो का जंगल नज़र आने लगा. यहाँ सड़क साफ अच्छी बनी हुई थी. ड्राइवर भी तेज़ी से बस चला रहा था. चोपटा पहुँचते – पहुँचते हमे अपने बाई ओर वर्फ़ से आच्च्छादित पर्वत श्रखलाएँ दिखने लगी. ज्यो-ज्यो बस बढ़ रही थी पर्वतो की चोटियाँ स्पष्ट होती जा रही थी . बहुत ही मोहक द्र्श्य था. चोपटा पहुँचने पर बस ड्राइवर ने बस रोक दी. सामने ही तुंगनाथ मंदिर जाने के लिए रास्त था. सड़क के दोनो ओर वर्फ़ से ढकी चोटियाँ नज़र आ रही थी . चोपटा के बारे मे पढ़ा था , स्विट्ज़रलैंड ऑफ इंडिया है. कोई शक नही हिन्दुस्तान मे चोपटा की प्राक्रतिक सुंदरता नायाब है.कोसानी के बारे मे महात्मा गाँधी ने स्विट्ज़रलैंड ऑफ इंडिया कहा था. वहाँ उन्होने अपना आश्रम भी बनाया परन्तु चोपटा की सुंदरता के आगे कोसानी कहीं नही टिकता है. जो भी चोपटा आता है वह यहाँ की खूबसूरती को भूल नही सकता. यहाँ पर हम लोग लगभग आधा घंटा रुक कर आस पास के नज़ारे देखते रहे. हमने साथ के बंगाली बाबू से पुंछ क्यो जी कैसा लग रहा है यहाँ. कहाँ तो वह इस रास्ते से आना नही चाहते थे पर अब यहाँ की सुंदरता देख कर बार-बार मेरे से कहने लगे आपने बहुत अच्छा किया जो आप हमे इस रास्ते से ले आए वरना हमे पता ही नही चलता कि कितनी खूबसूरत यह जगह है.
चोपटा
चोपटा
चोपटा
चोपटा
चोपटा
चोपटा
तुंगनाथ से चमोली का रास्ता हरे-भरे जंगलो से घिरा हुआ है. इस रास्ते पर ज़्यादा वाहन नही चल रहे थे. हमलोग दोपहर दो बजे चमोली पहुँच गये. यहाँ ड्राइवर ने एक होटेल के सामने बस रोकते हुए कहा की सब लोग जल्दी से खाना खा लो. अगर हम 4 बजे तक जोशीमठ पहुँच जाए तो बद्रीनाथ जाने का मार्ग खुला मिल जाएगा. फिर हमे रास्ते मे कहीं ना रुक कर सीधे बद्रीनाथ पहुँच जाएँगे. सभी ने 15 मिनट मे दोपहर का भोजन किया और बस मे बैठ गये. चमोली से बद्रीनाथ का मार्ग काफ़ी चौड़ा था. ड्राइवर तेज़ी से बस चला रहा था. गनीमत हुई की रास्ते मे कोई बाधा नही आई और हम लोग 4 बजे जोशीमठ पहुँच गये. अभी बद्रीनाथ जाने का मार्ग खुला था. हमारी बस के निकलने बाद ही बद्रीनाथ जाने के लिए रास्ता बंद कर दिया गया. जोशीमठ से आगे का मार्ग संकरा है इस कारण दो –दो घंटे के इंटरवल से जोशीमठ से बद्रीनाथ जाने का मार्ग खोला जाता है.
चमोली से कुछ आगे ही हमे सड़क के किनारे अलकनंदा पर कुछ अन्य विददुत परियोजनाओ पर काम चल रहा था. जोशीमठ से आगे बढ़ते ही हमे सड़क के किनारे लगे हुए jaypee के सैकड़ो बोर्ड नज़र आने लगे. हर एक बोर्ड पर बड़ा-बड़ा .” NO DREAM TOO BIG” jaypee लिखा हुआ था. ऐसा लग रहा था, अब हम किसी की प्राइवेट एस्टेट मे से होकर गुजर रहे है. ज्यो-ज्यो हम विष्णु प्रयाग की ओर बढ़ रहे थे अलकनंदा मे जल कम होता जा रहा था. विष्णुप्रयाग के पास तो अलकनंदा मे जल ही नही जज़र आ रहा था. विष्णुप्रयाग पहुँचने पर पता लगा की यहाँ पर jaypee ने अपनी विदूत परियोजना लगाई हुई है . इस कारण अलकनंदा का जल विष्णु प्रयाग मे रोक रखा था. चारो ओर jaypee..” NO DREAM TOO BIG” के बोर्ड लगे थे . ऐसा लग रहा था कि हम पर ठठाकर हंस रहा है और कह रहा है कि देखो किस तरह हम प्रकर्ती का दोहन कर के इतने बड़े हो गये है अफ़सोस कि यह लोग हम सबकी इस जल संपदा का दोहन कर के हमे ही चिढ़ा रहे है. इन्ही विचारो को लिए हुए हम बद्रीनाथ धाम पहुँच गये. इस बार भी बाकी लोंगो ने तो उसी होटेल मे कमरा लिया जहाँ पर ड्राइवर ने बस रोकी थी पर हमने परमार्थ निकेतन मे 4 बेड का एक कमरा 400 रुपये प्रति दिन के हिसाब से ले लिया. समान कमरे मे रख कर हम सब मंदिर दर्शन के लिए चल दिए. रात हो चुकी थी मंदिर के बाहर लगी लाइटो से मंदिर प्रकाशित हो रहा था. मंदिर मे भगवान बद्रीविशाल के रात्रि शयन की आरती होने जा रही थी . इसलिए मंदिर के अंदर नही जाने दे रहे थे. हम सब दूर से ही दर्शन कर के वापस आ गये.
बद्रीनाथ मंदिर
परमार्थ निकेतन की अपनी केंटिन है पर सीजन ना होने के कारण बंद थी. रात के खाने का इंतज़ाम करना था. परमार्थ निकेतन से बाहर कई होटेल रेस्टोरेंट बने हुए थे. पर अधिकतर खाली थे . एक रेस्टोरेंट मे जाकर खाना पैक करवाया. जब तक वह खाना तैयार करने लगा मै वहीं बैठे एक पंडा से बात करने लगा. बातो ही बातो मे पता लगा की वह वहीं पर एक दूसरी धर्मशाला के caretaker है. बोले हम तो आपको 200 रुपये मे कमरा दे देते. मैने कहा कोई बात नही. अब तो ले ही लिया है. वही सीजन के समय 2500 मे भी नही. मिलता है. बातो ही बातो मे इस धाम ( बद्रीनाथधाम ) की चर्चा होने लगी, मैने कहा सच तो यह है पंडित जी कि मुझे लगता है कि यहाँ तो केवल शुद्ध ह्रदय से भगवान बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आने वाले ही आ सकते है. पापी लोग तो यहाँ पहुँच ही नही सकते. बद्रीनाथ मंदिर से पहले देव दर्शनी है. यहाँ से मंदिर दिखने लगता है. देवदर्शनी के पास ही एकादशी का मंदिर है. कहते है माँ एकादशी यहीं प्रकट हुई थी.
यहाँ पहुँच कर अचानक मन मे विचार आने लगे कि लोग क्यो झूठ, फरेब, धोखाधड़ी कर के पैसे कमाने की दौड़ मे लगे हुए है. देखता हूँ लोग 60, 70 और उससे भी अधिक उम्र के हो गये हैं पर लगे हुए हैं दौड़ मे. मै पूछता हूँ अरे किसके लिए यह सब कर रहे हो. सच तो यह है की सब कुछ तो यहीं छोड़ कर जाना है. लेकिन नहीं, लगे हैं कैसे किसको टोपी पहनाए.
सुबह चार बजे से ही कानो मे आस पास के मंदिरो मे हो रही आरती की आवाज़ गूंजने लगी. पर थकान के कारण सोते रहे. करीब 6 बजे सोकर उठे तो बाहर आ कर देखा हमारे चारो ओर विशालकाय पर्वत खड़े हैं. इन पहाड़ो की चोटियो पर पड़ी वर्फ़ सूर्य की रोशनी मे चमक रही थी. जल्दी जल्दी तैयार होकर हम भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए चल दिए. जैसी की परम्परा है कि दर्शन से पहले मंदिर के नीचे बने हुए तप्त कुंड मे स्नान किया जाता है.
अलकनंदा पर बने इस पुल से मंदिर जाते है.
