OSHO CAMP BHEEMTAL भीमताल का ओशो आश्रम

June 23, 2012 By:

Table of contents for Kumaon Taal Yatra

  1. BHIMTAL/Bheemtal चले भीमताल की ओर
  2. OSHO CAMP BHEEMTAL भीमताल का ओशो आश्रम

ओशो के भीमताल कैम्प में कई प्रवचन सुनने को मिले, जिसमें से आपके लिये ओशो के कुछ चुनिन्दा प्रवचन में से एक आपके लिये लाया हूँ मुझे तो इसमें काफ़ी दम लगा, आपको कैसा लगा, वो तो आप जाने। यह तो मैंने पहले ही बता दिया था कि यहाँ पर रुकने व् तीन समय का खाने सहित किराया पांच सौ रूपये डेली था अगर हम यहाँ खाने व् रुकने का मिलाकर कमरे के चार्ज का हिसाब लगाए तो घाटे का सौदा नहीं था, मैंने यहाँ के कई होटल में बात की थी जिसम से दो तीन ही इस कीमत में खाना व् रुकना देने पर तैयार थे, एक जरूरी बात और यहाँ पर कोई भी बन्दा रुक सकता है एक दिन दो दिन दस दिन बिलकुल होटल की तरह, उसे यहाँ के ओशो सन्देश में शामिल होना जरूरी नहीं है खासकर मेरे जैसा तो सिर्फ यह जानने को शामिल हुआ कि आखिर ओशो का मामला है क्या? क्योंकि इससे पहले मुझे ओशो के बारे में ज़रा सा भी पता नहीं था, यहाँ आकार एक बार भी मुझे नहीं लगा कि मैं ऐसे वैसे बाबाओं के चक्कर में फंस गया हूँ, सबको पूरी आजादी थी बस उनकी वेशभूषा पहननी जरूरी थी जो मैंने नहीं पहनी थी क्योंकि मैं किसी भी टाइप के बाबा का भक्त नहीं हूँ, अब वो चाहे ओशो ही क्यों ना हो, हाँ यह बात अलग है कि यदि बाबाओ की कोई बात गलती से भी मुझे उचित लगती है तो मैं उसपर अमल करता हूँ लेकिन उनका भक्त बने बिना?

