NAINITAL- SNOW VIEW POINT नैनीताल- स्नो व्यू स्थल

July 16, 2012 By:

भीमताल व इसके आसपास के सारे ताल तो देख लिये गये थे। अब नैनीताल झील व नैनीताल शहर में देखने लायक कुछ स्थल देखने की बारी थी। जिसके लिये मुझे यहाँ भीमताल से विदा होना ही था। यानि अब इस ओशो आश्रम को छोडने की बारी आ गयी थी, जहाँ पर मैंने सोने व खाने के अलावा इनके किसी खास पाठयक्रम में शामिल नहीं हुआ था। जब मैंने अपने दोनों दोस्तों को अपने कल के कार्यक्रम के बारे में बतायी तो अब समस्या यह आ गयी थी कि मेरे साथ अन्तर सोहिल व उनके दोस्त अभी कल यहाँ से जाने के मूड में नहीं थे क्योंकि उन्हे यहाँ के ओशो आश्रम का माहौल कुछ ज्यादा ही पसन्द आ गया था, जबकि मेरी दिलचस्पी ओशो आदि में नहीं थी। आज की आखिरी रात मैंने एक बार फ़िर से भीमताल की ठन्डी हवा में बिताने की सोच कर भीमताल किनारे जा बैठा। भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल यह तीनों ताल भीमताल के ओशो आश्रम में रहते हुए आराम से देख डाले थे। पहले दिन में भीमताल व नौकुचियाताल दोनों एक साथ देख लिये गये थे, दूसरे दिन सातताल देख लिया गया था। इन तीनों तालों को देखने के लिये मैंने तो पैदल ही भ्रमण किया था। लेकिन सभी लोग ऐसा नहीं कर पाते है अत: जिसे जैसा अच्छा लगे, वह उसी प्रकार इन स्थलों पर जरुर घूम कर आये। क्योंकि इन सभी तालों पर जाने के लिये सडक मार्ग उपलब्ध है। यह तो मैंने पहले ही बता दिया था कि ओशो आश्रम के स्वामी ने जब यह कहा था कि बिना गाऊन पहने कोई सभा में नहीं आयेगा। अपुन ठहरे घुमक्कड प्रजाति के प्राणी, ओशो के भक्त-वक्त(चेले-चपटे) तो थे नहीं, जिससे कि मेरे ऊपर उनके प्रवचन का तनिक मात्र भी कुछ प्रभाव पडता। ले दे के अपने तो एकमात्र देव है महादेव, अत: जब कभी मौका मिलता है तो उनके कुछ आसान से (मेरे लिये आसान है सभी के लिये नहीं होंगे, कभी मेरी बात मान कर बिना तैयारी पहुँच जाओ और वहाँ जाकर मुझे कोसने लगो) ठिकाने पर मैं जयराम जी की करने चला जाता हूँ।

मार्ग में एक घर की छत के बीच से निकला हुआ पेड है।

इसी मार्ग से होते हुए आया था।

मैंने यह रात में ही तय कर लिया था कि कल सुबह जल्दी ही भीमताल का ठिकाना छोडकर नैनीताल के लिये निकल जाना है। वैसे हमने यहाँ तीन दिन का किराया जिसमें रहना व खाना दोनों शामिल थे, पहले ही दे दिया था। लेकिन बिना बात के 500 रु के चक्कर में, पूरा एक दिन यू ही पडॆ-पडे बर्बाद कर दिया जाये, उससे तो अच्छा है कि कहीं घूम आया जाये। इसलिये मैंने रात को अन्तर सोहिल व उनके दोस्त दाऊद को बता दिया कि मैं तो कल सुबह यहाँ से नैनीताल जा रहा हूँ, तो उन्होंने कहा कि कल नहीं परसों चलेंगे। लेकिन दिल्ली से ही हम एक बात पहले से ही तय करके आये थे कि जाट देवता केवल घूमने के लिये व वे दोनों केवल ओशो के आश्रम में मस्ती के साथ प्रवचन सुनने के लिये ही जा रहे है। अत: हमने आपस में एक दूसरे को नहीं रोका-टोका नहीं करना था। सुबह मैंने भीमताल में दैनिक कार्य से निपट वहाँ से नैनीताल के लिये कूच कर दिया था। सुबह 7 बजे से पहले ही मैं भीमताल पुलिस स्टेशन के सामने जीप, बस, कार आदि की प्रतीक्षा में खडा था। कि कुछ भी मिल जाये उससे अपुन को कोई फ़र्क नहीं पडने वाला है, दो तीन जीप आयी भी, लेकिन कोई भीमताल से नैनीताल जाने वाला नहीं मिल रहा था। कुछ देर बाद एक जीप और आयी, उसने कहा भाई जी आप भुवाली तक चले जाओ, वहाँ से आगे की दूसरी जीप आसानी से मिल जायेगी। मैं उससे पूछा कि क्या तुम भुवाली तक नहीं जा रहे हो तो उसने बताया कि मैं उससे थोडा पहले ही रुक जाऊँगा, नहीं तो जरुर लेकर जाता। खैर उस जीप वाले के जाने के बाद एक जीप और आयी उससे नैनीताल जाने के बारे में कहा तो मना कर दिया लेकिन भुवाली तक वो जा रहा था, अत: मैं भी उसकी जीप में भुवाली तक सवार हो गया। उसकी जीप में मेरे अलावा कोई और सवारी नहीं थी। सुबह का समय पहाडों में से मैदानों की ओर कूच करने का होता है ना कि पहाडों की ओर चढने का, जिस कारण सुबह-सुबह ऊपर जाने वाली जीप खाली रहती है। भुवाली भीमताल से मुश्किल से 10-11 किमी के आसपास ही है थोडी देर में ही उसने मुझे भुवाली ले जाकर पटक दिया, मतलब छोड दिया था।

