RAMPUR-ROHRU-TUNI-CHAKRATA road view रामपुर-रोहडू-त्यूनी-चकराता सडक मार्ग |
रामपुर में रात को ठहरने का कार्यक्रम पहले से ही तय कर लिया था। अत: कई होटल को देखने के बाद भी जब उचित कीमत पर बात नहीं बनी तो किसी ने बताया कि आप लोग नीचे की ओर सरकारी पंचायती गेस्ट हाऊस में जाओ आपको वहाँ अच्छा कमरा मिल जायेगा। हम नीचे की ओर बताये गये गेस्ट हाऊस की ओर चले गये, वहाँ जाकर देखा कि कमरों का पहरेदार उस समय वहाँ पर मौजूद नहीं था। उसके घर से उसका फ़ोन नम्बर लिया, उससे फ़ोन पर बात की, तब उसने बताया कि मैं आधे घंटे बाद आऊँगा। जब वो आया, हमने अपना सामान कमरे में रखा, दो दिन से नहाये नहीं थे सभी जम कर नहाये व आराम से पंखा चलाकर सो गये। अगले दिन हमें चकराता जाना था। यहाँ कमरे मात्र 250 रुपये में मिल गये थे। रामपुर में मजे से सारी रात पंखे के नीचे गुजारने के बाद आज घर की ओर जाने की बारी थी। दिल्ली से रामपुर तक आने के लिये शिमला होते हुए आना होता है, व वापसी भी शिमला होते हुए मुख्य मार्ग से ही जाया जाता है, लेकिन हम ठहरे कुछ अलग खोपडी के इंसान। अरे बन्धु जब वाहन अपना, चालक हम स्वयं, तो फ़िर क्यों बसों की सवारियों की तरह लाचार होकर, उन मार्गों से ही वापस जाया जाये जहाँ से हम यहाँ तक आये थे जबकि हमारे पास दूसरे विकल्प भी हो तो। तो बन्धु मेरी इस मार्ग से जाने की सलाह तीनों ने मानी, वैसे दो तो बेचारे हमारे साथ मौज-मस्ती के लिये थे, मार्ग से उन्हे कोई लेना देना नही था। मार्ग कि चिंता तो दो को ही होती थी, वो भी कुछ खास नहीं होती थी। हमने यहाँ आने से पहले नक्शा खोल के भी देख लिया था।
शाम को तो सब नहाये ही थे फ़िर भी सब एकबार फ़िर सुबह नहा धो कर चलने को तैयार हो गये थे। समय वही पुराना 7 बजने वाले थे,(नीरज के चक्कर में) जब यहाँ से चले तो सामने ही एक दीवार पर दूरी दर्शाने वाला बोर्ड था। रामपुर काफ़ी बडा शहर है, अत: हमने यहाँ से ही अपनी बाइक में पेट्रोल लेना उचित समझा, सबसे पहले हम पेट्रोल पम्प की तलाश में चल दिये। हमने दो-तीन किलोमीटर का यह शहर पार कर लिया, पर हमें पम्प नहीं मिला, जब एक जीप वाले से पूछा कि भाई पेट्रोल पम्प कहाँ है? वो उल्लू की पूँछ पैट्रोल पम्प तो बताने से रहा बल्कि हमारे बैंत के लठ देखकर बोला कि पहले गन्ना खिलाओ तब बताऊँगा कि पेट्रोल पम्प कहाँ है, जब उसके मुँह के आगे अपने कील वाले बैंत के लठ अडा दिये तो उसकी आँखे फ़टी की फ़टी रह गयी कि गन्ने लठ कैसे हो गये। बैंत के डंडे दूर से देखने में गन्ने जैसे ही दिखाई देते है। खैर हमें जब पम्प नहीं मिला तो हम वापस शिमला की ओर चल दिये, रामपुर से 10 किलोमीटर पहले एक पम्प आता है। यहाँ से हमने अपनी बाइक की टंकी फ़ुल कराई व आगे की यात्रा पर चल दिये।