नीचे बने हुए तप्त कुंड
मंदिर मे दर्शन के लिए दूर तक बना टीन शेड
हमारे लिए तो सब कुछ नया था. हम भी पूछते हुए वहाँ पहुँचे. यह एक छोटा सा टैंक था जिसमे कुछ लोग नहा रहे थे कुछ लोग बाहर बैठ कर मग से तप्त कुंड का पानी ले कर नहा रहे थे. तप्त कुंड का जल काफ़ी गर्म था. बाहर मौसम मे ठंडक थी पर फिर भी तप्त कुंड का जल शरीर पर डाला नही जा रहा था. लोग इसके अंदर नहा रहे थे. तभी वहाँ नहा रहे लोगो ने बताया की पहले जल को मग से अपने उपर डाले . जब शरीर सहने लायक हो जाय तो जल्दी से इस कुंड मे उतर आए. मैने ऐसा ही किया. वहीं लोगो ने बताया की गर्म जल सर पर ज़्यादा नही डालना चाहिए वरना तबीयत खराब हो सकती है.
स्नान के बाद पूजा की थाली ले कर हम पहले आदिकेदार के दर्शन के लिए गये. कहते है , बद्रीविशाल के दर्शन से पहले आदिकेदार के दर्शन करना चाहिए. यह मंदिर तप्त कुंड से आगे बद्रीनाथ के मंदिर को जाते हुए मंदिर के बाई ओर बना हुआ है. यहाँ मंदिर मे पत्थर पर श्री नारायण के पैरो के निशान बने हुए थे. यहाँ पूजा करके पुजारी जी से तिलक लगवा कर भगवान बद्रीविशाल के दर्शन के लिए गये. भगवान बद्रीविशाल पद्मासन मे ध्यान मुद्रा मे बैठे हुए हैं. मंदिर मे भीड़ नही थी. वरना तो फटाफट दर्शन करो और बाहर निकलो. वहाँ गद्दी पर बैठे रावल जी बताने लगे की भगवान ध्यान मुद्रा मे है. विग्रह स्पष्ट नही मंदिर भगवान के ललाट पर हीरा लगा हुआ है. दाहिनी ओर कुबेर और गणेश जी तथा बाई ओर उद्धव जी, नर-नारायण, गरूण जी, नारद जी, है. उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सवमूर्ति है मस्तक पर लगे हीरे को देख कर ऐसा लग रहा था की हरे रंग का ज़ीरो वाट का वल्व जल रहा हो हम लोग थोड़ी देर वहाँ एक टक निहारते रहे तभी एक दंपति वहाँ विशेष पूजा के लिए आए. रावल जी मंत्रोचार करने लगे. हमे लगा कि इससे पहले , हमको बाहर जाने के लिए कहे , बाहर चलना चाहिए. भगवान के सामने से हट कर बाहर को निकालने लगा तभी मंत्रोचर करते हुए रावल जी ने इशारे से अपने पास बुलाया और माथे पर चंदन का लेप प्रसाद के रूप मे लगा दिया. मंदिर की परिक्रमा करके खड़ा हुआ था तभी एक साधू ने आ कर पूछा भगवान का प्रसाद लेंगे, मन मे आया नेकी और पूछ- पूछ , मैने कहा क्यो नहीं महाराज साधु ने भगवान बद्रीविशाल को चढ़ने वाले केसर युक्त मीठे चावल का प्रसाद दिया. यहाँ चरणाम्रत केसरयुक्त मीठा था. बद्रीनाथ मंदिर के दाहिनी ओर लक्ष्मी जी, गणेश जी , हनुमान जी का मंदिर है.
बद्रीनाथ मंदिर

बद्रीनाथ मंदिर
मंदिर के पाट लगभग छह माह बंद रहते है. बद्रीनाथ मंदिर के पाट बंद होने के बाद नारद जी भगवान की पूजा करते हैं. विशेष बात यह है बद्रीनाथ मंदिर के पाट बंद करते समय जो ज्योति जलाई जाती है वह ज्योति पाट खोलते समय जलती हुई मिलती है.
बद्रीनाथ की आरती
श्री पवन मंद सुगंध शीतल , हेम मंदिर शोभितम्
निकट गंगा बहत निर्मल . श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
शेष सुमरिन करत निशदिन , धरत ध्यान महेश्वरम्
श्री वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
शक्ति गौरी गणेश शारद ,नारद मुनि उच्चारणम्
वेद ध्यान अपार लीला ,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
यक्ष किन्नर करत कौतुक ,ज्ञान गन्धर्व प्रकाशितम्
श्री लक्ष्मी कमला चंवर डोले ,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
कैलाश में इक देवी निरंजन ,शैल शिखर महेश्वरम्
राजा युधिष्ठर करत स्तुति।,श्री बद्रीनाथ विशम्भरम्।
श्री बद्रीनाथ के पंचरत्न ,पढ़त पाप विनाशनम्
कोटि तीर्थ भए पुण्यों ,प्राप्ते फलदायकम्।
मंदिर से बाहर आकर पूजा की थाली दुकानदार को वापस की. ध्यान आया ब्रह्मकपाल चलते है. पूछने पर पता लगा मंदिर से करीब 100 गज पीछे अलकनंदा के किनारे ब्रह्मकपाल है. ब्रह्मकपाल के बारे मे कथा है की जब शिव जी ने ब्रह्मा जी का पाँचवा सिर काट दिया तो उन्हे ब्रह्महत्या लग गयी और वह सिर उनके हाथ मे चिपक गया. बहुत कोशिश के बाद भी नहीं छूटा. शिव सारी प्र्थवी की परिक्रमा कर के जब इस स्थान पर आए तो यहाँ पर उनके हाथ से स्वता सिर छूट गया और शिव ब्रह्म हत्या से मुक्त हो गये. तब शिव जी ने कहा जो भी इस स्थान पर अपने पितरो का श्राध और पिंड दान करेगा उसकी सात पीढ़ी तक मोच्छ को प्राप्त हो जाएँगी. तभी से इस स्थान का नाम ब्रह्मकपाल पड़ गया. कहते हैं. इस स्थान पर अपने पूर्वजो का श्राध करने से प्राणी बार-बार के जन्म म्रत्यु के बंधन से मुक्त हो कर मोच्छ को प्राप्त हो जाता है. यहाँ पर श्राध मे पहले मीठे चावल के पिंड बना कर अर्पण एक पंडा करवाते हैं , फिर ब्रह्मकपाल से नीचे स्थित ब्रह्मकुंड के पास जल से दूसरे पंडा तर्पण करवाते हैं, इसके बाद शुद्धि के लिए वापस उपर ब्रह्मकपाल के पास जाकर हवन द्वारा शुधि एक तीसरे पंडा करवाते हैं. पंडा ने बताया कि यहाँ पर श्राध करने के बाद फिर कहीं भी श्राद्ध नही किया जाता है.
ब्रह्मकपाल के पास अलकनंदा
ब्रह्मकपाल के पास अलकनंदा
श्री नारायण अदृश्य रूप से अपने भक्तों को देखते हैं व उनका कल्याण करते हैं लेकिन इस स्थान पर वही लोग जा सकते हैं जिन्हें श्री हरि अपने पास बुलाते हैं. बद्रीनाथ धाम एक पुण्य भूमि है कहते हैं यहाँ जो भी ही श्रधा से आता है वह मोच्छ को प्राप्त हो जाता है. इसलिए ही इस भूमि को भू-वैकुंठ कहते है.. इस भूमि के बारे मे कहा गया है की यहाँ पर एक दिन के तप का लाभ 10000 वर्षो के तप के बराबर मिलता है, कहते हैं दानव सह्स्त्रकवच ने सूर्या देव की तपस्या करके 1000 कवच प्राप्त किए थे. और एक कवच को वही तोड़ सकता था जिसने 10000 वर्ष तप किया हो. इस तरह से वह तीनो लोक मे अजय हो गया. जब उसके कुकर्त्यो से मानव, देवता, ऋषि, मुनि सभी त्राहि-त्राहि करने लगे तब सभी भगवान श्री नारायण के पास पहुँच, सह्स्त्रकवच को हराने के लिए यह ज़रूरी था कि आत्मचिंतन किया जाय श्री नारायण ने चिंतन कर के जाना की हिमालय पर केदार खंड मे यही स्थान ऐसा है जहाँ एक दिन तपस्या करके 10000 वर्ष का फल प्राप्त होता है. वह इस स्थान पर आ कर आत्म चिंतन मे लीन हो गये. बाद मे नर, नारायण के रूप मे जन्म लिया. अलकनंदा के एक तट पर नर ने तपस्या की और अलकनंदा के दूसरे तट पर नारायण ने तपस्या की. जिस तट पर नर ने तपस्या की वह नर पर्वत कहलाया और जिस पर्वत के नीचे अलकनंदा के दूसरे तट पर नारायण ने तपस्या की वह नारायण पर्वत कहलाता है. बद्रीनाथ का मंदिर नारायण पर्वत पर स्थित है. सह्स्त्रकवच जब युद्ध के लिए आया तब एक दिन नर युद्ध करते और उसका एक कवच तोड़ देते दूसरे दिन नर तपस्या करने बैठ जाते और सह्स्त्रकवच से नारायण युद्ध करते और उसका एक कवच तोड़ देते . बारी-बारी से एक भाई तप करता तो दूसरा भाई युद्ध करता. इस तरह से उसके 999 कवच तोड़ दिए तब सह्स्त्रकवच युद्ध भूमि से भाग कर सूर्य देव की शरण मे चला गया.