इन्ही पेडों के बीच से होते हुए मार्ग है।

स्नो व्यू बिन्दू पर कुछ दिखाई नहीं दिया।

भुवाली पहुँच कर उसने बताया कि सामने उल्टे हाथ वाली जो जीप चढाई की ओर खडी है, नैनीताल जा रही है। नैनीताल भुवाली से कोई 12 किमी दूरी पर ही है। मैं उस जीप में नहीं बैठा, पहले मैंने भुवाली को थोडा समझने के उस तिराहे के आसपास थोडा सा पैदल भ्रमण कर डाला। तिराहे से एक मार्ग अल्मोडा की ओर चला जाता है। यहाँ तिराहे पर फ़लों की काफ़ी दुकाने लगी हुई थी। एक लडका आडू जैसा कुछ फ़ल बेच रहा था, मैंने भी अपने खाने के लिये थोडे से ले लिये। वो फ़ल नाम मुझे याद नहीं आ रहा है देखने में आडू जैसा था खाने में इतना नर्म कि मुँह में डालते ही ऐसा घुल जाता था कि पता ही नहीं चलता था कि कुछ खाया है या कुछ पिया है। उस फ़ल को खाया मानूं या पिया जो जी में आये मान लेना। फ़ल से निपट कर मैंने नैनीताल जाने वाली जीप में अपना स्थान ग्रहण किया। जीप में 5-6 लोग बैठ चुके थे कि तभी वहाँ एक आल्टो कार वाला आया जिसके आवाज लगाते ही जीप में जैसे भूचाल आ गया। सभी (केवल मुझे छोडकर) दनादन जीप से उतर कर आल्टो कार में घुस गये। एक बार मेरे मन में भी आया था कि जीप तो चलने में अभी समय लगायेगी लेकिन मुझे दिखाई दे रहा था कि आल्टो में अब जगह ही नहीं बची है, अत: मैंने वहाँ से उठने की परॆशानी नहीं ली। इसके बाद लगभग दस मिनट बाद एक फ़ल वाला जीप वाले के पास आया और बोला कि बीस पेटी फ़ल नैनी मन्डी में जाने है तो जीप वाला उसके फ़ल ले जाने की मान गया, उसके फ़ल जीप में चढाने के बाद तब कही जाकर हमारी जीप भी चलने को तैयार हो गयी थी। अब जीप में सवारी तो सिर्फ़ चार ही थी, लेकिन फ़लों का वजन काफ़ी था, जिस कारण जीप वाले ने जीप सीधी नैनीताल में नैनी झील के किनारे एक सवारी को उतारने के लिये रोकी थी।