आगे शिमला की ओर नहीं, बल्कि रामपुर की ओर, हमें जाना था रोहडू होते हुए, जिसके लिये रामपुर से 7 किलोमीटर पहले सीधे हाथ वाला मार्ग रोहडू की ओर जाता है जिसकी दूरी सतलुज किनारे से मात्र 81 किलोमीटर है। उल्टे हाथ पर सतलुज नदी है, जो आगे रामपुर के मध्य से होते हुए चली आ रही है। जब इस मोड से आगे के लिये चले थे, सुबह के 8 बजने वाले थे। यहाँ खाने पीने को कुछ नहीं मिला था, अत: आगे के लिए चलते रहे। इस मार्ग पर भीड नाममात्र की ही थी, कभी-कभार ही कोई वाहन आता था। सडक कोई खास चौडी तो नहीं थी, फ़िर भी 12-15 फ़ीट की तो रही होगी। नीरज के पेट में भूख के मारे परेशानी हो रही थी, मार्ग में एक दुकान मिली उससे लेकर कुछ नमकीन खायी गयी, फ़्रिज का पानी पिया, यहाँ फ़्रिज का ठन्डा पानी देख सब चौंक गये थे। वैसे रामपुर में भी रात को छत के पंखे चलाकर सोये थे। मौसम देहरादून जैसा ही था या ये कहो कि हम बर्फ़ से हो कर आये थे जिससे हमें ऐसा लगा हो। जहाँ हमने नमकीन खायी थी सामने ही सेब के बाग थे लेकिन यहाँ पर दुकान वाले ने कहा कि सेब अभी कच्चे है। उससे खाने के ठिकाने का पता किया तो उसने एक जगह तकलेच के बारे में बताया जो उसकी दुकान से 18 किलोमीटर आगे थी।
अब खाना मिलने की जगह का पता चल गया था। अत: सबके मन में भूख ने जोर लगा दिया था, लेकिन जब इस जगह के पास आये तो पता चला कि वो जगह तो इस मार्ग से एक किलोमीटर दूसरे मार्ग पर हट कर है, दो किलोमीटर बेकार में चलने के बजाय, हम आगे की ओर चलते रहे। अब मार्ग की हालत कुछ डावाडोल होने लगी थी, सडक जगह-जगह से खराब आ रही थी, कही-कही तो कीचड भी मिल रहा था चढाई भी थी, लेकिन ऐसा नहीं था जैसा बागीपुल से आगे है। बाइक पर सवारी, ऊपर से सडक खराब होने के कारण पीछे बैठने वाली सवारी परेशान होने लगी थी। हर 10 किलोमीटर के आसपास नीरज बाइक रुकवा देता था, बाकि सब भी अपने-अपने हाथ पैर सीधे कर लेते थे। बारिश ने भी बीच-बीच में डराने की कोशिश की थी, लेकिन हम चलते रहे। आखिर हम इस मार्ग की सबसे ऊँची जगह साँकुरी पर जाकर ही रुके। यहाँ एक छोटा सा गाँव है कुछ दुकाने है, यह जगह एक दर्रे जैसा ही है। यहाँ से एक मार्ग नारकंडा जाता है दूसरा रोहडू होते हुए चकराता, व तीसरा रामपुर जिससे हम आ रहे थे।
यहाँ हमने एक दुकान से चाऊमीन बनवा कर खायी थी, जब तक चाऊमीन बनी तब तक हम यहाँ आस-पास घूम आये थे। एक अंग्रेजों का बनाया हुआ घर भी है। और कुछ पुराने घर भी यहाँ मिले थे। यह जगह बिल्कुल जलोडी जोत के जैसी ही लग रही थी। चढाई उतनी भयंकर नहीं है, मार्ग लम्बा है जिस कारण चढाई आसान हो गयी है। यहाँ से रामपुर 60 किलोमीटर के आसपास है। खा पी कर जब आगे चले तो दो मार्ग थे। हम उल्टे हाथ वाले मार्ग पर रोहडू के लिये नीचे की ओर उतर गये, यहाँ से रोहडू तक 20 किलोमीटर तक ढलान ही ढलान थी। सडक भी काफ़ी अच्छी बनी हुई