कहते हैं यहाँ आकर भागवत कथा का श्रवण थोड़ी हो सके तो देर को भी करना चाहिए. मै जिस दिन बद्रीनाथ धाम से चल रहा था उसी दिन परमार्थ निकेतन मे विशाल शामियाना श्रीमद् भागवत कथा के लिए लगाया जा रहा था. करीब 300 लोगो के एक सप्ताह ठहरने और भागवत कथा श्रवण का कार्यक्रम था.इस बार तो इस संयोंग का लाभ नही उठा पाया पर अगली बार अवश्य .
वापस आकर हमने ड्राइवर से प्रोग्राम पूछा तो बोला आज ही वापस चलना है. मैने कहा, आज तो चौथा दिन है पाँच दिन का टूर है तो कल चलना. बोला अभी आपको माना गाँव ले चलता हूँ उसके बाद वापस चलना है. एक दिन मे बद्रीनाथ से हरिद्वार नही पहुँच सकते. बद्रीनाथ से माना गाँव 3 किलोमीटर की दूरी पर अलकनंदा के किनारे बसा हुआ है. मुश्किल से 10-15 मिनट मे ही हम माना पहुँच गये. और इतनी सी दूरी के ड्राइवर ने हमसे 60 रुपये सवारी के हिसाब से अलग से ले लिया.
माना गाँव जिसे की पुराणो मे मणिभद्र पुरम के नाम से जाना जाता है. यहाँ से ही सरस्वती नदी के दर्शन होते है. कहते हैं की यहाँ से निकल कर वह भूमिगत हो जाती हैं बाद मे इलाहाबाद मे उनकी धारा दिखती है. मन मे जिग्यासा लिए हुए हम आगे बढ़े. यहाँ एक स्थान से दो रास्ते जा रहे थे एक गणेश गुफा के लिए दूसरा सरस्वती नदी के उदगम स्थल के लिए. हम पहले सरस्वती नदी के लिए गये. देखा पहाड़ के मध्य से सरस्वती की जल धारा निकल कर पतले से गलियारे मे गिर रही है. साथ मे ही सरस्वती देवी छोटा सा मंदिर है. वही पर एक चाय की दुकान है जिस पर लिखा है अंतिम चाय की दुकान. हम लोगो ने सरस्वती मंदिर मे जाकर के दर्शन किए वहीं पास मे एक बोर्ड लगा था केशव प्रयाग, अलकनंदा व सरस्वती का संगम.
माना गाँव का रास्ता
माना गाँव
माना गाँव
सरस्वती नदी उदगम स्थल
सरस्वती नदी उदगम स्थल
सरस्वती नदी के पास भारत की अंतिम चाय की दुकान
सरस्वती नदी
भीम पुल
गणेश गुफा पर लगा शिला लेख
माना गाँव , ऊन से तैय्यार किए हुए कालीन
माना गाँव
मैने दुकानदार से पूछा, मैने तो पढ़ा है कि सरस्वती नदी यहाँ से निकल कर भूमिगत हो गयी है फिर यह अलकनंदा मे कैसे मिल गयी. दुकानदार ने बताया की केशव प्रयाग मे बहुत थोड़ा सा ही पानी अलकनंदा मे मिलता है बाकी सारा भूमिगत हो जाता है. वहीं पर भीम पुल है. भीम पुल के साथ मे एक साधु ने धुनि रमा रखी है. वहीं पर एक छोटी सी जलधारा बह कर सरस्वती मे मिल रही थी. वहाँ पर लिखा था कि यह जलधारा मानसरोवर के जल की है. हमारे पास पानी की बोतल तो थी ही हम सबने पहले तो उस जल को पिया फिर बोतल मे भर कर साथ ले आया. वहीं पर दो
यूरोपियन पुरुष गेरुए वस्त्र मे आए हुए थे. उनसे बात करने लगा, बहुत ही अच्छी हिन्दी वह लोग बोल रहे थे. बताने लगे जोध पूर मे वह लोग किसी मठ मे रहते हैं.
वापस हम उसी स्थान पर आए जहाँ से गणेश गुफा जाने का मार्ग था. थोड़ा सा आगे ही गणेश गुफा है. कहते है यहाँ पर बैठ कर गणेश जी ने महाभारत ग्रंथ का लेखन किया था. रचनाकार वेद व्यास जी थे. पहले तो यह पहाड़ के बीच मे गुफा थी पर अब वहाँ पर एक छोटा सा मंदिर बना दिया है. हम जब गुफा के अंदर पहुँचे वहाँ से पानी बह रहा था. गणेश गुफा से आगे व्यास गुफा है. चढ़ाई चढ़ कर मै और मेरी लड़की व्यास गुफा पहुँचे. मेरी पत्नी और लड़का गणेश गुफा के पास ही रहे. कैमरा उनके पास था इस कारण फोटो नही खिच सका. वेद व्यास की गुफा के उपर एक चट्टान है जिस पर व्यास पोथी लिखा था. उसको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे विशालकाय ग्रंथो का पुलिंदा है. वहीं एक शिलालेख पर लिखा था , व्यास जी ने सत्तरह पुराणो की रचना की पर उन्हे संतुष्टि नही मिली अंत मे उन्होने अठारवाँ पुराण श्रीमद् भागवत की रचना की थी. व्यास जी के पुत्र शुकदेव जी ने राजा परिच्छत को अंतिम समय मे सुनाया था. गुफा छोटी सी पर साफ है जिसमे व्यास जी की प्रतिमा स्थापित है.
माना गाँव के लोग ऊन से तैय्यार किए हुए तरह-तरह के स्वेटर , कालीन आदि बेंच रहे थे. वह यहाँ खेती भी करते हैं, हमारे ड्राइवर ने तो एक बोरा आलू का खरीद कर बस मे रख लिया था.

बद्रीनाथ धाम

बद्रीनाथ धाम
हम लोग दो बजे बद्रीनाथ से वापस धर्म छेत्र के बाद कर्म छेत्र के लिए चल दिए. जाते समय ही हमने ड्राइवर को गरूण गंगा पर रुकने को कहा था पर तब तो वह रुका नही. मैने दोबारा उसे याद कराया, लौटते समय वहाँ रुक कर चलना है. पीपलकोटि से पाँच किलोमीटर आगे
पास गरूण गंगा बहती है. यहाँ पर गरूण जी का मंदिर है. कहते है भगवान के बद्रीवन जाते समय गरूण जी यहीं रुक गये क्योकि यहाँ गरूण जी के पसंद का भोजन सर्प . बहुतायत मे थे. कहते हैं अगर किसी को कोई विषैला जीव काट लेता है उसे गरूण जी कि प्रतिमा से स्पर्श करा दिया जाय तो उसका विष उतर जाता है. पढ़ा तो यह था , यहाँ पर लोग सर्पो के उन अवशेषो को जो कि पत्थरो के रूप मे है. ढूदते रहते हैं जिन्हे घर मे रखने से घर मे विषैले जीव-जन्तु का ख़तरा नही रहता है. ड्राइवर ने गरूण गंगा के पास बस रोकी. सड़क से नीचे गरूण गंगा बह रही थी. यहाँ पर लक्ष्मीनारायण का मंदिर है. उससे नीचे गरूण जी का मंदिर है. यहाँ पर हमसे पहले आए हुए एक परिवार वालो को पंडित जी पूजा किए हुए पत्थर दे रहे थे. मैने भी उनसे लिए. हमारे साथ के बंगाली बाबू तो नदी के पास ढूंड कर कुछ पत्थर ले आए.
