PAUNTA SAHIB TO DELHI Road view पौंटा साहिब से दिल्ली तक सडक मार्ग विवरण |
यह BIKE TOUR/TRIP बाइक यात्रा आज अन्तिम भाग तक आ पहुँची है। अब तक हम दिल्ली (DELHI) से पिन्जौर गार्डन (PINJORE GARDEN, शिमला (SHIMLA), कुफ़री (KUFRI), नारकण्डा (NARKANDA), सैंज (SAINJ), जलोडी जोत (JALORI PAAS), रघुपुर किला (RAGHUPUR FORT), सरोलसर झील (SAROLSAR LAKE), अन्नी (ANNI), रामपुर बु्शैहर (RAMPUR BUSHAHR), बागीपुल (BAGHIPUL), जॉव (JAON), सिंहगाड (SINHAGAD), थाचडू (THACHADU), काली घाटी (KALI GHATI, काली कुंड (KALI KUND), भीम डवार (BHEEM DWAR), पार्वती बाग (PARVATI BAGH), नैन सरोवर (NAIN SAROVAR), भीम शिला (BHEEM SHILA), एवं श्रीखण्ड महादेव दर्शन (SRIKHAND MAHADEV DARSHAN) करने के बाद वापसी में रामपुर (RAMPUR) से रोहडू (ROHRU), त्यूणी (TUNI), चकराता(CHAKRATA), टाईगर फ़ाल (TIGER FALL), कालसी (KALSI), सम्राट अशोक का शिलालेख (ASHOK SHILALEKH), विकास नगर (VIKAS NAGAR), हर्बटपुर (HERBERTPUR), आसन्न बैराज (AASAN BAIRAJ) यमुना पुल (YAMUNA RIVER BRIDGE) होते हुए यहाँ श्री पौंटा साहिब गुरुद्धारे (PAONTA SAHIB GURUDWARA) तक आ पहुँचे है। यहाँ से अब सिर्फ़ सहारनपुर (SAHRANPUR), शामली (SHAMLI), कांधला (KANDHLA), बडौत (BARAUT), बागपत (BAGHPAT), खेकडा (KHEKRA), लोनी (LONI), होते हुए दिल्ली (DELHI) तक जाना है। जो यहाँ से सिर्फ़ 235 किमी दूर है अगर अम्बाला से जायेंगे तो 305 किमी जाना होगा।
रात को ठीक 10 बजे तक सब सो गये थे क्योंकि सुबह सबको जल्दी चलना था। सिर्फ़ नीरज की दोपहर की नौकरी के कारण जल्दी जाना पड रहा था बाकि तीनों की छुट्टी थी। रात में तय हुआ था सुबह पाँच बजे तक यहाँ से चल देना है, तभी 12-1 बजे तक दिल्ली जा पायेंगे। सुबह चार बजे का अलार्म लगाया था तो बजना भी चार बजे ही था। मैंने उठकर देखा तो लोगों की चहल-पहल चारों ओर थी ऐसा लग ही नहीं रहा था कि सुबह के चार बजे है, मैंने सोचा कि कही नितिन के मोबाइल में समय तो गलत नहीं है, विपिन को उठाया तो देखा कि उसके मोबाइल में भी यही समय हुआ था। इसके बाद सबको उठाया गया, अब नीरज की तरह बिना पेट व तन साफ़ किये चलना अपने तो बस की बात नही है। नीरज को छोडकर बाकि तीनों नहाने धोने के लिये चले गये। जब नहाने धोने वाली जगह जाकर देखा तो वहाँ तो लम्बी कतार लगी थी बारी-बारी से सब काम हो रहा था, किसी तरह पेट तो साफ़ हो गया लेकिन जब नहाने वाली कतार में देखा कि यहाँ तो अपना स्थान दस के बाद आ रहा है यानि 11 वॉ स्थान, तो जी लाईन के चक्कर में अपना नहाना रद्द हो गया, क्योंकि नहाने में कम से कम एक घन्टा जरुर लग जाता। इसी काम से निपटने में साढे चार बज गये थे।

रामपुर मनिहारन वह जगह है जहाँ पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल किलंटन ने एक COMPUTER संस्थान का उदघाटन किया था।