थी। मार्ग के शानदार नजारों का लुत्फ़ लेते हुए हम चले जा रहे थे, कि एक जगह पर तिब्बती लोगों जैसा मकान या मंदिर दिखाई दिया। सडक से दूर था, अत: हम दूर से उसे देख, फ़ोटो ले कर आगे चल दिये थे। रोहडू शहर के नजदीक जाते ही कुछ देर आराम किया गया। यहाँ बिल्कुल बडॆ-बडे शहरों जैसे मकान व होटल बने हुए है। मार्ग के सीधे हाथ पर एक विशाल मैदान भी देखा, जिसमें कोई मैच भी हो रहा था।
यहाँ के बस अडडे से होते हुए हम सीधे नाक की सीध में आगे की ओर चलते गये, जबकि उतराखण्ड जाने वाला मार्ग बस अडडे के एकदम साथ ही सीधे हाथ पर ही मुडा हुआ है, लेकिन कोई बोर्ड नहीं होने के कारण हमें पता ही नहीं चला, कोई दो किलोमीटर आगे चीडगाँव वाले मार्ग पर जाकर हमने पता किया, तब हम उसी बस अडडे पर वापस आये जहाँ से हम आगे चले गये थे, यहाँ पर नीरज को फ़िर से भूख लगी, वह डॆढ दर्जन केले ले आया था। नितिन ने अपने लिये चप्पल खरीदी थी, विपिन ने और मैंने कुछ नहीं लिया। हम वापस आते हुए बस अडडे के साथ उल्टे हाथ की ओर जाने वाले मार्ग पर मुड गये। मार्ग अब उल्टे हाथ हो गया था, नहीं तो आते समय सीधा हाथ ही था। यहाँ से एक नदी के किनारे-किनारे आगे का सफ़र चलता रहता है। सारा मार्ग ढलान वाला था, लेकिन हिमाचल की ये सडक ठीक ठाक ही थी, शानदार नहीं थी। इस शहर को पार करने के बाद ही हमने केले खाये थे। यहाँ कालेज के छात्रों के मध्य खुले आम आशिकी हो रही थी। धीरे-धीरे वो जगह भी आ गयी जहाँ सीमा पर हिमाचल का आखिरी चैक पोस्ट था। यहाँ आने जाने के लिये जीप का प्रयोग हो रहा था। यहाँ भी हमारे लठ देख कर पुलिस वाला चौंक गया था। लेकिन उसे जब बताया कि श्रीखण्ड महादेव की पैदल यात्रा करके आ रहे है तो बडा खुश हुआ था।
अब तो बार्डर क्षेत्र आ गया था जिस कारण मार्ग की हालत खराब ही थी, हाँ जहाँ से उतराखण्ड शुरु होता है, वहाँ से सडक एक बार फ़िर शानदार आ गयी थी, यहाँ एक बडा झमेला देखा कि कुछ दूर पर देखो तो हिमाचल का बोर्ड दो किलोमीटर आगे जाने पर फ़िर उतराखण्ड का बोर्ड ये चक्कर बडा घमचक्कर था। इस प्यारे से मार्ग पर चलते हुए, एक जगह सरकारी नल पर पानी पीने के लिये रुके थे, तो वहाँ कुछ स्कूली लडकियाँ पहले से पानी पी रही थी। हमें भी प्यास लगी थी जैसे ही हमने बाइक रोकी तो लडकियाँ हमें देखते ही वहाँ से भाग खडी हुई थी, अब पता नहीं हमारी शक्ल से डर गयी थी, या हमारे लठों से। पानी पीने के बाद आगे चल दिये थे। कुछ आगे चलने पर उतराखण्ड का पहला कस्बा त्यूनी आ गया था। वैसे एक कस्बा आराकोट भी आता है लेकिन वो एकदम बोर्डर पर है, उसका कितना भाग हिमाचल में व कितना उतराखण्ड में है यह कहना मुश्किल है? यहाँ त्यूणी में रुक कर खाना खाया गया। नीरज ने समौसे खाये थे, हम तीनों ने राजमा व रोटी का भर पेट स्वाद लिया था। यहाँ से एक मार्ग एशिया के सबसे ऊँचे चीड के पेड को देखने के लिये जाता है, लेकिन यहाँ आकर पता चला कि वो पेड तो दो साल पहले ही टूट गया था। बडा दुख हुआ, बेचारा पेड हमारा इंतजार भी ना कर सका। हर की दून यात्रा में मैं आपको उस पेड के दर्शन करवा चुका हूँ।