भीमताल ओशो कैम्प में ओशो का फ़ोटो दर्शाया गया है।



ओशो संदेश। क्या गजब लिखा है, वाह।

भीमताल के ओशो कैम्प के प्रवचन हॉल में मुझे सिर्फ़ दो प्रवचन में बैठने का मौका मिला जिससे काफ़ी कुछ सीखने को मिला। यह मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मेरी दिलचस्पी ओशो के प्रवचन में कम तथा वहाँ के ताल घूमने में ज्यादा थी। वैसे यहाँ का कैम्प इतनी प्यारी जगह बना हुआ है कि अगर कोई कैम्प में शामिल भी ना होना चाहे तो भी उसको वहाँ दो-चार दिन बिताने में कोई परेशानी नहीं है। ओशो कैम्प में एक बात अजीब लगी कि वहाँ पर परायी औरतों को माँ कहकर बुलाया/पुकारा जाता है। वैसे उस समय मैंने यह ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब सोचता हूँ कि अपनी घरवाली को क्या कहकर पुकारा जाता होगा? किसी को मालूम हो तो बताने का कष्ट करे। मैं दिन में तो वहाँ ठहरता ही ना था, लेकिन अपने दोनों सहयात्री तो सिर्फ़ ओशो के नाम से ही आये थे। उन्होंने वहाँ के प्रवचन के बारे में जमकर लाभ/आनन्द उठाया था। वहाँ पर मेरे दूसरे प्रवचन के दौरान संचालक/स्वामी ने एक बार कहा कि अब सबको खुलकर रोना है, तो सचमुच वहाँ पर सभी लोग (जाट देवता को छोडकर) खुल कर रोने लगे थे। मैं उन्हें रोता देख हैरान हो रहा था कि आखिर यहाँ ऐसा क्या कमाल है? लेकिन थोडी देर बाद अगले प्रवचन में बारी आयी हसँने की तो सभी खुलकर हसँने लगे थे यहाँ सबको हसँता देख मैं भी उनमें मुस्कुराता हुआ शामिल हो गया था। लेकिन अगले प्रवचन में जब बारी आयी अपने मन की भडास निकालने की तो उस समय माहौल कुछ तनावपूर्ण सा लगने लगा था। लगभग सभी ने वहाँ पर अपनी भडास जरुर निकाली होगी। थोडी देर बाद सबको बिल्कुल शांत लेटना था, तो वहाँ पर ऐसी शांति छा गयी थी कि बाहर के वन के पक्षियों की आवाज एकदम साफ़ सुनायी दे रही थी। कोई खुसर-फ़ुसर तक नहीं होती थी। वहाँ के स्वामी ने बताया भी था कि अगर किसी के पास गाऊन(सफ़ेद+महरुम) नहीं है तो उनके पास बिक्री के लिये उपलब्ध है जिसे इच्छा हो, वो ले सकता है। दो-तीन ने तो लिया भी था। वहाँ पर दिल्ली पुलिस के एक डी.सी.पी भी अपने परिवार सहित प्रवचनों में भागीदारी कर रहे थे। दो-तीन छात्र भी थे। एक बन्दा जो कि उडीसा से आया हुआ था उससे बातचीत में पता लगा कि वो वहाँ पर तीन दिनों के लिये आया था और जब हम वहाँ पहुँचे तो उसे उस दिन पूरे 35 दिन हो गये थे। बताते है कि फ़िल्मों के हीरो विनोद खन्ना अपनी भरी जवानी में सब कुछ छोडकर ओशो के चेले बन गये थे। आखिर ओशो में ऐसा क्या है जो करोडो लोग उनके भक्त बन चुके है।

ओशो का निराला संदेश।

भीमताल के ओशो कैम्प में वहाँ के स्वामी/आचार्य प्रवचन देते हुए।

पुस्तक ‘सम्भोग से समाधी की ओर’ में ओशो ने इस पक्ष की व्याख्या कुछ इस तरह की है।

“भोजन तो जुटाया जा सकेगा क्योंकि अभी भोजन के बहुत से श्रोत हैं और आगे भी रहेगें लेकिन आदमी की भीड बढने के साथ क्या आदमी की आत्मा खो तो नहीं जायेगी? पहली बात ध्यान मे रखें कि जीवन एक अवकाश चाहता है। जंगल में जानवर मुक्त है, मीलों के दायरे में घूमता है, अगर पचास बन्दरों को एक कमरे में बन्द कर दें तो उनका पागल होना शुरु हो जायेगा। प्रत्येक बन्दर को एक लिविग स्पेस चाहिये, खुली जगह चाहिये, जहाँ वह जी सके। बढती हुई भीड एक-एक व्यक्ति पर चारों तरफ़ से अनजाना दबाब डाल रही है, भले ही हम उन दबाबों को देख न पायें। अगर यह भीड बढती चली जाती है तो मनुष्य के विक्षिप्त (neurotic) हो जाने का डर है।”

हाँ, अलबत्ता, परिवार नियोजन का मामला धार्मिक अवश्य बन गया है। किसी एक पक्ष पर दोषारोपण करने से काम नहीं चलेगा। अलग-अलग पक्ष हैं और अलग-अलग तर्क-वितर्क हैं।

1-एक पक्ष कहता है कि परिवार नियोजन द्धारा अपने बच्चों की सँख्या कम करना धर्म के खिलाफ़ है क्योंकि बच्चे तो ऊपर वाले की देन हैं और खिलाने वाला भी ऊपर वाला है। देने वाला वह, करने वाला वह, कराने वाला वह, फ़िर हम क्यों उसके कार्य में रोक डालें?

