NAINITAL- NAINA PEAK नैनीताल- नैना शिखर

July 18, 2012 By:

नैनीताल का स्नोव्यू पोइन्ट SNOW VIEW POINT तो देख लिया, जबकि मैं इस स्थल को देखने के लिये नहीं आया था, मैं तो नैना पीक NAINA PEAK देखने के लिये आया था। इसे चाइना पीक CHINA PEAK भी कहते है इसकी समुन्द्र तल से ऊँचाई 2615 मी है, को देखने की इच्छा थी। वापसी में नैना पीक की ओर आते समय सडक किनारे दो तीन लोग एक मोड पर कुकडी यानि कि भूट्टे भून-भून के उस पर काला नमक व नीम्बू लगा कर बेच रहे थे। जिन लोगों ने इस प्रकार के आग में भूने हुए भूट्टे खाये होंगे, उनके मुँह में तुरन्त पानी आ गया होगा। मैंने 15 रुपये वाला एक बडा सा भूट्टा देशी भाषा में बोले तो कुकडी खाने के लिये ली। हमारे गाँव में तो इसे कुकडी ही बोले है आप लोगों के यहाँ कुछ और बोलते होंगे। मैं स्वाद ले-ले कर कुकडी खाता रहा, साथ ही अपनी मस्त चाल वाली पैदल चाल चलने में भी लगा रहा। मुश्किल से दो किमी भी नहीं चला था कि एक मोड पर एक बोर्ड दिखाई दिया जिस पर लिखा था कि नैना देवी पैदल मार्ग दूरी मात्र तीन किमी। अरे केवल तीन किमी जबकि मैं समझा था कि नैना देवी अभी 5-6 किमी तो होगा ही। जहाँ से यह पैदल मार्ग शुरु होता है ठीक वही पर उल्टे हाथ की ओर एक चाय की दुकान है, मैंने कुछ देर उस दुकान पर बैठने की सोची। दुकान वाले ने मुझसे पूछा कि नैना पीक जाओगे। मैंने कहा हाँ क्यों? मार्ग बन्द है क्या? मैंने मार्ग बन्द होने के बारे में इसलिये कहा क्योंकि मुझे वहाँ बैठे-बैठे लगभग आधा घन्टा हो गया था लेकिन कोई भी उस पैदल मार्ग से जाना वाला दिखाई नहीं दिया था। चाय वाले ने बताया कि आज मौसम साफ़ नहीं है इसलिये आज अभी तक दो तीन लोग ही ऊपर गये है। चाय वाले ने बातों-बातों में बताया कि यह पैदल मार्ग यहाँ से नहीं बल्कि नीचे से ही यहाँ तक आया है। जब मैंने कहा कि मैं भी नीचे से ही पैदल ही आया हूँ तो वो मानने को तैयार नहीं था जब उसको कैमरे से फ़ोटो दिखाये तो उसकी बोलती बन्द। एक जवान फ़ौजी अपनी नई नवेली फ़ौजन( फ़ौजी की घरवाली फौजन, मास्टर की घरवाली मास्टरनी कहलाती है)  के साथ वहाँ आया, फ़ौजी तो नैना पीक जाना चाहता था लेकिन फ़ौजन को तीन किमी की पैदल चढाई के नाम से ही साँप सा सूंघ गया था। इसलिये वे तो गये नहीं।