वापस उसी जगह आये जहाँ हमारा सामान रखा हुआ था तो देखा कि नीरज बिल्कुल नैन सरोवर वाली मुद्रा में (साक्षात दर्शन वाली पोस्ट में फ़ोटो भी लगा हुआ है) अब तक बैठा हुआ था। मुँह को घुटनों के बीच दबाये बैठा था, सबने एक दूसरे को देखा लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा क्योंकि एक तो उस दिन उस का जन्मदिन था, दूसरा नीरज का रवैया ऐसा था कि विपिन व नितिन नीरज से ज्यादा घुलमिल नहीं सके। मेरा क्या मैं ठहरा अलग किस्म का इंसान ऐसे नखरों का मुझ पर कोई फ़र्क नहीं पडता है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, आगे से हमारे साथ यात्रा पर नहीं जायेगा, बस। वैसे हमारी जैसी बाइक यात्रा करना नीरज जैसे आलसी इंसान के बस की बात नहीं थी वो तो पता नहीं कैसे उसने हमारे साथ सहारनपुर तक की यात्रा कर ली, नहीं तो नीरज तो रामपुर (वो तो चकराता टाईगर फ़ाल व पौंटा साहिब का लालच था) से भागने की सोच रहा होगा कि कहाँ फ़ँस गया इन बाइक वालों के चक्कर में। इस सफ़र से नीरज व विपिन ने एक बात तो जान ही ली होगी कि आराम वालों के लिये बाइक नहीं है और मैं कहता हूँ कि मेरे जैसे मनमौजियों के लिये बस का सफ़र नहीं है। नीरज के इरादे हमारे साथ जाने के तो नहीं थे, यह उसने रात को ही कह दिया था कि मुझे सहारनपुर या अम्बाला तक ही तुम्हारे साथ जाना है जिस कारण रात को ही हमने सारा हिसाब किताब कर लिया था जो कि एक बंदे का खर्चा आया मात्र 2425 रुपये। जिसमें पेट्रोल का 1075 रुपये मिलाकर था बाकि रात का रुकना, खाना, पीना सब कुछ मिलाकर था। सबने अपने-अपने हिस्से का हिसाब चुका दिया था। किसी का किसी पर कोई बकाया नहीं रहा था।
इसी बीच, बाहर बारिश भी हो रही थी। बारिश रुकने का इंतजार नहीं किया जा सकता था। ठीक पौने पाँच बजे हमने अपने रैन कोट, हैलमेट पहन कर अपने बैग उठा लिये थे। यहाँ से बाहर आने के बाद उसी मार्ग से वापस चल दिये जिससे कल आये थे। बारिश ज्यादा तेज तो नहीं थी फ़िर भी परेशान कर रही थी। कुछ ही देर बाद घने जंगलों से होते हुए हर्बटपुर से सीधे हाथ सहारनपुर जाने वाला मार्ग आ गया था, यहाँ से सीधे हाथ दिल्ली व उल्टे हाथ चकराता और देहरादून की ओर मार्ग जाता है यहाँ से कुछ आगे जाते ही अंधेरा भी समाप्त हो गया था बीच में एक बार फ़िर कुछ किलोमीटर पहाडों का सफ़र आता है। पहाड पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुए थे कि देखा कि बारिश रुक गयी थी। यहाँ कुछ देर रुक कर अपना सामान ठीक किया व आगे के सफ़र पर चल दिये। बारिश में कुछ भीगे तो थे आगे जाते-जाते वो भी सूख गये थे, मार्ग की हालात कही-कही तो खराब आ जाती थी वहाँ आराम से निकल जाते थे। सही मार्ग आते ही फ़िर से अपनी बाइक 50 के आसपास भाग लेती थी। नीरज ने सुबह-सुबह सबका मूड खराब कर ही दिया था। जिस कारण सभी बिना बातचीत चुपचाप चलते जा रहे थे।

शामली फ़ाटक पार करने के बाद सडक के बीचों बीच यह मंदिर बना हुआ है। पता नहीं क्यों मंदिर-मस्जिद सडक घेर कर बनाते जाते है?