हम जब नंद प्रयाग पहुँचे , अंधेरा ढल गया था. ड्राइवर ने यहीं रुकने का निर्णय किया पर पता लगा पिछले 2 दिनो से पानी नही आ रहा है होटेल वालो ने ठहराने से मना कर दिया. अब 8 बजे के बाद ही हम कर्ण प्रयाग पहुँचे. यहाँ सड़क के किनारे एक होटेल मे केवल तीन कमरे ही खाली मिले दोनो बंगाली और एक गुजराती भाई ठहर गये. मुझे उस होटेल वाले ने सामने के रेस्ट हाउस मे 400 रुपये मे एक कमरा देकर ठहराया. जब हम कमरे मे पहुँचे तो देख कर सुखद आनंद आया कि साथ मे ही एक नदी बह रही है. जिसकी कलकल की ध्वनि गूँज रही थी. सुबह उठ कर पता लगा कि यह तो पिंडर नदी है. होटेल से आगे ही अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम था. सुबह के समय यहाँ से भी दूर पहाड़ो पर वर्फ़ से ढकी चोटी दिख रहीं थी .
अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम
अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम
सब लोग तैयार होकर सुबह 8 बजे हरिद्वार के लिए चले. श्रीनगर से कुछ किलोमीटर पहले ड्राइवर ने बस रोक दी. पता लगा, पिछले 2 दिनो से आगे पहाड़ो से पत्थर टूट कर लगातार गिर रहे हैं रास्ता बंद है. गाड़ियाँ दूसरे रास्ते से जा रही थी जो की नियमित रास्ता नही था. हमारा ड्राइवर बोला में तो इस रास्ते से कभी गया नही हू. काफ़ी ख़तरनाक रास्ता है. हम लोगो ने कहा, जब सारे लोग अब उसी रास्ते से जा रहे हैं तो तुम्हे क्या परेशानी है. पता लगा परेशानी उसे यह थी की कुछ पैसे चाहिए थे. मतलब यह जो बोरा आलू का उसने खरीदा था वह उसे मुफ़्त का पड़ जाय . क्या करते मजबूरी थी. हमे हाँ करनी पड़ी. रास्ता काफ़ी संकरा था. सारा ट्रेफिक इस रास्ते पर आ जाने के कारण ट्रेफ़िक जाम भी हो रहा था. इस रास्ते पर चलते हुए डर भी लग रहा था. बहुत उँचे-उँचे पहाड़ो से होते हुए हमारी बस जा रही थी, कई जगह तो सड़क एकदम कच्ची मिट्टी की थी , डर लग रहा था कि इतने ट्रेफ़िक के वजन से अगर कहीं ढह गयी तो सीधे सैकड़ो फिट गहरी खाई मे जाएँगे. हमने देखा की पहाड़ो को चोटी तक खेती हो रही है. विशालकाय पहाड़ो को सीढ़ी नुमा काट कर खेती की जा रही थी. इस रास्ते पर पेड़ तो बहुत कम थे. वैसे भी जब पहाड़ो को काट-काट कर खेती की जाएगी तो पेड़ तो बचेंगे कहाँ से. कोई बड़ी बात नही कि पेड़ो की जगह खेती करने से यहा भू-स्खलन ज़्यादा होता है. मुझे लगता है कि इस तरह पहाड़ो को काट कर खेती करना भी ग़लत है. और पहाड़ो मे सुरंग बना कर बाँध बनाना भी भू-स्खलन का बड़ा कारण है.
अब कुछ विशेष जानकारी बद्रीनाथ और केदारनाथ के बारे मे.
हरिद्वार से केदारनाथ 269 किलोमीटर है. हरिद्वार से ऋषिकेश 24 किलोमीटर, ऋषिकेश से शिवपुरी 13 किलोमीटर, शिवपुरी से ब्यासी 4 किलोमीटर, ब्यासी से कौड़ियाला 17 किलोमीटर, कौड़ियाला से देव प्रयाग 36 किलोमीटर, देव प्रयाग से श्रीनगर 38 किलोमीटर, श्रीनगर से कैला सौर 10 किलोमीटर, कैला सौर से रुद्रप्रयाग 35 किलोमीटर, रुद्रप्रयाग से टिलवारा 9 किलोमीटर, टिलवारा से अगस्त मुनि 9 किलोमीटर, अगस्त मुनि से कुंड 19 किलोमीटर, कुंड से गुप्त काशी 8 किलोमीटर, गुप्त काशी से सोन प्रयाग 28 किलोमीटर, सोन प्रयाग से गौरिकुण्ड 5 किलोमीटर, गौरी कुंड से रामबाड़ा की चढ़ाई 7 किलोमीटर, रामबाड़ा से केदारनाथ 7 किलोमीटर कुल दूरी 269 किलोमीटर,
केदारनाथ धाम 11824 फिट की उँचाई पर है. गौरी कुंड 6500 फिट की उँचाई पर है. लगभग 5000 फिट की उँचाई 14 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ कर पूरी करनी होती है.
केदारनाथ से गोपेश्वर होकर बद्रीनाथ 230 किलोमीटर है.
हरिद्वार से बद्रीनाथ धाम की दूरी 302 किलोमीटर है,
हरिद्वार से ऋषिकेश 24 किलोमीटर, ऋषिकेश से शिवपुरी 13 किलोमीटर, शिवपुरी से ब्यासी 4 किलोमीटर, ब्यासी से कौड़ियाला 17 किलोमीटर, कौड़ियाला से देव प्रयाग 36 किलोमीटर, देव प्रयाग से श्रीनगर 38 किलोमीटर, श्रीनगर से कैला सौर 10 किलोमीटर, कैला सौर से रुद्रप्रयाग 35 किलोमीटर, रुद्रप्रयाग से गौचर 10 किलोमीटर, गौचर से कर्णपरयाग 10 किलोमीटर, कर्णपरयाग से नंद प्रयाग 21 किलोमीटर, नण्द्प्रयाग से चमोली 10 किलोमीटर, चमोली से पीपलकोटि 17 किलोमीटर, पीपलकोटि से जोशिमठ 13 किलोमीटर, जोशिमठ से विष्णुपरयाग 12 किलोमीटर, विष्णु प्रयाग से गोविंद घाट 7 किलोमीटर, गोविंद घाट से पांदुकेश्वर 2 किलोमीटर, पांदुकेश्वर से बद्रीनाथ 23 किलोमीटर है
बद्रीनाथ धाम 11204 फिट की उँचाई पर है.












बहुत बढिया रस्तौगी जी , फोटो के साथ साथ वर्णन भी बहुत बढिया है आपके इस वृतांत ने समां बांध दिया है ।
चोपटा सुंदर है पर कौसानी का भी जबाब नही
dear manu
तीन चार वर्ष पहले मै मई के पहले हफ्ते मे कोसनी गया होटेल वाले ने सुबह 4 बजे उठा दिया. जैसे – तैसे हम लोग वियू पॉइंट पर पहुँचे पर कुछ भी तो नही दिखा. शायद मौसम साफ नही होने के कारण रहा हो.
बहुत खूबसूरत वर्णन , फोटो भी बाड़िया हैं|
मैं जून में केदारनाथ व बद्रीनाथ गया था , सारी की सारी यात्रा दुबारा आँखों के सामने आ गई |
चोपता वाकई में बहुत खूबसूरत है | ज़यादा चड़ाई के कारण ड्राइवर वहाँ से जाते नही हैं यदि बोला ना जाए |
mahesh ji
आप चोपता होकर गये थे या नही. मुझे लगता है कि जून मे तो और भी ज़्यादा खूबसूरत लगता होगा.
हम चोपता हो कर ही गये थे , बहुत सुंदर है , वहाँ से आगे जाने का मान ही नही हो रहा था|
Bahut hi sunder varnan kiya he aap ne yatra ka. Bardinath se judi saari kathaye bhi bata kar aapne hamare gyan me vradhi ki, us hetu kotish dhanyawad. Bahut ache photos liye he aapne. Badrinath-Kedarnath par likhe lekho me ye lrkh mujhe sabse adhik pasand aaye…..marg aur duriyon ki achi jankari di aapne…bahut gyanvardhak.
इस लेख मे मैने कोशिश यही की थी कि अधिक से अधिक जानकारी थोड़े शब्दो मे दी जाय. अगर पाठक को लेख पसंद आ जाता है तो लिखने वाले को उससे अधिक प्रसन्नता होती है. धन्यवाद
It is a beautiful T-log with equally eye catching fotos. Chopta is indeed one of the most beautiful places on earth. We went there in 1992 and still havent forgotten that
tks for sharing
उस समय तो मुझे लगता है कि वहाँ पर होटेल वग़ैरह भी नही होंगे. और बहुत खूबसूरत नज़ारा होगा.
