ROCK EDICT OF ASHOKA (KALSI) सम्राट अशोक का शिला लेख (कालसी में)

June 08, 2012 By:

चकराता से वापसी में विकास नगर की ओर आते समय कालसी नाम का स्थल आता है यहाँ अशोक का शिलालेख अंग्रेजी मे बोले तो ROCK EDICT है इसे देखने की इच्छा बहुत दिनों से थी। जो आज पूरी होने जा रही थी। एक बार चार साल पहले भी इस जगह के बहुत पास से बिना देखे मात्र 100 मी दूरी से होकर जा चुका हूँ, उतराखण्ड के चार धाम यात्रा करते समय महाराष्ट्र वाले दोस्त अपनी सूमों में तथा मैं अपनी इसी नीली परी पर सवार था। चार धाम के लिये गये थे, उसी सफ़र में यमुनोत्री के बाद गंगोत्री जाते समय डबरानी के पास पहाड खिसक जाने पर हम गंगनानी के गर्मागर्म पानी में नहा धोकर जब वापिस आ रहे थे तो भटवाडी से पहले भी सडक खिसक कर गंगा में समाती हुई देखी है, सडक पर एक सीमेंट से भरा हुआ ट्रक भी उसके साथ-साथ मैंने पानी में जाता हुआ देखा था। सडक खिसकने के बाद सिर्फ़ इतना मार्ग बचा था जिसपर पैदल यात्री या बाइक ही जा सकती थी। मेरी बाइक तो निकल गयी थी महाराष्ट्र वाले दोस्तों की सूमो तीन दिन बाद जाकर निकल पायी थी। वो सफ़र फ़िर कभी बताया जायेगा, अभी तो सिर्फ़ अशोक का शिलालेख देखिये।

भारत सरकार का चिन्ह, अशोक का दिया हुआ है।

कालसी आने से पहले यमुना घाटी।

अशोक के शिलालेख स्थल जाने का मार्ग है।

हमारी यह यात्रा यहाँ कालसी तक आ गयी है। इस यात्रा का असली लुत्फ़ तो शुरु से पढने व देखने में ही आयेगा। कालसी तक पहुँचने के लिये देहरादून (56 किलोमीटर)/ सहारनपुर से हर्बटपुर(दिल्ली से दूरी 225) होते हुए जाना होता है। हम लोग चकराता से वापस आते हुए यहाँ गये थे। चकराता से आते समय पहले सहिया नाम का कस्बा आता है, जहाँ से कालसी सिर्फ़ 17-18 किलोमीटर दूरी पर ही है। कालसी यमुना नदी के किनारे पर बसा हुआ है, लेकिन यहाँ पर यमुना व टोंस नदी का संगम भी होता है। यहाँ पर यमुना नदी बहुत ही शानदार घाटी बनाती है। यह काफ़ी अच्छा शहर है, लगभग हर तरह की सुख सुविधा यहाँ पर उपलब्ध है, मार्ग भले ही पहाडों में एकलौता होता हो, दो लेन की जरुरत ही यहाँ महसूस नहीं होती है। यह घाटी इतनी शानदार है कि कोई भी बन्दा यहाँ घन्टों खाली बैठ कर समय व्यतीत कर स्कता है।

देख लो, जान लो, असली है।

पढ लो जाओगे तो काम आयेगा।

दीवार भी कम सुन्दर नहीं है।

हम इस प्यारी सी ढलान वाली सडक पर आराम से चले आ रहे थे, कि तभी हमें इस शहर के मुख्य बस अडडे से पहले उल्टे हाथ एक बोर्ड नजर आया जिस पर लिखा था, अशोक का शिलालेख 200 मीटर दूरी पर है। हम तो इसी तलाश में ही थे, इस शिलालेख को देखने के लिये मुड गये। कुछ आगे जाने पर इस जगह का प्रवेश द्धार भी आ ही गया। यहाँ से ही फ़ोटो खिचवाने की शुरुआत कर दी थी। यहाँ अपनी बाइक खडी कर पैदल ही पत्थरों का बना हुआ ढलान का मार्ग था, उस पर उतरते हुए चले गये। यहाँ पर तीन चार पैडी उतरने के बाद हमें इस जगह के दर्शन हुए। यहाँ भी एक दो बोर्ड लगे हुए थे, जिन पर लिखा हुआ देखा व पढा भी। असली जगह जिसकी तलाश में हम यहाँ आये थे। यहाँ एक कमरे के अन्दर एक विशाल शिलालेख है जिस पर ब्राहमी लिपी में कुछ लिखा हुआ था, इस कमरे के बराबर में ही इस लिपी का हिन्दी व अंग्रेजी में अनुवाद भी लिखा हुआ था। जिसको आप आसानी से पढ सकते हो। दीवार पर लगे एक पत्थर से पता चलता है कि इस कमरे का निर्माण अंग्रेजों ने करवाया था, ताकि ये शिलालेख सुरक्षित रह सके। आप देखिए उतर प्रदेश को पहले क्या कहा जाता था, चित्र में साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है।