लगभग साढे सात बजे हम सहारनपुर के स्टेशन के नजदीक आ गये थे। यहाँ से कुछ पहले एक चौराहा आता है जिससे सीधे हाथ अम्बाला, जगाधरी, यमुनानगर की ओर जा सकते है, व उल्टे हाथ छुटमलपुर होते हुए देहरादून, मंसूरी, रुडकी हरिद्धार जाया जा सकता है, सहारनपुर के स्टेशन पर नीरज को छोडा, पहले तो विपिन भी रात में ट्रेन से जाने की बोल रहा था, लेकिन उसे पता नहीं क्या हुआ? उसने बाइक से ही आगे का सफ़र करने के लिये कहा। चारों लठ तो नीरज ही लाया था उसके लठ उसे दे दिये और अब हम चार चतुर्भुज से तीन त्रिदेव काम बनाने के लिये रह गये थे। एक जाट फ़िर से कम हो गया था। सहारनपुर स्टेशन के बराबर बने पुल द्धारा रेलवे लाईन पार हो जाती है। सुबह कोई ज्यादा भीड भाड भी नहीं थी। इस शहर को पार करने के बाद विपिन मेरी बाइक पर आ गया था। यहाँ भी बीच-बीच में मार्ग ही हालत कुछ अच्छी नहीं थी, हम मस्ती में झूमते हुए इस मार्ग पर जा रहे थे कि एक बोर्ड नजर आया जिस पर दिल्ली व चकराता की दूरी लिखी हुई थी। नीरज के जाने के बाद अब हमे घर जाने की भी जल्दी नहीं थी, हमारी तो आज छुट्टी थी। नौकरी की जल्दी तो सिर्फ़ नीरज को ही/या उसके कारण थी और वही पौने पाँच बजे चलने पर भी गुब्बारे की तरह मुँह फ़ुलाये बैठा था। अब पता नहीं गुस्से के कारण या फ़िर पेट के प्रेशर के कारण उसने मुँह फ़ुला रखा था, पर पौंटा साहिब से लेकर सहारनपुर तक उसने अपने मुँह का जो स्टाईल बना रखा था वो देखने लायक था?

यहाँ रेलवे स्टेशन व सडक के बस अडडा में सिर्फ़ 50 मी का ही फ़ासला है। स्टेशन व बस स्टाप आमने सामने है।
मार्ग में रामपुर मनिहारन के पास एक जगह आम की बिक्री हो रही थी। हमने तीन बंदों के लिये पूरे ढाई किलो आम ले लिये। वैसे आम खाने की बात नीरज भी कर रहा था लेकिन उसने पता नहीं क्या खाया होगा? ननौता फ़ाटक पार करने के बाद हमने एक जगह सरकारी नल देखकर बाइक रोक ली व सारे आम आपस में बाँट कर खाये, आम खाते समय एक शर्त लगायी थी कि जिसके आम बचेंगे उसे कोई भी खा लेगा। जो अपने हिस्से के आम पहले समाप्त कर लेगा, वो दूसरे के हिस्से के आम भी खा सकता है। इस कारण सबने फ़टाफ़ट अपने-अपने आम निपटाये थे लेकिन ऐसी नौबत नहीं आयी कि दूसरे के हिस्से के भी खाने पड जाये, क्योंकि सबका पेट अच्छी तरह भर गया था। इस जल्द बाजी में आम खाने के कारण कपडे पर भी कुछ आम गिर गया था वो तो पानी का नल पहले ही देख लिया था जिस कारण अपने हाथ व मुँह अच्छी तरह धो लिये थे। सारे आम निपटा कर आगे के लिये चले दिये थे। अब मार्ग बीच-बीच में कभी सही कभी खराब आ जाता था। जब हमने थाना भवन पार किया तो देखा कि मार्ग एकदम मस्त था जिस पर हमने 70-80 की रफ़तार से बाइक भगायी थी, धीरे-धीरे हम शामली के तिराहे पर आ गये यहाँ से एक मार्ग उल्टे हाथ मुजफ़्फ़र नगर, हरिद्धार की ओर व सीधे हाथ दिल्ली की ओर चला जाता है। यहाँ आकर हमें भोले के भक्त काँवर लाते हुए मिले, कुछ आगे जाने पर रेलवे फ़ाटक भी