हां रस्तोगी जी जब हम गये तो 1-2 चाय की दुकाने व एक छोटा सा सरकारी गैस्ट हाउस ही था… मुझे नही लगता चोपता अब उतना सुन्दर रहा होगा. टूरिस्म कुछ न कुछ नुक्सान तो करता ही है
बाकी आपका लेख बहुत खूबसूरत है, चित्र बहुत अच्छे है व लेखन उत्तम…छोटी-मोटी त्रुटियां तो हर लेख मे होती ही है |
वैसे अगर आप लेख को 2 भागों मे देते तो कुछ अधिक निखर कर आता। फिर भी बहुत कसा हुआ व बेहतरीन लेख है
बहुत सुन्दर विवरण हैं, पुरानी यादे ताज़ा हो गयी, धन्यवाद, वन्देमातरम…
प्रवीण जी आप कब गये थे. वैसे इसमे कोई शक नही कि पुरानी यादे ताजी हो जाती है,
रस्तोगी जी नमस्कार, मै पांच बार बदरीनाथ जी की यात्रा पर जा चुका हूँ, मैंने घुमक्कड पर पोस्ट भी डाली थी. आखिरी बार दो साल पहले गया था. ये धाम ऐसा धाम हैं, जंहा बार बार जाने का मन करता हैं. और फिर वंहा से आने का मन नहीं करता हैं. मन करता हैं की भगवान बद्री विशाल के चरणों में ही पड़े रहो. जय बद्री विशाल. वन्देमातरम…
बहुत खुशी हुई जानकर कि आप को पाँच बार जाने का मौका मिला. लगता है प्रभु की विशेष कृपा है
ओम नमो नारायण
maza la dia aapne rastogi ji.wah kya kehna.main bhi aapke saath -2 dasrshan kar lia. halaki log pehle kedar phir badri vishal ke darshan ko jate hain,par mera jana ulta hua tha,main nainital se sabhi jagah ghumte hue gwaldam me ratri vishram karte hue pindar nadi ke kinare -2 hote hue pehle badri vishal ke darshan kar choupta hote hue kedar baba ke darshan ko gaya tha. choupta me maine night halt kia tha.wahan bijli nahi hai,chhote chhote hotel hain jo khana bhi dete hain aur raat me battery se chalnewali emergency light bhi.bahut khubsurat jagah hai choupta,wahan ek cheej jo maine dekhi subah-2 kaag(kouaa) bahut jyada the aur we kutchh bhi uchhaal kar kar khane ko dene par use jameen par nahi girne dete the,hawa me hi lapak lete the.aage jo gupt kashi me aapne kedar baba ke winter ka unke ghar ka darshan kie wo jagah ukhimath kehlata hai.
राजेश जी तो कुल मिला कर आपकी पुरानी यादे तो मैने ताजी कर ही दी. हाँ एक बात ज़रूर है की मै भी एक बार वहाँ रुक कर वहाँ की सुंदरता को जी भर कर देखना चाहता हूँ
रस्तोगी जी,
इतना सुन्दर एवं कमाल का वर्णन किया है आपने इस पोस्ट में की हमें लग रहा है हम भी आपके साथ यात्रा कर रहे हैं. हम जैसे लोग जो कभी बद्रीनाथ नहीं गए उनके लिए यह पोस्ट बद्रीनाथ की एक कम्प्लीट मार्गदर्शिका है. पढ़ते पढ़ते ऐसा लग रहा था की जो हम पढ़ रहे हैं वही हमारी आँखों के सामने चलचित्र के सामान घूम रहा है. बहुत सुन्दर वर्णन. मात्राओं की तथा वर्तनी की कुछ छोटी मोटी त्रुटियाँ जरूर थीं लेकिन उनसे पोस्ट की रोचकता एवं महत्त्व में रत्ती भर भी कमी नहीं आई.
kavita ji
एक लेखक की सबसे बड़ी खुशी यही होती है की जब अन्य पाठक उसके लेख को सराहे. आपको बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्रा अच्छी लगी. जानकार खुशी हुई. जहाँ तक व्याकरण या मात्राओ कि त्रुटियों का सवाल है तो कोशिश यही रहती है कि ना हो. पर समस्या तब आती है जब हम लिखना कुछ चाहते है. पर कॅंप्यूटर महोदय लिखते कुछ और हि हैं.
Dear Rastogi jee,
In your post not only we are travelling with you by sitting in front of system, but it is great to read our PORANIK granth, some of the storeyes are very much new to us, specially MANI BHADRAM PURAM,Sahstra Kavach, Garud ganga and the value of TAP in Badrinarayan,
Sir, I think our young generation must read these sites to know our religious past,
Thanks and regards,
Baldev swami
dear baldev ji
जानकार बहुत खुशी हुई कि आपको कुछ नया पढ़ने को मिला. और पसंद भी आया. जहाँ तक नई पीढ़ी की बात है तो मुझे लगता है वह लोग भी बहुत रूचि इसमे लेते है. हमारे ज़्यादा तक घुमक्कड़ परिवार के लोग युवा हैं पर आप देखें कितनी रूचि लेते हैं.
धन्यवाद
Awesome post Mr. Rastogi. The post is narrated like a story and, therefore, leaves the readers craving for more. I share your concerns about farming on the mountains and the deforestation. And I feel the heartbreak that you felt when you saw Alaknanda drying up because of the project by Jaypee. I wish development could be more eco-friendly else very soon we won’t have too many things to cherish…
hello vibha
you are the first person who appreciate me on my view.
thanks a lot
राम राम रस्तोगी जी ,
एक बहुत बढ़िया पोस्ट और बहुत ज़बरदस्त विवरण, मुझे बहुत आनंद आ गया . क्या खूब लिखा है एक दम दिल से. भक्ति कूट कूट के भरी है आपमें और आपने दिखाया इस पोस्ट में . आपको बहुत बहुत धन्यवाद. फोटो अच्छे है लकिन विवरण ने बाज़ी मारी दी. और यह पोस्ट मेरे बहुत काम में आएगी. इसलिए आपको साधूवाद.
अब चलते है कथा की ओर.आपने लिखा है की शिवजी ने ब्रह्मा जी का सर काटा था और उस जगह का नाम ब्रह्मकपाल पड़ गया है. उसी तरह बहुत से ग्रन्थ और पुरानो में लिखा है कि शिवजी ने कालभैरव को प्रकट किया था , जिसने ब्रह्मा जी का सर काटा था. और उनका सर काल भैरव के हाथ में चिपक गया था. काल भैरव पूरी श्रृष्टि घूम आया, वैकुण्ठ , कैलाश आदि लेकिन वह सर अलग नहीं हुआ लेकिन जब वह काशी में आता है तब सर अलग हो जाता है और काल बहिर्व वही रुक जाते है . काल भैरव को काशी का कोतवाल भी बुलाते है. कशी में कालभैरव का दर्शन भी अनिवार्य है कशी विश्वनाथ जी के दर्शन के बाद. खैर कशी हो या ब्रह्मकपाल कथा ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्यूंकि मैं तो दोनों जगह जाना चाहता हूँ . कशी जाके आया हूँ अब बद्रीनाथ में बुलावे का इन्तेज़ार है.
दूसरी कथा मैं पूरी कर देता हूँ. सह्स्त्रकवच सूर्या की शरण में चले जाता है लेकिन अब भी एक कवच तो बाकी होता है ना उसके पास. तो अब वह सूर्य के पुत्र के रूप में कुंती के पास जनम लेता है . और उसे नर नारायण के अवतार कृष्ण अर्जुन मार देते है महाभारत के युद्ध में.
वह और कोई नहीं अर्जुन का बड़ा भाई और ज्येष्ठ पांडव कर्ण था जिसके पास भी एक अचूक कवच था.
बद्री विशाल धाम को इतने विस्तार से बताने के लिए फिर से धन्यवाद.
hi vishal
सच तो यह है कि इस लेख को मैने बड़े मनोयोग से लिखा था. कोशिश की थी अधिक से अधिक जानकारी सन्छिप्त मे पाठको तक पहुँचे. इसलिए ही सहस्त्रा कवच की पूरी कथा भी सन्छेप मे लिखी थी. दूसरा कारण यह भी कि कहीं पाठक बोर ना होने लगे. जहाँ तक काल भैरव या शिव द्वारा पाँचवा सिर काटने का सवाल है तो मुझे लगता है अलग – अलग पुराणो मे अलग अलग कथा कही जा सकती है. ब्रह्म कपाल के बारे मे मैने ऐसा ही पढ़ा था.
