SAHASTRADHARA & TAPKESHWAR MAHADEV TEMPLE, DEHRADUN सहस्रधारा व टपकेश्वर महादेव मंदिर, देहरादून |
Table of contents for मेरी पहली घुमक्कडी
धमालचौकडी करने के इरादे लिये हमारे पास लगभग पूरा दिन ही पडा था। यहाँ मैंने क्या-क्या गजब ढहाया वो बताता हूं। सहस्रधारा में कितनी धारा है? यहाँ आने से पहले मेरे मन में यही प्रश्न बार-बार कोंध रहा था। जैसे ही बस से बाहर निकला तो एक ठन्डी हवा का झोंका ऐसा आया कि उसने मार्च की गर्मी में भी ठण्डक का अहसास करा गया कि यहाँ गर्मी में लोग ऐसे ही नहीं आते है कुछ तो खास बात है। बस से उतर कर हम दोनों आगे की ओर बढ चले। मामाजी का लडका नवीन उर्फ़ बबलू यहाँ पहले भी कई बार आया था, जिस कारण उसे यहाँ के बारे में अधिकतर जानकारी पहले से ही थी। जिसका फ़ायदा मुझे बहुत हुआ। सबसे पहले हम दोनों गुरु द्रोणाचार्य की गुफ़ा में गये। यह गुफ़ा अब शायद मन्दिर के रुप में बना दी गयी है। बीस साल पहले ऐसा नहीं था। तब शायद यह एक साधारण सी गुफ़ा ही थी जिसके बारे में बताया गया था कि यह महाभारत के कौरवों व पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य की गुफ़ा है, वे यहाँ कुछ दिन रहे थे। बताने वाले तो यही बताते है कि देहरादून का नाम गुरु द्रोण के कारण ही पडा है। अब इस बात में कितनी सच्चाई है, मैं नहीं जानता। उस गुफ़ा को देखकर, हम दोनों आगे की ओर बढे। जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि मैं सोच रहा था कि यहाँ कितनी धाराएँ मिलेगी? हम कितनी ही दूर पैदल चलते रहे लेकिन मुझे पानी की सिर्फ़ एक ही धारा दिखाई दे रही थी। यहाँ पर बीस साल पहले खाने-पीने व अन्य सामान की कुछ ही दुकाने थी। आजकल शायद बहुत सी दुकाने बन गयी होगी। मुझे आखिरी बार यहाँ गये कई साल हो गये है। हम दोनों लगभग हम उम्र ही थे। मामाजी का लडका उस साल दसवी कक्षा में आया था, जबकि मैं दसवी के पेपर दे कर आया था।
दुकानों के आसपास काफ़ी लोग स्नान कर रहे थे। स्नान तो हमें भी करना था, लेकिन मैं पहले यह देखना चाह रहा था कि आखिर यह पानी आ कहाँ से रहा है? मैंने बबलू को बोल दिया कि चलो जहाँ तक हो सका इस पानी का छोर देख कर आयेंगे। हमें रोकने टोकने वाला भी कोई ना था। अत: हम दोनों उस दिशा की ओर चलने लगे जहाँ से पानी बहता हुआ नीचे की ओर आ रहा था। हमें पानी के साथ लेकिन धारा की विपरीत दिशा में चढते हुए, लगभग एक घन्टा होने को आ गया था, लेकिन हमें पानी का छोर नहीं दिख रहा था। अब हमें एक छोटा सा लोहे का पुल दिखाई दिया जो शायद वहाँ के गाँव वालों को यह नदी पार करने के लिये बनाया गया था। उस समय इस नदी में इतना पानी तो था कि बिना भीगे आसानी से उसे पार नहीं किया जा सकता था। आज का मुझे पता नहीं कि नदी में पानी की मात्रा की क्या स्थिति है? जैसे ही हम उस पुल के पास पहुँचे, तो वहाँ एक स्थानीय किसान हमें अपने खेत पर काम करता