SATTAL सात ताल (भीमताल से पैदल यात्रा)

July 02, 2012 By:

भीमताल, नौकुचियाताल देखने के बाद आज सातताल देखने की बारी थी। वैसे तो सातताल व भीमताल में पहाडों के पैदल मार्ग से कोई खास दूरी नहीं है दूरी यानि 5-6 किमी ही है लेकिन फ़िर भी ज्यादातर अरे! ज्यादातर क्या लगभग सारे के सारे ही वाहनों में आराम करते हुए लम्बे मार्ग से भीमताल से सातताल देखने के लिये जाते है पूरे सीजन में मुश्किल से कोई 30-40 लोग ही पैदल मार्ग मार्ग का प्रयोग करते होंगे। जब मैंने पैदल मार्ग से जाने के बारे में ओशो आश्रम वालों से बताया तो उन्होंने कहा कि वैसे तो कोई समस्या नहीं है लेकिन आपको मार्ग में शायद ही कोई मिले, अगर आप मार्ग भटकते है तो आपको बताने वाला कोई नहीं मिलेगा। जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों? तो उन्होंने कहा कि उस मार्ग पर कोई गाँव नहीं पडता है जिस वजह से सडक बन जाने पर अब उस मार्ग से कभी-कभार ही कोई आवागमन करता है। मैंने उनसे अच्छी तरह मार्ग के बारे में समझ लिया ताकि मार्ग भटकने की कोई आशंका ही ना रहे। उनके बताये मार्ग पर मैं सुबह का खाना खाकर लगभग 9 बजे वहाँ से चल पडा।

ओशो आश्रम के ठीक ऊपर से ही एक मार्ग आगे पहाडियों में चला गया था जिस पर मुझे चलते जाना था। जैसा कि उन्होंने बताया था कि आगे जाने पर कुछ घर आयेंगे जिसके बाद उल्टे हाथ पर एक पगडंडी आयेगी जिस पर मुझे जाना होगा। लेकिन यह क्या पगडन्डी आने से पहले ही यह सडक, जिस पर मैं जा रहा था दो मार्गों में विभाजित हो गयी। अब इसके बारे में तो उन्होंने मुझे बताया ही नहीं था कि आगे मार्ग दो हो जायेंगे। मैं बडा परेशान कि क्या करूँ? लेकिन जैसा उन्होंने कहा था कि पहाड से नीचे नहीं उतरना है पहले इस पहाड के सबसे ऊपर चढ जाना है उसके बाद ही नीचे उतरना है। चूंकि मार्ग उल्टे हाथ पहाड की ओर मुडा था जिस कारण मैं भी पहाड की ओर जाने वाले की ओर चल पडा कुछ दूर जाने पर देखा कि कुछ बकरियाँ पत्थरों पर चढकर पेड की पत्तियाँ खा रही थी। मैंने बकरियों का फ़ोटो लिया व आगे चलता रहा, जब मैं लगभग आधा किमी चला गया तो देखा कि यह मार्ग समाप्त हो गया है। मैंने सोचा हो सकता है कि कोई पगडन्डी होगी जिस पर चलकर इस पहाड को पार किया जा सकता है। लेकिन काफ़ी तलाश करने के बाद भी मुझे कोई पगडन्डी ना मिल सकी।

