SRIKHAND MAHADEV श्रीखण्ड महादेव, पद यात्रा समापन, भाग 13, (काली घटी-थाचडू-डंडाधार-जाव) |
आज हमारी पैदल यात्रा व श्रीखण्ड यात्रा का आखिरी दिन था। सुबह उठते ही आज तो नीचे जाने की धुन सवार थी। चलने से पहले सुबह-सुबह उठकर दो-दो परांठे खा कर चले थे, ताकि किसी को खचेडू से पहले भूख तंग ना करे, वैसे भूख दस बजे तक तो ज्यादा तंग नहीं करती है उसके बाद पेट में परेशानी सी होने लगती है। मैंने कई बार पाया कि अपनी सहनशक्ति भूख के मामले में भी इन तीनों से कुछ अधिक ही रही थी। पहाड पर चढ़ने के मामले में विपिन सबसे बढ़िया था, मैं किसी भी यात्रा पर जाने से पहले पूरी तरह मानसिक व शारीरिक दोनों रुप से पूरा तैयार होकर ही घर से बाहर जाता हूँ। तीनों कुछ अलग किस्म के है, ये तो सब को पता चल ही गया होगा। अपने नींद के मारे छोटे जाटराम सुबह उठने में थोडे से नखरे दिखाते थे, मुझे नेट पर लिखने की प्रेरणा देने वाले जाटराम नीरज ही है उम्र में भी सबसे छोटा था, इसलिये कुछ भला-बुरा भी कहा भी नहीं जाता था, मैं आसानी से किसी को बुरा नहीं कह पाता हूँ, अब नीरज को थोडा सुधारना भी जरुरी था उसका इलाज मैंने यह निकाला था कि भाई हम तो जा रहे है, तुम आते रहना, ये शब्द सुनते ही जाटराम तुरन्त तैयार होने लगते थे। इसी कारण मैंने नैन सरोवर में भी चलने को कह दिया था। लेकिन जब तक कोई अपनी परेशानी ना बताये पता कैसे चलेगा। ठीक यही बात नीरज ने भी नहीं बतायी थी कि मुझे कुछ परेशानी हो गयी है। मैं इस चक्कर में था कि सुबह की नींद के कारण गुस्से में परेशान है। सुबह के पौने सात बजने वाले थे नीरज अभी जूते पहन ही रहा था कि हम आगे घर वापसी के लिये चल दिये थे, वैसे भी आज नीरज का दिन था, मतलब आज उतराई थी, लेकिन कल शाम को पार्वती बाग से उतरते समय फ़िसलकर जिस आसानी वाली धडाम से नीरज गिरा था, उसके बाद अब उतराई में नीरज की वो शताब्दी वाली चाल नजर नहीं आ रही थी। जिससे वो जाना जाता है। आज उसमें हमको पीछे छोड सकने वाली हिम्मत नहीं आ रही थी। जिसका लाभ मुझे व् विपिन को हुआ भी, हम तीनों मार्ग का पूरा मजा लेते हुए चले आ रहे थे।
यहाँ आगे के पूरे मार्ग में ही पीने के पानी क कोई समस्या नहीं थी, हर आधा किलोमीटर के आसपास पानी का स्रोत आ ही जाता था। सभी प्यास लगते ही पानी पी लेते थे। विपिन को मैंने बोल दिया था कि आज उतराई ज्यादा है, अत: आज नीरज स्वाभाविक कुदरती रुप से तेज चलेगा, इसलिये आज हमें भी नीरज को दिखाना है कि हम भी तेजी से उतरना जानते है। बस यह बात उसे बताना मत। कही हमसे आगे निकलने के चक्कर में कल की तरह फ़िर से ना गिर पडे। कोई एक घन्टा ही चले थे कि मुझे याद आया कि मैंने रात को सोते समय अपनी कमीज टैंट में रस्सी पर टांग दी थी जिसे सुबह बैग में रखना ध्यान ही नहीं रहा। अब तक हम तीन-चार किमी आ चुके थे, मेरी हिम्मत नहीं हुई कि एक कमीज के लिए भयंकर चढाई दुबारा चढी जाये। उस समय कमीज की कीमत कुछ नहीं लगी थी। मार्ग में बादलों का कोहरा चारों ओर से घिर आया था। जिससे हमें इस घनघोर कोहरे