देख लो

लो जी देख लो कुछ ऐसा मार्ग है।

आधे घन्टे बैठने के बाद मैंने अपना बैग उठाया व पहाड के पैदल मार्ग पर चढाई शुरु कर दी। थोडी दूर जाने पर ही मेरी समझ में आ गया कि क्यों लोग इस चढाई के नाम से थोडा सा घबराते है? वैसे चढाई कोई भयानक नहीं है मार्ग बडा अच्छा बनाया हुआ है। मुझे तो इसी प्रकार के मार्ग कुछ ज्यादा ही पसन्द आते रहे है। जो लोग अभी तक यहाँ नहीं गये है उनकी जानकारी के लिये बता दूँ कि तीन किमी का पैदल मार्ग पारिवारिक रोमांच के लिये बहुत बढिया है। मैं अपनी मस्त चाल से, मेरी मस्त चाल के बारे में सुन लो मेरी मस्त चाल व होती है जो मैं आमतौर पर हर जगह प्रयोग में लाता हूँ यानि कि पहाड हो, मैदान हो, उतराई हो, खाई हो, पेट भरा हो, खाली हो उससे मुझ पर कोई फ़र्क नहीं पडता है। मेरी चाल हर जगह एक समान सी ही रहती है। बस थोडा सा उतराई पर जरा ध्यान से उतरता हूँ क्योंकि उतराई पर कई बार फ़िसलकर चोट खा चुका हूँ। जैसे-जैसे पैदल मार्ग ऊपर की ओर चढता रहता है। मन में कई बार बुरे-बुरे से ख्याल आने शुरु हुए कि अगर किसी मोड पर कोई जंगली जानवर मिल गया तो? लेकिन बेचारे जंगली जानवर, जिन्हे हम जैसे मानव जाति के जंगली व जानवर कहते है उनके दिल से पूछ कर देखो, जिनके घर (जंगल) हम लोगों (मानव) ने काट छाँट कर अपने खेत व घर बना लिये है। कुदरत की मार बडी भयंकर होती है जब-तब कुदरत चाहती है एक झटका देती है और हजारों लोगों का पता साफ़ हो जाता है ऐसा पूरे वर्ष में संसार में कई जगह हो जाता है लेकिन मानव जाति सुधरे तो बात बने ना।

लो जी और देख लो कुछ ऐसा मार्ग ही मार्ग है जहाँ से जाना होता है।

मैं अकेला अपनी धुन में बढता जा रहा था कि एक मोड पर कुछ ढेर सारे वानर नजर आये। मैं अकेला, वे लगभग 50 की संख्या में तो रहे होंगे। मैं जैसे-जैसे उनके पास पहुँच रहा था वानरों का समूह कुछ सावधान सा होता महसूस हो रहा था। पहाड में पाये जाने वाले लंगूर काफ़ी सीधे होते है लेकिन बन्दर के बारे में कुछ भी कहना सही नहीं होगा कि कब उनका दिमाग बिगडे और वो आप पर हमला कर दे। बन्दर अचानक से डराते है व हमला करते है इसलिये मैं पूरी तरह सावधान था। मैंने उनसे बचने के लिये कुछ पत्थर हाथ में उठा लिये ताकि अगर कोई बन्दर गुस्ताखी करे तो उसका उसी की भाषा में जवाब दिया जा सके। एक बार शिमला में वहाँ की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित हनुमान जी के जाखू मन्दिर में बन्दरों ने हमें घेर लिया था, उन बन्दरों से मैं किस तरह निपटा उसके बारे में सोच कर मैं सावधान हो गया था। उसके बारे में यहाँ नहीं फ़िर कभी? मैं भी बिल्कुल शांत व चौकन्ना होकर उन बन्दरों के बीच से निकल रहा था। जब मैंने उनको पार कर लिया तो अपना दिमाग कुछ शान्त हुआ। थोडी दूर जाने के बाद मैंने अपने हाथों में उठाये पत्थरों को एक तरफ़ फ़ैंक दिया था। मैं चलता रहा बीच में एक जगह जाकर मार्ग दो भागों में बँट गया। अब अपनी खोपडी खराब कि यार अच्छा आये यहाँ इस जगह ना कोई बोर्ड, ना कोई निशान, अब जाये तो जाये कहाँ? पहले मैंने लोगों के पैरों के निशान देखकर अंदाजा लगाने की कोशिश की, लेकिन उस जगह पर मार्ग पथरीला था मुझे कोई भी कैसा भी हाथ-पैर का निशान दिखाई ना दिया। आखिरकार मैंने सीधे हाथ वाले मार्ग को कुछ दूर तक देखने की सोची, मैं उस मार्ग पर मुश्किल से 100 मी तक ही गया था कि मेरी समझ में आ गया कि यह वाला गलत है। अत: मैं वापिस उसी जगह पर आया जहाँ पर दो मार्ग मिले थे मैंने सीधे वाले मार्ग पर चलना शुरु कर दिया। जैसे जैसे यह मार्ग आगे बढता रहा अपनी दिमागी परेशानी कुछ ज्यादा ही बढने लगी थी।