इस कमरे के अन्दर है शिलालेख।

इस शिलालेख पर क्या लिखा है उसे यहाँ समझ सकते हो।

इस पर यह कमरा अंगेजो ने कब बनाया गया था? देख लो।

भारत का राजकीय प्रतीक/ चिन्ह सम्राट अशोक की सारनाथ की लाट/स्तंभ से लिया गया चिन्ह है। इस चिन्ह में चारों दिशाओं में मुँह किये हुए चार शेर है जो एक गोल आधार पर टिके हुए है। ये गोल आधार खिले हुए उल्टे लटके कमल के जैसा है। एक ही पत्थर को काट कर बनाए गए इस सिंह स्तंभ के ऊपर ‘धर्मचक्र’ रखा हुआ है। चक्र केंद्र में दिखाई देता है, सांड सीधे हाथ, और घोड़ा उल्टे हाथ पर। चिन्ह के नीचे सत्यमेव जयते देवनागरी लिपि में लिखा हुआ है। सत्‍यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिया गया हैं, जिसका अर्थ है केवल सत्य की जीत होती है। राष्‍ट्र चिन्ह 26 जनवरी 1950 में संविधान अपनाते समय ही भारत सरकार द्धारा अपनाया गया था। कालसी भारत के महान सम्राट अशोक के पत्थर पर बने हुए शिलालेख के कारण प्रसिद्ध है। पुराने समय में पत्थरों जैसी कठोर सतह पर कुछ लिखने की परम्परा थी। प्राचीन काल से ही राजा महाराजा अपने आदेश इसी प्रकार लिखवाते थे। जिससे लोग इन्हे पढे व इन पर अमल करे। सम्राट अशोक का राजकाल ईसापूर्व 273-232 के समय का रहा है। इनका राज अफ़गानिस्तान से लेकर पूर्वी भारत तक व दक्षिण भारत में सिर्फ़ तमिलनाडु व केरल को छोड कर पूरे भारत पर था। इतिहास में मात्र तीन लोगों अशोक, सिकन्दर व अकबर को महान कहा गया है, अशोक के पिता बिंदुसार व माता कल्याणी थी। (वैसे क्रिकेट खिलाडी कपिल देव को भी महान कहते है।) इनका का जन्म 297 ई. के आसपास का है। कलिंग की भीषण लडाई के बाद अपनी दुनिया पर विजय करने की योजना छोड दी थी, बौद्ध धर्म स्वीकार व उसका प्रसार किया। मौर्यवंश में तीसरे स्थान पर नाम आता है। मैं तो इसे अशोक की मूर्ति ही मानता था, लेकिन छ्तीसगढ के वरिष्ठ ब्लॉगर श्री राहुल सिंह जी ने बताया है कि यह आवक्ष प्रतिमा, चैत्‍य गवाक्ष या चन्द्रशाला कहे जाने वाले स्‍थापत्‍य अंग का अंकन है।