जब यहाँ से आगे चले तो एक पुल आता है, चकराता जाने वाले इस पुल को पार करते है, नदी के इस किनारे वाले हिमाचल में चलते रहते है, यहाँ पर दो सबसे बडे घुमक्कड संदीप पवाँर व नीरज जाट जी से एक छोटी सी भूल हो गयी जो आगे जाकर एक बडी भारी गलती बन गयी थी। असल में हमें चकराता जाना था, लेकिन इस बात का ध्यान नहीं रहा कि पुल त्यूनी से पार करना है हम दोनों इस भूल में रहे कि पुल पार करके मोरी व बडकोट वाला मार्ग है जो आगे यमुनौत्री भी चला जाता है। पुल पार करते ही दो मार्ग हो जाते है, उल्टे हाथ मोरी बडकोट व सीधे हाथ वाला चकराता होते हुए मंसूरी देहरादून की ओर चला जाता है। हमने पुल पार ही नहीं किया, असलियत में मुझे तो इस पुल पर कोई बोर्ड नजर नहीं आया था, एक बोर्ड था, वो आधे किलोमीटर पहले था। हम इस नदी के साथ-साथ चलते रहे, लेकिन सबसे बुरी बात जो हुई कि इस मार्ग की हालत बहुत ही बुरी थी, ऊपर से एक बोर्ड जो हर दो तीन किलोमीटर पर आता था कि देहरादून इतना, पौंटा इतना बाकि है जिससे हम इसे देहरादून वाला मार्ग समझ रहे थे। असलियत में यह देहरादून तो जाता था, परन्तु यह चकराता होते हुए नहीं जाता था।
त्यूनी से चकराता 84 किलोमीटर दूर था। जब हम 50 किलोमीटर आगे आ गये तो हमारे से आगे चल रहे नितिन व विपिन एक वाई आकार दोहराहे/तिराहे पर रुके हुए मिले, अब दो पैदल वाले यात्रियों ने बताया कि आप तो गलत रास्ते पर आ गये हो। खोपडी खराब, गलती का पता भी चला तो पूरे 50 किलोमीटर आगे जाकर। अब इस गलती का सुधार कैसे हो? तो उन्होंने बताया कि 4-5 किलोमीटर आगे जाकर एक पुल उल्टे हाथ पर आयेगा, जिसे पार करते ही आप उतराखण्ड में चले जाओगे। वहाँ से 18-20 किलोमीटर आगे जाकर, फ़िर आपको उल्टे हाथ वाले मार्ग पर जाना होगा, क्योंकि ये मार्ग आगे तैयार नहीं हुआ है। जिससे आप उस मोड से आगे 52 किमी जाकर सहिया नाम की जगह पर पहुँच जाओगे जो कि चकराता-कालसी-विकासनगर मार्ग पर आता है। अब क्या करते? चल दिये जी उनके बताये मार्ग पर पुल पार किया फ़िर वो मोड भी आया, मुड गये इस मोड से सहिया 52 किलोमीटर था, व सहिया से चकराता 22 किलोमीटर था। कुल मिलाकर हमारी छोटी सी भूल हम पर 75-80 किलोमीटर भारी पडी वो भी बेकार से सडॆ से खड्डे वाले मार्ग पर, जहाँ पीछॆ बैठने वालों के पिछवाडे का बुरा हाल हो गया था। गनीमत ये रही कि उतराखण्ड में आते ही सडक की हालत अच्छी हो गयी थी। नहीं तो बेचारे पीछे बैठने वाले मारे जाते, दो घन्टे और दर्द भरा मार्ग सहना पडता।