हुआ मिल गया। हमने उससे यह जानने के लिये पूछा कि यह पानी कहाँ से आ रहा है? उस किसान ने बताया कि यह पानी पहाडों में बहुत दूर से आ रहा है। जब हमने उसे बताया कि हम तो इस पानी का मूल स्रोत देखने के लिये पहाड पर चढ रहे है। हमारी अबत सुनकर किसान बोला कि एक दिन में तुम वहाँ तक नहीं जा पाओगे। सबसे जरुरी बात तुम्हारे पास कोई हथियार भी नहीं है, जैसे-जैसे तुम आगे बढते जाओगे तुम्हे घना जंगल मिलता जायेगा, उस जंगल में तुम्हे हाथी, हिरण, चीते जैसे जंगली जानवर तुम्हे मिलेंगे ही।(आज शायद वहाँ जंगली जानवर भी नहीं मिल पायेंगे, क्योंकि इन्सान लगभग सभी को मार चुके होंगे) तुम उनका सामना कैसे करोगे? उसकी यह बात सुनकर अपनी योजना तो ढेर होते दिखाई देने लगी। कहाँ तो हम शाम तक इस नदी का आरम्भिक स्रोत देखकर आने वाले थे, दूसरे अब जंगली जानवर वाली बात सुनकर लग रहा है कि कही हम गलत जगह पर तो नहीं आ गये है।
जब हम वहाँ से वापिस चलने लगे तो, वापसी में हमें पुल पार एक पगडन्डी दिखाई दी। जबकि हम यहाँ तक जिस मार्ग से यहाँ आये थे, वहाँ कच्चा-पक्का जैसा कोई मार्ग ही नहीं था। हम तो सिर्फ़ नदी किनारे के पत्थरों पर उछल-कूद करते हुए चले आ रहे थे। एक दो बार तो जब हमें आगे बढना का मार्ग नहीं सूझ रहा था तो मजबूरन हमें पानी में भी घुसना पडा था। वापसी में मार्ग के बारे में हालात बिल्कुल ही अलग दिखाई दे रहे थे। जहाँ आने में हमारे होश खराब हो गये थे। वहीं वापसी में दो बाते आसान हो गयी थी पहली आसान बात कि अबकी बार हमें गाँव वालों का कच्चा मार्ग मिल गया था। दूसरी बात अबकी बार ढलान थी। जिस कारण हम तेजी से नीचे उतर रहे थे। हम लगभग बीस मिनट में ही नीचे उतर आये होंगे।
नीचे आकर फ़िर से ऊपर जाने की शरारत सूझने लगी, बात कुछ ऐसी थी कि हमें पहाड के दूसरे किनारे पर एक मार्ग दिखाई दे रहा था जिससे हमे लगा कि हम नदी का छोर नहीं देख पाये तो क्या हुआ? हम इस पहाड का शीर्ष जरुर देख कर आयेंगे। नीचे आते ही हमने सामने वाले पहाड पर दिखाई दे रहे मार्ग पर चढना शुरु कर दिया। लगभग एक किमी तक तो मार्ग ठीक-ठाक बना हुआ था। मार्ग कच्चा जरुर था लेकिन इतना चौडाई वाला जरुर था जिस पर एक ट्रेक्टर आसानी से चलाया जा सकता था। कोई किमी भर चलने के बाद वह मार्ग अचानक ही समाप्त हो गया। अब हमारी समझ में यह नहीं आया कि यहाँ तक मार्ग बनाया ही क्यों? और जब बनाया तो अधूरा क्यों छोड दिया? जिस जगह हम पहुँच चुके थे वहाँ से देखने पर लग रहा था कि हम उस पहाड की चोटी ज्यादा दूर नहीं है। अत: चोटी नजदीक मान हमने बिना मार्ग के ही ऊपर चढना शुरु कर दिया था। जब हम किसी तरह उस पहाड की चोटी पर पहुँचे तो हमें खुश तो बहुत होना चाहिए था। लेकिन हमारी खुशी क्षण भर ही टिक पायी। जैसे ही हमने आगे देखा तो हमें लगा कि हम तो घन्टे भर मेहनत करने के बाद भी इस छोटे से पहाड पर ही चढ पाये है। आगे तो इससे भी बडा पहाड है। हमने सामने वाले पहाड को भी फ़तह करने का निश्चय कर डाला।
