Gokarna And Mahabaleshwar Temple:- गोकर्ण और महाबलेश्वर मंदिर |
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गोकर्ण और महाबलेश्वर मंदिर दर्शन और कुछ जानकारी

गोकर्ण महाबलेश्वर अत्मलिंग :- आप देख सकते है कि रावण ने इसे खीचकर गाय के कान जैसे आकार का बना दिया .इसलिए शहर का नाम है गोकर्ण . यह बहुत पुराना फोटो लिया गया है इस लिए ब्लेक अंड वाईट है. यह एक फोटो से खीचा गया फोटो है .
वैसे मैंने गोकर्ण शहर तो देखा ही था और महाबलेश्वर मंदिर में भी दो या तीन बार दर्शन करके आया ही था। लेकिन वह दर्शन मैंने बहुत शीघ्रता से किये थे क्योंकि बाकि और काम भी थे और दूसरी जगहों पर भी जाना था। इसलिए मैंने शिरसी और ओम बीच के लेख पहले लिखे और गोकर्ण और महाबलेश्वर मंदिर के बारे में नहीं बताया। अब इस लेख में आपको गोकर्ण और महाबलेश्वर शिव मंदिर के बारे में बताऊँगा। गोकर्ण इस स्थल का क्या महत्व है? यह मैंने आपको पहले एक पोस्ट में बता ही दिया है। अब चलते है गोकर्ण शहर के बारे में जानने के लिए।
गोकर्ण :-. गोकर्ण एक छोटा सा शहर है जो उत्तर कन्नड़ जिले में हैं। यहाँ कि आबादी कुछ 40000 के करीब होगी। इस हिंदू धार्मिक स्थल के साथ एक बड़ा सा पर्यटको का भी स्थल है। शहर के बाजू में करीब कई बीच है जिसकी वजह से पर्यटकों कि भीड़ बनी रहती है। गोकर्ण शहर मंदिरों, नारियल और सुपारी के पेडों, नीला समुन्दर और साफ़ सुथरी रेत से भरा पड़ा है। इस शहर में केवल दो मुख्य गली है और शहर के घर पुराने तरीकों से बने हुई ईटों और तिरछी छतों वाले है जो आम शहर से बिलकुल अलग है।
गोकर्ण गिटार और ड्रम्स बजाने वालो के लिए स्वर्ग है। यहाँ काफी विदेशी लोग भी रहते है। अपना घर और देश यहाँ जीवन बिताने को छोड के आते है। आपको गोकर्ण कि मुख्य गली और रास्तों पर हर दस फीट पर एक फिरंगी तो मिल ही जाएगा। गोकर्ण में आपको शान्ति और ख़ामोशी का आभास होगा। गोकर्ण कि दुकाने काफी रंगीन होती है, इसमें आपको कई तरह के विदेशी स्टाइल के कपडे और फेशन का सामन मिलेगा। अगर आपको आपके मंदिर में स्थापित करने के लिए छोटी-छोटी धातु की मूर्ति भी लेनी है, तो वह भी काफी अच्छी किफायती दामो में मिल जाती और मूर्ति पर कलात्मक काम का तो कोई जवाब नहीं है। गोकर्ण में खाने के मसाले भी उत्तम क्वालिटी के मिलते है, बस आपको थोड़ी सौदेबाजी करनी आनी चाहिए। साथ-साथ में आपको हर गली में साइबर कैफ़े भी मिल जाएगा।
गोकर्ण संस्कृत सीखने का भी केंद्र है। यहाँ भंडीकेरी और तोग्गु मठ है। यहाँ संस्कृतिक ज्ञान का प्रवाह पीढियों से ब्राह्मण परिवारों में पारित हो रहा है। काफी लोग अंतिम संस्कार भी यहाँ करते है। यहाँ बहुत सारे मंदिर है जिसमें मुख्य है महाबलेश्वर, भद्रकाली, महागणपती, उमा महेश्वरी, वेंकत्रमाना मंदिर। एक पानी का बड़ा तीर्थ भी है जिसे कोटितीर्थ कहते है। यहाँ स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते है, गोकर्ण शहर के बारे में यह भी कहते है कि जिंदगी में एक बार तो यहाँ आना ही चाहिए, एक और बात गोकर्ण कि यह है कि यह समुद्र से लगा हुआ है यह गाँव, लेकिन आपको किधर भी मच्छी कि दुकान या उसकी गंध नहीं आएगी। मुरुडेश्वर में ऐसा नहीं था, यहाँ का वातावरण बहुत शुद्ध है। इस शहर में आपको आराम और विश्राम पूरी तरह से मिलेगा, इसलिए जब यहाँ आओ तो कम से कम दो दिन तो रहना ही चाहिए।
गोकर्ण अपने बीच और परिदृश्य के लिए प्रसिद्द है। गोकर्ण में मुख्य बीच में गोकर्ण बीच, मैन बीच, कुड्ले बीच, ॐ बीच, पेरेडाईस बीच और हाफमून बीच है। गोकर्ण और मैन बीच शहर के बाजू में है और बाकी 4 बीच गोकर्ण से दूर 5 किमी दक्षिण कि ओर है, गोकर्ण बीच ज्यादा करके भक्तों से भरा रहता है। मैन बीच पर सर्फिंग जैसे खेल होते है, कुड्ले और ॐ बीच 5 किमी दूर है, इन दोनों में आप वाहन करके जा सकते हो, और हाल्फ मून और पेरेडाईस बीच आप ॐ बीच से पैदल चलके जा सकते हो, यह दोनों बीच एकदम शांत और एकांत है, आपको वहाँ कोई ज्यादा लोग नहीं मिलेंगे, बस यह था गोकर्ण के बारे में ऊपर से थोडा रिव्यू, अब चलते है यात्रा विवरण पर और गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर की ओर।
