BHIMTAL/Bheemtal चले भीमताल की ओर |
Table of contents for Kumaon Taal Yatra
- BHIMTAL/Bheemtal चले भीमताल की ओर
- OSHO CAMP BHEEMTAL भीमताल का ओशो आश्रम
अब तक सुनते आये थे कि तालों में ताल नैनीताल, भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल जैसी कई ताल है जो कि नैनीताल के आसपास फ़ैली हुई है। इन सब तालों को देखने की इच्छा कई सालों से मन में हिलोरे मार रही थी। वैसे तो मैं भारत में बहुत सी जगह घुमक्कडी कर चुका हूँ लेकिन अभी तक मेरा चक्कर उतराखण्ड के कुमायूँ क्षेत्र में नहीं हुआ था। बनारस से आते ही सोच लिया था कि जैसे भी हो अबकी बार तो नैनीताल का एक चक्कर जरुर लगाना ही है। अपने एक ब्लॉगर बंधु जो अन्तर सोहिल के नाम से लिखते है। एक बार मैंने उन्हें नैनीताल के घूमने की इच्छा बतायी तो उन्होंने कहा कि अगर आप भीमताल आदि देखना चाहते हो तो मैं भी साथ चलूँगा। अन्तर सोहिल जी जो कि ओशो के आश्रम में जाकर वहाँ पर उनकी शिक्षा का आनन्द उठाते रहते है। उन्होंने बताया कि भीमताल में एक ओशो आश्रम है जिसमें जुलाई की दिनांक 15.06.2011 से तीन दिन का कैम्प लगने जा रहा है। मैंने सोचा कि अच्छा मौका है दो जानकारी एक साथ देखने को मिलेगी। पहली प्राथमिकता तो वहाँ घूमने की ही थी, दूसरी ओशो के आश्रम के बारे में जानने का मौका था कि आखिर ओशो आश्रम में क्या होता है लगे हाथ यह भी समझने का मौका मिलेगा। पहले तो हम दोनों का ही जाने का कार्यक्रम बना हुआ था। जिस कारण मैं तो अपनी नीली परी पर जाने की खुशी में तैयार ही था। लेकिन जिस दिन हमें जाना था उससे एक दिन पहले अन्तर सोहिल जी का फ़ोन आया, उन्होंने कहा जाटदेवता जी एक दोस्त और साथ हो लिया है अब बाइक पर कैसे जायेंगे। बाइक एक जाने वाले तीन, मामला वाकई परेशानी करने वाला था। आखिरकार इसका समाधान निकला कि बाइक से ना जाकर बस से जाया जाये। तब तय हुआ कि रात के ठीक 9 बजे आनन्द विहार बस अडडे पर मिलते है वहाँ से रात की बस में बैठकर भीमताल चला जाये।
अपुन तो हमेशा से समय के पाबन्द है ही, लेकिन अन्तर सोहिल जी भी मुझसे ज्यादा समय के पाबन्द निकले और तय समय पर हम तीनों आनन्द विहार के बस अडडे पर हाजिर हो गये थे। वहाँ पहुँचने के बाद पता किया तो मालूम हुआ कि रात को 11 बजे रोडवेज की वातानुकूलित बस है जो हमें काठगोदाम तक ले जायेगी। साधारण बसे तो हर आधे घन्टे बाद जा रही थी। तीसरे साथी जो हमारे साथ जा रहे थे वह तो पहले से ही ओशो वाली वेशभूषा में आये थे। मैंने उन्हे देखकर पूछा कि यह महाराज जी कौन पकड लिये? तो अन्तर सोहिल ने कहा कि यह पहुँचे हुए महाराज है। अब मैं ठहरा कुछ अलग किस्म का प्राणी, यह महाराज कोई सी भी किस्म के हो इससे अपने को क्या फ़र्क पडने वाला था? हम अभी वहाँ टिकट की लाईन में खडे हुए ही थे कि तभी वहाँ पर निजी बस वालों के दलाल चक्कर लगाने लगे। दलाल आवाज लगा रहे थे कि “हल्द्धानी नैनीताल-नैनीताल मात्र 450 रु“। अपने पहुँचे हुए महाराज तो उस दलाल के साथ ही हो लिये कि चल भाई अपनी बस दिखा अगर ठीक हुई तो उसमें ही चलेंगें। बस वाला हमें आनन्द विहार बस अडडे से बाहर ले गया। वहाँ सडक पार करने पर निजी बस वालों की बस खडी हुई थी।