पहाड पर चढने में सबसे बडी समस्या हमें यह सोचने से आ रही थी कि ऊपर तो किसी तरह चढेंगे ही, लेकिन हमें वापसी भी तो उतरना है। अबकी बार इस वाले पहाड पर चढने में हम पसीने से तर-बतर हो गये थे। कहाँ तो हम घर से यह सोच कर चले थे कि सहस्रधारा के ताजे पानी मे स्नान कर के आयेंगे। उल्टे ताजे पानी से नहाने धोना तो दूर हम पसीने से नहा रहे थे। ऐसी जगह अगर कोई ढीला ढाला छॊकरा होता तो कभी का दुम दबा कर वापिस भाग गया होता। लेकिन हम भी ठहरे पूरे मनमौजी जाट। किसी तरह रो-पीट कर जी-जान लगाकर हमने वह दूसरी पहाडी भी फ़तह कर ही दी। लेकिन दूसरी पहाडी पर चढकर हमारी भी हिम्मत टूट गयी। हिम्मत ने तो जवाब नहीं दिया था। लेकिन इस पहाड के ऊपर आकर हमने सामने जो नजारा देखा उसने हमारे होश उडा दिये थे। कारण हम अब भी पहाड के सबसे ऊपर नहीं आ पाये थे। चारों और देखने पर हमने पाया कि हम इतनी ऊंचाई पर तो आ ही गये है जहाँ से दूर-दूर तक दिखाई दे रहा था। आखिरकार हमने दो घन्टे चढने के बाद तय किया कि अब बहुत हो गयी पर्वत की चढाई। अब वापिस नीचे उतरते है। यहाँ उतरते व चढते समय कोई मार्ग नहीं था जिस कारण हमारी हालत पतली हो रही थी। कई बार हमारा पैर किसी हिलते पत्थर पर पडता तो लगता कि हमारे नीचे से पत्थर नहीं पहाड ही खिसक गया है। अब सोचो जिसके नीचे से पहाड ही खिसकने का खतरा हो जाये तो वहाँ कोई कैसे सम्भल पायेगा? हम आधे मार्ग तक किसी तरह पौधे पकड-पकड कर उतर पाये थे। कई जगह लुढकते-लुढकते रह गये। कई जगह पर सरक-सरक कर उतरना पडा था। नहीं तो पता नहीं कहाँ-कहाँ से टूटते-फ़ूटते? खैर ऊपर वाले परमात्मा का भला सा साथ हमेशा साथ रहा है, अत वहाँ भी था कि हम आधे वाले मार्ग यानि बिना मार्ग वाले हिस्से तक सुरक्षित उतर गये थे। एक किमी के बाद तो ट्रेक्टर लायक मार्ग बना हुआ ही था जिस पर उतरने में कोई समस्या नहीं आयी थी।
अब जैसे ही हम नदी किनारे आये वैसे ही हमने अपने-अपने कपडे उतार फ़ैंके और सीधे पानी में जा कूदे। लगभग घन्टा भर हम पानी में बन्दर वाली इन्सान वाली ऊछलकूद करते रहे। पानी में नहाने से हमारा मन तो नहीं भरा। लेकिन सिर में दर्द जरुर होने लगा। सिर दर्द होने का कारण पानी का ठन्डा होना था। यहाँ पानी वैसे तो ज्यादा गहरा नहीं है लेकिन दुकान वालों ने पानी के बहाव के आगे पत्थर लगा-लगा कर उससे छोटे-छोटे कुन्ड जैसा रुप देने की सफ़ल कोशिश की हुई थी, आजकल का मुझे नहीं पता कि कैसा हो रहा होगा? उन कुन्डों में इतना पानी तो था कि जब हम पानी में अन्दर घुसे थे, तो पानी हमारे सिर से ऊपर तो नहीं हुआ लेकिन मेरी छाती तक पानी आसानी से आ रहा था। हमे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था, हम बार-बार पानी से बाहर निकल कर आते तथा पानी के किनारे खडे होकर ऊपर से पानी में