में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, जो मार्ग आते समय हमें डरा रहा था, वापसी में तो उसका डरावनापन कोहरे में खो गया था, और कब वो तीनों पाताललोक की चढाई व उतराई आई उसका तो पता ही जब चलता, जब उस पर आधा चढ जाते थे। फ़ूल, पौधे, भॆड, आदि जो पास में थे वो ही नजर आते थे, थोडी सी दूर का कुछ भी नजर नहीं आता था। कोहरे ने एक तरह देखा जाये तो हमारी मदद ही की थी। काश ऐसा कोहरा चढाई में भी मिल जाता,
मेरे पास ना घडी थी, ना मोबाइल, समय का भी पता नहीं चल पा रहा था। हम आज ढलान होने के कारण अपनी सामान्य चाल से ज्यादा तेज चल रहे थे, जब बहुत ज्यादा ही खडी ढलान आती थी, तभी हम सावधान होकर टुलक-टुलक चढते थे। नहीं तो दे दना दन उतरते जा रहे थे, हमें वह जगह तो नजर आयी, जहाँ काली कुन्ड में लोग स्नान करते है। लेकिन इसके बाद हमें काली घाटी की चढाई का भी पता नहीं चला, और हम इस घाटी की दो-तीन किलोमीटर की कठिन चढाई भी आराम से चढ गये थे, जब एक जगह बारिश का एक रपटा आता है तब मैं चौंक गया था कि अरे यार ये तो काली घाटी से चलते ही आ जाता है, और सच में वैसा ही था। रपटा पार करते ही काली घाटी आ गयी थी, इस पूरे 15 किलोमीटर के सफ़र में आज पहली बार ऐसा था कि हम तीनों मे से कोई भी कहीं बैठा नहीं था। यानि अंग्रजी वाला नान स्टॉप पूरे करते हुए चल रहे थे। जब काली घाटी आयी तो देखा कि मौसम कुछ नाराज हो रहा है, यानि हल्की-हल्की बारिश शुरु हो गयी थी। यहाँ कुछ देर बैठ कर आराम किया गया। तब तक नीरज भी चढाई पर विजय पताका फ़हराता हुआ आ गया था, इस चढाई में स्वाभाविक रूप से नीरज दो-चार मिनट पीछे रह गया था। भीमडवार से जॉव लगभग 27 किलोमीटर है, और काली घाटी 15 के आसपास है, पूरे सवा तीन घन्टे में हम 15 किमी चलकर काली घाटी के मुहाने पर आ गये थे।
यहाँ से आगे तो अब ढलान ही ढलान थी। यहाँ से मार्ग पूरा का पूरा पहाड के शीर्ष पर ऊपर ही रहता है। जो डन्डीधार के नाम से जाना जाता है, इस मार्ग में अपना प्यारा खचेडू भी आता है, थाचडू भी कोई नाम हुआ, वैसी ही जैसे श्रीखन्ड बाबा की जगह, यहाँ से खचेडू तीन किलोमीटर दूर है, लेकिन उतराई ऐसी है जैसे किसी तिरछी दीवार पर सीधे उतर जाओ, एक तिरछे पहाड पर उतरना भी कम खतरनाक नहीं है, बल्कि मैं तो हमेशा कहता आया हूँ कि पहाड पर चढना आसान है, उतरना नहीं, इसे आप मेरी या कहो विपिन की भी कमजोरी मान सकते हो, इसलिये मैंने विपिन को सुबह ही बोल दिया था कि आज चाहे कुछ हो जाये पर आज बराटी नाले के पुल पर जाने में नीरज से आगे ही रहना की कोशिश करनी चाहिए। काली घाटी से दो किलोमीटर उतरने के बाद पेड एक बार फ़िर अपना साथ बना लेते है। जहाँ से पेड शुरु होते है, वहाँ से खचेडू मात्र एक किलोमीटर दूर रह जाता है, धीरे-धीरे हम खचेडू भी आ गये थे, यहाँ तक मार्ग में कीचड मिलना भी शुरु हो गया था।