आ जाता है यही पर उल्टे हाथ शामली का रेलवे स्टेशन भी है, फ़ाटक पार करने के एक किमी बाद एक चौराहा और आता है जहाँ से सीधे हाथ पानीपत की ओर व उल्टे हाथ मेरठ की ओर जाया जा सकता है। हमें तो दाये बाये के चक्कर में पडना नहीं था, अत: हम तो नाक की सीध में दिल्ली की ओर चलते रहे। जिस पर एक कस्बा काँधला, रमाला, (यहाँ से आगे दिल्ली तक सडक मस्त बनी हुई है) बावली, (क्षेत्र का सबसे बडा गाँव) बडौत, (जहाँ से मेरा गाँव मात्र 12 किमी दूर रह जाता है) आता है इसके कुछ किमी आगे जाने पर एक मन्दिर आता है जो कि गुफ़ा वाले बाबा के नाम से क्षेत्र में प्रसिद्ध है। यहाँ भी कुछ देर आराम किया गया, बाबा को भी नमस्कार किया गया।
कुछ देर रुकने के बाद आगे के सफ़र पर चल दिये। अब आगे जाने पर एक जगह आती है जिसे गौरीपुर मोड के नाम से नाम से जानते है। यहाँ से भी सीधे हाथ एक मार्ग यमुना नदी को पार करता हुआ सोनीपत की ओर चला जाता है इस मोड से सोनीपत मात्र 22 किमी रह जाता है। यहाँ से कुछ आगे जाने पर बागपत जिला मुख्यालय आ जाता है तथा कुछ और आगे जाने पर बागपत शहर भी आ जाता है। बागपत शहर के चौराहे से उल्टे हाथ जाने वाली सडक से मेरठ व आगे गढ-गंगा जाया जा सकता है यहाँ से मेरठ मात्र 50 किमी है मेरठ बाईपास मात्र 40 किमी रह जाता है। दिल्ली शाहदरा मात्र 32 किमी व लोनी बार्डर मात्र 28 किमी रह जाता है दिल्ली का बस अडडा भी सिर्फ़ 38 किमी बाकि रह जाता है। दोपहर के 11 बज गये थे फ़िर से कुछ खाने का मन हुआ तो (आज सिर्फ़ आम ही तो खाये थे) यहाँ मैं व विपिन एक पेड के नीचे रुक गये लेकिन नितिन का कोई पता नहीं था। कुछ देर पहले ही तो कहा था कि बागपत में घुसते ही खाना खायेंगे। तो कहाँ रह गया जब काफ़ी देर हो गयी तो वापस जाकर देखा तो अपने हेलमेट को ठीक करवा रहा था जिसका शीशा टूट गया था। नया शीशा लगवाकर वापस उसी जगह आये जहां विपिन खडा था। विपिन का भूख से बुरा हाल था अब तीन घन्टे पहले के खाये आम गडडे भरे मार्ग पर कहाँ गये? पता ही नहीं चला, सामने ही पनीर के गर्मागर्म ब्रेड पकौडे बन रहे थे यहाँ एक-एक समौसा व ब्रेड पकौडा खाया गया। जिससे सबका पेट फ़ुल हो गया था। इस सारे खाने पीने में लगभग एक घन्टा लग गया था। हम खा पी कर ठीक सवा बारह बजे यहाँ से चले थे।
करीब एक बजे हम लोनी बार्डर आ गये थे। विपिन को घर चलने को बोला तो उसने बोला नहीं भाई ऐसी हालत में नहीं फ़िर कभी नहा धो कर आऊँगा। विपिन को शाहदरा मैट्रो स्टेशन की ओर जाने वाले आटो रिक्शा में बैठा कर हम दोनों यमुनोत्री मार्ग से 300 मीटर दूर अपने घर की ओर चले गये। घर पहले ही फ़ोन कर दिया था जिससे सबको पता ही था। हमें देखकर सब बडे खुश थे और हम उन सबसे ज्यादा। क्योंकि जय भोले नाथ, हर दम हर पल हमारे साथ, बोलो जय शंकर की।






























भोले बाबा की जय, आपका सफ़र अच्छे से हो गया . आप का बहुत बहुत धन्यवाद आपने हमें घर बेठे ही भोले बाबा के दर्शन करवाए.