बहुत खुशी हुई जानकर कि अगले वर्ष बद्रीनाथ धाम जाने का प्रोग्राम बना रहे हो. वैसे मेरा भी कुछ ऐसा ही प्रोग्राम है. या तो अमरनाथ यात्रा पर या केदारनाथ बद्रीनाथ यात्रा पर जाने का मन है. देखो कहाँ बुलाते हैं.
सबसे बड़ी बात तो यह है कि बद्रीनाथधाम यात्रा का वर्णन करना ही अपने आप मे एक गहरी अनुभूति प्रदान करता है.
काशी के बारे मे अच्छी जानकारी दी है. मेरा अभी जाना नही हुआ है.
एक बात और
बद्रीनाथ धाम के बारे मे कहा गया है की इस भूमि पर आने वाले के सभी पाप धुल जाते हैं.
भगवान कृष्ण ने उद्धव को यहाँ इसलिए भेजा था क्योकि दुर्वसा मुनि के शाप के कारण समस्त यादव कुल का नाश होना था. तब भगवान कृष्ण ने उद्धव से कहा की तुम मेरी खड़ाउ ले कर बद्रीनाथ धाम जाओ वह भूमि सभी तरह के शाप से मुक्त है.
यह तो रही पुराणो की बात पर मेरा मानना है की अगर पाप किया है तो भोगना भी यहीं पड़ेगा. और इसी जन्म मे. यहाँ carry forward नही. होता है.
रस्तोगी जी – बहुत ही सुन्दर लेख | एक आम भाषा में बंधा हुआ, कसा हुआ कीमती लेख | साथ साथ चलते है, बिना ज्यादा समय लिए आपने सारा ज्ञान भी बांटा, यात्रियों के लिए बहुमूल्य जानकारी भी परोसी और साथ ही साथ कुछ ऐसे विषयों पर (जेपी के प्लांट्स , भूस्खलन, पैसे के दौड़) भी निगाह डाली जो घुमक्कड़ी से परे है पर अत्यंत महतवपूर्ण है | बहुत बढ़िया और शास्त्र कोटि साधुवाद |
नंदन जी
बहुत धन्यवाद , आपको मेरे विचार अच्छे लगे. शायद बचपन मे पढ़ी गयी कहानियो का असर है जैसे जिस तरह से एक कथाकार अपने लेखन मे समाज की बुराइयो को पूरो देता है. कुछ ऐसा ही शायद मेरे साथ है.
रस्तोगी जी,
आपका यह लेख सचमुच अमूल्य है और सहेज कर रखने के काबिल है. बहुत बारीकी से वर्णन किया है आपने बद्रीनाथ का, हर छोटी से छोटी गतिविधि को बड़े ही मनोयोग से वर्णित किया है. इस लेख के लिए आपको 10/10.
धन्यवाद.
मुकेश जी
10 मे 10 नंबर देने के लिए धन्यवाद . सबसे सुखद बात यह है कि भगवान बद्री नारायण की यात्रा आप सभी को पसंद आई.
Rastogi Ji….
बहुत ही सुन्दर, उत्तम, श्रद्धा युक्त विस्तृत वर्णन …..और भक्ति भावना को ओतप्रोत करते सुन्दर , विस्मयीकारी चित्र !
सच पूछो तो ऐसा लगा की आपके लेख से दुबारा से बदरीनाथ धाम हो आये हो….|आपके लेख से हमें भी अपने बदरीनाथ धाम यात्रा की एक-एक बात याद आ गयी |
बदरीनाथ धाम में नर – नारायण पर्वत के बीच बर्फ से ढका नीलकंठ पर्वत बड़ा ही सुन्दर नजर आता हैं….और उसकी छत्र छाया में बदरीनाथ मंदिर की शोभा का तो क्या कहना …..अति सुन्दर मंदिर….|….. जय बद्री विशाल की….
हमारी यात्रा में माणा गाँव जाना नहीं हो पाया पर आपके लेख से काफी हद तक घूम लिए…..|
बस थोड़ा सा मात्राओ पर ध्यान देने की जरुरत बाकी लेख में कही से कोई कमी नहीं छोड़ी आपने…..हर बात का वर्णन अच्छे से किया हैं….. :-)
धन्यवाद….!
रीतेश…..
रितेश जी
जानकार खुशी हुई कि आप भी बद्रीनाथ धाम हो आए है. लेखन पसंद आने के लिए धन्यवाद. अगली बार अवश्य माणा होकर आए .
चोपटा वाकई में बहुत सुंदर है. एक नये रास्ते से आप हम सबको बद्रीनाथ लेकर गए, धन्यवाद.
एक खिचडी लेख जिसमें जबरदस्ती काफ़ी कुछ मिलाकर ठूँस दिया गया है।
अगर सभी को याद हो तो तीसरे मोर्चे की सरकार मे चिदम्बरम वित्त मंत्री थे, जब उन्होने बजट पेश किया तब मनमोहन सिंह जो कि विपछ मे थे बोले यह कोई बजट है.
तब चिदंबरम् बोले की वाह साहिब वाह आपका बजट तो बजट और हमारा बजट , बजट ही नही.
इसी तरह से आपका लिखा लेख तो सुलेख और मेरा खिचडी वाह भई वाह.
अगर अपने आप को देवता लिखते हो तो देवताओ के गुण भी अपने मे लाओ. खाली लिखने से कोई देवता नही बन जाता. देव वाणी लिखना और बोलना भी चाहिए.
मेरा यह लेख भगवान श्री बद्री नारायण को समर्पित है और इस पर किसी को उंगली उठाने का कोई हक नही है.
कल सुबह मैंने आपकी पोस्ट पर एक छोटा सा कमेन्ट किया था आपको आगाह करने हेतू, लेकिन उससे आपने कुछ नहीं सीखा। हालत अब भी वैसी ही है, मैं बताता हूँ कि यह लेख एक खिचडी लेख, कैसे बन कर रह गया है? जिसके कारण आप नाराज हो रहे हो। जिसमें लग रहा है कि जबरदस्ती काफ़ी कुछ मिलाकर ठूँस दिया गया है। जिससे एक अच्छे भले लेख का सत्यानाश हो गया है।
ऊपर वाले जिस छोटे से कमेन्ट को पढकर आप आग बबूला हो रहे हो पहले तो मैंने नीचे वाला लम्बा कमेन्ट लिखा था लेकिन फ़िर मैंने सोचा चलो पहले रस्तोगी साहब को एक लाईन में समझा दिया जाये। अगर समझ गये तो ठीक, नहीं समझे तो फ़िर आपके महाभारत लेख की तरह महाभारत कमेन्ट तो तैयार था ही। पढिये मेरा पूरा कमेन्ट क्या था। फ़िर आप अपनी अनमोल सलाह देना, अगर सही व उचित हुई तो अवश्य मानूँगा।
रस्तोगी साहब राम-राम, लगता है कि आज का दिन मुझे सारे लेख गलतियाँ वाले ही मिलने थे। सबसे पहले मनु का लेख कई गलतियाँ, जिसमें से उसने काफ़ी सुधार कर लिया। जो अच्छा किया। उसके बाद एक और गडबड लेख मात्र 155 शब्द वाला, जिसको बाद में नन्दन जी को हटाना ही पडा।
सबसे बडी बात, इस लेख में इतनी गलतियाँ लिखने में की है कि लगता है कि आप गलतियों का शतक बनाना चाह रहे थे, जो आपने बना भी दिया है मुबारक हो, आप घुमक्कड पर पहले लेखक हो जिसने शतक लगाया है भले ही गलतियों का, वैसे कुछ गलतियाँ निम्न है (वैसे सारी गलतियाँ सौ से भी ज्यादा है)
चोपटा, दच्छिना, धाराए, आच्च्छादित, दो –दो, विदूत, होटेल, मोच्छ, जिग्यासा, जोध पूर, तैय्यार, छेत्र, यमञोत्री, जज़र, प्रकर्ती, चरणाम्रत, प्र्थवी, श्राध, शुधि आदि-आदि-आदि-आदि-आदि-आदि-आदिआदि………………………………….