भीमताल से चलने के बाद ऐसा दृश्य।

गलत मार्ग पर जाने पर यह नजारा दिखाई दिया था।

मैं वापस उसी मोड की ओर चल पडा जहाँ से मार्ग एक की जगह दो हो गये थे। यहाँ से मैंने दूसरे सीधे वाले लेकिन छोटे से मार्ग पर चलना शुरु कर दिया। थोडी दूर जाने पर इस मार्ग पर एक लोहे का गेट बना हुआ था जिस पर किसी कम्पनी का बोर्ड लगा हुआ था पहली नजर से देखने पर तो यह एक सामान्य बोर्ड लगता था, लेकिन मार्ग अभी समाप्त नहीं हुआ था। मैं आगे चलता रहा थोडी दूर जाकर यह मार्ग भी समाप्त हो गया। जहाँ यह मार्ग समाप्त हुआ वहीं से एक पगडन्डी उल्टे हाथ ऊपर की ओर जाती हुई दिखाई दे रही थी। मैं इस पगडन्डी पर चलना शुरु करता उससे पहले ही मुझे सामने तितली लिखा हुआ दिखाई दिया। मैंने पहले जाकर तितली लिखी हुई जगह देखी तो पता चला कि वहाँ पर तितली का पूरा का पूरा बैंक बनाया हुआ है ना जाने कितनी तरह की तितली वहाँ पर रखी हुई थी। लेकिन इन तितलियों में एक गडबड थी कि यह सभी की सभी जीवित नहीं थी नकली भी नहीं थी। डिब्बों में बन्द तितलियाँ ममी बनाकर रखी हुई थी लेकिन हो सकता है कि वहाँ पर जीवित तितलियाँ भी रहीं हो लेकिन उस समय मुझे दिखाई नहीं दी थी।

बीच मार्ग में शानदार पौधा

इनको देखकर मैं अपनी पगडन्डी पर चल पडा। पगडन्डी भी कोई लम्बी चौडी नहीं थी मुश्किल से एक फ़ुट की ही थी। जैसे-जैसे यह पैदल मार्ग आगे बढ रहा था चीड के पेड का जंगल घना होता जा रहा था। इस पगडन्डी पर चलते हुए मुझे काफ़ी देर हो गयी थी लेकिन यह मार्ग भी पहाड के ऊपर चढता ही जा रहा था। कई मोड पार करने के बाद एक जगह फ़िर से दो पगडन्डी हो गयी थी। लेकिन यहाँ समस्या वाली बात नहीं थी। क्योंकि एक नीचे जा रही थी व दूसरी ऊपर जा रही थी। मुझे तो ऊपर की ओर ही जाना था क्योंकि अभी तक पहाड का शीर्ष छोर नहीं आया था। जब मैंने यहाँ से ऊपर चढना शुरु किया तो सच में पता चल गया कि इस मार्ग से कई दिनों से कोई नहीं आया था। अब पैदल मार्ग पर मार्ग कम मकडियों के जाले ज्यादा हो गये थे मकडियों के जालों ने पूरे मार्ग को ढक रखा था रही सही कसर झाडियों ने कर रखी थी जिस कारण मेरा ज्यादा ध्यान इनमें लगा हुआ था वैसे इस मार्ग पर अब जोरदार चढाई भी आ गयी थी लेकिन चढाई का मुझपर इन मकडियों के चक्कर में ज्यादा फ़र्क नहीं पडा था। थोडी देर बाद जब इन सब से छुटकारा मिला तो वाह क्या नजारा था? मैं इस पहाड के सबसे ऊपरी बिन्दु पर खडा हुआ था जहाँ से चारों ओर के नजारे बहुत ही खूबसूरत लग रहे थे। सातताल झील भी यहाँ से छोटी सी नन्ही सी लग रही थी।

घने चीड के पेडों के बीच पगडंडी

चीड के पेडों के बीच पगडंडी का एक और फ़ोटो।

मैंने थोडी देर बैठकर यहाँ विश्राम किया उसके बाद मैंने सामने दिखाई दे रही सातताल झील की ओर उतरना शुरु कर दिया था। मैं पहाड पर चढने के मुकाबले उतरने में हमेशा सावधानी बरतता हूँ। जिस कारण यहाँ भी उतराई पर सावधानी से उतरना शुरु कर दिया। लगभग आधा किमी तक तीखी ढलान थी उसके बाद मार्ग कुछ आसान हो गया था जैसे-जैसे मैं नीचे उतर रहा था झील नजदीक आती प्रतीत हो रही थी। मुझे सामने झील के उस पार कुछ मकान जैसे बने हुए दिखाई दे रहे थे। मैंने वहीं पहुँचने की ठान ली थी। अब यह मार्ग इस झील के ऊपर-ऊपर ही घूमना शुरु हो गया था। मैं भी बिना किसी परेशानी के चलता रहा। एक मोड पर मुझे पहाड में एक पेड की जड में सफ़ेद-सफ़ेद नजर आ रहा था, जब मैंने इसे पास जाकर ध्यान से देखा तो पाया कि यह तो सफ़ेद मकडी है, और मकडी एक दो नहीं सैकडों की सँख्या में थी। मैं यह नहीं जान पाया कि सारी मकडी एक जगह बैठकर धूप सेक रही थी या कोई कार्य कर रही थी।

