PAUNTA SAHIB GURUDWARA पौंटा साहिब गुरुद्धारा

June 11, 2012 By:

हमारी यह यात्रा श्रीखण्ड महादेव से यहाँ पौंटा साहिब तक आ पहुँची है। हम पौंटा साहिब गुरुद्धारे में शाम को अंधेरा होने से काफ़ी पहले आ चुके थे। हम चारों ही यहाँ पहली बार आये थे, इसलिये यहाँ के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था कि अन्दर कहाँ रुकना है? किससे पूछे इसी उधेडबुन में मुख्य दरवाजे के बाहर एक किनारे पर अपनी-अपनी बाइक खडी कर दी व अन्दर जाकर सबसे पहले तो रात को ठहरने के बारे में मालूम किया, तो पता लगा कि अन्दर घुसते ही उल्टे हाथ पर एक खिडकी से रात को रुकने वालों को परची दी जा रही है इसी परची को दिखाकर अपनी-अपनी बाइक भी गुरुद्धारे की चारदीवारी के अन्दर ला सकते हो। तो जी हम भी लाइन में लग गये। जब हमारा नम्बर आया तो परची काटने वाले बंदे ने कोई भी पहचान पत्र दिखाने को कहा, उस समय मेरे पास पहचान पत्र नही था (बैग में था) नीरज ने अपना पहचान पत्र दिखाया, अपना नाम पता व कितने बंदे हो सब कुछ लिखवाया था। जब सब खानापूर्ति हो गयी तो उसने हमें परची दे दी, हम परची लेकर बाहर आये व अपनी-अपनी बाइक को मुख्य द्धार से चारदीवारी के अन्दर पैदल चलाकर लाने का नियम है, हम भी ले आये। मुख्य द्धार से प्रवेश करते ही जहाँ से परची ली थी ठीक उसी के सामने ही कुछ दूरी पर बाइके खडी करने का स्थान है जहाँ पर सैंकडों की संख्या में बाइक खडी हुई थी। हमने भी अपनी-अपनी बाइक स्थान देख कर वही पर लगा दी। यहाँ पर ज्यादातर बाइक वाले हेमकुंठ साहिब की यात्रा से आने वाले या यात्रा पर जाने थे। वैसे मैं भी हेमकुंठ साहिब व फ़ूलों की घाटी की यात्रा पाँच साल पहले इसी नीली परी पर कर चुका हूँ। वो यात्रा फ़िर कभी होगी आज तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पौंटा साहिब के बारे में ही बताया जायेगा।

भवन के ठीक सामने का चित्र है।

निशाने साहिब।

दूसरी जगह से लिया गया चित्र।

हमने अपने-अपने हेलमेट व बाइक एक साथ बाँध दिये ताकि कोई छेडछाड ना करे। हम सामने ही बने हुए एक विशाल भवन (नाम याद नहीं आ रहा है कि उस हाल का नाम क्या था) में अन्दर प्रवेश किया व देखा कि यह तो इतना विशाल है कि एक साथ कई हजार भक्त इसमें आराम कर सकते है। हमने भी एक तरफ़ दीवार के साथ बिछे हुए दरे पर अपना डेरा जमा दिया था। यहाँ दीवार के किनारे इसलिये क्योंकि दीवार पर मोबाइल व कैमरा आदि में ऊर्जा (CHARGE) भरने करने के लिये बोर्ड लगे हुए थे, अगर बीच में कहीं भी बैठते तो बार-बार दीवार के पास आना पडता। यहाँ इस विशाल बरामदे में कोई ताला या कमरा आदि कुछ नहीं था सब कुछ खुल्लमखुल्ला था। पहले विपिन व नितिन बाहर घूमने के लिये गये उसके बाद मैं व नीरज भी बाहर घूम आये थे। मेरी एक आदत है कि मैं जहाँ भी घूमने जाता हूँ वहाँ पर एक-एक चीज बारीकी से देखना चाहता हूँ अब वो चाहे मन्दिर-गुरुद्धारे हो या पहाड मुझे जब तक उस जगह को जगह को अच्छी तरह से ना देख लूँ तसल्ली नहीं होती है। यहाँ का यमुना किनारा नजदीक जाकर देखे बिना रह गया है, अबकी बार उसे भी देख कर आऊँगा, बल्कि यमुना में नहा कर आऊँगा, क्योंकि दिल्ली तक आते-आते तो यमुना का स्वरुप पूरी तरह बिगड चुका होता है, दिल्ली के वजीराबाद पुल के बाद तो यमुना नदी मात्र एक नाला भर बन कर रह जाती है। आगे चलकर आगरा में चमडे की कई फ़ैक्ट्री अपना कच्चा कचरा यमुना में गिरा कर इसे और प्रदूषित करती है, जिस प्रकार कानपुर में गंगा नदी में सैकडों चमडे की फ़ैक्ट्री अपना कचरा गंगा में डाल कर गंगा को गंगा से गंदा नाला बनाने पर आमादा है और हमारी सरकारे सो रही है। काश समय रहते सब ठीक हो जाये तो!