खचेडू में जो मान्यवर भंडारा लगाते है, वह श्री मणिमहेश पैदल यात्रा में भी अपना भंडारा लगाते है, मैं मणिमहेश यात्रा में सन 2006 में इन्ही मान्यवर के भंडारे में ही ठहरा था। नाम तो याद नहीं आ रहा है। यह साँप के काटने का इलाज करते है। बताते है किसी को साँप काट ले तो ये उसे हर हालत में बचा लेते है, लेकिन इनके पास जाने तक बन्दे में साँस रहनी भी चाहिए। यहाँ इस दुर्गम चढाई पर अकेले दम पर भन्डारा लगाते है, यहाँ भण्डारा लगाना कोई हँसी खेल जैसा आसान काम नहीं है। भले ही यहाँ के भन्डारे में अमरनाथ यात्रा की तरह पकवान ना मिले, मिठाई ना मिले, लेकिन थका हुआ यात्री जब इस जगह आता है, तो उसे यहाँ मिलने वाले कडी चावल, दाल चावल व चाय भी किसी लजीज पकवान से कई गुणा बेहतर ही लगती होगी। यकीन ना हो तो एक बार ये आसान सी दिखाई दे रही यात्रा करके देख लो, आपको अपने आप ही पता चल जायेगा कि भक्ति में कितनी शक्ति होती है जिसके सहारे सब संकट पार हो जाते है, इनके भण्डारे तक आते-आते भूख भी लगने लगी थी। हमने भी खचेडू में कडी चावल खाये थे। खा पी कर जब हम चलने लगे तो समय हुआ था दोपहर के ठीक 12 बजे।
खचेडू तक तो तीनों साथ ही चल रहे थे, लेकिन खचेडू से कुछ आगे जाकर नीरज की मशीनरी में शायद थकावट के कारण कुछ रफ़्तार कम हो गयी थी। जबकि मेरी रफ़तार में कोई कमी नहीं आयी थी, मैं अब भी सबसे आगे था, विपिन भी नीरज के साथ ही चल रहा था। हम तीनों काफ़ी तेज उतर रहे थे जिससे कि तेजी के कारण मैं कई बार फ़िसलते-फ़िसलते बचा, उन दोनों का पता नहीं कितनी बार फिसले होंगे, फ़िसलने से बचने के लिये मैंने तो कीचड से बचने की बजाय सीधे कीचड में से निकलना शुरु कर दिया था, जिस पर तीनों ने अमल किया था। जिससे फ़ायदा ये हुआ कि अब सब आराम से उतर पा रहे थे, लेकिन इसका नुकसान यह हुआ कि हमारे सब के जूते व पैंट काफ़ी गन्दे हो गये थे। यहाँ नीरज व विपिन पीछॆ आ रहे थे, अब सामने एक टोली जा रही थी। जो कि काफ़ी तेजी से नीचे उतर रही थी, थोडी देर में मैंने इन्हें भी पीछे छोड दिया, उस वक्त पता नहीं क्या भूत सा सवार हुआ था मेरे सिर पर कि मैं नीरज की उतराई वाली शताब्दी वाली रफ़्तार को भी पीछे छोड चुका था, अब मेरी रफ़्तार बुलेट ट्रेन वाली हो गयी थी। काफ़ी देर तक दोनों मेरे पीछे लगे रहे लेकिन मेरी गति बरकरार नहीं रख पाये। इन दोनों ने मेरे पीछे आना छोड दिया या कहो कि मेरी रफ़्तार से उतर नहीं उतर पाये थे। जब मुझे झरने के पानी की आवाज सुनाई देने लगी तो खुशी के मारे जोश और ज्यादा भर गया, लेकिन इस तेजी के चक्कर में मैं सावधानी से उतरने के बावजूद दो बार फ़िसलते-फ़िसलते भी बचा। किसी तरह हाथों से पेड पकड व डन्डे के सहारे अपने आप को संम्भाल लेता था। जैसे ही बराटी नाले का पुल दिखाई दिया तो अपनी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा था। इस पुल आने की प्रतीक्षा हम कई घन्टों से कर रहे थे।