छ्लांग लगाते थे। छलांग लगाने का सिलसिला काफ़ी देर तब तक चलता रहा जब तक कि मुझे एक बार पानी में सीधे सपाट शरीर के कूद जाने के कारण चोट ना लगी। मुझे बीस साल पहले की लगभग सारी घटनाएँ याद है और सबसे गजब जब पानी में सपाट रुप से कूदने के कारण मेरे शरीर खासकर छाती में पानी की जबरदस्त चोट लगी थी। जिससे पानी में कूदने के बाद काफ़ी देर तक मैं पानी में ही बैठा रह गया था। उसके बाद मैं कभी पानी में सपाट रुप में नहीं कूदता हूँ। मैं अब भी जब जैसे भी पानी में कूदने का मौका लग जाता है तो सीधा खडा-खडा ही पानी में कूदता हूँ ताकि मेरे शरीर को पानी के कारण चोट ना पहुँचे। जब शाम के तीन बजने को आये तो हमने यहाँ से देहरादून की ओर चलने का फ़ैसला किया। सुबह से कुछ खाया-पिया भी नहीं था। इतनी शारीरिक मेहनत करने के बाद पेट में भूख वाले हाथी-घोडे दौडने शुरु हो गये थे। अब पेट में भूख का तूफ़ान चल रहा हो तो हम घर कैसे जा सकते थे? चलने से पहले एक दुकान से ब्रेड-पकौडे लेकर कर खाये गये। घनघोर भूख में वो पकौडे भी जबरदस्त स्वाद वाले लग रहे थे। कुछ देर बाद हम देहरादून आने वाली बस में बैठ कर उसी लोकल अडडे पर आ गये, जहाँ से बस में बैठकर हम यहाँ तक आये थे।
सहस्रधारा से आने के बाद हमारे पास काफ़ी समय था जिसमें नजदीक की एक जगह और देखी जा सकती थी। घन्टाघर के सबसे नजदीक देखने लायक स्थान देहरादून का प्रसिद्ध टपकेश्वर महादेव मन्दिर है। हमने भोल्रे नाथ के दर्शन करने का निर्णय लिया। यह तो पूरी तरह याद नहीं आ रहा है कि उस समय हम इस मन्दिर तक कैसे पहुँचे थे। लेकिन हम कुछ पैदल जरुर चले थे। यह मन्दिर एक नदी के साथ बना हुआ है मन्दिर का बाहरी प्रवेश द्धार सडक पर बना हुआ है लेकिन मन्दिर का असली दरवाजा नदी किनारे बना हुआ है। हमने सडक पर ही अपने जूते उतार दिये थे। पैदल ही नदी की ओर उतर गये। यह कुदरती रुप से बना हुआ मन्दिर बहुत ज्यादा विशाल तो नहीं है लेकिन इस मन्दिर की असली पहचान यहाँ पानी की टपकती हुई गुफ़ा है जिसमें आने के बाद कोई भी श्रद्धालु भाव-विभोर हुए बिना नहीं रह पाता है। मुझे भी यहाँ आकर एक अलग ही अनुभूति प्राप्त हुई थी। यहाँ का प्राकृतिक माहौल आपको बाकि दुनिया को भूला देने को काफ़ी है। जब तक कोई बन्दा यहाँ रहता है वह प्रकृति से अलग नहीं रह पाता है। आज के समय का मैं नहीं कह सकता हूँ कि इस मन्दिर के सामने वाली नदी में पानी की क्या स्थिति है लेकिन आज से बीस साल पहले वहाँ पानी की कॊई कमी नहीं थी। आपका किसी का भी जब कभी देहरादून जाने का मौका लगे तो यहाँ जरुर होकर आना चाहिए।