जैसे ही हम बस में घुसे तो लगा जैसे स्वर्ग में आ गये हो। गलत मत समझना वहाँ छोरी-छारी नहीं थी बल्कि बस में A.C. चल रहा था जिससे वहाँ का तापमान 20 डिग्री के आसपास ही होगा। बाहर उस समय बहुत ही गर्मी चल रही थी। अपने पहुँचे हुए महाराज तो बस में डेरा जमा कर ही बैठ गये थे। बस वाले से बस के चलने के समय के बारे में पता किया उसने बताया कि बस ठीक साढे 10 बजे चल देगी। लेकिन जब 11 बजे तक भी बस नहीं चली तो अपना दिमाग गर्म होने लगा। थोडा सा शुक्र यह था कि बस में हमारे आने से पहले ही A.C. चल रहा था। आखिरकार वहाँ बैठी हुई अन्य सवारियों का धैर्य भी जवाब देने लगा और उन्होंने बस वाले के साथ लडना शुरु कर दिया। इस लडाई में हमें भी कूदना ही था। परेशान तो हम तीनों भी हो गये थे। बस वाले से सबने अपने-अपने रु वापिस माँगने शुरु कर दिये। बस वाले को लगा कि अब शायद रु वापिस देने ही पडॆंगे तो उसने कहा कि ठीक 11:30 पर बस चल पडेगी। वैसे बस फ़िर भी चली 12 बजे के आसपास, लेकिन हमारी परेशानी यहाँ ही समाप्त नहीं हुई, यहाँ से बस ले जाकर पैट्रोल पम्प पर खडी कर दी, बस अभी पूरी तरह फ़ुल नहीं हुई थी। निजी बस वाले कई जगह के एजेंटो से सम्पर्क में रहते है, बस फ़ुल करके ही लेकर चलते है। उसने पेट्रोल पम्प पर भी 15-20 मिनट बर्बाद कर ही दिये।
किसी तरह वहाँ से चले तो, वहाँ की अन्य सडकों से होता हुआ बस वाला फ़िर से उसी जगह ले आया जहाँ से बस शुरुआत में चली थी। लेकिन यहाँ आते ही बस वाले ने सवारियों के बोलने से पहले ही कह दिया कि कोई नाराज ना होना अभी 7 सीट खाली है यहाँ से चार सवारी और लेनी है बस चारों सवारियों के बैठते ही बस चल पडेगी। यह भी ऊपर वाले का शुक्र रहा कि चारों सवारी पहले से ही मौजूद थी। मुल्लाओं में एक कहावत है कि जाट को मरा हुआ तब मानना चाहिए जब उसकी तेरहवीं हो जाये। ठीक उसी तरह हम भी ये मान कर बैठे थे कि जब तक बस हिण्डन पर बने पुल को पार नहीं कर लेती है तब तक हम भी नहीं मान रहे थे कि बस चल पडी है। जब बस ने सचमुच में हिण्डन नदी पार कर ली तो जान में जान आयी कि चलो अब तो चल ही दिये है। बस फ़ुल वातानुकूलित थी, साथ में सभी सीटे भी पीछे तक फ़ैलने वाली थी, जिस कारण रात में सोते हुए चले गये थे। यह मत कहना कि बढिया नींद आयी होगी, किसी तरह कमर तो सीधी सी हो गयी थी, पैर को तो उसी मुडी-तुडी हालत में ही रात भर रहना पडा था। सुबह अपनी आदत अनुसार 5 बजे आँख खुल गयी थी, बाहर देखा तो मालूम हुआ कि अभी तो मुरादाबाद भी नहीं आया है।