पहाड के टॉप पर।

पहाड के टॉप से सातताल को देख लो।

थोडा और आगे जाने पर यह पैदल मार्ग चक्कर काटता हुआ एक सडक में जा मिला। अब सडक तो मिल गयी लेकिन एक परेशानी आ गयी कि सामने सडक पार एक और झील दिखाई दे रही थी, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा था कि किधर जाने पर ऊपर पहाड से दिखाई दे रहा नावों का झुंड मुझे नजर आयेगा। इसी उधेडबुन में अब मैं उल्टे हाथ की ओर चल पडा। यहाँ से आगे जाने पर उतराई उतरने पर एक जगह दो तीन घर दिखाई दिये। नजदीक जाने पर पाया कि वहाँ पर कोई आश्रम जैसा कुछ है बल्कि चर्च जैसा ज्यादा लग रहा था। यहाँ से आगे मार्ग नहीं था, अब फ़िर से मार्ग तलाशना पडा। यहाँ चर्च के पास से एक घर के पीछे बराबर से एक पगडन्डी नीचे उतर रही थी। इस पगडन्डी पर थोडी सी दूर जाते ही वही झील दिखाई दी जो अभी-अभी सडक से दिखाई दे रही थी। जब मैं इस झील के किनारे पहुँचा तो पाया कि वहाँ दो तीन परिवार बच्चों सहित अपना समय बिता रहे थे। मैं यह तो समझ गया था कि यह झील बडी वाली झील नहीं है लेकिन आखिर बडी वाली झील कहाँ गयी। कुछ कदम बढाने पर मुझे इन परिवार की कार नजर आयी और कुछ और आगे जाने पर एकबढिया सडक दिखाई देने लगी। एक घोडे वाले से पूछा तो पता चला कि सातताल अभी 200 मी दूर है।

पैदल मार्ग का उतराई का नजारा।

मार्ग में एक विशाल कैक्टस।

अब सातताल मुश्किल से 200 मी की दूरी पर ही है। यहाँ से सडक के किनारे सीधे हाथ की ओर एक पैदल मार्ग नीचे की ओर जाता दिखाई दे रहा था। जबकि सडक दूसरी ओर मुड गयी थी चूंकि पहाडों में ऐसा होता ही है कि पैदल मार्ग सडक मार्ग के मुकाबले काफ़ी छोटा होता है अत: यहाँ भी मैंने सडक छोड कर पैदल मार्ग पर चलना शुरु किया ही था कि मुझे एक ऊँचे से पत्थर पर कुछ लोग रस्सी बांधकर चढने में लगे हुए थे। यहाँ पर राक क्लाईमिंग की जा रही थी। कुछ देर तक उनको देखने के बाद, मैंने फ़िर से अपनी मंजिल की ओर चलना शुरु कर दिया था। यह पैदल मार्ग मुझे एक बैरियर के किनारे ले आया था। यहाँ बैरियर से इस स्थान पर आने वाले वाहनों से शुल्क लिया जा रहा था। मेरे पास तो वाहन था ही नहीं अत: मैं तो अपनी ग्यारह नम्बर की गाडी से आगे की ओर चलता रहा। अरे हाँ एक बात तो रह ही गयी थी कि इस बैरियर पर आते ही मैं सातताल झील के किनारे आ गया था। यहाँ बैरियर से ही सडक झील के किनारे-किनारे ही होकर आगे जा रही है। कुछ आगे जाने पर मैंने देखा कि कोई 20-25 स्कूल/कालेज या किसी संस्थान के युवक-युवती इस झील में अपनी-अपनी नाव लेकर झील की सैर करने की तैयारी करने में लगे थे। मैं कुछ दूर तक इन्हें देखता रहा उसके बाद मैं आगे की ओर चलता रहा।