कवि दरबार का इतिहास।

दैनिक सूचना पट।

एक झरोखे से लिया गया चित्र है।

मैंने व नीरज ने एक कोने से शुरु कर सारा गुरुद्धारा देखना आरम्भ कर दिया। सबसे पहले स्थान देखा दस्तार यानि पगडी जहाँ पर गुरु जी अपनी पगडी बाँधा करते थे। इसके बाद नीचे यमुना नजर आयी तो उसे देखने चल पडे लेकिन आगे तो जाल लगाकर मार्ग ही अवरुद्ध किया हुआ था वापस आने के अलावा कोई चारा नहीं था। मैं तो किनारे तक जाना चाह रहा था, लेकिन नीरज ठहरा आलसी उसने जाने से मना कर दिया क्योंकि नीचे जाने के लिये काफ़ी घूम कर आना पड रहा था। कोई बात नहीं अब सामने एक बोर्ड देखा जिस पर लिखा हुआ था कवि दरबार, हो लिये कवि दरबार की ओर, यहाँ आने के लिये कुछ सीढियाँ भी चढनी होती है। तो जी हम भी चढ गये और इस जगह पर भी जा पहुँचे। इस जगह पर उस समय के सबसे अच्छे कवियों का दरबार लगा करता था और एक बात यहाँ ध्यान देने वाली थी कि जो यमुना शोर मचाती हुई आती है यहाँ पर आकर एकदम शांत हो जाती है। ऐसा क्यों है कौन जाने? इसी स्थल के सीधे हाथ की ओर गुरु का लंगर चल रहा था। हमें भी भूख लग ही रही थी, लेकिन उससे पहले गुरु के दर्शन करने जरुरी थे तो जी हम चल दिये मुख्य भवन की ओर मुख्य भवन में प्रवेश करने से पहले प्रवेश द्धार के बाँये हाथ एक बोर्ड नजर आया उस पर उस दिन के बारे में बताया हुआ था, आप भी फ़ोटो में देखना कि क्या लिखा हुआ था।

यमुना नदी व किनारे का मन्दिर भी दिखाई दे रहा है।

मुख्य भवन में प्रवेश करते हुए।

गुरुग्रन्थ साहिब।

सिखों के नवे गुरु श्री गुरु तेगबहादुर जी के घर पटना साहिब में सिखों के दसवें गुरू गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म सन 1666 को हुआ था। इनकी माता का नाम गुजरी जी है। बचपन का नाम गोविंद राय रखा गया। सन् 1699 को बैसाखी वाले दिन पंज प्यारों से अमृत छक कर गोविंद राय से गुरु गोविंद सिंह जी बन गए। सन 1675 को लोगों (आम जनता) की मदद करते हुए श्री गुरु तेगबहादुर जी ने दिल्ली के चाँदनी चौक में बलिदान दिया, जहाँ पर आज शीश गंज गुरुद्धारा है। इसके बाद 11 नवंबर 1675 को गुरु गद्धी पर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी विराजमान हुए। गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। इन्होंने ही पाँच प्यारे बनाये। पञ्च प्यारे यानी सिक्ख धर्म के पहले 5 व्यक्ति, जिन्होंने अपना शीश धर्म के लिए कुर्बान किया, आज जो भी सिक्ख धर्म अपनाता हैं वो पञ्च प्यारों के हाथों अमृत-पान करता हैं और उन्ही पञ्च प्यारों के हाथो अमृत-पान करके गुरु गोविन्दराय गुरु गोविन्द सिंह बने और कहा कि जहाँ पाँच सिख इकट्ठे होंगे, वहीं मैं भी निवास करूँगा। गुरु गोबिंद सिंह जी की तीन पत्नियाँ थी जीतो जी, सुंदरी जी और साहिबकौर जी थीं। इनके 4 लडके थे जिसमे से बडे दो अजीत सिंह व जुझार सिंह लडाई में शहीद हुए और दोनों छोटों लडकों जोरावर व फ़तेह सिंह को सरहिंद नवाब ने जिंदा दीवारों में चुनवा दिया था। आज जहाँ दमदमा साहिब गुरुद्धारा है वहीं पर लेखक मणि सिंह जी ने गुरुबाणी लिखी थी, जिसे लगभग 5 महीने में लिखा गया था। अपना सब कुछ कुर्बान कर नांदेड में श्री हुजूर साहिब में ग्रन्थ साहिब को गुरु का दर्जा दिया था। इनके बाद सिक्खों का कोई गुरु नहीं हुआ। ये ही आखिरी गुरु थे। सन् 1708 को नांदेड में ही शरीर छोड सचखंड का रुख किया। पहला इतिहास 16 अप्रैल 1685 को मिलता है।

