FIRST TREKKING IN MY LIFE- NEELKANTH MAHADEV TEMPLE, RISHIKESH मेरे जीवन की पहली ट्रेकिंग-नीलकंठ महादेव मन्दिर, ऋषिकेश

August 28, 2012 By:

उतर भारत में सावन का महीना भोले नाथ के नाम कर दिया जाता है, वैसे तो सम्पूर्ण भारत में सावन माह में भोले के भक्त चारों ओर छाये हुए रहते है, लेकिन इन सबका जोरदार तूफ़ान सावन के आखिरी में चलता है। संसार में भोले के नाम से चलने वाली कांवर यात्रा विश्व की सबसे लम्बी मानव यात्रा मानी जाती है। किसी जगह मैंने पढा था कि दुनिया में कावंर यात्रा की ऐसी एकमात्र यात्रा है जो हजार किमी से भी ज्यादा लम्बाई ले लेती है। गंगौत्री या देवभूमि उतराखण्ड (हिमाचल भी देवभूमि कहलाती है) का प्रवेश दरवाजा हरिद्धार से दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश, पंजाब व अन्य राज्यों में शिवभक्त कावंर रुप में गंगाजल धारण कर, सावन माह में भोलेनाथ पर अर्पण करते है। एक बार मैंने भी यह सुअवसर पाया था। जब मैंने गौमुख से केदारनाथ ज्योतिर्लिंग तक गंगा जल धारण कर पैदल यात्रा(ट्रेंकिग) की थी। वह यात्रा मेरी अब तक की सबसे लम्बी पद यात्रा रही है लेकिन मुझे लगता है कि मेरा यह अभिलेख(रिकार्ड) जल्द ही धवस्त होने जा रहा है क्योंकि मैं बहुत जल्द वृंदावन क्षेत्र की चौरासी कौस (256 किमी) की पद यात्रा पर जा सकता हूँ, इसके अलावा एक पैदल यात्रा का फ़ितूर भी मेरी जाट खोपडी मे घुसा हुआ है, मेरा एक D.E.O. साथी जो दो साल पहले तक मेरे साथ कार्य करता था। आजकल उसका स्थानांतरण दूसरे क्षेत्र में हो गया है। कुछ दिन पहले उसका फ़ोन आया था कि संदीप चलो बालाजी की पद यात्रा करके आते है। अभी तक मेरे मन में दोनों यात्रा करने की है लेकिन समय अभाव के कारण कोई एक यात्रा निकट भविष्य में सम्भव हो पायेगी। देखते है जाट देवता को मिलने के लिये अबकी बार कौन से भगवान दर्शन के लिये खाली है?

 

दिल्ली से राम झूला मार्ग।


बात चल रही थी कांवर यात्रा की और मैं आपको लेकर पहुँच गया भविष्य की संभावित यात्रा के बारे में। बात सन 1994 के सावन महीने की है जब दिल्ली में कांवर मेला अपने पूरे उफ़ान पर होता है, हमारे घर के पास ही कांवरियों की मदद के लिये एक कांवर भण्डारा लगता था। वैसे तो वह भण्डारा हर साल लगा करता था, जिसमें मेरे पिताजी मुख्य संरक्षक थे। लेकिन मेरे पिताजी की आकस्मिक निधन के बाद सन 1997 से वह भन्डारा बन्द हो गया। मैं भी दो-तीन साल तक, उस भण्डारे में प्रतिदिन दो-तीन घन्टे की सेवा कर दिया करता था। उस भण्डारे का एक वार्षिक नियम था कि सावन का जल अर्पण करने वाले दिन, हरिद्धार व ऋषिकेश की यात्रा करने के लिये इच्छुक बन्दों से नाममात्र के किराये पर यात्रा करायी जाती थी। उस साल मैंने भी पापा से आज्ञा लेकर अपना नाम सूची में लिखवा दिया था। दिन में पूरी सब्जी व खीर का भन्डारा आम जनता के लिये किया जाता था, जिसमें भण्डारे में बची हुई शेष सामग्री समाप्त हो जाती थी। अगर कुछ कम पडता था तो उस सामान को मंगा लिया जाता था। दिन में भण्डारा कर रात में ठीक नौ बजे सबका भण्डारा स्थल मिलने की बात पक्की हो गयी थी। लगभग सभी तय समय पर वहाँ पहुँच गये थे। सूची अनुसार एक बन्दा जिसका नाम उसमें लिखा हुआ था, उसका कहीं अता-पता नहीं था। उस समय मोबाइल जैसी बला तो मौजूद नहीं थी ताकि उससे सम्पर्क किया जा सकता, क्या कर सकते थे? एक लड्का उसके घर भेजा गया, उसने लौट कर बताया कि उसका अपने बापू से किसी बात पर झगडा हो गया है वह अब नहीं आयेगा। यह पक्का हो जाने के बाद कि वह नहीं आयेगा, अपनी गाडी (टाटा 407) देवभूमि दर्शन कराने के लिये चल पडी थी। एक काहवत है ना कि सिर मुंडाते ही ओले पडे। वह कहावत उस यात्रा में कई बार सिद्ध हुई थी। जैसे जैसे यह यात्रा आगे बढेगी एक दो घटना सामने आयेंगी।