आ गये ऊपर।

चोटी पर बैट्री चार्ज करने का यंत्र।

हुआ ऐसा कि जिस पैदल मार्ग पर मैं जा रहा था आगे जाने पर वह मार्ग, मार्ग ना रहकर बरसात के पानी बहने के मार्ग में बदल चुका था। चूंकि पैदल चलने लायक अच्छा मार्ग था अत: मैं भी चलता रहा। जैसे-जैसे ऊँचाई बढती जा रही थी पेडों का जंगल भी घना होता जा रहा था। बीच में एक बार लगा कि पहाड की चोटी पर आ गया हूँ लेकिन मार्ग अब भी आगे जा रहा था। तभी बारिश भी शुरु हो गयी, ऊपर वाले का शुक्र रहा कि बारिश हल्की-फ़ुल्की ही थी, लेकिन उतनी मुझे गीला करने के लिये बहुत थी। अत: मैंने अपना पन्नी वाला बुर्का निकाल लिया, पन्नी वाला बुर्का बिल्कुल मुस्लिम लोगों की श्रीमती जैसे पहने जाने वाले यानि मुल्लन के बुर्कों जैसा ही होता है फ़र्क सिर्फ़ इतना होता कि मुल्लनों को उन बुर्कों को जीवनभर पहनना होता है, रही बात घुमक्कड वाले पन्नी के बुर्के की तो यह कोई भी पहन सकता है यह हमेशा भी नहीं पहना होता है सिर्फ़ तभी पहना जाता है, जब बारिश हो रही होती है। पन्नी वाला बुर्का दाम में भी ज्यादा नहीं होता है मुश्किल से 25-30 रु का आ जाता है। अब दस रु और बढा लो तो भी आसानी से मिल जायेगा। बैग में रखने में आराम, कैसे भी मोड-तोड लो इस पर कोई फ़र्क नहीं पडता है। यह पन्नी का बुर्का बाइक पर भी बहुत काम आता है, आपने कैसी भी रैन कोट पहनी हो, आप उसमें जरुर भीग जाओगे, जैसा हाल श्रीखण्ड वाले रैन कोट ने किया था जिसमें मेरा मोबाइल भीग गया था। लेकिन यह बुर्का भी कमाल की चीज है जो कम पैसों में ज्यादा काम आता है।