ऊपर छत।

बाहर आते हुए।

पौंटा साहिब का इतिहास।

गुरुद्धारा पौंटा साहिब सिखों के दसवें गुरू गुरु गोबिंद सिंह जी व सिख बंदा बहादुर के कारण प्रसिद्ध है। पौंटा साहिब का असली नाम पाँव टिका है, कहते है कि गुरू गोविंद सिंह के घोड़े ने यहाँ पर पैर जमा दिये थे व आगे बढने से मना कर दिया था। जिस कारण गुरु ने कुछ दिन यही रहने का फैसला किया। उसी समय में गुरु जी ने कई सिख धार्मिक पुस्तकों यहाँ लिखा था, यहाँ पर उस समय की कुछ वस्तुएँ व कुछ हथियार अभी तक एक छोटा से संग्रहालय में सुरक्षित रखे हुए है। पौंटा साहिब राष्ट्रीय राजमार्ग 72 पर स्थित है, जो कि शिमला(180), चडीगढ(130), देहरादून(45), सहारनपुर आदि को जोडता है। कालेसर राष्ट्रीय उधान मात्र 12 किमी दूर है। यहाँ आसपास विभिन्न गुरुद्धारे व मन्दिर है, लोहगढ किला, भूरे शाह, नाहन व आसन बैराज देखने लायक जगह है।

मैंने हिन्दुओं के बहुत से मंदिर में व् सिखों के गुरूद्वारे में कई अंतर देखे है, जैसे हिन्दुओ के ज्यादातर मंदिर में पंडे-पुजारी आपको पूजा पाठ कराने के चक्कर में रहेंगे, जैसा कि यदि उन्होंने पूजा पाठ नहीं कराया तो आपकी भक्ति निष्फल जायेगी, आपको जन्म-मरण का भय दिखा कर डराएंगे, ताकि कुछ रुपया खींचा जा सके, इसके ठीक विपरीत सरदारों के गुरूद्वारो में ऐसी कोई समस्या नहीं है, आपकी इच्छा है तो दान दो या मत दो, दान भी सीधे पेटी में या यहाँ पर्ची कटा कर दिया जाता है, भोजन का लंगर लगभग हर गुरूद्वारे में चलता है, जहां अमीर-गरीब सब बराबर नीचे जमीन पर बैठ कर खाना खाते है, सबकी भावना देखो अपने बर्तन भी सब साफ़ करके रखते है, काश हमारे मंदिर भी ऐसा कर पाते? लेकिन ऐसा तब हो पाए, जब मतलबी लोग वहाँ से हट जाए तो? हिन्दुओं के कुछ गिने गिनाए मंदिर सरकार ने अपने कब्जे में लिए है वहाँ सुधार होना चालू हो गया है, लेकिन अब भी अधिकतर मंदिरों पर ऐसे लोग कब्जा जमा कर बैठे है, जिनका पेट ना कभी भरा है ना भरेगा, यहाँ आने वालों के सोने के लिए हाल नुमा निशुल्क आवास बनाए हुए है, कमरे लेने के लिए थोडा खर्च करना पड़ता है, मुझे याद नहीं पड़ता किसी मंदिर वालो ने भक्तों के लिए निशुल्क आवास बनाये हुए हो, बेशक कुछ अमीर लोग जरुर धर्मशाला बनवाते है, मन्दिरों में फ़ोटो भी नहीं लेने देते है उन्हे कुछ भेंट रूपी रिश्वत दो, फ़िर जितनी मर्जी फ़ोटो लो, जबकि फ़ोटो लेने से तो उनका प्रचार ही बढता है, लेकिन अवैध आमदनी भी तो होनी चाहिए वो कैसे होगी, ऐसे रोक लगाकर ही ना। जबकि उसी मन्दिर के बाहर आपको वहाँ के फ़ोटो दुनिया भर के मिल जायेंगे। किसी गुरुद्धारे में अंदर-बाहर का फ़ोटो लेने पर भी कोई रोक वाली समस्या नहीं है, मैंने खुद पौंटा साहिब, स्वर्ण मन्दिर, शीश गंज, हेमकुंठ साहिब आदि कई गुरुद्धारे देखे है कही भी मुझे फोटो लेने से रोका नहीं है। अरे मुझे क्या किसी को भी फ़ोटो लेने से नहीं रोका है। दिल में तो बहुत कुछ है बाकी फिर कभी?