राम राम जी, बहुत अच्छा सफर, बहुत अच्छा लेखन, बहुत अच्छे फोटो, यादगार रहेंगे. और सफर में ये छोटी छोटी बाते तो होती ही रहती हैं, रूठना मनाना जब तक न हो सफर का मज़ा ही नहीं आता. आपकी एक तो रोहतांग, लद्दाख, अमरनाथ जी यात्रा, और दूसरी श्रीखंड यात्रा, हम सभी घुमक्कडो के लिए एक आदर्श हैं. और रहेगी. अगली पोस्ट कहा की डाल रहे हो. और आजकल कहा घूम रहे हो. धन्यवाद..
जाट देवता जी तथा उनके तीन साथी (कंधे से कन्धा ) मिला कर चलने वालों को १९ भागो में लिखी इतनी सुंदर वर्णन के साथ , सुंदर सजीव फोटो के साथ खट्टे मीठे अनुभव ,दिखने घुमाने दर्शन कराने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद .
अगली यात्रा भी जल्दी शुरू करना
Jai bhole baba ji ki,
badi khub rahi apki yeh yatra.
Ek baar dobara padhunga vistaar se, ab sabhi bhaag jo post ho chuke hain.
ab kahan le jaa rahe hain hamein?
आप सब श्रीखंड महादेव यात्रियों को मेरा साक्षात नमस्कार. बहुत बढ़िया यात्रा थी . बड़ा मजा आ गया यह यात्रा का लेख पढकर . मेरे लिए यह घुमाक्कर.कॉम पर सबसे बढ़िया सीरीस रही है. अब हमें भी यह यात्रा (श्रीखंड महादेव ) करने की इच्छा है. देखते है कब बुलावा आता है भोलेनाथ का. यह लेख बड़ा ही याद आएगा . जब भी याद आएगा तब तब इसे पढ़ने आया करेंगे .
जय हो श्रीखंड महादेव भोलेनाथ शिव शंकर की……………..
संदीप भाई,
तो आज इस महान श्रंखला का सुखद समापन हो ही गया. मेरे ख़याल से इस श्रंखला को घुमक्कड़ की सबसे लम्बी श्रंखला (19 भाग ) का गौरव भी प्राप्त होना चाहिए. क्या कहते हैं नंदन जी?
अब इंतज़ार है आपकी अगली सिरीज़ के शुरू होने का……………………………………………..
संदीप जी , पूरी पोस्ट बहुत बढ़िया है, वैसे मैंने आपके ब्लॉग की सारी पोस्ट पढ़ी है, पर श्रीखंड यात्रा सबसे बढ़िया लगी.
mithunda ke shabdon me- kya baat, kya baat, kya baat.
aisi yatra sirf jat devta hi kar sakte hain. shrikhand mahadev ke baare me kabhi suba hi nahi tha. aaj suba bhi aur darshan bhi ho gaye.
ek sujhav aap sabhi se chahiye- mera july 1st week ka program ban raha hai mata vaishno devi darshan ka. agar main mata aur baba shrikhand yatra club karun to kya root ban sakta hai. mujhe jaana hai cycle par. need suggestions from everybody.
i need one good quality ruksuck. from where i can get in delhi.