बराटी नाले पर आकर मैंने अपना बैग उतार कर, एक ओर रख दिया व दोनों का इंतजार करने लगा। कुछ मिनट बाद विपिन आ गया, व विपिन के कुछ देर बाद नीरज भी आता दिखाई दिया। आज मन में बडी खुशी हो रही थी कि मैंने अपने घिसे हुए लगभग चिकने तलों वाले जूतों से शताब्दी की रफ़्तार को पीछे छोड दिया था। नीरज जब हमारे पास आया तो खुश तो दिखाई दे रहा था, लेकिन शायद सोच रहा होगा कि आज ये दोनों पहले कैसे उतर गये? लेकिन मैं बार-बार कहता हूँ कि पहाड हो या मैदान हमेशा अपनी हिम्मत के अनुसार ही चलना चाहिए, ना कि दूसरे को देखकर, एक बार विपिन मुझे देखकर तेजी से उतर रहा था तो मैने उसे कहा कि देख भाई अपने हिसाब से चल, अगर मुझसे तेज चल सकते हो तो आगे निकलो नहीं तो आराम से मेरे पीछे पीछे-पीछॆ आ जाना। मैं बराटी नाले के पुल पर आराम करता मिल जाऊँगा। उस तेजी से उतरने का फ़ायदा ये हुआ कि हम दो घन्टे में खचेडू से यहाँ पर आ गये थे, जाने में इसी चढाई ने चार घन्टे लिये थे। हमने अपने जूतों की बुरी हालत के फ़ोटो लिये, हमें नहाये दो दिन हो गये थे, हमारा थोपडा/चेहरा भी देखने लायक था।
यहाँ काफ़ी देर आराम किया उसके बाद यहाँ से आगे जाते ही बराटी नाले का भन्डारा आ जाता है, भंडारे वालो ने हमें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन अब हमारा मन खाने का नहीं था। हम जल्द से जल्द जॉव पहुँच जाना चाहते थे। अब हमारी पैदल यात्रा मात्र 5 किलोमीटर ही रह गयी थी। आधा घन्टे में ही हम सिंहगाड आ गये थे, अब हमें यहाँ की चढाई कुछ भी नहीं लग रही थी। यहाँ आकर हमने एक बार फ़िर से बार-बार लाकर पेट भर कर जलेबी व पकौडी खायी थी, नीरज ने तो अपने पास ज्यादा जलेबी रख ली थी कि आखिर जब उससे खाई ना गई तो बोला अरे भाई ये जलेबी परसाद खत्म तो करवा दो, खैर किसी तरह बची खुची जलेबी खत्म कर हम आगे बढे। रफ़्तार हमारी अब भी सुपर फ़ास्ट ही थी, जिस मार्ग में आते समय हमें एक घन्टा लगा था अब उसी मार्ग का बेडापार आधा घन्टा में कर दिया था। यहाँ मार्ग में एक बंदा यात्रा पर आ रहे यात्रियों को एक-एक सेब बाँट रहा था, हमने भी सेब खाया और आराम से हम जॉव आ गये थे।
यहाँ आकर हमने नितिन को तलाशना शुरु किया। नीचे भन्डारे में पता किया तो बताया कि ऊपर गया हुआ है, ऊपर देखा तो नजर नहीं आया, मन में ख्याल आया कि आशिक बंदा है किसी के साथ फोन पर बात करने में लगा पडा होगा। जब काफ़ी तलाशने पर नहीं मिला तो उस गाजियाबाद वाले ड्राईवर से पता करना चाहा, जिसके साथी हमारे साथ ऊपर दर्शन करने गये थे। तो देखा कि नितिन उसी की गाडी में सो रहा है। समय 4:30 बज चुके थे, हम यहाँ से रामपुर तक जाना चाहते थे, अत: सबने अपना-अपना बैग लिया व अपनी-अपनी बाइक पर सवार हो चल दिये। जॉव से बागीपुल तक कच्चा मार्ग है, जिससे हमें उतराई में भी आराम-आराम से चलना पडा था, 6 किलोमीटर को तय करने में बीस मिनट लग गये थे। बागीपुल आते ही शानदार सडक थी, अब हमारी बाइक हवा से बाते कर रही थी। थोडी देर बाद निरमुंड में उसी टेलर की दुकान से होकर निकले जहाँ से नितिन व विपिन ने अपनी फ़टी पैंट सिलवायी थी। एक घन्टा बाद हम उसी पुल पर थे, जहाँ से हमने सतलुज पार की थी, शिमला से रामपुर जाते समय रामपुर से तीन किलोमीटर पहले रोड से उल्टे हाथ पर ये पुल आया था। अब रामपुर आते ही रात को रुकने के लिए कमरा तलाश करने लगे,