20 March 2012
महागंपतिजी का मंदिर :- मैंने अब तक सोनाली और आर्या के साथ गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर के दर्शन नहीं किये थे, तो अगली दिन सुबह यानी 20 तारीख को मैंने सोचा कि परिवार के साथ भी दर्शन करके आ जाऊं और मंदिर के फोटो भी खीच लूं, तो हम लोग जल्दी उठे और चल दिए मंदिर कि ओर, क्रम के अनुसार पहले हमें श्री महागन पति जी के दर्शन करने चाहिए क्योंकि वे प्रथम पूजनीय भी है और इस जगह में शिवलिंग स्थापित उनकी वजह से ही हुआ है।
तो चलते है महागणपति जी के मंदिर में, गणपति जी का मंदिर बिलकुल महाबलेश्वर मंदिर के सामने ही है, द्वार के अंदर जाते ही वहाँ पर श्री गणेशजी कि खड़ी मुद्रा में स्वयंम्भू मूर्ति गर्भग्रह में स्थापित है। आप गर्भग्रह के बाहर से दर्शन कर सकते है, अगर आपको गर्भग्रह में जाकर श्री गणेश जी कि स्वयं पूजा करनी है तो आपको एक रू का टिकिट निकालना होगा, फिर आप मंदिर में अपने आप या या अगर आपको पंडों द्वारा पूजा करनी हो तो आप कर सकते है, दोनों के लिए छूट है।
यह है गोकर्ण के श्री महागंपतिजी, इनके सिर में एक बड़ा खड्डा है, जब हमारे गणेशजी ने बाल रूप में रावण का अत्मलिंग ज़मीन पर रख दिया था, तब रावण ने जोर से गणेशजी के सिर पर मारा था, इस मूर्ती में सिर पर खड्डा यही संकेत करता है, श्री गणेशजी कि मूर्ति बहुत सुन्दर है, आप उनके दर्शन करते ही सुख और तृप्ति का मीठा अनुभव करोगे।
अब गणेश जी के मंदिर के बाद हम चले श्री महाबलेश्वर मंदिर कि ओर।
गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर और अत्मलिंग :- महाबलेश्वर मंदिर सबसे पहले मयुशर्मा ( कदम्ब परिवार ) नाम के राजा ने 345 से 365 साल के मध्य में बनाया है, मंदिर काफी बड़ा है और उसके 4 द्वार है जिसमे मुख्य द्वार वह है जिससे समुद्र कि ओर जाया जाता है, कहते है कि पहले समुद्र में स्नान करके महाबलेश्वर के दर्शन करना चाहिए, यहाँ के गर्भग्रह में स्थित है एक अत्मलिंग, जिसकी कहानी मैंने आपको एक पोस्ट में बताई थी, कहते है कि इस लिंग के दर्शन मात्र से आपको अमिट आशीर्वादों की बौछार होगी और यह मंदिर और शहर ऊपर काशी की तरह पवित्र है, कर्नाटक के 7 मुक्तिस्थलों में गोकर्ण और महाबलेश्वर मंदिर सबसे महत्त्वपूर्ण है।
महाबलेश्वर मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली से ग्रेनाइट पत्थरों से बना हुआ है, यहाँ पर एक आत्मलिंग है जो पूरा ज़मीन के अंदर स्थित है जिसके नोक के ऊपर-ऊपर एक चौकोन शालिग्राम पीठ है, शालिग्राम पीठ में एक बड़ा छेद है जिससे आप दर्शन और अभिषेख कर सकते हो, यहाँ पर आपको पूरे लिंग के दर्शन नहीं होते है, केवल 60 सालों में एक बार यह शालिग्राम कवच निकाला जाता है, इसका कारण है कि स्थानीय लोग कहते है कि यह लिंग इतना मुलायम, संवेदनशील और भावुक है कि अगर इसको आपका नाखून भी लगे तो इसमें से खून आता है, इसलिए इसे शालिग्राम कवच या पीठ से हमेशा ढका हुआ होता है, मूल रूप वाले आत्मलिंग को आप पूरा नहीं देख सकते हो लेकिन उस लिंग की नोक को जरूर देख सकते हो और स्पर्श कर सकते हो, उसकी नोक शालिग्राम पत्थर के छेद से दिखाई देगी, अगर उस छेद में कोई पूजा सामग्री जैसे दूध, पानी, बेल पत्र आदि नहीं है तो पांडे प्रत्येक व्यक्ति को आराम से स्पर्श करने को देते है, दूसरी बात यह आत्मलिंग का एक दूसरा प्रतिबिम्ब है उस जैसा ही जिससे आप गर्भग्रह में एक प्लेटफ़ार्म के ऊपर असली अत्मलिंग के सामने देख सकते हो।
लो जी देखिये फोटो में रावण का पूरा आत्मलिंग, हाँ आप वहाँ भी पूरा आत्मलिंग फोटो में ही देख सकते है, बाकी तो शालिग्राम कवच से ढका हुआ है.