ek bar phir se- jaatdevta ki jai
लक्षय,
मुबारक हो वैष्णों देवी जाने के लिये और श्रीखण्ड के बारे में प्लानिंग करने के लिये।
आप साइकिल से जा रहे हैं, इसका मतलब है कि आपके पास समय की कोई कमी नहीं है।
आपको वैष्णों देवी से श्रीखण्ड जाने के लिये पठानकोट तक तो आना ही पडेगा। शिमला के रास्ते जाने की सलाह बिल्कुल नहीं दूंगा क्योंकि आपको पहले तो शिमला और नारकण्डा तक साइकिल चढानी पडेगी, फिर नीचे सतलुज तक उतारनी पडेगी। तो क्यों ना आप बिलासपुर के रास्ते जायें।
छोडिये, आप पठानकोट से कांगडा होते हुए मण्डी पहुंचिये। हालांकि यह पहाडी रास्ता है, लेकिन ज्यादा उतार-चढाव नहीं हैं। मण्डी से नेर चौक होते हुए करसोग। फिर तत्ता पानी से सतलुज मिल जायेगी आपको। यहां से शिमला जाने की जरुरत नहीं है। आप सीधे सतलुज किनारे चलते चलते रामपुर तक जा सकते हैं। रामपुर से तीन चार किलोमीटर पहले निरमण्ड जाने के लिये सतलुज पर पुल है। निरमण्ड पहुंचिये और वहां से बागीपुल और आखिर में जांव। जांव में साइकिल एक तरफ खडी करके पैदल यात्रा शुरू कर सकते हैं।
करसोग जाने के लिये आप कांगडा, मण्डी का रास्ता ना पकदकर बिलासपुर होते हुए भी जा सकते हैं। बिलासपुर से मण्डी की तरफ चलते हुए नेर चौक और फिर वही जो अभी अभी बताया है। इसके अलावा कोई छोटी मोटी सडक भी हो सकती है, जिसके बारे में लोकल आदमी ही बता सकते हैं।
अगर आपको शिमला भी जाना है तो वापसी में जा सकते हैं।
अच्छा रकसैक लेने के लिये आप गूगल पर adventure 18 के बारे में ढूंढिये। उनका एक शोरूम दक्षिण दिल्ली में है। वहां से आपको बढिया क्वालिटी का रकसैक ठीक ठाक दाम पर मिल जायेगा।
संदीप भाई….
आपकी सम्पूर्ण श्री खंड यात्रा लेख श्रृंखला बहुत ही प्रभावशाली और अच्छी रही……… आज इसके सफल समापन पर आपको बधाई….|
अब देखते हैं कहाँ ले चलते आप नए स्थान पर अपने अगले लेख के माध्यम…..
thanks, neeraj ji
तो समापन रहा इस यादगार यात्रा का | संदीप जी, आपका ये लेख इतिहासिक महत्व रखता है क्योंके रास्ते, शहर, गाँव समय के साथ बदलते रहते हैं, हो सकता है के एक पूरा नया राज मार्ग बन जाए (जैसा के राष्ट्रीय राजमार्ग ५८ से साथ हुआ, जो चीतल ग्रांड पुराने राजमार्ग के शान थी, वो अब नए राजमार्ग पर है ही नहीं) और तब इस लेख के माध्यम से पुरानी जानकारी बरकरार रहेगी | साधुवाद इस यात्रा पर हमे साथ ले जाने के लिए | जय हिंद |
@ neeraj- i am planning this route-
delhi-ambala-jalandhar-jammu-katra-jammu-pathankot-palampur-mandi-jaon-shrikhand-jaon-rohru-chakrata-saharanpur-kairana-panipat-ganaur-delhi
kya ye route sahi rahega as i have 18 days in my hand ? for 1st time traveler whats kind of pre-cautions needed. i reed ur blog also and i think 8 days are enough for me. and i want to know opening dated of this year for shrikhand.
need suggestions.
@ jaat devta- jaat bhai, kya sabse naaraj ho. kisi bhi comment ka koi reply nahi diya.
hindi main kaise likhte hain?