2-दूसरा पक्ष यह कहता है कि परिवार नियोजन जैसा अभी चल रहा है उसमें हम देखते हैं कि हिन्दू ही उसका प्रयोग कर रहे हैं, और बाकी धर्म के लोग ईसाई, मुस्लिम इसका उपयोग कम ही कर रहे हैं तो हो सकता है कि आने वाले कल में इनकी सँख्या इतनी बढ जाये कि दूसरा पाकिस्तान माँग लें या पाकिस्तान या चीन जिनकी जनसँख्या अधिक है, वे ताकतवर हो जायें और हम पर हमला करने की चेष्टा करे।

भीमताल के ओशो कैम्प में ओशो भक्त प्रवचन ग्रहण करते हुए।

धार्मिक पक्ष के पहले खंड को देखते हैं।

1- सब धर्मों के धर्म गुरूओं ने सब बातें ईश्वर पर थोप दीं हैं कि यह सब उसकी मर्जी है और ईश्वर कभी यह जानने नहीं आता कि उसकी मर्जी क्या है। ईश्वर की इच्छा पर हम अपनी इच्छा थोपते हैं। यह तो इन्सान की बुद्धिमता पर निर्भर है कि वह सुख से रहे या दुख से रहे। जब एक बाप अपने 2-3 बच्चों के बाद भी बच्चे पैदा कर रहा है तो वह उन्हें ऐसी दुनिया मे धक्का दे रहा है जहाँ वह सिर्फ़ गरीबी ही बांट सकेगा। आज हमको यह सोचना ही होगा कि जो हम कर रहे हैं, उससे हर आदमी को जीवन की सुविधा कभी नहीं मिल सकती। हमारे धर्म गुरु समझाते हैं कि यह ईश्वर का विरोध है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाये कि ईश्वर चाहता है कि लोग दीन और फ़टेहाल रहें। लेकिन अगर यही ईश्वर की चाह है तो ऐसे ईश्वर को भी इंकार करना पडेगा। एक बात और अगर ऊपर वाला बच्चे पैदा कर रहा है तो बच्चों को रोकने की कल्पना कौन पैदा कर रहा है? अगर एक चिकित्सक के भीतर से ईश्वर बच्चे की जान को बचा रहा है तो चिकित्सक के भीतर से उन बच्चों को आने से रोक भी रहा है। अगर सभी कुछ उस ऊपर वाला का है तो यह परिवार नियोजन का ख्याल भी उस ऊपर वाला का ही है। परिवार नियोजन का सीधा सा अर्थ है कि पृथ्वी कितने लोगों को सुख दे सकती है। उससे ज्यादा लोगों को पृथ्वी पर खडे करना, अपने हाथों से नरक बनाना है। दूसरी बात कि ईश्वर कोई स्पाईवेयर नहीं है जो इन्सान की रतिक्रियाओं पर नजर रखे कि वह किसी साधनों का प्रयोग तो नही कर रहा।

प्रवचन हॉल में उडीसा से आये वह भक्त जो वहाँ पर एक महीने से ठहरे हुए थे।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जो समाज जितना समृद्ध उसकी जनसँख्या उतनी ही कम है। अपने देश, मुस्लिम देशों और पश्चिम देशों मे यह अन्तर साफ़ दिख सकता है। बढती हुई जनसँख्या में सबसे बुरी मार बेचारे गरीब आदमी की हुई, वह इसलिये गरीब नहीं है क्योंकि उसकी आय के साधन कम है, बल्कि इसलिये कि उसकी बुद्धि को भ्रष्ट करने मे उसके तथाकथित धर्मगुरुओं का साथ मिला। एक समृद्ध मानव अपने सेक्स की उर्जा को दूसरे कामों मे लगा देता है- मसलन संगीत, साहित्य, खेल, लेखन आदि। लेकिन एक गरीब के पास सेक्स ही उसके मनोरजंन का साधन मात्र रह जाता है। भारत में अगर अधिक बच्चों का अनुपात देखें तो इस वर्ग मे अधिक मिलता है, और फ़िर वह हिन्दू हो या मुस्लिम, इससे फ़र्क नही पडता। मुस्लिमों में अधिक इसलिये भी है वह अपनी बुद्धि पर कम और अपने धर्मगुरुओं की बुद्धि पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। हिन्दू समाज में वक्त के साथ उनके धर्मगुरुओं का प्रभाव कम होता गया जिसकी वजह से इन लोगों की पकड अब इतनी मजबूत नहीं दिखती।