1. इतना ही भाग ज़मीन के बहार है, जिसे आप दर्शन और स्पर्श कर सकते हो, बाकि तो ज़मीन में अंदर है।
2. ज़मीन के अंदर वाला भाग,
नीचे देखिये शालिग्राम पीठ या शालिग्राम कवच, इसमें एक छेद है इसमें आपको भोलेनाथ का दिया हुआ आत्मलिंग का दर्शन होता है, इसमे हाथ डाल के आप नीचे स्पर्श भी कर सकते हो।
मंदिर परिसर में ही उमा महेश्वरी देवी का मंदिर है, जिसकी मूर्ति बहुत भव्य और सुंदर है, आप उसका दर्शन कर लो।
उसके बाद हम गोकर्ण बीच पर गए और कुछ तस्वीरे खिची, कोल्ड ड्रिंक्स पी और फिर चल दिए भद्रकाली मंदिर के दर्शन करने जिसका दर्शन मैंने शिरसी वाली पोस्ट में कराया था।
यह है कोटि तीर्थ, यहाँ नहाने से सारे पाप धुल जाते है, यहाँ सिर्फ मैं ही गया था शायद जल्दी-जल्दी में, यह मंदिर से कुछ 1 किमी कि दूरी पर है।
गोकर्ण जाने के लिए :- गोकर्ण जाने के लिए आप रोड से N.H.- 17 वाला मार्ग पर गोवा और उडुपी के बीच में आता है । गोकर्ण का एक खुद का स्टेशन भी है जिसे गोकर्ण रोड कहते है लेकिन यहाँ ज्यादा ट्रेने नहीं रूकती ।आप कुम्ता और करवर स्टेशन पर उतर सकते हो जहा ज्यादातर ट्रेन रूकती है. कुम्ता 21 किमी और करवर 59 किमी से बहुत सी बसे मिलती है । एअरपोर्ट में गोवा का देबोलिम एअरपोर्ट और मंगलोर एअरपोर्ट सबसे नजदीक है ।
हमारे कर्नाटक यात्रा की समाप्ति :- बस हो गया हमारी कर्नाटक यात्रा का अंत। हम लोग होटल में आनें के बाद पेकिंग शुरू करने लगे। मैं बस स्टैंड जाकर बस का टाइम पूछ आया, हमारी ट्रेन थी 4:30 मिनट की मुंबई मेंगलोर सुपर फास्ट एक्सप्रेस थी जो गोकर्ण रोड नहीं रूकती थी, हमें कुम्ता से ट्रेन पकडनी थी जो गोकर्ण से 21 किमी दूर है, हम वहाँ से कुछ दुपहर को 1:00-1:30 बजे कुम्ता की ओर निकले। वहाँ जाकर एक होटल में खाना खाया, थोडा रुके होटल में, मैं सोनाली के साथ जाकर कुछ फल ले आया, बाद में हमने उस होटल के बाजू में एक दुकान थी जिससे बहुत सारी मिठाई खरीदी। मुकेश ने भी कुछ मिठाईयाँ अपने लिए खरीदी। मिठाई खरीदने के बाद स्टेशन की ओर गए और हमारी ट्रेन राईट टाइम पर थी, हम अगले दिन सुबह 4:30 बजे मुंबई C.S.T. पहुँच गए। फिर हम तीन दिन तक मुंबई घूमे जिसका जिक्र मुकेश ने कर ही दिया है अपने लेखो में।
बस यही पर मेरी कर्णाटक कि सीरीज समाप्त हुई, आप सब पाठकों को मेरा साधुवाद……….. जय राम जी की।
एक महत्त्वपूर्ण श्रेय :- संदीप जाटदेवता पवाँर जिन्होंने मेरे ज्यादातर लेखों कि शब्द वर्तनी की, आपको बहुत बहुत धन्यवाद।




































बहुत विस्तार से विवरण दिया है..