 

देख लो झूला पुल।


दिल्ली में घुसते ही सबसे पहले पुलिस वालों ने गाडी को रोक लिया, वहाँ से किसी तरह कई मिनट बरबाद कर आगे बढे तो जैसे ही फ़िर से उतरप्रदेश में प्रवेश किया तो पियक्कड किस्म के दो बन्दों के कारण शराब के सरकारी ठेके पर फ़िर से कई मिनट खराब हो गये। किसी तरह गाजियाबाद पार किया। टैम्पों में लोहे के फ़र्श पर उबड-खाबड सडक पर चलते हुए नींद आने का तो कोई सवाल ही नहीं था। मैं तो यही सोचता रह गया था कि ढंग से सलामत बैठा कैसे रहूँ, जब कोई खडडा सडक पर आ जाता था तो हम लगभग सभी उछल पडते थे। और सभी के मुँह से निकलता था। सभी ड्राईवर को कहते ओ दुश्मन जरा देख के चला ले इतनी तावल क्यों मचा रहा है? मारेगा क्या? बेचारा टैम्पो चालक भी क्या करे रात मे सडक के छोटे-छोटे गडडे दिखाई ही दे पाते है, और यदि दिखाई भी दे जाते है तो तब दिखते है जब गाडी उन पर चढ चुकी होती है। उन गडडों ने हमारे शरीर का अंग-अंग दुखा दिया था। मन कर रहा था कि किसी तरह इस टैम्पो से छुटकारा मिले तो बात बने।

 

एक विश्राम स्थल।


रात में रुडकी आते-आते बारिश ने भी हमसे किसी जन्म का बदला लेना शुरु कर दिया था। टैम्पो में ऊपर छत के नाम पर तिरपाल तक नहीं थी। बारिश ने किसी को नहीं बक्सा, सभी को पानी में भिगो दिया था। चूकि गर्मी का मौसम था इस कारण ठण्ड तो ज्यादा नहीं लगी, लेकिन गर्मी भी सारी की सारी उतर गयी थी। हम लगभग सुबह के चार बजे ऋषिकेश से आगे मुनि की रेती नामक जगह पहुँच चुके थे। जब टैम्पो से नीचे उतरे तो देखा कि हम गंगा के किनारे आ पहुँचे थे। आसमान में देखा तो जबरदस्त बादल छाये हुए थे। किसी ने कहा कि चलो  पहले सीधे नीलकंठ चलते है क्योंकि बारिश का तो कोई भरोसा नहीं है कि कब दुबारा शुरु हो जायेगी? हम लगभग 18-20 बन्दे थे। सब के सब नीलकंठ महादेव मन्दिर जाने के लिये राम झूले की ओर चल पडे थे। जहाँ हमारा टैम्पो खडा हुआ था वहाँ से राम झूला काफ़ी नजदीक था जिस कारण हमें राम झूला पहुँचने मे ज्यादा समय नहीं लगा था। मैं इस यात्रा से पहले भी राम झूला एक बार देखा था आज दूसरी बार इस झूले से पार जाना हो रहा था। राम झूला पार करने के बाद गंगा जी के किनारे जाकर नीलकंठ महादेव मदिर में अर्पण करने के लिये गंगा जल लिया गया था। लगभग सभी ने छोटी-छोटी प्लास्टिक वाली आधी लीटर की कैन में अपने-अपने लिये गंगा जल ले लिया था। गंगा जल लेकर सब आगे बढ चले। झूला पार करने के कुछ दूरी बाद चॊटी वाला भोजनालय आता है जिसके सामने से बिना कुछ खाये पिये, हम सीधे पहाड की ओर चलते गये। थोडी दूर जाने पर हमें वह सडक दिखाई देती है जो लक्ष्मण झुले+नीलकंठ महादेव मन्दिर की ओर गाडी जाने के लिये बनी हुई है। मैंने एक बार बाइक, एक बार कार से इस मार्ग पर भी यात्रा की हुई है। जब मैं पत्नी के साथ यमुनौत्री, गंगौत्री व नचिकेता ताल गया था।