भीमताल कैम्प में प्रवचन केन्द्र का एकांत में लिया गया चित्र है।

2-जब हम दूसरे पक्ष के बारे में बात करें कि क्या परिवार नियोजन को किसी की स्वेच्छा पर छोडा जाना उचित है? यह तो ऐसा ही सवाल है जैसे कि हम हत्या को या डाके को स्वेच्छा पर छोड दें कि जिसे करनी हो करे। अत: परिवार नियोजन को अनिवार्य कर देना ही उचित है और जब हम इस जीवंत सवाल को अनिवार्य कर देगें तो यह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई का सवाल नहीं रह जायेगा। आज के हालातों पर जरा नजर दौडायें तो इन सबके धर्मगुरु समझा रहे हैं कि तुम कम हो जाओगे या फ़लाने ज्यादा हो जायेगें और हकीकत यह है कि ये सब जो सोच रहे हैं, इनके सोचने की वजह से भी अनिवार्य परिवार नियोजन का विचार समाप्त हो रहा है। एक और सवाल कि ऐसा हो सकता है कि अगर मुस्लिमों की आबादी इतनी बढ जाये कि वह दूसरे पाकिस्तान की माँग करने लगें। आज के वैज्ञानिक युग में जनसंख्या का कम होना, शक्ति का कम होना नहीं है। बल्कि जिन मुल्कों की जनसंख्या जितनी अधिक है वह टैकनोलोजी दृष्टिकोण से उतने ही कमजोर है। क्योंकि इतनी बडी जनसंख्या के पालन पोषण मे इनकी अतिरिक्त सम्पति बचने वाली नही है। वह जमाना गया ,जब आदमी ताकतवर था, अब युग दिमाग और मशीन का है और मशीन उसी देश के पास हो सकेगी, जिस देश के पास संपन्नता होगी और संपन्नता उसी देश के अधिक पास होगी जिस देश के पास प्राकृतिक साधन ज्यादा और जनसँख्या कम होगी। दूसरी बात यह बात समझने जैसी है कि सँख्या कम होने से उतना बडा दुर्भाग्य नहीं टूटेगा, जितना बडा दुर्भाग्य सँख्या के बढ जाने से बिना किसी हमले के टूट जायेगा। आज के दौर में युद्ध इतना बडा खतरा नहीं है जितना कि जनसँख्या विस्फ़ोट का है।

यहाँ पर भोजन के लिये आना पडता था।

आज हर धर्मावलंबी को यह निर्णय लेना है कि सवाल उनकी गिनती का है या देश का और अगर गिनती का है तो मुल्क का मर जाना निश्चित है और अगर यह साहसिक निर्णय देश का है तो किसी को तो लेना ही है। जो समाज इस निर्णय को लेगा, वह संपन्न हो जायेगा। मुसलमानों में उनके बच्चे ज्यादा स्वस्थ, अधिक शिक्षित होगें, ज्यादा अच्छी तरह जीवन निर्वाह करेगें। वे दूसरे समाजों और खासकर अपने ही समाज मे जिनकी संख्या कीडे-मकोडों की तरह है, उनको छोडकर आगे बढ जायेगें और इसका परिणाम यह भी होगा कि दूसरे समाजों और उनके ही समुदायों मे भी स्पर्धा पैदा होगी इस ख्याल से कि वे गलती कर रहे हैं।
यह सब तब ही संभव है जब हमारी सरकारें वोट-बैंक की राजनीति से परे हट कर परिवार नियोजन को स्वेच्छित नहीं, बल्कि अनिवार्य बनायेंगी ।

शाम के समय सभी भीमताल का ऊँचाई से अवलोकन करते हुए।

(इस लेख की मूल भावना ओशो रजनीश की पुस्तक ”सम्भोग से समाधी तक” से ली गई है। विवादों मे घिरी ऐसी पुस्तक जिसको आम लोगों ने हेय दृष्टि से ही देखा, लेकिन पढकर परखा नहीं , ज़ीवन के फ़लसफ़े को एक नया आयाम देती हुई यह पुस्तक, अगर न पढी हो तो पढें अवश्य।) इसके अलावा एक सन्देश मुझे ज्यादा पसंद आया था लेकिन उसे मैं यहाँ नहीं लगा रहा हूँ उसके लिए आप मेरे ब्लॉग पर जाकर देख व् पढ़ सकते है,