चोटी पर जाकर यह पेड आपको जरुर मिलेगा।

वन विभाग की कोटेज।

मैं पहाड पर चढ ही रहा था कि मेरा मोबाइल बजना शुरु हो गया, मैंने बारिश से बचने के लिये उसको भी एक पन्नी में लपेट कर बैग में डाल दिया था। पहली बार बजने पर मैंने काल रिसीव नहीं की लेकिन जब मोबाइल दुबारा बजना शुरु हुआ तो मुझे मोबाइल बैग से निकालना ही पडा। मोबाइल में देखा तो अन्तर सोहिल मुझे फ़ोन करने में लगे पडे थे। अन्तर सोहिल व उनके दोस्त को मैं सुबह भीमताल में ही छोड आया था। अन्तर सोहिल ने कहा जाट देवता कहाँ हो? मैंने कहा कि नैना पीक पहुँचने वाला हूँ। अन्तर सोहिल ने बताया कि वे भी भीमताल से चल दिये है अभी भुवाली आ गये है। मैंने कहा ठीक है आ जाओ, मैं तुम्हे नैना पीक जाने वाले पैदल मार्ग पर जहाँ यह सडक पर मिलता है एक चाय की दुकान है उसी पर बैठा मिलूँगा। थोडी देर बाद मैं नैना पीक पर पहुँच चुका था। चोटी पर आकर देखा तो चारों ओर कोहरा छाया हुआ था। यहाँ देखने को तो कुछ खास नहीं मिला लेकिन यहाँ आना भी मजेदार रहा। चोटी पर वन विभाग का वायरलैस रिले केन्द्र था जिस पर वायर लैस पर बार-बार आवाज आ रही थी। वहाँ पर एक कर्मचारी डयूटी पर उपस्थित था। मैंने उससे वहाँ के बारे में काफ़ी जानकारी ली। वो उस समय अकेला था, मुझे वहाँ पाकर उसे भी बहुत अच्छा लगा था। मुझे तो पूरे मार्ग में कोई मानव जाति का प्राणी नहीं मिला था।

लो जी अपनी मैगी तैयार है।

अब खा ही लू क्या पता कौन बीच में टपक जाये?

उसने मुझे बताया कि यहाँ से हिमालय की कई चोटियाँ दिखाई देती है, लेकिन आज तो मौसम बहुत ही खराब है अत: आज तो बिल्कुल भी सम्भव नहीं है। उसने मुझे एक पेड के नीचे एक चार फ़ुट की दीवार दिखाई जिस पर तांबे की पलेट लगी हुई थी जिस पर सामने दिखायी देने वाली चोटियों के बारे में जानकारी दी हुई थी। मैंने उस व्यक्ति से पीने का पानी माँगा तो उसने मुझे पीने का पानी तो दिया ही साथ ही कहा कि वह मैगी भी बनाता है ताकि अगर यहाँ आकर किसी को भूख लगी हो तो मैगी खा सके। वहाँ पीने के लिये पानी की व ठन्डे की बोतलों का इन्तजाम भी किया हुआ था। मैंने अपने लिये एक मैगी बनवायी, ऐसी पैदल यात्रा पर गर्मा-गर्म मैगी खाने का अपना अलग ही आन्नद है। मैगी खाकर मैंने उससे उस चोटी पर कुछ और जगह के बारे में पता किया तो उसने कहा कि मौसम खराब है नहीं तो इस झोपडी से थोडा आगे 5 मिनट पैदल चलकर इस पहाड का आखिरी किनारा आ जाता है जहाँ से नैनीताल का शानदार नजारा दिखाई देता है। मैंने तुरन्त वो जगह देखने की सोची, मौसम भले ही खराब हो कम से कम वो पोइन्ट तो देख ही सकते है। जब मैं उस जगह पर पहुँचा तो पहाड से नीचे का तो कुछ दिखाई नहीं दिया लेकिन पहाड के ऊपर ही इतना शानदार नजारी दिख गया कि यह यात्रा सफ़ल हो गयी। इस जगह को देख कर वापिस वन विभाग की उसी लकडी की झोपडी में आया जहाँ पर मैंने मैगी खायी थी। उसके पैसे दिये, अपना बैग उठाया और दुबारा आने की सोच वापिस चल पडा। वापसी में चलते ही तीन लोग मिले, उन्होंने पूछा कि चोटी कितनी दूर है मैने कहा 100 मी से भी कम। मार्ग में जाते समय जहाँ बन्दर मिले थे, वापसी में एक भी नजर नहीं आया था। मैं अपनी चाल से आधे घन्टे में ही उसी चाय की दुकान पर आ गया जहाँ से मैंने यह तीन किमी की चढाई शुरु की थी।

मौसम साफ़ हो तो, यहाँ से नैनीताल का सारा नजारा दिखाई देता है।

देखा है ऐसा शानदार मस्त नजारा।

यहाँ आकर मुझे अन्तर सोहिल व उनके दोस्त की प्रतीक्षा करनी पडी। ये दोंनों ओशो के पक्के दीवाने। जिसके बारे में अगले भाग में।