जैसे ही हमें सडक दिखाई दी थी, वैसे ही हम सीधे सडक पर चलने लगे थे। कुछ दूर जाने पर सडक नागिन की तरह बलखाती हुई आगे चली जाती है जबकि हम सडक छोड्छाड कर उल्टे हाथ पर बने पैदल मार्ग पर चलने लगते है। यहाँ तक आते-आते बारिश रुक जाती है। जहाँ से नीलकंठ महादेव मन्दिर जाने का पैदल मार्ग शुरु होता है वहाँ पर एक बोर्ड भी लगा हुआ था। शायद आज भी होगा। उस समय यह मार्ग लगभग कच्चा ही था। बाद में मैं यहाँ एक बार फ़िर से गया था तो तब इस मार्ग का पक्का करने का कार्य चल रहा था, पैदल मार्ग पर चलने के थोडी दूरी तक तो थोडा सा समतल रहता है उसके बाद पत्थरों से बनी हुई सीढियाँ आनी शुरु हो जाती है। जैसे-जैसे मार्ग आगे बढता जा रहा था वैसे-वैसे कठिन होता जा रहा था। यह यात्रा कुल मिलाकर आना-जाना पैदल दूरी लगभग 28 किमी की हो जाती है। गाडी से शायद एक तरफ़ से 26 किमी की हो जाती है।

 

चलो चले।


 हमारे समूह में में लगभग आधे लोग थोडे ढीले किस्म के प्राणी थे। बाकि आधे हमारी तरह ऊँत खोपडी शरारती किस्म वाले प्राणी थे। जो ढील-ढाले बन्दे थे वह आराम-आराम से आ रहे थे बल्कि यह कहे कि बैठ-बैठ कर आ रहे थे तो ज्यादा ठीक है। हमारी शरारती टोली में लगभग आठ-नौ लडके थे जो कि मार्ग को छोड कर ऊपर जाने का शार्टकट तलाश करते रहते थे। पहाड में होता यह है कि लोग उतरते समय शार्टकट ज्यादा तलाश करते है जबकि हम चढते समय तलाश कर रहे थे। चलते-चलते मार्ग में एक ऐसी जगह आयी थी जहाँ पर एक दुकान थी और पैदल मार्ग के ऊपर एक पेड गिरा हुआ था जिस कारण सभी को झुक कर पॆड के नीचे से निकलना पड रहा था। हमारे एक साथी ने बताया कि सामने जो मोड है वहाँ से नीलकंठ महादेव मन्दिर का आधा मार्ग रह जाता है। हम ऊपर चढते जा रहे थे और पीछे मुड-मुड कर मार्ग व घाटी की ओर भी देखते जा रहे थे। बीच-बीच में कई जगह ऐसी आई थी, जहाँ से गंगा नदी का शानदार नजारा दिखाई दे रहा था। मार्ग घने जंगल से होकर गुजर रहा था जिस कारण मन में थोडा सा डर सा बना हुआ था। हम में से किसी ने बोला कि यहाँ जंगली जानवर भी मिल जाते है जंगली जानवर का नाम सुनकर मन में थोडी सी खुशी व बैचैनी बन गयी थी।

 