किसी तरह 6 बजे मुरादाबाद में प्रवेश हुआ। यहाँ से आगे बस चलती रही और रुद्रपुर जाने पर बस से सवारियाँ उतरनी शुरु हो गयी थी। यहाँ 4-5 सवारी उतर जाने के बाद बस फ़िर अपनी मंजिल की ओर चल पडी थी। ठीक साढे आठ बजे हमारी बस काठगोदाम पहुँच गयी थी। बस तो नैनीताल जा रही थी लेकिन हमें भीमताल जाना था। इसलिये हम तीनों भी काठगोदाम के स्टेशन के सामने ही बस से उतर गये। हमें बस से उतरे 3-4 मिनट ही हुए थे कि एक आल्टो कार वाले ने भीमताल-भीमताल की आवाज लगायी। अन्तर सोहिल ने उस कार वाले से बात की तो उसने काठगोदाम से भीमताल तक 22 किमी जाने के प्रति सवारी 50 रु किराया बताया। चूँकि मैं इस जगह से आगे पहली बार जा रहा था अत: मैं आगे सीट पर बैठना चाहता था लेकिन आगे वाली सीट पर तो पहुँचे हुए महाराज डेरा जमा चुके थे। कार पहाडों के नागिन जैसे टेढे-मेढे बलखाते मार्गों पर मस्त चाल से चली जा रही थी। कि एक मोड पर हमें भुट्टा भूनने वाला नजर आया। उसे देखते ही कार रुकवायी। यहाँ से एक-एक भुट्टा खाने के बाद आगे बढे।
लगभग 9:30 बजे सडक के किनारे एक बडी सी झील नजर आयी। पहले तो सोचा कि हो सकता है बिजली बनाने के लिये नदी का पानी रोककर बाँध बनाया हुआ होगा, जैसे कि उतरकाशी से गंगौत्री जाते समय मनेरी में आता है। जब कार चालक से पूछा तो उसने कहा कि यह भीमताल है। भीमताल सुनते ही मैंने अपनी खोपडी कार से बाहर निकाल ली थी ताकि इस भीमताल का जी भर कर अवलोकन कर सकूँ। भीमताल की आबादी शुरु होते ही भीमताल के किनारे पुलिस थाना आता है उसके पास ही कार वाले ने हमें उतार दिया था। उसने बताया कि उल्टे हाथ की ओर पहाड पर चढ जाना। आप लोग सीधे ओशो आश्रम पहुँच जाओगे। हमें सामने ही एक पगडंडी नजर आयी जिस पर चढते गये, लेकिन कुछ दूर जाने पर मार्ग ही नजर नहीं आया तो हम वापिस सडक पर लौट आये। सडक पर आने के बाद एक बन्दे से ओशो आश्रम के बारे में पता किया तो उसने कहा कि मैं वही जा रहा हूँ लेकिन मैं बाइक पर हूँ आप पैदल हो, मुझसे पहले पहुँच जाओगे। उसने थोडा सा आगे चलकर एक पगडंडी दिखायी जो सीधी घने जंगलों के बीच से होते हुए ओशो आश्रम तक जा रही थी। जैसे ही ओशो आश्रम पहुँचे तो देखा कि वहाँ तो पहले से ही महरुम रंग के बडे-बडॆ गाऊन पहने हुए लोग मौजूद है। ये गाऊन मैंने पहली बार देखे थे, यह मुझे औरतों द्धारा घर में पहनी जाने वाली मैक्सी जैसे लग रहे थे। आश्रम में हमारा स्वागत वहाँ के स्वामी (ओशो आश्रम के संचालक को स्वामी कहकर पुकारा जाता है) ने स्वयं किया था।
भीमताल के ओशो कैम्प में जाने के बाद हम तीनों में अन्तर सोहिल ने अपनी पहचान दिखा कर वहाँ के अभिलेख में अपना नाम-पता प्रविष्ट कराया। उनके द्धारा वहाँ की तय फ़ीस जमा की जो हम तीनों की 4500 रु तीन दिनों के लिये थी। दोपहर में हम पहुँचे ही थे। कुछ समय इधर-उधर घूमने में बिताया गया उसके बाद शाम को वहीं ओशो आश्रम में प्रवचन कक्षा में हमने भी भाग लिया था। वैसे मैं सुबह-शाम की कक्षा में भाग लेने की सोच रहा था लेकिन वहाँ के स्वामी जी ने पहली सभा में ही फ़रमान सुना दिया कि सही कपडों (वेश भूषा) के बिना किसी को कक्षा में हिस्सा नहीं लेने दिया जायेगा। यह बात अपने को खटक गयी जिससे मैंने