आपने लिखा है, ज़ीरो वाट का वल्व, आप बताईयेगा, जिसका वाट ही जीरो हो वो क्या जलेगा? जरा कभी देखना उस बल्ब पर या उसके खोल पर कितने वाट लिखे होते है? मुझे पता है लेकिन शायद आपको अपनी आंखों से देखकर ही यकीन आये।
वैसे मेरी आदत नहीं रही है दूसरे के लेख में गलतियाँ निकालने की, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर बहने लगे तो हाथ-पैर चलाने ही पडते है। अत: अभी समय है सुधार लीजिए।
आपने जबरदस्ती लेख को लम्बा बनाने के चक्कर में सारा कबाडा कर दिया है, बीच बीच में कहानियाँ भी, डाल दीहै, कहानियाँ नेट पर बहुत मिल जाती है। कहाँनियों का लिंक डाल दिया करे या दूसरे भाग में लिख दिया करे। लेख पढ कर लग रहा है लेख है कि महाभारत जो कि समाप्त ही नहीं हो रहा है। एक आदर्श लेख 2000 से 2500 शब्द के आसपास सही लगता है। ज्यादा कम शब्द या ज्यादा अधिक शब्द भी लेख की अहमियत खराब कर देते है।
कई फ़ोटो लेख में ना भी होते तो भी कोई फ़र्क नहीं पडता? क्योंकि उनमें दोहराव साफ़ झलक रहा है।
एक काम की बात जरा गौर करना कि विशाल ने भी बीच में हिन्दी में लिखना शुरु था लेकिन आपकी तरह उसकी भी हिन्दी पर अच्छी पकड नहीं थी। अत: उसने दुबारा अंग्रेजी में लिखना शुरु किया, यकीन नहीं तो देखिये उसकी अमरनाथ वाली सीरिज क्या धूम मचा रही है? हो सके तो आप भी अंगेजी में लिखिये यदि हिन्दी में ही लिखना है तो यह गलतियाँ मत दोहराओ। मत दोहराओ।
आप भी जानते है इन नेताओ ने देश का क्या कर दिया है? उनका उदाहरण मत दे, हो सके तो क्योंकि नेता कभी सुधर नहीं सकते है जबकि हम व आप अपने लेख व उनकी गलतियाँ सुधार सकते है!!!!!!!!!
जाट देवता वाली बात लेख में कहाँ से आ गयी? मेरा नाम जाट देवता लिखने से नहीं पहाडों में अत्यधिक घूमने से पडा है। लेखन मेरा पेशा नहीं है टाईम पास करने के लिये लिख लेता हूँ।
अगर आप अपनी गलतियाँ भगवान बद्री को समर्पित करना चाहते हो करो, लेकिन उसका सबके सामने पर्दशन मत करो।
अन्तिम लाईन, आप बडे है समझदार है अत: उम्मीद है आगे से इस प्रकार की गलतियों का दोहराव नहीं करेंगे। यदि आपको अब भी लगता है कि मैंने कुछ कडुवा झूठ कहा है तो बता दीजिएगा। फ़िर नहीं कहूँगा।
संदीप जी
अगर आपने अपना कमेन्ट लिखने से पहले दूसरे पाठको के कमेन्ट पढ लिये होते तो बेहतर रहता. आपने जो शाब्दिक त्रुटियो की बात लिखी है तो कविता जी ने पहले ही पॉइंट आउट कर दिया था और मैने इसका कारण भी बता दिया था.
अब आपकी जानकारी के लिये बता दू कि यह लेख मैने 2010 मे ही कागज पर लिख रखा था. पर हिन्दी मे कम्पूटर पर टाइप करना एक बड़ी समस्या थी. क्योकि हमारे कम्पूटर मे हिन्दी का software नही था और ना ही मै इस झंझट मे पड़ना चाहता था. कुछ दिन पहले मैने पढ़ा अमिताभ बच्चन के अलावा ज्यादातर फिल्म एक्टर अपने डायलाग रोमन हिन्दी मे लिखे हुए पढ़ना पसंद करते हैं. अब मुझे आइडिया आया कि रोमन मे टाइप करना बहुत आसन है. क्यो ना रोमन मे लिख कर उसको हिन्दी मे ट्रांसलेट कर लिया जाय. बस मैने यही किया. गूगले पर बहुत से software थे. परन्तु इसमे दिक्कत आ रही थी कि कई शब्द वह सही ढंग से नही लिखता था. मैने भी सोंचा कि काम तो चल रहा है अगर दो-चार शब्द सही नही भी हैं तो चलेगा पर आपने तो तिल का ताड बना दिया. ऐसा लग रहा है कि लेख का आनन्द लेने के विपरीत बच्चो की कापी जांच रहे हो.
अब दूसरी बात कि जीरो वाट का बल्ब नही होता है. पर यह चलन है कि 15 वाट के बल्व को आम तौर पर जीरो वाट का बल्व कहा जाता रहा है. दुकानदार से ज़ीरो वाट का बल्व कह कर ही खरीदते थे. पहले इसे लोग नाइट बल्व की तरह चलन मे लाते थे. या दिवाली पर इसकी झालर बना कर लगाते हैं. मेरा आशय तो पाठको को बताने का था. जिनको मालूम है अच्छी बात , नही मालूम तो उनकी जानकारी मे रहेगा, अगली बार जब वह जाएं तो ध्यान रहेगा. लेकिन आपने तो बात का बतंगड़ बना दिया. इसे कहते हैं बात का बतंगड़
आपने तो पूरे लेख का पोस्टमॉर्टम कर के छोड़ दिया .
अब बात आती है लेख मे कहानियो की तो यह जान ले की यह कहानिया मैने कहीं नेट पर ना ही पढी थी और ना ही मुझे इनके लिंक मालूम हैं. मै तो पाठको को बद्रीनाथ धाम की महिमा के बारे मे बताने के लिये सन्छिप्त मे इन कहानियो को लिखा था. आप क्या सोंचते हैं कि आप को मालूम है तो सारे जहां को मालूम हो गयी.
जहां तक लेख छोटा या बड़ा करने का सवाल है तो किस पुस्तक के कौन से अध्याय मे लिखा है कि यात्रा संस्मरण , व्रतान्त केवल 2000 से 2500 शब्दो का होना चाहिये.
और फोटो तो लेख को सजीवता प्रदान करते है. अगर किसी फोटो मे दोहराव हो गया है तो दोबारा देख लो , आंखे खराब तो हो नही जायेंगी.
मै शाब्दिक गलतियाँ, भगवान बद्री विशाल को नही समर्पित कर रहा हूँ. अपनी भावनाओ को समर्पित कर रहा हूँ और भगवान भी भक्त की भावनाओ को ही देखते हैं. उसके पहने हुए कपड़े या प्रसाद को नहीं. कि यह तो पुराने या गन्दे कपड़े पहन कर आ गया इसे बाहर निकालो. इसमे प्रदर्शन की बात कहाँ से आ गयी. हमे जो अच्छा लगा लिख दिया. अच्छा लगे तो पढ़ो ना अच्छा लगे तो मत पढ़ो.
एक बात और मै कोई साहित्यकार नही हूँ.
आलोचना करना अच्छी बात है पर आलोचना करने से पहले सही शब्दो का चयन करना भी आना चाहिये. जिससे कि दूसरे की भावनाओ को ठेस ना पहुंचे.
आप…….मैने भी सोंचा कि काम तो चल रहा है अगर दो-चार शब्द सही नही भी हैं तो चलेगा पर आपने तो तिल का ताड बना दिया. ऐसा लग रहा है कि लेख का आनन्द लेने के विपरीत बच्चो की कापी जांच रहे हो.
मैं……….जब कोई दिल से कोई लेख पढता है तो बारीकी से पढता है, बिना पढे, सिर्फ़ झूठी वाहवाही करने से बेहतर है कि ना पढे, बीते लेखों की तरह बात दो-चार शब्द तक ही सीमित रहती तो मैं तो क्या? कॊई भी कुछ नहीं कहता, लेकिन आपने तो शतक से भी कही ज्यादा बनाया है तब जाकर मुझे टोकना पडा है, उसके बाद भी आप software की गलती निकाल रहे है कमाल है अपनी गलती मानने को हरगिज तैयार नहीं है, मैं भी इसी software से लिख रहा हूँ देखिए मुश्किल से एक-आध गलती ही रह पायी होगी। जिसके बारे में मुझ जानकारी नहीं होगी। या मैंने ध्यान नहीं दिया होगा। मैं दूसरों के कमेन्ट नहीं पढता क्योंकि मैं लेख पढने आता हूँ कमेन्ट पढने नहीं।
आप…..आपने तो पूरे लेख का पोस्टमॉर्टम कर के छोड़ दिया .