आते समय हम रामपुर से पहले उल्टे हाथ की ओर बागीपुल के लिये मुड गये थे। रात रामपुर में ही रुकने का पहले से ही तय था। अत: कई होटल पर देखने के बाद किसी ने बताया कि आप लोग नीचे की ओर पंचायती गेस्ट हाऊस में जाओ आपको वहाँ अच्छा कमरा मिल जायेगा। कमरों का पहरेदार वहाँ नहीं था, उससे फ़ोन पर बात की तो तब उसने बताया कि मैं आधे घंटे बाद आऊँगा। जब वो आया, हमने अपना सामान कमरे में रखा, नहाये व आराम से सो गये। अगले दिन हमें चकराता जाना था। मात्र 250 रुपये में दो कमरे मिल गये थे, अगर इससे भी सस्ते चाहिए तो ये कहना कि सरकारी काम से आये है।
दोस्तों भोले शंकर महादेव के स्थल श्रीखण्ड महादेव की यात्रा यहाँ इस पोस्ट के साथ समाप्त होती है। अब हम रामपुर नामक जगह पर आ गये थे जहाँ से दिल्ली व निरमुंड, बागीपुल तक आसानी से हिमाचल रोडवेज की बसे नियमित अंतराल पर चलती रहती है। वैसे बसे जॉव तक भी जाती है लेकिन उनकी संख्या बहुत कम जिनके लिये घन्टा भर का इन्तजार भी करना पड सकता है। जिस प्रकार दिल्ली से सीधी बस रामपुर तक प्रतिदिन चलती है। उसी प्रकार रामपुर से बागीपुल या जॉव तक बसे आसानी से मिल जाती है। अपने वाहन से आओगे तो भी कोई समस्या नहीं आयेगी। वापसी में भी रामपुर आने के बाद यहाँ से सीधी दिल्ली, शिमला, चडीगढ तक की बस मिलती रहती है। हमारी यह यात्रा तो यही समाप्त होती है लेकिन अभी यह सीरिज बनी रहेगी जिसमें वापसी में हमने शिमला ना जाकर रोहडू, चकराता, टाईगर फ़ॉल, पौंटा साहिब होते हुए जाने का कार्यक्रम बनाया हुआ था। जिसमें एक जगह हम गलतफ़हमी में किसी दूसरे मार्ग पर पचास किमी तक चले जाने के बाद पता लगा कि हम गलत जा रहे है ।
अगले भाग में जाना था जापान पहुँच गये चीन, वाली बात हमारे साथ हो गयी। जब हम चकराता जाने की बजाय पौंटा साहिब वाले मार्ग पर चलते गये। लेकिन हम भी जिद के पक्के थे चकराता हर हालत में जाना था।





































ज से जाट देवता ज से जलेबी ……….जलेबी से शुरू जलेबी से खत्म ………..जय हो जलेबी माता की ………हा हा हा
कीचड से सने जूतो को देखकर ही मेहनत का अंदाजा हो जाता है …..कि आपने किस तरह चढाई के साथ साथ उतराई की होगी वैसे उतराई में भी कम परेशानी नही होती है
चलो अब चलें बाइक से अपने इकलौते घर
मेरे दोस्तों , प्यारे घुमक्कडो और प्रिय पाठकों , आज जाटदेवता संदीप जी ने घुमाक्कर.कॉम पर एक वर्ष में सबसे ज्यादा पोस्ट लिखने का खिताब हासिल किया है, वह भी केवल मई तक. अभी तो पूरा वर्ष बाकी. संदीपजी ने इस साल घुमक्कड पर २८ पोस्ट लिखी है अब तक . इस खिताब के मालिक अब तक हमारे नंदनजी जिन्होंने २००७ में २८ पोस्ट लिखी थी. आज संदीपजी ने उनकी बराबरी कर दी. अगले पोस्ट से संदीपजी इस खिताब के अकेले मालिक रहेंगे. दुसरे नंबर पर देवस्मिताजी है जिन्होंने २०११ में २७ पोस्ट लिखी थी. लेकिन संदीप भैया आपने तो राजधानी की स्पीड पकड़ी है तो पीछे मनु प्रकाश त्यागी भी दुरोंतो एक्सप्रेस में आ रहा है नॉन स्टॉप २५ पोस्ट पर. देखिये साल के अंत तक क्या होता है.