लक्षय,
जम्मू से जांव तक का रास्ता आपने वहीं चुना है, जो मैंने बताया है- पठानकोट से कांगडा- पालमपुर- मण्डी- नेर चौक- करसोग होते हुए। नहीं तो मण्डी से जलोडी जोत होते हुए भी जा सकते हैं लेकिन उसमें 3000 मीटर ऊंचे जलोडी जोत पर साइकिल चढाना बेहद मुश्किल काम है। वापसी में कुछ मामला गडबड लग रहा है। रामपुर से नोगली तक 80 किलोमीटर के करीब चढाई, फिर रोहडू, त्यूनी तक उतराई, फिर चकराता की चढाई; काफी उल्टा सीधा मामला फंस रहा है। वो भी तब जब आप श्रीखण्ड की थकाऊ यात्रा करके वापस लौटेंगे।
आप अगर पहली बार साइकिल से इतनी दूर जा रहे हैं तो सम्भल जायें। आप एक दिन में अधिकतम 100 किलोमीटर साइकिल चलाने का लक्ष्य लेकर चलिये। 100 किलोमीटर प्रतिदिन से ज्यादा साइकिल चलाना काफी मुश्किल काम है। इससे ज्यादा की सलाह मैं नहीं दूंगा। दिल्ली से कटरा करीब 700 किलोमीटर है यानी 7 दिन। इतने ही दिन वापस आने के लिये। सीधी सी बात है कि आप वैष्णों देवी के साथ श्रीखण्ड महादेव को 18 दिनों में नहीं कर पायेंगे।
सर्वोत्तम सलाह यही है कि इस बार वैष्णों देवी ही घूमकर आइये। वहां के अनुभवों के आधार पर अगली यात्राओं की योजना बनाईये।
और सहारनपुर से शामली- कैराना होते हुए पानीपत क्यों जा रहे हो? जब तक आप शामली से पानीपत पहुंचेंगे, तब तक तो बागपत ही पहुंच जायेंगे। बागपत से दिल्ली 40 किलोमीटर है जबकि पानीपत से करीब 80 किलोमीटर।
लक्ष्य भाई काम तो हिम्मत का करने जा रहे हो, अग्रिम बधाई हो, मैं कमेन्ट का जवाब मुश्किल से ही देता हूँ वो भी उसका जिसमें कुछ जानकारी मांगी गयी हो।
देख भाई मेरी एक सलाह मान लियो कि चकराता होते हुए मत जाना, क्योंकि त्यूनी से लेकर चकराता तक चढाई ही चढाई है वो भी कुछ कठिन ही है, रामपुर से कुछ छ: सात किमी नोगली आता है वहाँ से रोहडू अस्सी किमी है लेकिन रोहडू से लगभग २२ किमी पहले एक दर्रा आता है जिसका नाम सांकुरी है। वहाँ तक चढाई ही चढाई है चकराता की चढाई उससे कही ज्यादा है और उस मार्ग पर गिने चुने दो चार गाँव ही आते है। पीने के पानी की भी समस्या आ जाती है। यदि त्यूनी से आप सीधे पौंटा साहिब जाओगे तो आपको १२० किमी ढलान मिलेगी, और हाँ मार्ग बीते अक्टूबर में ही नया-नया बना था। अत: ज्यादा परेशानी नहीं आयेगी। लेकिन कहते है ना भगवान भी कोशिश करने वालों की मदद करता है अत: आप किसी भी मार्ग पर जाये, आपकी भोलेनाथ अवश्य मदद करेगे, जय भोलेनाथ सबके नाथ।
At last, the epic bike journey has ended. Wow! Brilliantly narrated, Jatdevta Sandeep, in your trade mark style. This is the longest serial ever on ghumakkar, by far, of I am not mistaken. Congratulations to the adventurous foursome and it is amazing that the entire trip cost less than Rs.2,500 per head. A point to note is that in a group, there will always be differences of opinion. It is praiseworthy that you were able to resolve your issues in an amicable maner.
A few comments on this article:
“इस बोर्ड में यमुनौत्री की दूरी गलत लिखी हुई है”…..even the spelling of Yamunotri is wrong!
“पता नहीं क्यों मंदिर-मस्जिद सडक घेर कर बनाते जाते है?”…. I think that it is a case of scant respect for laws and the inability of the law enforcement agencies to deal with such violations.
“यहाँ रेलवे स्टेशन व सडक के बस अडडा में सिर्फ़ 50 मी का ही फ़ासला है। स्टेशन व बस स्टाप आमने सामने है” I wonder why urban planners do not emulate this model everywhere. It will be highly convenient for travellers who have to switch between trains and buses.
Thanks, once again, Sandeep bhai, for sharing your experiences with us. Looking forward eagerly to reading about your next journey.
क्या करे डी एल जी इन्होने तो चकराता की भी गलत ही लिखी हुई है
@ neeraj- mera program hai groud area main 200 km tak daily jaane ka. aur panipat ka raasta is liye chuna hai kyonki ganaur mera home town hai.
@ jaat devta- sir, can you tell exact route for my return journey from baba mahadev and this year date.
i will very thankful to you.
@ nandan- sirji, i m going mata darbar on cycle. abhi tak maine ghumakkar.com pe cycle travel nahi padha hai. kya aap cycle travel stories ko consider karoge ?
@ Lakshay – Yes, absolutely. Best wishes and good luck.