पगडी बांधने का भवन।

पढ लो।

शीशमहल।

अन्दर प्रवेश करते ही सारा माहौल ही बदला-हुआ था, जहाँ बाहर चहल-पहल थी, अन्दर तो सम्पूर्ण वातावरण शांती से भरा हुआ था, कुछ सुनायी दे रहा था तो सिर्फ़ गुरुवाणी का पाठ जो उस समय वहाँ पढा जा रहा था। मैं कुछ देर तक बिल्कुल चुपचाप बुत सा बनकर वहाँ खडा रहा उसके बाद आगे बढकर गुरुग्रंथ साहिब को राम-राम/ प्रणाम किया व बराबर से शुद्ध देशी घी से बने हल्वे का प्रसादा ग्रहण किया व चारों ओर निहारते हुए बाहर आ गये। अब सिर्फ़ एक ही कार्य बचा था, वह था पेट भरने का, तो जी हम अब की बार कवि दरबार की ओर (भवन के पीछे है) से नहीं, बल्कि सामने की ओर से लंगर चखने के लिये जा पहुँचे। अपनी-अपनी थाली गिलास कटोरी ले कर हम भी बैठ गये और लग गये जी लंगर चखने में, जब तक पेट पूरा नहीं भरा हम लोग वहाँ से नहीं उठे। वैसे जाटों और सरदारों में एक कहावत है जब कोई बंदा खाने में नखरा दिखाता है तो उसे कहते है कि खा ले नहीं तो बाद में गुरुद्धारे जाना पडेगा। खा पी कर अपने-अपने बर्तन अच्छी तरह धोकर रख दिये। मेरा मन था कि चलो कुछ देर सेवा की जाये लेकिन वहाँ पहले से ही काफ़ी लोग जमे हुए थे।

बैठने का स्थान।

आओ आप भी लगंर में।

अरे फ़ूल यहाँ भी।

वापस अपने डेरे पर यानि कि उसी जगह पर जहाँ पर हमारा सामान रखा हुआ था पहुँच गये, अब सब आराम कर रहे थे, अंधेरा भी हो गया था। नितिन अब भी किसी के साथ मोबाइल पर व्यस्त था? सबने अपने-अपने घर पर बता दिया कि कल सुबह जल्दी यहाँ से घर के लिये चलेंगे व दोपहर तक पहुँच जायेंगे। रात के आठ बजने वाले थे कि तभी ध्यान आया कि कल तो नीरज का जन्मदिन है तो हम जन्मदिन के मौके पर आइसक्रीम की दावत कैसे छोड देते। नीरज को खडा किया व गुरुद्धारे के बाहर बनी हुई दुकान से सबके लिये आइसक्रीम ले आये। नीरज के लिये एक अलग से थी। आइसक्रीम तो हम कल भी खा सकते थे लेकिन नीरज का कार्यक्रम तो हमें बीच में छोड कर भागने का था नीरज को कल दोपहर की नौकरी जरुर करनी थी। इसलिये नीरज ने पहले ही कह दिया था कि मैं तुम्हारे साथ अम्बाला या सहारनपुर तक ही जाऊँगा। सुबह जल्दी की भागम-भाग में कहाँ आइसक्रीम याद रहती, इसलिये पहले ही खाकर माने व नीरज का जन्मदिन मना लिया था। रात के दस बजने वाले थे ये लोग सोने के मूड में नहीं लग रहे थे, जब मैंने कहा कि सुबह पाँच बजे चलना है उसके लिये चार बजे उठना होगा, तो नितिन व विपिन दोनों बोले कि जब मरजी ऊठा देना चाहे रात के तीन बजे ही सही। इनकी ये बात सुनकर मैं सोने लगा कल नीरज की चिंता नहीं थी उसको तो खुद जल्दी जाकर अपनी दोपहर की नौकरी करनी थी। लेकिन सुबह-सुबह लडाई नीरज के साथ ही हो गयी।