सफ़ेद मकडी का झुन्ड।

सातताल को यहाँ से भी देख लो।

थोडी दूर आगे जाने पर एक घोडे वाला मिला, यकीन मानिये घोडे वाला ही था नहीं तो पहाडों में तो खच्चर ही भरे पडे है। यहाँ उस घोडे वाले ने कहा “भाई जी घोडे पर सैर करोगे” यह सुनकर अपना माथा ठनका। मैंने कहा “देख भाई वो सामने पहाड दिखाई दे रहा है मैं भीमताल से उसी पहाड के ऊपर से पैदल होता हुआ आ रहा हूँ क्या आपको लगता है कि मैं आपके घोडे पर सवारी करूँगा, भले ही शौक के लिये ही”, वैसे आप सब की जानकारी के लिये बताना चाहता हूँ कि आजतक मैंने पहाडों पर घोडे का प्रयोग नहीं किया है। घोडे वाले से बाते हो ही रही थी कि तभी अचानक तेज बारिश होने लगी। मैं अपने साथ छाता भी लेकर नहीं आया था लेकिन शुक्र रहा कि सामने ही झील किनारे बैठने के लिये कुछ ठिकाने बने हुए थे जिन पर ऊपर छत भी बनी हुई थी। अत: मैं उनमें से एक ठिकाने में जा घुसा। बारिश भी लगता था कि पूरी तरह ठान कर आयी थी जो रुकने का नाम नहीं ले रही थी। पूरे ढाई घन्टे बरसने के बाद बारिश का वेग कुछ कम हुआ तो अपनी जान में जान आयी नहीं तो लगने लगा था कि आज बारिश का ये हाल रहा तो रात यही बितानी पडेगी। बारिश में वैसे मैं तो एक जगह ही जम कर बैठा हुआ था लेकिन कालेज के युवक-युवती बारिश में भी नाव पर सवारी करते हुए अपनी-अपनी नाव लेकर मौज कर रहे थे। उन सभी में एक प्रतियोगिता चल रही थी जिसमें एक युवक विजयी रहा था। इन सबको सिखाने वाले प्रशिक्षक भी पूरी तरह मस्ती के मूड में थे। इन सब पर बारिश का कोई प्रभाव नहीं पड रहा था।

रुकने का ठिकाना।

यहाँ पर बच्चों के लिये भी बहुत कुछ है।

आखिरकार बारिश रुक गयी। मैं तो था ही इसी इन्तजार में तुरन्त वहाँ से उठा, कुछ आगे चलते ही बच्चों के खेलने के लिये बहुत सारे झूले लगाये गये थे। यहाँ आकर एक बार मुझे लगा कि यह जगह बच्चों के लिये हर तरह से काम की है यहाँ झील है नाव है रात को रुकन के लिये सरकारी आवास है सामने ही गढवाल निगम का आवास है। बच्चों के खेलने के लिये समय बिताने के लिये इससे बेहतर जगह नैनीताल क्षेत्र में मुझे दिखाई नहीं दी। अगर आप में से कोई यहाँ नहीं गया है तो परिवार को साथ लेकर जाये आपके साथ आपके बच्चे भी इसे पूरा एन्जाय करेंगे। यहाँ मैंने बच्चों के लिये कई प्रकार के झूले देखे थे। घुडसवारी के लिये घोडे तो थे ही। एक रोमांचक खेल झील में एक स्थान पर जहाँ चौडाई कुछ कम थी दोनों किनारों पर मोटे व लम्बे रस्से बाँध कर रोपवे की तरह बनाया हुआ था। जिस पर किसी भी बन्दे को वो चाहे छोटा हो या बडा लडका हो या लडकी हर कोई उसका आनंद उठा सकता था। ठीक इसी प्रकार से पहाडों में ज्यादातर जगह पर सामान व मानव नदी पार करने के लिये इसी तरीके को प्रयोग में लाते रहे है। यहाँ आपके मनपसंद भोजन के लिये भी कई भोजनालय है इनका थाली का मूल्य भी ठीक-ठाक ही है लेकिन झील किनारे बैठकर खुले में खाना व रात्रि में यहाँ पर रहना एक अलग ही अनुभव देता है। इन दुकानों व खेलों के कुछ आगे चलते ही ढेर सारी नाव आपके इंतजार में तैयार मिलती है जिसमें बैठकर आप उस झील में लम्बी यात्रा कर सकते है जो हमें पहाड के ऊपर से दिखाई दे रही थी। यहाँ के पहाड चारों ओर से पेडों से घिरे हुए है। जिससे कभी भी यहाँ आकर ऐसा नहीं लगता है कि हम किसी शहरी वातावरण में यात्रा कर रहे है।