जब सहिया 32 किलोमीटर बाकि रह गया था तो एक और गजब हो गया, मैं आगे चल रहा था, जब नितिन आता हुआ नहीं दिखाई दिया तो हम भी रुक गये तभी एक मोड से नितिन पैदल बाइक चलाता आ रहा था, विपिन पीछे-पीछे पैदल आ रहा था। मैं व नीरज परेशान कि इन्हें क्या हुआ? हम वापस उनके पास गये तो पता चला कि अगले पहिया में पेन्चर हो गया है। अब मेरी बाइक पर तीन सवारी थी नितिन अकेला पीछे होकर बाइक चला रहा था। सहिया से 18 किलोमीटर पहले अंधेरा हो गया था तो सोचा कि रात यही रुका जाये, लेकिन पता लगा कि उस गाँव में रात रुकने का प्रबन्ध नहीं था अत: हम सहिया के लिये चल दिये, 8:30 पर हम सहिया आ चुके थे। यहाँ नेगी होटल में एक कमरा लिया गया जिसका किराया 300 रुपये टी वी सहित था। खाना खाया, बाइक में पेन्चर लगवाया व दस/ग्यारह बजे तक सब सो गये थे।
टाइगर-फ़ॉल TIGER FALL अगले लेख में दिखाया जायेगा।


































पूर्ण रूप से हरयाली वाली पोस्ट , क्रिकेट मैदान , अंग्रेजो की कोठी . बड़े तथा छोटे बजरंगबली की जय
जहाँ प्रेम होता हे वहां नियम नहीं होते _(एक पर तीन
बेठना ) पंचर वाली बा इ क केसे चलती हे.
सर्वेश जी पंचर वाली बाइक बिल्कुल ऐसे ही चलती है बस थोडी सी सावधानी ज्यादा हो जाती है खासकर ब्रेक लगाते समय।
beautiful post,quite adventurous journey,nice photos.Congats.keep travelling and keep posting.
संदीप जी राम राम, क्या खूब, भई वाह, सारे के सारे चित्र ऐसे हैं, जैसे की वालपेपर, हनुमान जी वाला फोटो का जवाब नहीं, आप में भी बिलकुल हनुमान जी वाली शक्ति आगई लगती है. इतने वीराने में हनुमान जी की इतनी अच्छी मूर्ति गज़ब, जय बजरंगी. क्रिकेट के मैदान वाकई फोटो बहुत खूबसूरत है, इतनी ऊँचाई पर इतना सुन्दर ओर बड़ा मैदान गज़ब. चाउमीन की दूकान पर लगे हुए स्लोगन शिक्षाप्रद हैं. बच्चो का फोटो प्यारा है. दुबारा आपका पोस्ट पढकर मज़ा आगया गुरूजी. ऐसी गर्मी में ये हरियाली, ठंडक मिली हैं. धन्यवाद….
ठेयोग और नारकंडा तो मैंने भी देखा है पर बहुत साल पहले. आप ने रोहरू और रामपुर की सेर करवा दी मन को बहुत तसल्ली मिली. आप वहां है मुझे लगता है मैं वहां भी हूँ . मैंने तो सिर्फ रोहरू और रामपुर का नाम सुन रखा है . जहाँ प्रेम होता हे वहां नियम नहीं होते….. वाह क्या बात है, यह बात जब बुले शाह को पता लगी थी तो उसने अपनी तस्बीह (माला) फ़ेंक दी थी. जब भगवान से प्यार है तो गिनती किस बात की चाहे एक माला फेरो या दस. बजरंगबली जी को बहुत परणाम. भगवान बजरंगबली को और अपने लाडले संदीप बजरंगबली को भी .
एक और रोमांच से भरी पोस्ट. बहुत अच्छी जगह, बढ़िया नज़ारे है और बढ़िया चित्र है. सुंदर वातावरण का आभास भी होता है. आखिरी फोटो में से वोह नदी पार अकरने वाला पूल काफी अनोखा लगता है. फिर से इन रंगीन हरी जगहों का दर्शन करवाने के लिए धन्यवाद.