मेरी ओर से बहुत बहुत बधाई . congratulations ……………….
अब चलते है पोस्ट की ओर . एक और धमाकेदार पोस्ट . उतराई करने का बहुत बढ़िया वर्णन. वाह मजा आ गया.काफी जल्दी उतर गए और लंबा रास्ता काफी कम समय में तय किया . बहुत बढ़िया चित्र थे. लेकिन अब इस बात का दुःख भी हो रहा है की आपकी यह यात्रा समाप्त भी हो गयी. चलिए ठीक है जो भी शुरू होता है चाहे वह अच्छा हो या बुरा खतम भी हो जाता है.
अब हम अओके साथ हिमाचल घूमेंगे . श्रीखंड महादेव की ऐसी यात्रा कराने के लिए फिर से
धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद……………………….
एक अपडेट विशाल जी , 25 नही 26 पोस्ट अभी तक और महीने के अंत 30 मई तक 27 …..वो भी 21 फरवरी से ……….हा हा हा ……….दूरंतो नाम बढिया है मुझे पसंद आया ……….वैसे मेरे पेट में दर्द बना रहा कि आप क्या बताने वाले हो संदीप जी के बारे में ……….अपनी तो लंबी घुमक्कडी शेष 10 , दक्षिण 20, कश्मीर 5 मथुरा नैनीताल 10 बाकी 10 ये पुरानी शेष हैं यानि 55 और संदीप भाई जून में सारपास जा रहे हैं तो जुलाई में हिमाचल का रिंग रोड तो उनके साथ में तो चलने वाला जीवट ही चाहिये ………..
एक पेट में दर्द और हो रहा है विशाल जी ………..मुझे पता नही कि कहना चाहिये कि नही पर मुझे कुछ ऐसा आभास हो रहा है कि इस बार विशिष्ट लेखक का सम्मान किसे मिलने वाला है हो सकता है मै गलत हूं पर मेरा अंदाजा महेश सेमवाल जी के लिये है कि इस बार ये सम्मान उन्हे मिल सकता है आप क्या कहते हो ?
यह तो मैंने कल आपसे कह ही दिया था की महेश सेमवाल जी विशेष लेखक होंगे. ऐसा मुझे महसूस हो रहा है.अब देखते है की मेरी जजमेंट सही है की नहीं. वे मेरे पसंदिता लेखक है और मैं उनका प्रशंशक हूँ .अब देखते है क्या होता है एक तारीख को . सब निगाहें विभाजी की पोस्ट पर.
दूसरी बात देवस्मिताजी के साथ साथ एक साल में २७ पोस्ट पर आदित्य खंडेलवाल भी है. और २६ पोस्ट पर अमित कुमार ( सिन्हा) है. …………………
लेकिन सारे खिताब टूट जायेंगे आप दोनों के लिखने से.
vishal aap ke acche lekh hi nahi ek acche issan bhi hain.
Thanks for you sweet comment.