मन्दिर देखने के बाद हम फ़िर से घन्टाघर पर आ गये थे। यह घन्टाघर बीस साल पहले तक कार्य करता था आज के हालात का पता नहीं है कि यह बन्द है लोगों को समय बता रहा है। घन्टाघर से मसूरी की ओर जो सडक शुरु होती है उसका नाम राजपुर रोड है। यहाँ घन्टाघर से मसूरी जाते समय पहले बस राजपुर गाँव से ही होकर जाती थी। राजपुर गाँव यहाँ से कोई सात-आठ किमी दूर तो होगा ही। राजपुर की ओर जाते समय एक नया रोड बना दिया गया है जहाँ से सहस्रधारा अपने वाहन से आसानी से जाया जा सकता है। खासकर अगर कोई मसूरी से आ रहा है या सहस्रधारा देखने के बाद मसूरी जाना चाहता है तो उसके लिये राजपुर होते हुए बढिया व छोटा मार्ग रहेगा। आजकल गाडियाँ राजपुर गाँव से होकर नहीं जाती है क्योंकि राजपुर से पहले ही मालसी डियर पार्क से पहले ही नया मार्ग बना दिया गया था जो मसूरी जाने वाला मुख्य मार्ग है। वैसे तो मैं मसूरी भी गया था उसके बारे में बाद में बताया जायेगा।
मैं आपको बता रहा था कि घन्टाघर से जो सडक बस अडडे, सहारनपुर, हरिद्धार के लिये जाती है उसे गाँधी रोड कहते है। आये तो हम भी इसी गाँधी रोड से ही थे। लेकिन वापसी मे हमने घन्टाघर से पैदल ही घर जाने का निश्चय कर लिया था। घन्टाघर से जो सडक सीधे स्टेशन के पास निकलती है इस सडक का नाम पल्टन बाजार (रोड) है। अंग्रेजों के समय में यहाँ जरुर उनके सौनिकों से सम्बंधित सामान मिलता होगा या वे यहाँ आते-जाते रहते होंगे जिस कारण इसका नाम पल्टन बाजार पडा होगा। आजकल सुबह-सुबह के समय तो इस पल्टन बाजार से निकलना आसान है लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढता रहता है यहाँ इतनी भीड हो जाती है कि पैदल यात्रियों के कारण ही जाम लगने लगता है, उस पर कोई छोटा-मोटा वाहन आ जाये तो बस परेशानियों का दौर शुरु हो जाता है। जाम लगने की सबसे बडी वजह यहाँ के दुकानदार है जो अपना दकान का सामान सडक पर कई फ़ुट तक निकाल कर रख देते है। उसके बाद उनके निजी वाहन भी सडक पर ही रहते है। जबसे लोगों के पास अपने निजी वाहन ज्यादा हुए है तबसे ही यह जाम की समस्या हर कही उतपन्न होने लगी है। हम इस मार्ग पर टहलते हुए देहरादून कोतवाली के आगे से होते हुए स्टेशन के पास आ निकले। चूंकि मेरा यह पहला सफ़र था। अत: मैं हर-एक मार्ग को बडे ध्यान से देख रहा था। स्टेशन के पास आने के बाद का मार्ग तो मुझे अच्छी तरह याद हो गया था। यहाँ से हम स्टेशन से पहले लकडी काटने वाली आरा मशीन की कई फ़ैक्ट्री यहाँ पर थी उनमें से कई आजकल बन्द हो गयी है लेकिन कई अब तक भी कार्य कर रही है। हम अंधेरा होने से पहले घर पर आ गये थे। अगले दिन हमारा कार्यक्रम देहरादून का वन अनुसंधान संस्थान देखने जाने का था जहाँ पर जाने के बाद मुझे कई बातों के बारे मे पहली बार पता चला था। चलो आपको इसके बारे में भी बता दी देता हूँ लेकिन कुछ तो सोच लो यह लेख पहले से इतना लम्बा है कई तो इसे पूरा पढे बिना निकल लेंगे,
तो मैं आज यही विराम लेता हूँ अगले लेख में बाकि बाते होंगी।















मस्त मौज मस्ती . क्या उमर थी न कोई टेंशन न कोई परेशानी और शरीर एक दम फुर्तीला. वैसे यह कहानी तो हमने पहले ही आपके ब्लॉग पर पढ़ ली थी ,संदीप भाई.