सातताल का एकदम शान्त जल।

बारिश के दौरान लिया गया फ़ोटो है।

अब कुछ बाते इस सात ताल झील के बारे में यह झील उत्तराखंड के नैनीताल से मात्र 23 किमी दूर एक बहुत ही ख़ूबसूरत जगह है। कुमाऊँ क्षेत्र के सभी तालों में यह ताल सर्वोत्तम है। नल-दमयंती ताल, गरूड़ ताल, राम ताल, लक्ष्मण ताल, सीता ताल, पुर्ण ताल, सुखा ताल यहाँ की ताल है। यह सात छोटी-छोटी झीलों का समूह सात-ताल भवाली से मात्र 12 किलोमीटर के आसपास है। नैनीताल से आते समय भवाली से सीधे हाथ की ओर मुडना होगा। सात-ताल तक पहुँचने के लिए भीमताल से भी मार्ग बन गया है। भीमताल से महारा गाँव होते हुए ‘सातताल’ की सडक से दूरी केवल 7 किमी है। इस ताल के चारों ओर एक पक्का पैदल मार्ग बनाया गया है, प्रत्येक कोने पर बैठने के लिए सुन्दर व्यवस्था की गयी है। यह ताल देखने के हिसाब से बहुत ही अच्छी जगह पर है। यहाँ पर नौकुचिया देवी का मन्दिर भी है। इसकी लम्बाई 19 मीटर है, चौड़ाई 315 मीटर और गहराई 150 मीटर तक बतायी गयी है और यह समुद्र तल से 1300 मी की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ रात में ठहरा के लिये कई बिस्तर वाला एक आवास गृह भी बनाया हुआ है।

यह भी बारिश के दौरान लिया गया फ़ोटो है।

इस ताल पर कई घन्टे बिताने के बाद मैंने यहाँ से अपने ठिकाने भीमताल के ऒशो आश्रम की ओर पैदल ही चलना शुरु कर दिया था। बारिश रुकने के बाद मौसम बडा सुहावन हो गया था। जब मैंने घोडे वाले से बात की थी तो उसने बताया था कि आप जिस मार्ग से आये हो उसके अलावा भी एक और पैदल मार्ग और जिस पर सडक मार्ग बनाने का कार्य तीव्र गति से चल रहा है। अबकी बार मैंने उस घोडे वाले के बताये मार्ग से जान की ठान ली थी। झील से वापसी में मैं उसी चट्टान के पास से होता हुआ ठीक उसी जगह पर आ गया था, जहाँ से यहाँ आते समय मैंने यह सडक देखी थी। यहाँ कुछ दूर सडक पर चलते हुए एक छोटा सा मोड पार करने के बाद एक पगडंडी मुझे ऊपर जाती हुई दिखाई दी मैंने सडक छॊड दी और उस पैदल मार्ग की ओर चल पडा था लेकिन मुझे कुछ सौ मीटर आगे जाते ही यह अहसास होने लगा था कि यह मार्ग जिस पर मैं जा रहा हूँ एक आम पैदल मार्ग नहीं है क्योंकि यहाँ मुझे तंग झाडियाँ से होकर निकलना पड रहा था और सबसे बडी बात, नीचे मार्ग में साफ़ सफ़ाई नहीं थी बल्कि पत्थर उल्टे सीधे पडे हुए थे। कुछ और आगे जाने पर मैंने पाया कि मैं किसी पैदल मार्ग पर नहीं हूँ बल्कि मैं बारिश के पानी के बहाव के मार्ग पर था पहाडों में पानी के बहने से ऐसे बहुत से मार्ग जैसे बन जाते है जो हमें पैदल मार्ग जैसे दिखाई देते है। मैं भी पूरा ऊँत खोपडी का जाट मैंने एक बार भी यह नहीं सोचा कि आगे कुछ मिलेगा या नहीं। यहाँ कोई आधा किमी चलने पर मुझे एक कच्ची-पक्की सडक दिखायी दी। इस सडक पर आने के बाद एक समस्या आ गयी अब यह समझ नहीं आ रहा था कि मुझे जाना किस ओर है?