यमुना पुल जिससे होकर हम यहाँ आये थे।

अब इस यात्रा की आखिरी किस्त बची है जिसमें पौंटा से दिल्ली तक यात्रा व नीरज के साथ लडाई सहित विवरण रहेगा।

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

14 Responses to “PAUNTA SAHIB GURUDWARA पौंटा साहिब गुरुद्धारा”


  1. Nandan Jha says:

    संदीप जी – कमेंट्स बंद थे इस पोस्ट पर | मैने अभी देखा तो पता चला |

    पोंटा साहिब तीन (या चार) बार जाना हुआ है , बरसात के मौसम के आसपास तो और भी सुहाना हो जाता है | आपका विवरण पढ़ कर पुरानी यादें ताजा हो गयीं , धन्यवाद | बड़ा कमेन्ट थोडा रुक कर |

  2. JATDEVTA says:

    जय हो घुमक्कड़ एडिटर टीम की जो बारह घंटे तक उनकी नजर नहीं गयी, बड़ी मुस्तैद टीम है,
    मैंने जानबूझ कर आपको नहीं बताया कि देखते है कि टीम कितनी चौकन्नी है? मुझे मुकेश भाई ने बारह बजे से पहले ही बता दिया था कि आपके पोस्ट पर कमेन्ट बंद है,

    • Nandan Jha says:

      आजकल सर्वर दिक्कतों ने ही घेरा हुआ है :-) तो उसमे और न जोडें | घुमक्कर.कॉम आप लोगों से है | दरख्वास्त है जब भी कोई कमी दिखे, तो इत्तिला करें उसे शीघ्र ही सुधारा जाएगा |

  3. जाटदेवता, पोंटा साहब के बारे में काफी अच्छी जानकारी दी तथा फोटो भी सुंदर हैं. शायद शाम को देरी से पहुँचने के कारन आप और दो गुरद्वारे जो की बिलकुल नज़दीक ही हैं पांच से दस मिनट पैदल चलकर, नहीं देख पाए. उनमें से एक में तो विशेष सग्रहालय है जहाँ पंथ की बहुत जानकारी मिलती है और सूफी बाबा की गद्दी भी है, दूसरे में जलजीरे का लंगर छकाया जाता है. मुझे जानकारी न मिल सकी क्योंकि जो सेवादार वहां जलजीरा पिला रहे थे बह भी सही से नहीं बता पाए.
    और छोरे तन्ने बधाई दी थी और दूध जलेबियाँ के लिए नौता था जवाब कुक्कर न दिया.

    • JATDEVTA says:

      त्रिदेव चरण जी राम राम
      दूध-जलेबी के न्यौता को मैं मना कर दूं ऐसा कैसे हो सकता है, बताइये कब आना है? जब आप कहे, अपुन तैयार है

  4. राम राम जी, एक और अच्छी पोस्ट, अच्छा लेखन, लगता हैं, अब तो शब्द भी खत्म हो गए हैं. संदीप जी, सिक्ख पंथ हमारे हिंदू धर्म का एक सुधार वादी रूप हैं. सर जी यदि हिंदू धर्म और हमारे मंदिरों में इतनी कुरीति, और पंडो का शोषण न होता तो हिंदू धर्म से ये सिक्ख, बोद्ध, जैन न बनते. खैर ये पंथ तो हिंदू धर्म का ही अंग हैं. पर परेशानी तब होती हैं, जब हमारी जाति व्यवस्था, कुरीतियों का फायदा मुसलमान और ईसाई लोग उठाते हैं. यदि ये सब न होता तो भारत आज दुनिया में सिरमौर होता, और सोने की चिड़िया होता.