स्नो व्यू स्थल पर बच्चों के खेलने का भी प्रबन्ध है।

खतरनाक मार्ग पर एक जर्जर मकान के अवशेष।

इसके बाद जीप वाला जीप सीधा मन्डी की ओर ले गया। इस जीप में आने का फ़ायदा यह हुआ कि मुझे जीप में बैठे हुए ही पूरी नैनीझील का भ्रमण हो गया, साथ ही नैना पीक जाने के लिये एक किमी की दूरी कम चलनी पडी, लेकिन पैदल चलने से अपुन पीछे हटने वालों में से नहीं है। खासकर पहाडों में चढना मेरा पसंदीदा शौंक है। जीप से उतर कर मैंने फ़लों की मण्डी + सब्जी मण्डी के बीचों बीच से पार कर, दूसरी ओर एक सडक जो सीधे नैना पीक, राजभवन, विश्वविधालय आदि की ओर जा रही थी, मैंने भी उस सडक के साथ-साथ चलना शुरु कर दिया था। इस सडक पर चढाई तो काफ़ी है जिस पर वाहन भी काफ़ी संख्या में आ जा रहे थे। काफ़ी देर चलने के बाद एक चौराहा जैसा आता है, जहाँ से उल्टे हाथ राजभवन, विश्वविधालय व सीधे हाथ लोकल इलाका व नाक की सीध में एक गली दिखाई देती है। एक दुकान वाले से नैना पीक जाने के पैदल मार्ग के बारे में जानकारी ली, तो उसने कहा कि इस गली में सीधे चलते जाओ व पहाड पर चढते रहना आगे जाकर एक सडक मिलेगी जहाँ से एक पैदल मार्ग ऊपर जाता हुआ दिखाई देगा। मैंने उसके बताये मार्ग पर चलना शुरु कर दिया था। जैसे जैसे यह गली आगे जा रही थी इसकी चढाई कठिन होती जा रही थी। घरों के ऊपर से होता हुआ यह मार्ग चढाई पर चढता ही जा रहा था। घरों के बाद अब पेडों ने मार्ग को अपने साये में ले लिया था। काफ़ी साँस फ़ुलाने के बाद वो सडक आ ही गयी जिस का मुझे काफ़ी देर से इन्तजार हो रहा था। इस पैदल मार्ग पर मुझे कोई आता जाता नहीं मिला, कारण मुझे नहीं पता, सुबह का समय या कुछ और।

अब चलते है नैना पीक की ओर।

जैसा कि मुझे बताया गया था कि सडक पर जाने पर एक पैदल मार्ग ऊपर जाता दिखाई देगा। लेकिन मुझे ना तो पैदल मार्ग ना ही कोई मनुष्य दिखाई दिया जिससे मैं पता कर लेता। मैंने सीधे हाथ की ओर यानि ऊँचाई की ओर सडक पर चलना शुरु कर दिया जब मुझे चलते हुए कोई एक किमी हो गया तो मुझे दो मानव जाति के प्राणी नजर आये, मैंने उनसे पूछा तो जवाब मिला कि नैना देवी वाला पैदल मार्ग तो पीछे ही रह गया है, अब तो स्नो व्यू आने वाला है। नैना देवी का मार्ग पीछे छूटने वाली बात सुनकर मैंने एक बार सोचा कि वापिस चला जाये लेकिन फ़िर मन ने कहा कि चलो कोई बात नहीं पहले इस स्नो व्यू को भी देख ही लेते है, नहीं तो बाद में मन में मलाल रहेगा कि यह नहीं देख पाया। सडक पर एक मोड से, मैंने यह सडक छोड्कर स्नो व्यू वाला पगडंडी का मार्ग तय करना शुरु कर लिया था। इस मार्ग को इतना भयंकर ढलान वाला बनाया हुआ है जिस पर चलते हुए मैं सोचता रहा कि यहाँ पर कोई सिरफ़िरा गाडी पर भी आ पाता होगा क्या? आप ही सोच लो जहाँ पैदल चलने में फ़िसलने का डर बना रहता हो, वहाँ पर बाइक व कार चलाने में क्या हालत होती होगी? यदि मैं कभी बाइक लेकर यहाँ आया तो इस मार्ग पर बाइक लेकर एक बार जरुर जाऊँगा। कार लेकर गया तो भूलकर भी नहीं चढाऊँगा। कार चढेगी ही नहीं, बाइक तो फ़िर भी किसी ना किसी तरह चढ ही जायेगी। कुछ देर बाद मैं स्नो व्यू स्थल पर आ चुका था। लेकिन यह क्या? यहाँ तो बादलों के घने कोहरे के कारण कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। कुछ दिखाई ना देने के कारण यहाँ रुकना भी बेकार था, फ़िर भी मैंने कुछ देर तक कोहरा कहो या बादल हटने का इन्तजार किया। लेकिन बरसात का मौसम हो तो पहाडों के बादलों का कोई भरोसा नहीं होता है। जिस कारण मैंने यहाँ से चलने में ही भलाई समझी। यहाँ से नैना पीक का पैदल मार्ग ज्यादा दूरी पर नहीं था। मैंने पैदल मार्ग के लिये उसी सडक पर वापिस चलना शुरु कर दिया, जिससे होता हुआ मैं यहाँ तक आया था। यहाँ से वह जगह मुश्किल से दो किमी ही होगी जहाँ से नैना पीक/चाइना पीक का पैदल मार्ग शुरु होता है।
अगले लेख में नैना पीक……………….