झील के तल के पास जाकर लिया गया फ़ोटो है।

पहाड के टॉप से सातताल को यहाँ से भी देख लो।

कुछ देर सोचने के बाद मैंने पहाड की उतराई की ओर चलना शुरु कर दिया था। लेकिन थोडा आगे जाने पर नीचे की ओर एक झील का शानदार नजारा दिखाई दिया तो इस मार्ग पर आने का गम नहीं रहा। यहाँ से कुछ आगे जाने पर देखा कि जिस सडक पर मैं चला आ रहा था वो समाप्त हो गयी है। अब मेरे पास वापस जाने के अलावा कोई चारा नहीं था। इस सडक पर वापस आते हुए यह सडक दो तीन घरों के बराबर से होती हुई एक बडी सडक में जा मिली। यहाँ पर मुझे दो-तीन लोग मिले जिन्होंने मुझे बताया कि सामने जा रही सडक पर कुछ आगे जाने पर सीधे हाथ एक मार्ग नीचे जाता हुआ दिखाई देगा बस उसी पर उतरते जाना है। मैं उनके बताये मार्ग पर उतरता चला गया यह मार्ग अब तक पक्का बन गया होगा। यहाँ एक गाँव से होता हुआ एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ एक पुल का निर्माण कार्य चल रहा था। यहाँ आकर एक बार फ़िर से हल्की हल्की बारिश शुरु हो गयी। कुछ देर एक दुकान पर रुकना पडा, थोडी देर में बारिश रुक गयी। यहाँ से मैंने चलते हुए भीमताल के इलाके में प्रवेश किया। शाम के चार बजने वाले थे। मैं आराम से टहलता हुआ लगभग शाम के पाँच बजे तक भीमताल के ऒशो आश्रम पहुँच चुका था।

इस स्थल पर कितनी गजब की बात लिखी हुई है?

लेख बड़ा जरुर है लेकिन एक पोस्ट में ही इसका असली मजा आया है, यह पोस्ट कुछ ज्यादा ही लम्बाई लिए हुए है, लेकिन आपको रोमांच में भी उतना ही मजा आया होगा?

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

8 Responses to “SATTAL सात ताल (भीमताल से पैदल यात्रा)”


  1. सही कहा जी जब गाडी नीचे हो तो पैदल जाने की आपके जैसे घुमक्कड के अलावा कौन सोच सकता है । ये जो फोटो मजेदार आये हैं इनका कारण पैदल घुमक्कडी है ………..और इस तरह आपने एक नया रूप भी दिखाया सात ताल का आखिरी से पहला फोटो बडा बढिया आया है ………….धन्यवाद राजू पेंटर भुवाली

  2. बरसात के मौसम मैं फोटो भी लाज़वाब आते हैं, बहुत सुन्दर चित्र हैं, विशेषकर आखिरी और आखिरी से पहला , घुमक्कडी का मज़ा पैदल या फिर बाइक से ही हैं.

  3. Mukesh says:

    It is an ultimate post with great content and pictures added more excitement. Really author written well. keep it up

  4. Monty says:

    जा रहा हू में भी 15 तारिख को

    बढ़िया लिखा

  5. Mukesh Bhalse says:

    संदीप जी,
    हमेशा की तरह सुन्दर लेख तथा मनभावन तस्वीरें. पेड़ों के बिच से झांकता भीमताल का द्रश्य बड़ा ही सुन्दर लग रहा है…

  6. Neeraj Jat says:

    अपन भी भईया एक बार पैदल रास्ते से सातताल गये थे। जबकि सातताल जाने के तीन सडक रास्ते हैं।

  7. ashok sharma says:

    beautiful post,good photographs.

  8. रोचक मजेदार पोस्ट. सातताल के पहाड़ से फोटो बहुत ही अच्छे हैं.



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