यह शिला लेख है।

अगर आपको ब्राहमी लिपि आती है तो खुद पढ लो।


इस शिलालेख के सामने ही दो व्यक्ति बैठे हुए थे, हमने इनसे पूछा कि इस आकार के पत्थर यहाँ आसानी से मिल जाते है या इसे कही से यहाँ लाया गया था। तो वे हमें क्या जबाब देते है कि हम दोनों इस पत्थर को यहाँ उठा कर आये थे। खैर यह तो रही मजाक की बात, पत्थर काफ़ी बडा है। कई टन का तो जरुर ही होगा। इस जगह के पीछे की दीवार जो कि पत्थरों की बनी हुई है देखने में बडी शानदार लग रही थी। आप उसका फ़ोटो भी देखिए। इस जगह से आगे सिर्फ़ खेत ही खेत है और यमुना का किनारा व पहाड का सुन्दर सा नजारा। जिससे मन करता है कि बस यहीं बैठे रहो-बैठे रहो-बैठे रहो। जब मन भर जाये तो ही आगे जाने की सोचो। हम कोई घन्टा भर इस छोटी सी जगह पर रहे, इसके बाद हम आगे के सफ़र पर चल दिये। यहाँ से चलते ही सडक पर एक मोड आता है जिस पर मुडते हुए हम भी आगे चलते रहे, दो किलोमीटर बाद ही यमुना पर बना हुआ पुल आ जाता है। जिस के बीचों बीच जाकर हमने एक बार फ़िर अपना डेरा डाल दिया, और लग गये फ़ोटो लेने में यहाँ भी कई फ़ोटो लिये गये। इस जगह से इस शानदार घाटी को देखने का अपना एक अलग मजा आया था। यहाँ से आगे चलते हुए हम धीरे-धीरे हर्बटपुर के पास जा पहुँचे, बीच में एक जगह विकास नगर जाने का मार्ग भी था। विकासनगर इस मार्ग से एक किलोमीटर अलग हटकर है। वैसे अब तो आबादी इस मार्ग तक भी फ़ैल चुकी है।

एक और प्यारा फ़ूल।

यहाँ से यमुना घाटी का प्यारा सा नजरा।

यमुना पर बना हुआ पुल जो कालसी पार करते ही आता है।

हर्बटपुर के लगभग आखिर में जाकर एक चौराहा आता है जहाँ से एक मार्ग उल्टे हाथ देहरादून व सीधे हाथ पौंटा साहिब, तथा सामने वाला मार्ग जिस पर हम जा रहे थे, सीधे सहारनपुर की ओर चला जाता है। हमें तो पौंटा साहिब गुरुद्धारा जाना था, अत: हम तो मुड गये सीधे हाथ की ओर जाने वाले मार्ग पर। लेकिन आपको ध्यान होगा तो हर की दून से वापस आते समय मैं और धर्मेन्द्र सांगवान इस मोड से उल्टे हाथ की ओर मुडकर देहरादून की ओर चले गये थे, क्योंकि यह मार्ग आगे जाकर बेहद ही बुरी हालत में था, जो अब तज भी नहीं सुधरा है। इस मोड से कोई दस किमी तक सीधे व शानदार मार्ग पर जाने के बाद एकदम से मार्ग गायब सा हो जाता है, तलाशने पर पता चला कि यहाँ पर कोई बैराज बना हुआ है जिससे मार्ग कुछ घुमा-फ़िरा कर बनाया हुआ था। इस बैराज का नाम तो पता नहीं था किसी ने बताया कि ये तो देहरादून की ओर से आने वाली आसन नदी पर बना हुआ बैराज है। जिस कारण सब इसे आसन बैराज के नाम से जानते है। यहाँ से केवल छोटे वाहन कार-बाइक ही पार कर सकते है, क्योंकि यहाँ सडक पर लोहे के बैरियर लगाये हुए है। बडी गाडियों को पौंटा साहिब की ओर जाने के लिये हर्बटपुर से थोडा और आगे जाना होता है जहाँ से सीधे हाथ राज मार्ग पौंटा साहिब की ओर जाता हुआ मिल जायेगा।