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

8 Responses to “NAINITAL- SNOW VIEW POINT नैनीताल- स्नो व्यू स्थल”


  1. संदीप बाबू राम राम, आप लोगो को हिमाचल यात्रा कैसी रही. आज बहुत दिन बाद आपसे संपर्क हो रहा हैं. नैनीताल की वादिया हमेशा से मुझे आकर्षित करती रही हैं. मेरे मामा जी नैनीताल में रहते थे. बचपन से 1983 से मै लगातार नैनीताल जाता रहा हूँ. अभी फिलहाल पांच छः साल से नहीं जा पाया हूँ. आपकी नैनीताल की यात्रा पढकर पुरानी यादे ताज़ा हो आयी हैं. आज भी मुझे नैनीताल से प्यारा हिल स्टेशन कोई नहीं लगता. बस अब वंहा की भीड़ से घबराने लगा हूँ. ये जो आपने मार्ग दिखाया हैं, यह स्नो व्यू जाने का पुराना मार्ग हैं पहले इसी मार्ग से ही जाते थे. मल्लीताल में स्टेट बैंक के बराबर से ये सड़क जाती थी. और इसी रास्ते में ही मामाजी का माकन था. खैर अब आपके साथ नैनीताल यात्रा का मज़ा आएगा. धन्यवाद, वन्देमातरम

  2. बहुत बढिया यात्रा संदीप जी …………..हम तो पैदल नही जा सके थे पर नैना पीक भी हमारा रह गया था क्योंकि जब पहुंचे और जब तक निकले तब तक बारिश ही होती रही लगातार …………………..आगे देखते हैं नैना पीक कैसी है

  3. Surinder Sharma says:

    संदीप जी,
    बहुत अच्छा वर्णन है। फोटो भी अति सुंदर हैं। बहुत बहुत धन्यवाद।

  4. Mukesh Bhalse says:

    संदीप भाई,
    जै राम जी की. बड़े दिनों के बाद दिखाई दिए, कैसा रहा आपका हिमाचल टूर? और बाकी सब मजे में????
    आपकी यह पोस्ट भी हमेशा की तरह बड़ी सुन्दर लगी. घर की छत से निकले पेड़ का चित्र तो बड़ा ही आश्चर्यचकित कर देने वाला था. आज आपकी पोस्ट में आपकी यह बात “ले दे के अपने तो एकमात्र देव है महादेव” पढ़कर मन प्रसन्न हो गया. सावन के महीने में शिव का नाम लेने से ज्यादा पुण्य का काम और क्या हो सकता है.
    भोलेनाथ………….सबके साथ………….

  5. Kavita Bhalse says:

    संदीप जी,
    बहुत अच्छा लेखन एवं उससे भी बढ़कर चित्रण. आपने ओशो केम्प का बड़ा फायदा उठाया, गए थे ओशो के आश्रम में और कर ली घुमक्कड़ी और सारे तालों का आनंद उठा लिया……….बहुत खूब. आपने उस अनजान फल का इतना बढ़िया तरीके से जिक्र किया है की अब उस फल के बारे में तथा उसका नाम जानने के उत्सुकता बढ़ गई है. किसी घुमक्कड़ साथी को पता हो जो उत्तराखंड से ताल्लुक रखते हों तथा वहां की वनस्पति की जानकारी रखते हों तो बताने का कष्ट करें.
    धन्यवाद.

    • Geeta says:

      Sandeep ji us fal ka naam khumani hi jo dikhta bilkul aadu ki trah hi, but khane mein bahot soft hi, jo ki wahan ka local fruit hi . wahan gaon walo ke bache polibag mein daal ke sabhi gadiyon ke pass bechte rehte hi i think 10/- or 20/- ke ek polibag. well aapke lekh ne humari yadein taza kr di……………… waiting for your next lekh

  6. Ritesh Gupta says:

    कुछ दिनों पहले कुमायूं की यात्रा से लौटा हूँ…..नैनीताल के नैनापीक (किलबरी) पहाड़ पर हिमालय दर्शन पॉइंट तक भी गए थे….पर वहाँ से हमें भी हिमालय के दर्शन नहीं हुए, हाँ उसी रास्ते पर खूबसूरत नैनी झील के दर्शन झील के पूर्ण आकार में हो गए |

  7. Nandan Jha says:

    संदीप जी , स्वागत है | मेरा भी यही ख्याल है की वो फल खुमानी है | पहाड़ों में इस तरह से अकेले घूमना, भीम ताल पर बैठे रहना, या फिर स्नो पॉइंट के चढ़ाई एक अपने आप में एक तरह का ध्यान है या समाधी है | शायद आपके दोस्त एक अलग तरह के ध्यान में थे और आप एक अलग तरह के | जय हिंद |



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