ओशो के बारे में बस इतना ही, अब ऒशो को पीछे छोड कर अब हम अगली पोस्ट में भीमताल के विस्तृत दर्शन करेंगे।

आज मेरे लिए बहुत ही खास दिन है देखे कौन-कौन बताता है?

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

14 Responses to “OSHO CAMP BHEEMTAL भीमताल का ओशो आश्रम”


  1. आचार्य रजनीश के जो सिद्धांत और उपदेश थे, यदि हम उन पर अमल करे तो जीवन मैं बहुत शान्ति और सकून पा सकते हैं. अच्छी पोस्ट हैं, कारवाँ यूं ही चलता रहे, धन्यवाद.

  2. Mukesh Bhalse says:

    संदीप भाई,
    बहुत अच्छी पोस्ट लगी, ओशो के उपदेशों को पहले तो कभी पढ़ा नहीं था, लेकिन आज आपकी पोस्ट के माध्यम से उन्हें समझने की कोशिश की है. इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.

  3. Neeraj Jat says:

    ओशो जीने का तरीका सिखा गया। ‘सम्भोग से समाधि की ओर’ जिसने ना पढी हो और किताब के विरोधी हों, उनसे कृपया विनती है कि इस किताब में सेक्स के बारे में इतना ही लिखा है कि सेक्स आदमी का दुश्मन है, इसे छोडो। इसे छोडने के तरीके भी इस किताब में बताये गये हैं। मैंने यह किताब पढी है, तभी कह रहा हूं।
    एक किताब और है जो मैंने पढी है- मैं मृत्यु सिखाता हूं। जबरदस्त किताब है यह भी। इन दो किताबों को पढने के अलावा मेरा ओशो से कोई सम्बन्ध नहीं है। ना मैं किसी कैम्प में जाता हूं, ना ही मैंने आज तक ध्यान वगैरह किया है।

  4. Ritesh Gupta says:

    संदीप भाई…
    आपका लेख थोड़ा यात्रा लेख से हटकर हैं ….पर बहुत बढ़िया लगा आपका लेख…| लेख में ओशो के बारे में और उनके उपदेश को काफी अच्छे से समावेश किया ….ओशो के बारे में काफी कुछ जानने को मिला आपके लेख से …|
    ओशो का प्रधान आश्रम पुणे में जहाँ हमेशा हजारों की संख्या देशी-विदेशी लोगो इस आश्रम में ओशो का ज्ञान लेने और अपनी आत्मशांति के लिए आते हैं….|

    ओशो के बारे और भी अधिक जानने के मैंने एक साईट खोली और काफी कुछ जानने को मिला ….उस लेख के कुछ अंश इस प्रकार हैं :→
    ओशो रजनीश (११ दिसम्बर, १९३१ – १९ जनवरी १९९०) का जन्म भारत के मध्य प्रदेश के जबलपुर में हुआ था। वे रजनीश चन्द्र मोहन से आचार्य रजनीश के नाम से ओशो रजनीश नाम से जाने गये। दुनिया को एकदम नए विचारों से हिला देने वाले , बौद्धिक्जागत में तहलका मचा देने वाले भारतीय गुरु ओशो से पश्चिम की जानता इस कदर प्रभावित हुई कि भय से अमेरिकी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था |

    ओशो ने सैकडों पुस्तकें लिखीं, हजारों प्रवचन दिये। उनके प्रवचन पुस्तकों, आडियो कैसेट तथा विडियो कैसेट के रूप में उपलब्ध हैं। अपने क्रान्तिकारी विचारों से उन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। अत्यधिक कुशल वक्ता होते हुए इनके प्रवचनों की करीब ६०० पुस्तकें हैं। लेकिन संभोग से समाधि की ओर इनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद पुस्तक है। इस किताब को आज भी लोग पढ़ते हैं तो उनको सलाह दी जाती है कि पढो पर ऐसा मत करना ! दरअसल , यही ओशो के विचारों का डर है जो तब भी समाज में था और आज भी है ! काजल की कोठरी में रहते हुए काजल लग जाने का डर और ओशो मानव को उसी काजल की कोठरी से अंतर्मन को जगाने की बात करते हैं |