सिर्फ़ दो कक्षा के बाद सुबह-शाम कमरे में लेटकर आराम किया था। तीन दिनों के कैम्प में 15-16 बन्दे थे जिसमें से 5-6 औरते भी थी। सभी औरते भी अपने-अपने पति के साथ ओशो कैम्प में भरपूर ज्ञान उठा रही थी। वैसे मैंने यह देखा कि इन कैम्पों में इन्सानों के जीवन में बिताये जाने वाले पलों के बारे में खुल्लम-खुल्ला बताया जाता है। इन प्रवचन का एक ही उद्धेश्य देखा कि कैसे भी हो हर हालात में खुश रहना चाहिए। कभी-कभी तो मेरे जैसे बन्दे शरमा जाते थे। लेकिन जो लोग ऐसे कैम्प के अनुभवी है उन पर कोई फ़र्क नहीं पड रहा था। कैम्प में सुबह सबको चाय, बिस्कुट, नमकीन आदि दिया जाता था दोपहर को खाना ठीक एक बजे दिया जाता था, शाम को खाना ठीक आठ बजे दिया जाता था। मैंने दोपहर का खाना एक बार भी नहीं खाया क्योंकि दोपहर को मैं किसी ना किसी ताल पर भ्रमण करने चला जाता था। पूरे दिन में 2-2 घन्टे की तीन कक्षा होती थी जिसमें प्रवचन के साथ योग आदि का समायोजन रहता था। प्रवचन में रोमांस, उत्तेजना, शिक्षा, जोश, होश जैसी भावना रहती थी।
अगले भाग में आपको ओशो कैम्प दिखाया व प्रवचन दिया जायेगा।




























संदीप जी,
इस बार तो पूरा फिल्मी सफ़र है . पहली पोस्ट पढ़ कर दिल खुश हो गया . रहस्य, रोमांच से भरपूर. Art of living, yoga, Osho यह सब फ्री नहीं हैं . यह टीवी वाले Nirmal बाबा भी चोखे पैसे लेते हैं. हम लोग नाहक पंडे को कोसते हैं जो 500 से ५ रुपये पर राज़ी हो जाते हैं. आप ने ओशो आश्र्म की फीस भरी, और हम सब को भी अंदर की बात मालूम हो जाएगी. आप कोमेंट का जवाब देते नहीं, हम आपकी अगली पोस्ट का इंतज़ार करेंगे . बहुत बहुत धन्यवाद.
घुमक्कडी जिंदाबाद
सुरिन्दर जी,
लगता है कि आप ओशो के बारे में नहीं जानते, तभी तो उनकी तुलना निर्मल बाबा से कर रहे हैं। फ्री होना, पैसे लेना; यह अलग बात है लेकिन ओशो जैसे महात्मा की तुलना ‘मल’ बाबा से करना बिल्कुल दूसरी।
मैं कभी भी किसी ओशो कैम्प में नहीं गया लेकिन ओशो का भक्त हूं। ओशो के बारे में उनके विरोधियों ने जो अफवाहें फैलाई हैं, उन पर मत जाइये। आपसे विनती है कि कृपया ओशो को पढिये, ओशो को जानिये, फिर उनकी तुलना चाहे जिससे करनी हो करिये।
तकरीबन सात साल पहले कोसानी , रानीखेत , देखते हुवे हम आस पास के सब ताल देख चुकें हैं , आप के अगले लेख का इंतज़ार रहेगा| ओशो के बारे मैं ज़यादा नही जानता इस लिए अगले लेख की उत्सुकता और बढ़ गई है|
संदीप जी राम राम, भुट्टे देखकर मुँह में पानी आ गया. आपकी ये पोस्ट पहली बार ब्लागस्पाट पर पढ़ी थी, तब भी बढ़िया लगी थी. दोबारा पढ़ कर फिर से भीम ताल पहुँच गए. सैर कराने के लिए धन्यवाद.
संदीप भाई,
यह प्राइवेट बसवाले हमेशा ऐसा ही करते है . अभी कुछ दिन पहले मैं पूना से मुंबई आ रहा था तो एक बस वाला चिल्ला रहा था ए. सी.वोल्वो, ए.सी.वोल्वो मुंबई केवल २५० रू . मैंने पुछा तो कहा की बस १५ मिनिट में आएगी . तो मैंने पैसे देके बुक कर ली एक सीट.