मैं…….. अरे-अरे रस्तोगी साहब गजब कर रहे हो, इतने अच्छे लेख को पोस्टमॉर्टम से तुलना उचित नहीं है, इसमें सिर्फ़ 100 से कुछ ज्यादा ही तो गलतियाँ है जो सुधारी जा सकती है। जल्द सुधारने की कृपा करे। मैंने बद्रीनाथ व केदारनाथ जी पर इस साईट पर इतना शानदर लेख नहीं देखा।(अगर गलतियाँ ना होती तो)
आप…. शाब्दिक गलतियाँ, भगवान बद्री विशाल को नही समर्पित कर रहा हूँ. अपनी भावनाओ को समर्पित कर रहा हूँ और भगवान भी भक्त की भावनाओ को ही देखते हैं. उसके पहने हुए कपड़े या प्रसाद को नहीं. कि यह तो पुराने या गन्दे कपड़े पहन कर आ गया इसे बाहर निकालो. इसमे प्रदर्शन की बात कहाँ से आ गयी. हमे जो अच्छा लगा लिख दिया. अच्छा लगे तो पढ़ो ना अच्छा लगे तो मत पढ़ो. एक बात और मै कोई साहित्यकार नही हूँ.
मैं……..चलो इस पर भी बात करते है आपकी यह बात बहुत अच्छी लगी कि आप अपनी भावनाओं को भगवान को अर्पित कर रहे है सही कहा भगवान भक्त की भावनाओं को ही देखते है। उसके पहने हुए प्रसाद या पकडे को नहीं। इस बात पर मैं आपका कायल हो गया हूँ। आप अच्छा लिख रहे है, जब तक अच्छा लिखते रहोगे, तब तक तो अवश्य पढता रहूँगा, लेकिन झूठी वाहवाही नहीं कर सकता। अच्छा है अच्छा। बुरा है तो बुरा कहना पडेगा। यह भी पता लगा कि आप कोई साहित्यकार नहीं है फ़िर तो आपको और भी ध्यान लगाकर लिखना चाहिए।
आप…. आलोचना करना अच्छी बात है पर आलोचना करने से पहले सही शब्दो का चयन करना भी आना चाहिये. जिससे कि दूसरे की भावनाओ को ठेस ना पहुंचे।
क्या करे रस्तोगी साहब…… वैसे तो मैं आमतौर पर किसी की आलोचना नहीं करता हूँ क्योंकि मुझसे घूमा-फ़िरा बात करना पसन्द नहीं है। इसलिये अनुरोध है कि जितना हो सके उतना लेख गलतियाँ रहित रहना चाहिए। ताकि लेख की शान बनी रहे। इस बात में ज्यादा देर ना करे और गलतियाँ दूर होते ही मेरे दोनों कमेन्ट इस लेख से हटाने के लिये नदन जी से कह दे।
भगवान भी भक्त की भावनाओ को ही देखते हैं. उसके पहने हुए कपड़े या प्रसाद को नहीं | भगवान भाव का भूखा है कपडे-पूजा सामग्री का नहीं, आपकी यह बात दिल को छू गयी है। क्योंकि मेरे भी कुछ यही विचार है। अत: मुझसे आपसे कुछ गलती हो गयी हो तो उसे बताईयेगा कि फ़िर से मैंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया है। आप बडे है, मेरे शब्द गलत लगे हो तो, डाटेंगें तो भी चलेगा।
aap dono ke beech ke shabdik vyang baan me main nahi parunga,kyunki mujhe hindi me translate karna nahi aata.nandan sir ne complain bhi kia par kya kare nahi aata hi ndi me translate karna.baat sahi hai devtaji ne thore kare shabdo me alochna kar di hai.jabki iski utani jarurat nahi thi.dusre, main bhi manta hun lekh ko shabdo me bandhna uchit nahi hai kyunki isase lekh ki continuty par asar parta hai.maine manu se bhi request kia tha shabdo ke jaal me na pare,agar lekh bara hai to jiski jaisi itchchha,padhna hai padhe na padhna hai na padhe.aapke lekh me kahin koi kami nahi hai.bahut hi sundar balki atisundar.ummeed hai aage bhi aisi hi rochak yatra sansmaran post karenge.
ॐ शांति……………..ॐ शांति………………ॐ शांति
संदीप जी
इतना समझाने के बाद भी आप समझना नही चाहते . लगता है फिर से कहानी लिखनी पड़ेगी.
अगर आप भी मेरी तरह रोमन मे लिख कर बाद मे हिन्दी मे ट्रांसलेट करते है तो आपको मालूम होगा कि बाद मे प्रूफ रीडिंग करनी पड़ती है. जो कि लिखने से ज्यादा जटिल कार्य है. प्रूफ रीडिंग करते समय कुछ शब्द छूट जाना स्वभाभिक है. तो भाई कुछ शब्द तो इस तरह से छूट गये और कुछ एक शब्द मेरा software सही ढंग से लिख नही रहा था जैसे कि मैने mokch लिखा वह गलत उसने टाइप किया फिर मैने mochh लिखा वह भी गलत टाइप किया जबकि मैने छ्त्री वाला छ् लिखना चाहता था पर वह छाते वाला लिख रहा था. इस तरह से कई शब्दो मे गलतियाँ रह गयी पर आप तो अपने हिन्दी ज्ञान को बखाने लगे. यह उचित नही.
आपको बता दू कि 80 के दशक मे , शादी से पहले मेरा बहुत से कवियो और साहित्यकारो से संपर्क रहा. कवि सम्मेलन मे जाया करता था और मंच पर ही अन्य कवियो के साथ बैठा करता था. जिसमे से श्री सुरेन्द्र शर्मा, जो कि बहुत प्रसिद्ध हास्य कवि रहे हैं , ऐसे ही अशोक चक्रधर, ओम प्रकाश आदित्य, हुल्लड मुरादाबादी, संतोषानन्द , शैल चतुर्वेदी, शरद जोशी, काका हाथरसी, जगदीश सोलंकी आदि आदि. जैमिनी हरियाणवी का लड़का अरुण जैमिनी जो हम उम्र था , ने तो मेरे सामने पहली बर दरिया गंज के कवि सम्मेलन मे कविता पढी थी. जो कि अब कादम्बनी का एडीटर है. पर कोई भी अपनी योग्यता का इस तरह से बखान नही करता था.
एक और बात , जैसा कि मैने आपको बताया था कि यह लेख 2010 मे ही यात्रा से आने के बाद कागज पर लिख रखा था. सबूत के तौर पर 2 पेज स्कैन करके नंदन जी के पास भेज रहा हूँ कि आपको भेज दे क्योकि आपकी मेरे पास मेल id नही है. अब आप इसमे गलतियाँ ढूंढे.
आप ने एक छोटा सा जबाव लिखा पर उसमे भी गलतियाँ हो गयी ना आपसे.
मुझ,नही मुझे , पकडे. यहाँ आपने पकड़े लिख दिया कपड़े की जगह पर, इसी तरह मुझसे नही मुझमे शब्द लिखना चाहिये.
आपकी जानकारी के लिये बता दू कि एक बार प्रकाशित होने के बाद लेखक को एडिट करने का अधिकार नंदन जी ने नही दिया है. घुमक्कड़ पर प्रकाशित होने से पहले ही लेखक एडिट कर सकता है.
मुझे मालूम है आप इस जबाव को पढ कर शांत नही बैठेंगे . अभी एक-दो दिन के लिये बाहर जा रहा हूँ, वहां से लौट कर आपके अगले प्रश्न का जवाब दूंगा.
रस्तोगी जी मैं आपकी असली परेशानी समझ गया हूँ अत: आपकी यह पोस्ट मैं ठीक कर नन्दन जी को भेज देता हूँ, कोई शब्दहिन्दी में लिखने में कोई परेशानी आ रही हो तो बता देना।
मुझे अभी भी अच्छी तरह याद है जब मैंने नया-नया ब्लॉग लिखना शुरु किया था तो मैं भी आपकी तरह ढेर सारी गलती कर दिया करता था। (२-४ तो अब भी हो जाती होंगी) जिस तरह मैं आपके पीछे पडा ठीक इसी तरह नीरज भी मेरे पीछे पड गया था कि जब तक सही नहीं लिखोगे, टोकता रहूँगा।
जिस प्रकार आपने ध्यान से मेरा कमेन्ट पढा और उसमें आपको गलतियाँ मिली, उसी प्रकार लेख की गलतियाँ भी आसानी से ठीक हो जायेगी। मोक्ष के लिये mokSh लिखो ठीक हो जायेगा। जिन शब्दों पर आप असंजस की स्थिति में है ध्यान दे कि उनमें से छोटे+बडे अक्षर करने पर सही शब्द बन जाता है।
संदीप जी
बहुत खुशी हुई, आपको मेरी बात, परेशानी समझ मे आ गयी, कोई बात नहीं, कहते हैं ना “ देर आयद दुरस्त आयद”
वैसे एक बात है कि आप भी अडियल टट्टू की तरह अड जाते हो. लेकिन दिल से एकदम मोम यानी SOFT हो. यह बहुत अच्छी बात है.
राम राम