    और अधिक पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाये :
    http://www.janokti.com/%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%A1-download-links/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%93%E0%A4%B6%E0%A5%8B-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%82-download-osho/

  5. Monty says:

    जाटराम बहुत बढ़िया बात बताई आपने ..की परिवार बढ़ता है तो अपने मुस्लिम भाई कहते है की “सब अल्लाह की देन है”

    तो फिर ये परिवार नियोजन भी तो अल्लाह की देन है

    सब कुछ भगवान की देन है तो ये परिवार नियोजन भी तो भगवान की ही देन है…

    में जबर्दस्त तरीके से आपका समर्थन करता हू …बिलकुल सहमत हू आपसे..और आपकी कही हुई बात में कोई संशोधन भी नहीं चाहता…

    उम्मीद है की घुमक्कड परिवार की लोग भी मेरी तरह आपका समर्थन करेंगे.

    धन्यवाद

  6. Nandan Jha says:

    Dear Sandeep – I am at Bhimtal (and because of rains last night, the weather is brilliant) and Google Transliterate is not working on my datacard. Proabably I need to download Varah or a relevant software to comment in Hindi, so apologies.

    I have put this in the series. For some reason, this option is not visible to Authors.

    Regarding this log, thank you for sharing the thoughts of Osho Rajnish. I have no idea of his philosophy beyond the popular beliefs around living freely and that Vinod Khanna left his career on his pinnacle , so many thanks. If not for this log, I do not think I would have known this. At this point of time, I also have no inclination beyond academic interest to know more about Osho.

    I am eagerly waiting for the Ghumakkadi places in your next post. Take care.

    • Nandan – You should download Google IME ( http://www.google.com/ime/transliteration/) if you are on Windows. This is best I have used so far for Hindi Transliteration, internet is not required.

    • Monty says:

      नंदन जी मेरा भी रिश्तेदारों के साथ नैनीताल, भीमताल आदि घूमने का प्रोग्राम बन रहा है असमंजस में है की इस सीजन में नैनीताल जाएँ या फिर से हिमांचल में कहीं जाएँ …नैनीताल में इसलिए असमंजस में है की कहीं वह भी इतनी गन्दी गर्मी मिली तो मेरा साढू, साली और बीवी मुझे गाली देंगे….

      बस ये बताने की कृपा करे वहाँ ठंडक मिलेगी भी या नहीं ?

      और वहाँ का औसत टेम्प्रेचर क्या होता है ?

      और अगर हो सके तो अपना मोबाइल न. बताने की कृपा करें ….वो भी अभी..इसी वक्त बताएं… ताकि आपके नैनीताल में होते रहते हुए ही आपसे संपर्क किया जा सके.

      पता तो चले की आखिर वहाँ ठंडक है भी या नहीं वर्ना निकलते है अपने हिमांचल में..वहाँ तो ठंडक मिलेगी ही मिलेगी.

      • Nandan says:

        मोंटी जी, मैं नौकुचिया ताल में हूँ | कल रात मैं सात-ताल में था | मौसम का ऐसा की अगर बारिश होती है तो सुहाना हो जाता है (ठंडक नहीं पर गर्मी बिलकुल नहीं) पर अगर बारिश नहीं होती है (इस साल बारिश बहुत देर से हुई इस क्षेत्र में, पहली अच्छी बारिश २२ के रात को हुई थी उसके बाद बूंदा बांदी हुई बस) तो दिन में गर्मी है और शाम को ठीक ठाक | मैं दिन में आज नैनीताल गया था तो ठंडक बिलकुल नहीं थी | तो मिला जुला के यूँ है की अगर हिमाचल में कहीं ऊपर जाने की व्यस्था हो सकती है तो (शिमला से ऊपर) गुड है नहीं तो कम से कम एक सप्ताह के बाद आयें तो निश्चित तौर पर बारिश होगी और मौसम बढ़िया रहेगा |