लंगूर भी मिलते है।


चलते-चलते एक ऐसी जगह आती है, जहाँ आकर पैदल मार्ग पर कई दुकाने एक साथ दिखाई देने लगती है। उनमें से किसी एक दुकान पर सबने थोडी देर रुककर नीम्बू-पानी, चाय-पानी जिसको जो पसंद था उसका स्वाद लिया गया था। वहाँ लगभग आधा घन्टा रुकने के बाद हमारा कारवाँ फ़िर से मंजिल की ओर बढ चला था। उन दुकानों से लगभग एक किमी आगे तक मार्ग लगभग समतल सा ही था, नहीं तो अब तक चढाई ने सबका बुरा हाल किया हुआ था। समतल मार्ग समाप्त होने के बाद, एक बार फ़िर से थोडी देर चढाई वाला मार्ग आया था। उसे पार करने के बाद जब हमने सामने देखा तो अपनी खुशी का ठिकाना ना रहा। कारण सामने कई किमी तक हमें ढलान ही ढलान दिखाई दे रही थी। एक साथी ने बताया कि अब यहाँ से मन्दिर तक ढलान ही ढलान है। अत: इतनी लम्बी ढ्लान देखकर अपनी सारी थकावट छूमन्तर हो गयी थी। यहाँ से मन्दिर वाली घाटी का शानदार नजारा दिखाई दे रहा था। मैं कई मिनट तक खडे होकर इसे देखता रहा।

 

यह सडक मार्ग है।


जब सब लोग साथ आ गये तो वहाँ से नीचे की ओर दौड पडे, यहाँ चल पडे शब्द ठीक नहीं रहेगा क्योंकि यहाँ से आगे दो किमी का सफ़र हमने मात्र बीस मिनट में नाप डाला था। जब हम मन्दिर के नजदीक पहुँचे तो देखा कि फ़िर से थोडी सी चढाई आ गयी है। यह तीन चार मिनट की चढाई पार करने के बाद हम मन्दिर के आँगन में जा पहुँचे थे। सबसे पहले स्नान करने की तैयारी होने लगी। मन्दिर के ठीक पीछे दीवार के नीचे एक साफ़ पानी का झरना बहता रहता है। हममें से ज्यादातर बन्दों ने वहाँ स्नान किया था। स्नान करने के बाद मन्दिर में दर्शन करने वाली लाईन में लगने के लिये चल दिये। सबने अपने-अपने जूते चप्पल एक ओर निकाल कर, मन्दिर में गंगा जल अर्पण करने के लिये लाईन में लग गये। लाईन में लगे-लगे हमने मन्दिर की नक्काशी देखी थी, बिल्कुल दक्षिण भारतीय तरीके से बना हुआ मन्दिर लगता है। मैंने अपनी दक्षिण भारत की यात्रा में कुछ ऐसी की कारीगरी देखी थी। लाईन बेहद लम्बी थी, हमारा नम्बर आने में आधा घन्टा लग गया था। जब लाइन में लगे हुए थे तो देखा था कि किस तरह से लोगों की संख्या को नियंत्रित करने के लिये लोहे के पाईप व बाँस की लाईन बनाकर गली जैसा रुप दिया गया था। मन्दिर के एकदम सामने तो बेहद ही पतली गली मात्र दो फ़ुट चौडी लोहे की जाली वाली गली बनायी हुई है, जहाँ से होकर मन्दिर में प्रवेश कराया जाता है। जब हमारा नम्बर आता है सब के सब एक साथ जयकारा लगाते है। जय शंकर की हर-हर महादेव हर-हर गंगे” । एक साथ इतने सारे लोग जयकारा लगाते है तो तब समां ही कुछ और होता है। भीड-भाड के मौके पर उन लोगों को निराशा हाथ लगती है जो लोग काफ़ी देर रुककर वहाँ जल अभिषेक करने की इच्छा रखते हो। उन लोगों को इस प्रकार के भीड वाले मौके से परहेज करना ही बेहतर रहेगा। ऐसी भीडभाड में एक बन्दे को मुश्किल से दस सैकन्ड का समय मिल पाता है। क्या करे संचालक भी, भारी भीड भी तो नियंत्रित करनी होती है किसी दो-चार के लिये भीड को भडकाया नहीं दिया जा सकता है। हमने गंगा जल से भोले नाथ को स्नान कराके और फ़िर से मिलने की बोल, राम राम कर मन्दिर से बाहर का मार्ग पकड लिया।