    • JATDEVTA says:

      सोलह आने सच बात कह दी आपने गुप्ता जी, आभार बेहद ही जानकारी भरी बाते बताने के लिए

  5. Nandan Jha says:

    गुरुद्वारों के काफी बातें मुझे भी व्यक्तिगत पर अच्छी लगती हैं , जैसे शादी रविवार को दिन में करना और सादगी से करना, लंगर के बारे में आप लिख ही चुके हैं, कर सेवा को एक व्यवस्थित तरीके से अंजाम देना . वगैरह वगैरह |

  6. वाह ! संदीप जी काफी अच्छी पोस्ट है. मुझे नहुत अच्छा लगा इसका विवरण . आपके भाव बड़े प्रबल है इससे दर्शाने में. मैं आपके बताए गए गुरुद्वारा के नियमों से बिलकुल सहमत हूँ. काह्स हमारे हिंदू मंदिर में भी एक समान भावनाए सब के लिए होती तो कितना सही होता. आपने सही कहा हर जगह पैसे कमाने के चक्कर में पंडो और ट्रस्टो ने वहा का माहौल नकारात्मक कर दिया है.बाकी फोटो बहुत अच्छे है खास तौर पे यमुना नदी के.

    ऐसे लिखते रहिये संदीप भाई. जय रामजी की.

  7. संदीप भाई ………गंगटोक एम जी रोड से आपके लिये धन्यवाद ……..पौंटा साहिब मै नौ देवियो वाली यात्रा में रूका पर फोटो एक नही लिया इसीलिये लिखा नही अब तो लगता है कि बिना फोटो के तो लिखना बेकार है दोबारा घूमना पडेगा सब जगह

  8. Surinder Sharma says:

    http://www.sikhnet.com/pages/what-is-a-hukamnama
    संदीप जी,
    आपने पौंटा साहिब गुरुद्धारा के बारे में बहुत अच्छे तरीके से जानकारी दी बहुत बहुत धन्यवाद . निशान साहिब दूर से ही दिखाई पड़ जाता है और गुरुद्वारा साहिब का पता चल जाता है. आप ने जो दैनिक सूचना पट दिखा कर पुछा है उसे हुकुमनामा कहते है.
    Sikhs have been asking Guru Granth Sahibs Ji’s advice and for Guru Sahibs spiritual guidance through the tradition of taking a Hukumnama. The word Hukumnama literally means, ‘royal decree’. The method of taking is a Hukumnama is by performing an Ardas in front of Guru Granth Sahib Ji, in this ardas you can ask a question or simply ask for Guru Ji to bless you with some words of spiritual wisdom. At the end of the Ardas taking Guru Ji in both hands you open the pages of Guru Granth Sahib ji at random and the first Shabad on the left hand page of Guru Ji is the ‘Hukumnama’ filled with the spiritual wisdom or answer that you require.
    http://www.sikhnet.com/pages/what-is-a-hukamnama
    गुरुद्वारा साहिब में हमेशा सिर ढक कर रखने की प्रथा है. अगर आप के पास रुमाल ना हो यह परवेश द्वार पर रखे होते हैं. हेल्मट गुरुद्वारा साहिब में नहीं पहना जा सकता, टोपी, हैट को भी हमारे सरदार भाई जयादा पसंद नहीं करते. परुष रुमाल या और कोई कपडा सिर पर बांध सकते हैं , महिला स्कार्फ या चुन्नी से सिर ढक सकती हैं.

  9. Mukesh Bhalse says:

    संदीप भाई,
    पौंटा साहिब गुरुद्वारे का बहुत ही सजीव वर्णन तथा चित्रण किया है आपने. यहां का इतिहास भी बहुत रोचक लगा. श्रंखला का समापन भगवान के नाम के साथ हो रहा है इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है. और हां इस बार का फुल भी बहुत ही खुबसूरत लगा. अब आगे कहां लेकर चलने की तैयारी है?

  10. ritesh gupta says:

    संदीप भाई ,
    आपके लेख से पोंटा साहिब…….की बहुत ही सचित्र, सजीव और शानदार यात्रा लगी | काफी विस्तृत रूप से आपने इतिहास का वर्णन किया हैं …..जो मुझे बहुत अच्छा लगा जानकार |

  11. kamal says:

    आपने श्रीखंड महदेव जी की यात्रा के बारे में बहुत अच्छी तरह से बताने के लिए थैंक्स | मैं भी यहाँ पर गया हूँ और यात्रा पर बहुत सुन्दर नज़ारे हैं |



Leave a Reply


one × = 1