  7. परिवार नियोजन हमारी सरकार को compulsory करना चाहिए. इससे कुछ तो समस्याए ठीक हो सकती है . ओशो के विचार मैंने कभी नहीं देखे या पढ़े , अभी कुछ आपके द्वारा मालूम हुई. इसके लिए धन्यवाद. ५०० रू में रहना और खाना बहुत बढ़िया है . क्या यह केवल केम्प में ही ऐसी व्यवस्था होती है कि हम कभी भी वहा जाकर रह सकते है ???

    संदीपजी आपकी मेरेज एनिवेर्सरी के लिए बहुत बहुत बधाई. आपका दिन सुखद रहे .

    • JATDEVTA says:

      विशाल भाई आप या कोई भी जब चाहे यहाँ जाकर रह सकता है यहाँ रहने से यह जरूरी नहीं कि उसे ओशो की कक्षा में शामिल होना ही पडेगा, यहाँ वर्ष भर कभी भी जाया जा सकता है जबकि इनकी मीटिंग कभी कभार ही होती है
      आइये शाम की दावत में आप भी शामिल होने का यत्न कीजिए,

  8. ashok sharma says:

    a completely different travelogue.glimpses of the philosophy of Acharya Rajneesh is quite unexpected but most welcome.good post.keep it up.

  9. हे परम प्रतापी जाट देवता,

    आपने आज हमारे दिव्य चक्षु खोल दिये, उसके लिये आपका आभार ! आपने जिस कार्यक्रम की ओर इंगित किया है जिसमें रोना – हंसना, चीखना – चिल्लाना शामिल है, उसे सक्रिय ध्यान Active Meditation कहते हैं जिसमें मैने भी बहुत बार भाग लिया है। वास्तव में समाज सभ्यता के नाम पर हमारे जोर – जोर से हंसने पर, रोने पर, चीखने चिल्लाने पर पाबन्दी लगाता है, इसे बुरा मानता है। आप जोर से हंसे तो फूहड़ कहलायेंगे; अगर रोयें तो कहा जायेगा, “मर्द होकर भी रोता है?” चीखें, चिल्लायेंगे तो तो आप निश्चय ही असभ्य की श्रेणी में रख दिये जायेंगे। अपने मन की भावनाओं को अन्दर ही अन्दर समेटे रखना और उनको अभिव्यक्त न करना हमें बहुत stress यानि तनाव देता है और तनाव दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी है क्योंकि यह बीमारियों की मां है। अगर आपको कभी ऐसा अवसर मिले कि आप खुल कर रो सकें, हंस सकें, झूम सकें – गा सकें, चीख सकें – चिल्ला सकें तो आपके अन्दर जमा सारा तनाव बह – बह कर बाहर निकल आयेगा और आप पूरी तरह से प्रफुल्लित और बिल्कुल हल्के महसूस करेंगे। इतना अवश्य है कि जो भी सक्रिय ध्यान में भाग लेते हैं, उन सब की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है ताकि हम दूसरों को न देखें कि वह क्या कर रहे हैं, कैसे लग रहे हैं। हमें यह लगना चाहिये कि हम अकेले ही हैं क्योंकि हमें कोई भी देख नहीं रहा है। इससे हमारी inhibitions जो हमें संकोच में भर देती हैं, समाप्त हो जाती हैं। यह सक्रिय ध्यान अनेकानेक संस्थायें कराने लगी हैं । हमारे सहारनपुर में ही मैने इसका प्रयोग किया जाता हुआ देखा है। बहुत उपयोगी और विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है जिसका आविष्कारक कौन है, मुझे नहीं मालूम !

    आपकी पोस्ट पढ़ कर मेरे मन में नैनीताल आज तक न देख पाने का क्षोभ पुनः जाग उठा है। देखें, कब जाना होगा । टाटा, बाय बाय, विदा !

    सुशान्त



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