फिर क्या बस का कोई अता पता ही नहीं था आधे घंटे तक.तन जाके मैंने चिल्लाना शुरू किया दुसरे यात्रियों के साथ. तो फिर एक २० सीटर बस आई और हमें हाइवे पर ले गयी जहा पर बस थी. और बस भी कौनसी वोल्वो नहीं चीन वाली CERITA बस थी जिसका ए.सी. बिलकुल नहीं के बराबर था. मैं तो पूरे रास्ते परेशां हो गया. और अब ट्रावेल बस वालो को गाली खाने की आदत हो गयी है . उनके लिए तो रोज का है. अब तो गाली नहीं खायेंगे तो नींद नहीं आएगी और पेट नही भरेगा उनका , ऐसी हालत हो गयी है.
रही बात पोस्ट की तो लाजवाब थी.काफी अच्छी जगह लग रही है . पेड पौधों से भरपूर प्राक्रतिक सौंदर्य के बीच. विवरण फिर से उच्यतम स्थर पे है. अब आगे चलेंगे उनके केम्प और प्रवचन की ओर .
धन्यवाद.
Jai ho jaat devta ki,
osho ke baare mein jyaada nahi pata, ab pata chalega.
magar mujhe jyaada dilchaspi bhimtaal ke baare mein janne ki hai.
acche chitr dikhaiyega bhimtaal ke
बस वाली बात बहुत ही उपयोगी है | आजकल उत्तराखंड परिवहन वालों की बढ़िया सर्विस है , मैं इस तरफ काफी जाता हूँ निजी वाहन से , पर जितना लोकल साथियों से सुना है उसके आधार पर सरकारी बस ज्यादा विश्वसनीय है |
इस बार गर्मियों और बरसात के न आने से, करीब करीब आधा भीमताल सूख गया है, उम्मीद है अगले एक महीने में वापस वही बहार होगी | नैनीताल के तुलना में यहाँ पयर्टक काफी कम आतें हैं इसलिए थोडा ज्यादा सुकून रहता है | चलें ओशो आश्रम और भीमताल के अन्य आकर्षणों की ओर |
संदीप जी,
यहाँ तक की दास्तान तो बड़ी ही मनोरंजक लगी, अब देखना है आगे क्या क्या होता है ओशो आश्रम में. आशा है पहुंचे हुए महात्मा जी अब तक कहीं न कहीं तो पहुँच ही गए होंगे. कहावत बड़ी फनी लगी की “जाट को मारा हुआ तभी समझना चाहिए जब उसकी तेरहवीं हो जाए”.
कमेन्ट के जवाब नहीं आने से अब आपके प्रशंसकों का मनोबल गिर रहा है, तथा कमेन्ट करने में इंटरेस्ट कम होता जा रहा है. अगले भाग के इंतज़ार में………………………
मुकेश जी,
मैं सन्दीप को अच्छी तरह जानता हूं। सन्दीप उन लोगों में नहीं है जो एक कमेण्ट आते ही धन्यवाद धन्यवाद की बाढ लगा देते हैं। जहां बहुत ही जरूरी हुआ, वे अब वहीं पर उत्तर देते हैं।
@ नीरज,
मैं जानता हूँ, संदीप भाई उन लोगों में से नहीं है जो कमेन्ट आते ही धन्यवाद की बाढ़ लगा देते हैं और आप उन लोगों में से हो जो आवश्यकता नहीं होने पर भी हर कहीं कूद पड़ते हो और अंत में मुंह की खाते हो. किसी के द्वारा उत्साहवर्धन करने पर आभार व्यक्त नहीं करना या धन्यवाद नहीं देना आपके संस्कारों में होगा, लेकिन नैतिकता तो यही पाठ पढ़ाती है की सुसंस्कृत होने के नाते हमें जहाँ आवश्यक हो धन्यवाद देना ही चाहिए, हममें कृतज्ञता के भाव होने ही चाहिए.
@ संदीप भाई – मैं मानता हूँ की आप किसी व्यस्तता की वजह से सारी कमेन्ट के जवाब नहीं दे पा रहे होंगे. वैसे हम सभी जानते हैं की आप एक बहुत ही नेक व्यक्तित्व के मालिक हैं.