यमुना

तीनों मस्तमौला, मनमौजी जाट इस पुल पर।

भोला-भाला विपिन भी एक किनारे पर।

इस बैरियर को पार करने के बाद जब हम रुके तो आगे सिर्फ़ एक बडी सी पक्की नहर ही जा रही थी। आगे का सारा सफ़र इस नहर के किनारे-किनारे ही रहता है। कुछ आगे जाकर यह नहर वाला मार्ग, उल्टे हाथ सहारनपुर, देहरादून व हर्बटपुर की ओर से आने वाले मुख्य जिस से बडी गाडियाँ आती है यह उसी मार्ग में मिल जाता है। इस नहर से आगे जाकर बिजली बनायी जाती है उस जगह पर एक बडा सा बिजलीघर भी बना हुआ है। यहीं पर यह नहर यमुना में भी गिर जाती है। यहाँ से कुछ आगे जाने पर यमुना नदी पर बना पुल भी नजर आ जाता है। इस पुल के इस किनारे तक उतराखण्ड व पुल को पार करते ही हिमाचल शुरु हो जाता है। पुल पार करने के बाद ही हिमाचल का बैरियर भी आ जाता है। इस बैरियर पर कार, बस, ट्रक आदि वाहनों से टेक्स वसूली हो रही थी, बाइक का शुल्क यहाँ भी माफ़ था। बिना रोक टोक हम चलते गये और इस बैरियर को पार करते ही उल्टे हाथ पर एक मार्ग पौंटा साहिब गुरुद्धारा की ओर चला जाता है। व सीधा मार्ग अम्बाला की ओर चला जाता है यहाँ से अम्बाला 105 किलोमीटर दूरी पर है। यहाँ से रेणुका झील 86 किलोमीटर दूर है। पहले हमारा इरादा इस रेणुका झील तक भी जाने का था लेकिन हिमाचल के पहाड के सडे हुए टूटे-फ़ूटे से कच्चे मार्गों पर जाने कि हिम्मत दुबारा नहीं हुई थी। हम सीधे गुरुद्धारे के सामने जा पहुँचे।

आसन बैराज भी देख लो।

अब आगे का मार्ग नहर किनारे ही है।

बच्चे पुल से कूद कर आसन नदी/नहर में नहा रहे थे।

अब पौंटा साहिब गुरुद्धारे में क्या-क्या देखा, इसके लिये तो आपको इस यात्रा का आगे का भाग देखने के लिये यहाँ पुन: आना होगा।

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

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16 Responses to “ROCK EDICT OF ASHOKA (KALSI) सम्राट अशोक का शिला लेख (कालसी में)”


  1. Surinder Sharma says:

    संदीप भाई बहुत अच्छा लग रहा है पढ़ कर , भोले बाबा के दर्शन और अब अशोक का शिलालेख. अशोक महान थे काश उनके बाद भी लोग वैसे होते . आप ने बहुत मेहनत से लिखा है , फोटो भी सुंदर और जानकारी भरपूर हैं. आप का बहुत बहुत धन्याबाद .

  2. अशोक शिलालेख के दर्शन के लिए धन्यवाद. हम लोग ने ऐसी शिलालेख जूनागढ़ में भी देखी थी.बच्चे का फोटो बहुत बढ़िया लगा.

    • JATDEVTA says:

      विशाल भाई हम तो जुनागढ की बीस हजार सीढियां की चढाई में रात भर लगे रहे हमें अँधेरे में पता नहीं लगा कि शिलालेख कहाँ थे?

  3. संदीप जी राम राम, सम्राट अशोक के बारे में पढ़ कर अच्छा लगा. ये बात ठीक हैं की सम्राट अशोक एक चक्रवर्ती सम्राट थे, और कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने बोद्ध पंथ, और अहिंसा का पालन किया, आज जो संसार में बोद्ध पंथ हैं, वह सम्राट अशोक के कारण से ही हैं, पर इस अहिंसा और कूप मंडूकता के कारण ही बाद में भारत गुलाम भी होना शुरू हो गया था. इतिहास में सर्वप्रथम सम्राट की उपाधि चंद्रगुप्त मौर्य को मिली थी, और उनके बाद उनके पड़ पौत्र अशोक को मिली थी. अशोक के समय में भारत का नाम और ख्याति दुनिया में सर्वोच्च स्थान पर थी. अशोक के बाद ये स्थान केवल गुप्त वंश के शासको को ही मिल पाया था. अशोक महान थे, पर हम लोग अकबर और सिकंदर को महान नहीं कह सकते हैं. ये बात इतिहास भी जानता हैं. अकबर और सिकंदर को महान केवल पश्चिमी , मुस्लिम, व वामपंथी इतिहासकारों ने बताया हैं. इन लोगो ने भारत पर जो जुल्मो सितम किये हैं, ये हम सभी लोग जानते हैं. यमुना घाटी की सुंदरता का ज़वाब नहीं हैं. और वर्षा होने के बाद घाटियों और पर्वतो की सुंदरता और हरियाली और भी निखर कर आती हैं. बहुत अच्छी पोस्ट हैं, फोटो बहुत प्यारे हैं. जल्दी ही पांवटा साहेब के भी आपके द्वारा दर्शन कर लेंगे, धन्यवाद बहुत बहुत.