आर्या इतनी प्यारी लग रही है शिवलिंग को आलिंगन किये हुए..
और डोसे का चित्र देख कर मुंह में पानी भर आया… 2 साल हो गये डोसा खाये..LOL
thnks good post
गोकर्ण शहर के बारे में यह भी कहते है कि जिंदगी में एक बार तो यहाँ आना ही चाहिए, एक और बात गोकर्ण कि यह है कि यह समुद्र से लगा हुआ है यह गाँव, लेकिन आपको किधर भी मच्छी कि दुकान या उसकी गंध नहीं आएगी। मैं भी एक बार यहाँ जरुर जाऊँगा,
आपकी अंतिम पोस्ट, वैसे तो इस सीरीज की लगभग सभी पोस्ट ही यादगार रही, घुमते रहो, फिर मिलेंगे किसी और ठिकाने की सैर पर?
ये बेहतरीन प्रस्तुति थी ………और फोटोज सारे के सारे बढिया थे …………ये छेद वाला आत्मलिंग वास्तव में अजब है और इसे देखना ही पडेगा
विशाल जी,
बढ़िया फोटो और विवरण हैं. यात्रा पढ़कर बड़ा आनंद आया.
घुमक्कडी जिंदाबाद.
धन्यवाद.
विशाल जी….
गोकर्ण की अतिमहत्वपूर्ण जानकारी से सजा विस्तृत लेख बहुत पसंद आया | सभी फोटो बहुत अच्छे लगे ……..आत्मलिंग के बारे काफी अच्छी जानकारी उपलब्ध हुई…..| श्रंखला के समापन पर बधाई…..|
धन्यवाद
गोकर्ण मंदिर सचमुच लाजवाब है. गोकर्ण आत्मलिंग के बारे में पाठकों को इस सिरीज़ के माध्यम से बहुत कुछ जानकारी प्राप्त हुई, उसके लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं.
फिरंगियों की अत्यधिक आवाजाही की वजह से इस गाँव का पूरा माहौल विदेशों जैसा हो गया है, जिधर नज़र डालो अंग्रेज ही अंग्रेज दिखाई देते हैं. कुछ ऐसा ही माहौल मैंने पुष्कर में भी देखा था, लेकिन मुझे ये नहीं समझ में नहीं आया की किसी जगह विशेष पर ही अंग्रेजों का इतनी भारी मात्रा में आना जाना क्यों रहता है?
मस्त पोस्ट। गोकर्ण रोड स्टेशन पर सप्ताह में दो दिन तीन-तीन ट्रेनें आती हैं और बाकी दिन दो-दो ट्रेनें ही रुकती हैं- गोवा से भी और मंगलौर से भी। बेहद छोटा स्टेशन है।
बेहतरीन।
लेकिन मेरी यह समझ नहीं आ रहा कि मुकेश भाई उन विदेशियों को अंग्रेज क्यों बता रहे हैं। जरूरी नहीं कि वे अंग्रेजी बोलने वाले ही हों। वे फ्रेंच भी हो सकते हैं, जर्मन भी हो सकते हैं, स्विस, रशियन भी हो सकते हैं, इजराईली भी हो सकते हैं, जिन देशों में अंग्रेजी दुर्लभ है। फिर भी अगर वे कह रहे हैं तो सच ही कह रहे होंगे, उन्होंने पूछा होगा पांच चार विदेशियों से।
वैसे मुझे अंग्रेज कम ही मिलते हैं। विदेशी बहुत मिलते हैं। ऋषिकेश में, धर्मशाला-मैक्लोडगंज में, गंगोत्री में, जोशीमठ में मुझे गोरी चमडी वाले बहुत मिले लेकिन अंग्रेज नहीं मिले।
ओ भईया हिन्दूस्तान में सब गोरी चमड़ी वालों को अंग्रेज ही कहते है..
ये विसाल भाई आजकल कहां है… टिप्पणियों का जवाब ही नही देते
गोकर्ण शहर/क़स्बा के बारे में विस्तार से जानकारी, इसके लिए धन्यवाद विशाल | बहुत देर से पहुंचा मैं इस पोस्ट पर | गोकर्ण के ऊपर हाल फिलहाल में काफी पोस्ट्स आयी पर ऐसा लगता था मुझे, की यहाँ या तो आप धार्मिक मान्यता ले कर जाएँ या फिर ॐ बाच के लिए , पर आपकी पोस्ट को पढ़ कर लगता है की सिर्फ खाली घुमक्कड़ी के लिए भी उत्तम जगह है | संदीप को मेरी तरफ से भी साधुवाद |