जाट देवता,
बहुत सुन्दर वर्णन है, वो कागज की किश्ती, वो बारिश का पानी…, जगजीत सिंह जी जालंधर में पढते थे. जाट देवता आप की इन यादों के बीस साल कितनी जल्दी बीत गए.
धन्यवाद
सही कहा शर्मा जी बीस साल कैसे बात गये लगता है कि जैसे कल की ही बात हो
मुकेश भाई आयेंगे दो तीन यात्रा में रुलाने वाले पल भी आयेंगे।
संदीप भाई,
हमेशा की तरह अनमोल शब्दों से गाढ़ी एक बेमिसाल चिट्ठी. “बचपन के दिन भुला न देना……..आज हँसे कल रुला न देना”.
पहाड़ के बाद पहाड़ वाली बात अच्छी लगी | शुरू से ही आप झुझारू दिखतें हैं | गोड ब्लेस |
आप को कैसे पता लगा?
पहाड़ के बाद पहाड़ से |
बहुत अच्छा लेखन, बचपन बचपन ही होता हैं, अब तो वो दिन याद आयेगे ही..वन्देमातरम
हालात आजकल बद से बदतर हो गये हैं । गंदगी और बदबू की बहुतायत है । मेरा 24 जून को जाना हुआ था । जैसे आपने बताये हैं ऐसे ही कुंड हैं पर मेरा मन वहां पर नहाने का नही हुआ । और वहीं पर अब भी एक कडाही में ब्रैड पकौडे तलते रहते हैं ताजे ताजे जिन्हे खाकर फिर खाना भी नही खाने का मन करता है
और अगर कोई राजपुर मार्ग को होकर मसूरी नही गया है तो एक बार जरूर जाना चाहिये ये मार्ग थोडी खडी चढाई का तो है पर बार बार जाने वालो को एक नया रोमांच देता है
आपकी याददाश्त का जबाब नही
सही कह रहे हो मनु भाई जरुर सत्यानाश कर दिया होगा, कुदरती जगह का
very well written narrative.you have got a unique style of story telling and a very good memory .keep it up.keep travelling and keep sharing.
अशोक शर्मा जी जब आपके यह शब्द पढे ” you have got a unique style of story telling and a very good memory.” तो दिल में ढेर सारी गुदगुदी हुई,
जब मनु भाई ने भी आखिरी लाईन में कुछ ऐसा ही लिखा था तो उसे पढकर भी ऐसा ही हुआ था।
sandeep ji
मे ऑफिस स्टाफ के साथ 8-9 वर्ष पहले मसूरी से लौटते समय अक्टूबर के माह मे यहाँ गया था. उस समय मुश्किल से 3-4 दुकाने यहाँ पर थी. हमारी कार आख़िर तक चली गयी थी. पर अभी जब हम लोग दोबारा यहाँ पर गये तब हमारी बस 1 किलो मीटर पहले ही रोक दी गयी. और सैकड़ो की संख्या मे होटेल , दुकाने अब बन चुकी हैं. और आप तो 20 साल पहले गये थे , तब तो मॅ समझता हूँ कि छुट्टी के दिन के अलावा वीरान ही रहता होगा
Sahastdhara road par ab na jane kitni multistory buildings aa gai hai , yahan par IT park bhi khul gaya hai. chardham ke liye helipad bhi yahin par hai.
तो यहाँ से शुरुआत हुई थी जाटदेवता पहाड़ों चढ़ाई की…..उसके बाद पीछे मूढ़ कर नहीं देखा….अच्छा वर्णन