संदीप जी,
गन्ने का किस्सा पढ़कर सचमुच हंसी आ गई. अंग्रेजों द्वारा बनवाई गई उस कोठी का फोटो तथा उसके आस पास का माहौल देखकर उसमें रहने की लालसा जाग्रत हो गई. क्या अभी वहां कोई रहता है? बन्दे को किराये पर मिल सकती है क्या कुछ दिनों के लिए?
सुविचार वाला पोस्टर भी बहुत अच्छा लगा और उस पर सुरिंदर शर्मा जी की प्रतिक्रिया सचमुच काबिले तारीफ़ लगी.
शिमला से रामपुर आओ तो ढलान ढलान है, जहाँ शिमला ५६००-५८०० के आसपास है, वहीँ रामपुर शायद ३५०० के आस पास है | मैं तो रास्तों के जाल में खो गया, सोचा की जब इस तरफ जाना होगा तब फिर से पढ़ लेंगे , वैसे क्या ये रास्ता कार से किया जा सकता है ?
पोंटा में एक मित्र रहतें हैं, कई बार सोचा की पोंटा चलतें हैं और वहां से शिमला के ओर निकलेंगे | खैर | चलते रहिये | मई २०१२ के विशिष्ट लेख के सम्मान के लिए बधाई संदीप | :-)
नहीं, नन्दन जी, ऐसा नहीं है। शिमला के मुकाबले नारकंडा ज्यादा ऊंचाई पर है, इसलिये शिमला से नारकंडा तक तो चढाई है। हालांकि दूरी काफी होने के कारण रास्ता समतल सा लगता है। नारकंडा के बाद उतराई शुरू होती है।
और रामपुर तक रास्ता तारीफ करने लायक है। कार से जाओ, बहुत अच्छा रास्ता है।
सही बात है नीरज , मैने ज्यादा generalize कर दिया | काज़ा जाते वक़्त यही से गए थे |
नन्दन जी कार छोडो ट्रक से चले जाओ वो भी नहीं अटकेगा, जब इस रूट से बस आती जाती है तो फ़िर क्या डर?
सांकुरी टॉप से तो ढलान सी ढलान है पौंटा साहिब तक, बल्कि अम्बाला, दिल्ली तक,
क्यों नीरज भाई सही कहा ना?
हां, बिल्कुल सही कहा। सांकुरी के बाद रोहडू, उसके बाद चीडगांव से आने वाली रूपिन (शायद यही नाम है) नदी के साथ आराकोट, त्यूनी, इसके बाद रूपिन नदी टौंस में मिल जाती है जो यमुना में गिरने तक साथ साथ ही चलती है। उसके बाद तो अम्बाला, दिल्ली क्या इलाहाबाद और कलकत्ता तक चले जाओ, ढलान ही ढलान मिलेगा। क्योंकि नदियां हमेशा ढलान की ओर बहती हैं और इनके साथ साथ सडकें भी ढलान वाली हो जाती हैं।
lovely description… mujhe laga ye mera pados wala Rampur[uttar pradesh wala] hai…HP me bhi kya rampur??
landscape and pix are really as bful as wallpapers.. apna India itna khoobsurat hai ye jaan kar badi tasalli hui…but jaankar dukh bhi hua ki modern youth Publically apne vulgar pyar ka tamaasha karte phir rahe hain :(
ye last picture wala tree Probably Himalayan Alovera (Ghritkumaari naamak jadi-booti) ka hai…
keep rocking Jaats… will join u soon one day. .:)
tkcr…
अभिषेक भाई, रामपुर एक बेहद कॉमन नाम है। यह हर जगह मिलता है। वैसे हिमाचल वाले रामपुर का पूरा नाम रामपुर बुशैहर है।
दो रामपुर मुज़फ्फ़र्नगर के पास भी हैं, एक रामपुर (रामपुर तिराहा), दूसरा रामपुर मनिहारान सहारनपुर के पास. एक रामपुर जिला भी हैं, हल्द्वानी से पहले.
गुप्ता जी, अभिषेक रामपुर जिले की ही बात कर रहे हैं। वे बरेली के रहने वाले हैं।
dhanyavaad neeraj bhai ji.. :)
बहुत अच्छा लेख ,फोटो भी बहुत सुन्दर लगे…