    • JATDEVTA says:

      परवीन जी आपकी बात एकदम सही है क्या आप जानते है कि अकबर ने एक हिन्दू लड़की से शादी की सिर्फ इसलिए उसें धर्म निरपेक्ष दिखाया जाता है |आप की यह बात भी सत्य है कि इस अहिंसा के कारण ही विदेशी हमलावर यहाँ आने की हिम्मत कर सके थे, लेकिन क्या करे? समय बड़ा बलवान है

  4. sarvesh n vashistha says:

    संदीप जी , लगता हे की आपकी यह घुम्माकड़ी पूर्ण होने को हे जो की पुस्तक के रूप में संजोने लायक हे.
    कोण सा फोटो अच्छा नहीं लगा कोई नहीं कह सकता
    हस्ते खेलते फोटो , थकावट वाले चेहरे .
    समापन के बाद के वजन भी जरूर लिखना
    अति सुंदर

  5. Nandan Jha says:

    शिला लेख का ज़िक्र सुना तो लगा की आप पहले भी ले जा चुकें हैं हमें इस जगह पर, धर्मेन्द्र सांगवान जी के साथ | हम लोग जब गए थे (२००२ या उस के आस पास के बात है) तो काफी जीर्ण हालत में था ये पूरा काम्प्लेक्स , अच्छा लगा देख कर की ASI और सरकार ने कुछ अच्छा काम किया |

    अप्रैल अंत में कोलकाता गया था तो इंडिया मुज़ीयम में अशोक स्तम्भ देखने को मिला |

    पोंटा भी कई बार जाना हुआ तो इंतज़ार रहेगा अगली पोस्ट का |

  6. बहुत बढिया लेख , फोटोज नेट की स्पीड कम होने से खुल नही पाये यहां पर पर कोई बात नही बाद में देख लूंगा

    • Monty says:

      ओ भाई आपकी पोस्ट पर किये हुए कमेन्ट तो पढ़ लिया करो..सबसे बड़ी शिकायत यही है मेरी…कमेन्ट पढ़ लिया करो..

      दिमाग खराब हो रखा है आगे की पोस्ट कब आयेगी ..

      • JATDEVTA says:

        मोंटी भाई क्यों परेशान हो मनु भाई आजकल पूर्वी भारत के असम सिक्किम सहित कई राज्यों की घुमक्कडी पर है इसलिए वे आपके कमेन्ट का जवाब नहीं दे रहे है, १९ या बीस तक घर आ जायेंगे,

  7. D.L.Narayan says:

    As always, Sandeep bhai, a very interesting, informative and enjoyable account of your adventures.

    You had mentioned that there are only 3 emperors in Indian History who have been called “Great”. There is a fourth, Raja Raja Chola the Great, the 10th century Chola emperor whose empire covered most of peninsular India and included Sri Lanka. The famous Brihadeeshwara temple in Tanjore (Thanjavur) was built during his reign.

  8. Surinder Sharma says:

    Thanks D.L for giving information about Raja Chola the Great.

  9. anil kumar says:

    bhai main bhe gaya hoon is jagh to, badiya likha hai. poora padha. mujhe bhe le kar jaaoge kyaa mere paas bhi bike hai. hindi me kaise likhte hai bataaoge to meharbaanee hogee…………

    • Ritesh Gupta says:

      अनिल जी…..

      नीचे दिए लिंक पर क्लीक करो…….हिंदी अंग्रेजी में टायप करो…..जैसे anil और स्पेस छोडो और वह हिंदी में बदल जाएगा……फिर कॉपी पेस्ट का उपयोग करके कही भी उपयोग किया जा सकता है……

      http://www.google.com/transliterate

  10. anil kumar says:

    mera mobile no likh lo. bike par jao to jarur bata dena 9015922121 9015190837

  11. Ritesh Gupta says:

    आपने सम्राट अशोक का शिला लेख (कालसी) बहुत अच्छी यात्रा कराई …| मैंने इस जगह का नाम नहीं सुना था….इक नै जानकारी आज हासिल हुई आपके लेख से ….| बहुत अच्छा वर्णन किया हैं आपने …..|



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