मन्दिर से वापसी में चलते ही जबरदस्त बारिश शुरु हो गयी। वैसे हम सबने बारिश से बचने के लिये पहाड के मशहूर पन्नी वाले बुर्के लिये हुए थे। सबने अपने-अपने बुर्के पहन लिये। इसके बाद छॊटे हो या बडे, सभी दे दना-दना नीचे की ओर उतर रहे थे। जिस मार्ग पर चढते समय हमने साढे तीन घन्टे लिये थे वापसी में हमें मात्र दो सवा दो घन्टे ही लगे थे। जब सब टैम्पो के पास आ गये तो घर वापसी की तैयारी होने लगी। वापसी में हरिद्धार होते हुए ही जाना था। जिस कारण गंगा में हर की पैडी में भी स्नान कर वापसी की बात हुई। लेकिन जब तक हम हरिद्धार पहुँचते तब तक एक बार फ़िर जोरदार बारिश ने हमारा स्वागत किया जिस कारण सभी चुपचाप गाडी की तिरपाल मे दुबके हुए पडे रहे। सुबह होने से पहले सब दिल्ली आ चुके थे। इस प्रकार दो रात व एक दिन में हमने नीलकंठ महादेव मन्दिर की रोमांचक पद यात्रा जिसे अंग्रेजी में ट्रेकिंग (TREKKING) कहते है सफ़लतापूर्वक की थी। यह मेरी पहली ट्रेकिंग थी। जिसमॆं मैंने लगभग 30 किमी की दूरी मात्र घन्टे के समय में की थी। वैसे तो मैंने सहस्रधारा में भी ऐसा ही कुछ किया था लेकिन वह मात्र 8-10 किमी की मस्ती भरी घुमक्कडी थी। यह यात्रा यही समाप्त होती है अब आपको अपनी पहली गौमुख ट्रेकिंग के बारे में बताऊँगा, जिसमें मैं बहुत तंग हुआ था। जो सन 1999 की सितम्बर माह की बात है। तब तक सबको राम राम………………….

 

 

 

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

31 Responses to “FIRST TREKKING IN MY LIFE- NEELKANTH MAHADEV TEMPLE, RISHIKESH मेरे जीवन की पहली ट्रेकिंग-नीलकंठ महादेव मन्दिर, ऋषिकेश”


  1. Mahesh Semwal says:

    Aap ka lekh padne ke baad muzhe ye lines yaad aai.

    Veer tum badhe chalo , Dheer tum badhe chalo , Samne pahad ho, Sinh ki dahad ho, Tum nider hato nahi,
    Marg me ruko nahi…………….

    • JATDEVTA says:

      महेश जी पक्का इरादा है, “जाट देवता का सफ़र” जिन्दादिली के साथ चलता जाना है।

  2. Sanjay Kaushik says:

    बहुत बढ़िया जाट देवता जी,

    आपके लेख पढ़ कर हमें भी अपनी पुराणी यात्राये याद आ जाती हैं. लेख पढते ही सोचता हूँ मैं भी लिखूंगा, लेकिन जब लिखने बैठो तो वो हाल हो जाता है जैसा पहली बात आटा गूंथते हुए होता है, पहले पानी डालो तो पतला लगता है उसे ठीक करने के लिए और आटा मिला लेते हैं तो फिर सख्त हो जाता है, उसे फिर ठीक करने के लिए और पानी और यही क्रम चलता रहता है….

    मैं तो जब लिखने बैठता हूँ, एक बात में से दूसरी, और दूसरी मैं से तीसरी याद आती जा रही हैं, पता नहीं कुछ लिखा भी जायेगा या आखिर में यूँ ही आटा घोल के छोड़ना पड़ेगा और आप जैसे भाइयों के परांठे खा के मौज लेते रहेंगे….

    हाँ लंबी पदयात्रा से याद आया जब मैं नजफगढ़ रहता था तो मैंने कांवड लानी शुरू की थी, हम भी हर की पौड़ी से जल लेकर नीलकंठ महादेव पर चढ़ा कर आते थे और वापसी में हर की पौड़ी से कांवड उठाते थे. सात आठ तो लगातार और फिर दो तीन बाद में, एक तो बेटा होने के बाद (सन 2004) भी लाया हूँ.

    दूसरी लंबी यात्रा मेरी नजफगढ़ से श्री खाटू श्याम जी के लिए होती थी, यहाँ भी बाबा श्याम ने कई साल लगातार बुलाया, हम नजफगढ़ से “डाक ध्वज” (जैसे डाक कांवड होती है, उसी तर्ज पर डाक ध्वज होता है) लेकर श्याम बाबा पर चढ़ा कर आते थे,

    जय राम जी की….