मुकेश जी, दो बातों का उदाहरण दूंगा, फिर अपनी बात कहूंगा।
1. मैंने पहले कभी आपको कहा था कि परिवार के बहुत ज्यादा फोटो पोस्ट में अच्छे नहीं लगते, आपने तुरन्त उस बात पर अमल किया और उस पोस्ट से कम से कम दो फोटो हटा दिये। उसके बाद की पोस्ट में भी परिवार के फोटो बहुत सीमित थे और पोस्ट पूरी तरह सन्तुलित थी। यानी आप मुझसे सहमत थे।
2. आज मैंने सन्दीप के बारे में बताया कि वे हर जगह धन्यवाद धन्यवाद नहीं करते। आपने मेरी इस बात पर भी अपनी सहमति दिखाई।
इन दो बातों से निष्कर्ष निकलता है कि आप मेरे सच्चे दोस्तों में से एक हो। क्यों? कि आप मेरे सामने कुछ भी कहते रहते हो लेकिन मुझसे पीछे हमेशा वही काम करते हो, जो मैं चाहता हूं। सच्चा दोस्त वही है जो सामने विरोध करे और पीठ पीछे समर्थन करे। आप ये दोनों काम करते हो, इसलिये सच्चे दोस्तों की श्रेणी में आते हो।
ओशो बाबा हो या कोई और मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ये लोगो की अपनी इच्छाएं है..
बाकि बात रही घुमक्कडी की नजरिये की तो बहुत अचछा लिखा है.
आपसे पूरी तरह सहमत हूं।
कमेन्ट के नाम पर पंगा होने लगा है अत: मैंने निश्चय किया है कि मैं अपनी आने वाली पोस्ट पर यह आप्सन बंद कर दूंगा, यानि कमेन्ट बंद, फिर भी बात ना बनी तो यहाँ लेख लिखना ही बंद कर दूंगा ???????
रही बात दूसरों की पोस्ट की तो अगर किसी की पोस्ट बहुत पसंद आयी तो उस पर अपनी राय लिख दिया करूँगा अन्यथा जय राम जी की
मत जाना संदीप जाट आपके जाते ही घुमकड़ बंद हो जाएगा
सही कह रहे हो गुप्ता जी,
सचमुच भगाना चाहते हो क्या संदीप “जाट ” को ?
प्रोपर “जाट” तो करता ही वो है जो करने के लिए उसे मना किया जाये … :) या चैलेन्ज किया जाये..
हालाँकि आजकल जाटों मैं वो बात रही नहीं, वो काफी कुछ सोच समझ के भी करने लगे हैं…
भाई संदीप मैं कुछ गलत कह रहा हूँ तो correction कर देना, मैं असल मैं हरियाणा के experience के हिसाब से बोल रहा हूँ. …
संदीप भाई, जाट भी कब से पंगो से डरने/भागने लगे ?
अगर किसी की बात समझ मैं आये, मतलब बात की भावना समझ मैं आये तो कमेन्ट कर दिया करो, वैसे ये बात तो आप भी मानोगे की जब तक “हुंकारे” भरने वाला “हुंकारा” न भरे कहानी सुनाने वाले को भी मजा नहीं आता. भाई पता कैसे लगेगा की सामने वाला सुन भी रहा है या सो गया ?
भाई मुकेश ने “कमेन्ट” ही करने को तो कहा था ? आप तो धमकी देने लगे “कमेन्ट” का आप्शन बंद करने की या लिखना बंद करने की ??
भाई ऐसा मत करो “घुम्मकड” बंद हो जायेगा
जय राम जी की…
“JAT DO IT” एक बार फिर आपका धन्यवाद् जो आपने सरल शब्दों और चित्रों के साथ हमें भीमताल के दर्शन करवाए. सड़को पे लगे बोर्ड की फोटो आपकी सूझबूझ दर्शाती है. अधिकतर लोग की फोटो में पहाड़, घाटी या आपने चित्र होते है. इन चीजो पे ध्यान नहीं जाता. पुनः धन्यवाद्
रे के रोला हो रा है थारी जान न. के बबाल ठा रखा सै…..
बेरा न के हो रया सै आपस में झगडन लाग रे हो.
मेरी तो समझ ही न आ रया के रोला के सै …में तो चुप चाप बीयर पी कै मामला चेक कर रया था
सारा सरूर उतार दिया यार झगडा मत करो मेरे यार..
तुम सब मेरे भाई हो
Comments are more interesting than article… :)
monty is right. same position is mine.
photo me to aap hi ho devta,magar kaajal kyun lagaya hai? dusri baat aapka lekhan itna shaandaar hota hai ki log lagataar comment dete hi rehte hain,magar aapke jawab ke liye is ghummakar manch ko lagta hai jaise rajneeti me rang dia hai.aapke aage ke lekh k intezar me