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

9 Responses to “NAINITAL- NAINA PEAK नैनीताल- नैना शिखर”


  1. Mukesh Bhalse says:

    संदीप भाई,
    हमारे एरिया (मालवा-निमाड़) में तो कुकड़ी, मुर्गी को कहते हैं. भैया ध्यान रखना कभी इधर आओ और भुट्टा खाने की इच्छा हो तो भुट्टा ही मांगना अगर कुकड़ी मांगोगे तो अच्छे भले शाकाहारी प्राणी से मांसभक्षी बन जाओगे, और हाँ एक कुकड़ी 250 रु. से कम की नहीं आएगी, सो जेब खाली होगी वो अलग……….हाहाहा.

    • JATDEVTA says:

      मुकेश भाई आपने बता कर सही किया, वैसे कुछ इलाको में इसे छल्ली भी कहते है, हा हा हा हा

      कुकडी का अंडा देखा है क्या ? जब अपने यहाँ किसी को बताऊंगा/पूछूँगा तों तब तों और भी मजा आएगा हा हा हा हा

  2. Sharma Shreeniwas says:

    आपका जीवटता भरा घूमने का वर्णन पढकर आपके साथ होना ही महसूस हो रहा था।
    ध्न्यवाद ऐसी घुमक्कडी करवाने कि लिये।

  3. कुकडी वास्तव में मजेदार रही होगी और बरसात के मौसम में तो और भी मजा आता है ………..वैसे पहाडो में भुटटा और मैगी खाकर ही काम ज्यादातर चलाना पडता है …………कुछ ज्यादा नही दिखायी दिया इस चोटी से पर जाने आने का तो अलग ही आनंद है ।

  4. kavita Bhalse says:

    संदीप जी ,
    आज आपकी पोस्ट में मेगी के फोटो देखकर तो किसी का भी खाने का मन हो जायेगा बहुत बढ़िया .

  5. बहुत अच्छी पोस्ट हैं संदीप भाई, लगे रहो. वन्देमातरम

  6. Nandan Jha says:

    पहाड़ों में चलने का और और शायद अकेले चलने का एक अलग सुकून है | आपकी इस यात्रा ने मुझे काफी जलील किया :-) क्योंके मैं अक्सर इस क्षेत्र में आता हूँ पर बहुत कम हो पाता है इस तरह का पैदल सफ़र | इस बार गया तो पक्का | जय हिंद |

  7. नन्दन ने जलील शब्द का प्रयोग किया तो एक किस्सा याद आया। एक इफ्तार पार्टी में एक हिन्दू नेता जी भी आमंत्रित थे। खाना खाते खाते अपने मेज़बान से, जो एक बड़ी ऊम्र के बहुत योग्य व सुशिक्षित इंसान थे, बोले, “वाह साब वाह ! बहुत ही जलील खाना है।” मेज़बान बेचारे चुप लगा गये । नेता जी को लगा कि शायद मेज़बान सुन नहीं पाये । सो, पुनः दोहरा दिया, “बहुत जी जलील खाना है।” अब मेज़बान को बोलना ही पड़ा, “आज शायद लजीज़ कहना चाह रहे हैं।”

    हे जाट देवता, आपके बौद्धिक चातुर्य, बंदरों से लड़ने के रण-कौशल, आपकी जिजीविषा – सब कुछ मुझमें एहसास-ए-कमतरी जगाती हैं। मुझे लग रहा है कि मुझमें इतना आत्मबल क्यों नहीं है कि मैं इस प्रकार अकेला ही पहाड़ की चोटी पर चढ़ता चला जाऊं। चलो, इस जन्म में न सही तो अगले जन्म में ही सही !

  8. Pradeep.kumar says:

    Very nice post, with valuable information for visitors….. keep posting…



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