    • JATDEVTA says:

      कौशिक जी आप शुरुआत तो करिये, फ़िर उसे भी देख लेंगे, पराँठे ना बने तो क्या हुआ? चिले-पकौडे-आदि जो भी बनेगा, हम जानते है कि उसका स्वाद लाजवाब होगा।

      करिये श्रीगणेश, अवश्य करिये। कुछ मदद चाहिए तो मैं तैयार हूँ।

  3. Nandan Jha says:

    राम राम संदीप | वास्तव में जल्दी गए और जल्दी लौटे |

  4. आपका पहला ट्रेक के बारे में जानकार बहुत आनंद आया. नीलकंठ महादेव मंदिर मुझे भी जाना है जब मैं चार धाम करूँगा. लेकिन यह मन्दिर की नक्काशी दक्षिण भारत के मंदिरों जैसे है यह बात समज में नहीं आई .

    • JATDEVTA says:

      विशाल जी आप भी जरुर जाना, अगर सम्भव हुआ तो मैं भी साथ रहूँगा।
      देखने में यह बिल्कुल SOUTH INDIAN TEMPLE जैसा लगता है, यह हिमालय मन्दिरों जैसा नहीं लगता है।

  5. Vipin says:

    संदीप भाई, यात्रा अनुभव साझा करने के लिए शुक्रिया! बढ़िया यात्रा रही….टेम्पू वाली बात ने… मेरी श्रीनगर से हरिद्वार तक सब्जियों के ट्रक में की गयी यात्रा की याद दिला…उस दिन भी कुछ ऐसा ही मौसम था…झमा झम बारिश और सब्जियों के कंटेनर पर लोटना और वो भी बिना तिरपाल के…मजा आ गया भई!!!

    • JATDEVTA says:

      टेम्पो जैसे वाहन घुमक्कडी मे बहुत काम आते है, जिससे समय बहुत बच जाता है।
      पयर्टक बन कर जाना है तो सवारी बस है ना।

  6. bunty says:

    mast yaatra.

  7. Surinder Sharma says:

    जाट देवता,
    आप के लेख को पढ़ कर मुझे भी नीलकंठ महादेव मंदिर जाने का मन कर रहा है, हरिद्वार और ऋषिकेश कई बार जाना हुआ, पर यह गंगा सनान तक ही सीमीत रहा. अब की बार हरिद्वार रोप वे द्वारा माता के दर्शन और जीप के द्वारा महादेव जी के दर्शन जरुर करने जाऊंगा, कयोंकि पेदल चलना शायद इस उम्र में मुस्किल होगा. यात्रा शेयर करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

    • JATDEVTA says:

      सुरेन्द्र जी गजब कर दिया आपने भी अब तक नीलकंठ महादेव के दर्शन नहीं कर पाये। जरुर जाना जी लक्ष्मण झूला पार करते ही उल्टे हाथ की ओर सडक पर यहाँ जाने के लिये जीप मिलती है। जो मन्दिर के ठीक पीछे मात्र 50 मी दूरी पर उतार दे्ती है,

  8. Ritesh Gupta says:

    संदीप जी….बहुत अच्छा लगा आपका नीलकंठ यात्रा पढ़कर…..| कई बार हरिद्वार-ऋषिकेश हो आया पर अभी तक नीलकंठ जाना नहीं हो पाया…| अब तो आपका लेख पढ़कर मन इच्छा जाग उठी की जब कभी भी इस तरफ गया तो नीलकंठ अवश्य जाऊँगा ….|

  9. rajesh priya says:

    achchha laga devta aapne kam se kam reply dena to shuru kia .yatra to lagta hai kafi romanchak raha hoga ,kyuki barish ka maza jo apko saare raste mila.manu ki tabiyat thik nahi hai kya ,na hi post aa raha na hi koi reply.

    • Nandan Jha says:

      राजेश जी – http://www.google.com/transliterate की मदद से आप हिंदी में लिख सकतें हैं | पढने वाले के लिए सहूलियत रहती है | अंग्रेजी में टाइप करें और वो खुद बा खुद हिंदी में बदलता जाएगा |

      • JATDEVTA says:

        राजेश जी आपने जीप का किराया बताया, उन्होंने काफ़ी महंगा कर दिया है। मनु के यहाँ शायद नेट की समस्या चल रही है।

      • Rajeshwari says:

        इस टिप के लिए धन्यवाद्.

    • राजेश जी कुछ घरेलू व्यस्तताओ और कुछ नेट की समस्या से दो चार होना पड रहा है । बुढाना में नेट मोबाईल वाली स्पीड से है आज भी बाहर कैफे से कमेंट कर रहा हूं । मै जबाब नही दे पा रहा पर आपको पढता जरूर हूं

      और नंदन जी के दिये गये लिंक पर हिंदी में लिखिये ,

  10. parveen says:

    यह यात्रा काफी मजेदार रही. हम भी साथ साथ चल रहे हैं . घूमते रहो और हमें भी नई नई जगह घुमाते रहो.
    जाट देवता लगे रहो

    @ नंदन- धन्यवाद . पहली बार हिंदी में लिखा है

    • JATDEVTA says:

      प्रवीण जी साथ चलते रहे, यात्रा में नई-नई जगह घूमते रहो। आपने हिन्दी में लिखना सीख लिया है।

  11. भाई जाट देवता जी,

    आपकी नीलकंठ महादेव यात्रा का वृत्तान्त पढ़ कर निर्मल आनन्द की अनुभूति हुई । मैं भी ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव यात्रा कर चुका हूं मगर टवेरा में ! निश्चय ही मेरी यात्रा आपकी यात्रा के रोमांच को देखते हुए पासंग भी नहीं थी! सीधे – सीधे गये और सीधे सीधे लौट आये । इसी बात पर याद आया ! संता सिंह से किसी ने पूछा कि तुम्हें अपनी कार से दिल्ली से चंडीगढ़ जाने में पांच घंटे लगते हैं पर वापसी में पांच दिन ! ऐसा क्यों ? दुःखी मन से संता ने जवाब दिया, ये तो टवेरा बनाने वालों से पूछो – जाने के लिये पांच गीयर दिये, वापसी के लिये सिर्फ एक !

  12. संदीप जी,
    फिलहाल अजीब सी मनस्थिति से गुज़र रहा हूं ! भैया नहीं रहे । २७ दिन अस्पताल में रह कर २१ अगस्त को हम सब को विदा कहे बिना, कोमा में रहते हुए ही परमधाम की यात्रा पर निकल गये ! ये भी कोई घुमक्कड़ी हुई भला ? इन २७ दिनों में चिकित्सकों ने हमें मानसिक रूप से इस बात के लिये तैयार कर दिया था कि हम ऐसी किसी अनहोनी के लिये तैयार रहें। अतः उनका इस अंतिम यात्रा के लिये प्रयाण कष्टकारक तो है, पर अनपेक्षित नहीं ! संभवतः वह बचे रहते तो जीवन भर बिस्तर पर पड़े रह कर कष्ट में ही रहने वाले थे ! भगवान उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें ! यदाकदा आपके फोन आ जाते हैं तो धीरज मिलता है। इंसान दुःख के समय अकेला हो तो शायद पगला ही जाये ! उसका परिवार और मित्र बहुत बड़ा संबल होते हैं! आपका आभार !

    • JATDEVTA says:

      सुसांत जी राम-राम,
      मैंने शायद 18-19 को आपसे बात की थी उस दिन तक नहीं लग रहा था कि इतनी जल्दी ऐसा हो जायेगा। शायद होनी को यही मंजूर था।
      परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

    • सुशांत जी , ये तो मुझे पता था कि आप अस्पताल में हैं पर ये नही पता था कि इतनी गंभीर हालत है कि वे नही रहेंगे । ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे । मै विशाल राठौड के साथ जा रहा था तो मु0नगर आने पर हमने सोचा कि आपको फोन करें पर फिर समय देखा तो रात के एक बज रहा था । नही तो हम सोच रहे थे कि अगर समय 5 मिनट ही हो तो भी एक बार मिल सकते हैं

  13. D.L.Narayan says:

    राम राम संदीप भाई। यह बात बहुत ही आश्चर्यजनक है की 18 साल पुराणी किस्सा आज भी आपको इतनी स्पष्टता से याद है।
    Regarding the south Indian architecture of the Neelkanth temple, do you know the reason? Maybe there is some reference in the sthal puraan. Best of luck for breaking your own record on your next trek.

    @ Sushantji: Heartfelt condolences. May your brother’s soul rest in peace.

  14. climbing up 14 km. and then 3 km continuous down. i hope many people have same experience as i have too same . your next post coming with title wife, bike ,aur? excited me a lot by title. waiting for this one

  15. Sahil Sethi says:

    संदीप भाई, जन्मदिन जी बहुत बहुत मुबराक्बात | आज अपना दिन इंजॉय कीजिये !!!!

    मेरी और से आपको हार्दिक शुभकामनाएं |
    साहिल



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