Manu mein is race se bhar hun ….:-) time ki problem hone ke karan har post mein comment nahi de patha , par kam se kam 10-15 lekhak hain jin ko mein salam kartha hun, un mein se ek aap bhi hain.
kafi samyin se irregular hone ke badh bhi log yadh kar rahe hai wo hi sab se bada award hi …:-)
महेश जी ………मै कब कह रहा हूं कि आप रेस में हो ……..पर हमारा मन कह रहा है और देना तो एडिटर बोर्ड को है हम कोई ज्यूरी नही पर मै 31 को घूमने जा रहा हूं 20 दिन के लिये सो अगर मेरा अंदाजा सही हुआ तो मैने आपको पहले ही बधाई दे दी है और अगर किसी और का हुआ तो उन्हे 20 के बाद आकर दूंगा
रेगूलर होना ना होना एक अलग बात है रेगूलर होने से अगर विशिष्ट लेखक को गिना जाता तो कई लोग नही होते और कई हो जाते हा हा हा ……………किसी भी बात को प्लीज गंभीरता से मत लेना ये सिर्फ एक छोटी सी हंसीमजाक या आपसे अपनापन मानकर कह दिया
धन्यवाद
so sweet of you !
aap ki badhai hume svikar ki , qun ki is apnepan se bada award nahi hai.
best of luck for you trip.
विशाल जी आप ने कई घन्टों की छानबीन करने के बाद यह जानकारी निकाली है, मैंने कभी इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया,
और हाँ ये 27-28 के आंकडे अब पुराने पडने वाले है अब मैं और मनु ठान चुके है कि यह टारगेट कम से कम पचास बोले तो अर्धशतक तो होना ही चाहिए, जिस गति से मैं पहाड पर चढता हूँ और मनु बाइक चलाता है उस गणित से हिसाब से यह आंकडा भी कम लग रहा है लेकिन इतना 50-51 का बहुत है,
फ़िर एक दिन ऐसा भी आयेगा कि नन्दन जी भी खिसक कर दूसरे स्थान पर (सब पोस्ट मिला कर) हो जायेंगे देखे कौन हटाता है????????
Good second wale ko tho hata hi chuke ho , first wale ko bhi hatane mein jayada time nahi lagega ……Keep it up !
जाटदेवता संदीप जी आप ने यह यात्रा करवा के मन गदगद कर दिया ,
धन्यवाद
संदीप भाई राम राम, यात्रा में मज़ा आ गया, फोटो शानदार हैं, लेखन जानदार हैं. चढाई करते हुए जैसी यात्रा कठिन पड़ती हैं, और थाई पर जोर पड़ता हैं, ऐसे ही उतरते हुए घुटनो की ग्रीस खत्म हो जाती हैं. ऐसे जूतों में बिलकुल भूत नज़र आ रहे हो. जलेबियो में स्वाद आ रहा हैं. इतने दिन बाद जब घर लौटते हैं तो ये लगता है कि जल्दी से जल्दी पहुँच जाए, यात्रा पड़े ही कितनी अच्छी और सुन्दर हो, घर पहुँच कर अलग ही सकून मिलता हैं. खैर यात्रा मजेदार रही. अब आप की अगली पोस्ट किस यात्रा की आ रही हैं? प्रतीक्षा रहेगी.
जय श्रीखंड महादेव भक्तों की.
देवता जी आप तो एक अच्छे फोटोग्राफर भी हो गए
क्या क्लासिकल फोटो ओस की बूंदों के लिए हें
भंडारे वाले बाबा की फोटो की कमी रही.
नए तथा घिसे सोल वाले जूते देख ही लिए.
१३ भागों वाली यात्रा गजब की थी, धन्यवाद
सर्वेश जी बून्दों वाले फ़ोटो विपिन ने लिये थे असली हकदार वही है।
संदीप जी…..
जय हो श्री खंड बाबा की….
जबरदस्त और रोमांचक श्री खंड यात्रा के समापन पर आपको बहुत -बहुत बधाई….|
इस लेख बड़ा विवरण भी बहुत रोचक लगा …..मार्ग में पड़ने वाली परेशानी के मुकाबला करते हुए शान से आप नीचे उतर आये….|
कीचड़ में चलने से जूते गंदे हुए तो क्या हुआ आखिर अपनी मंजिल तक पहुँच ही गए…..|
फोटो ग्राफी कमाल की की हैं सच में इन फोटोओ देखकर मजा आ आज गया…..|
वैसे आपका यह यात्रा जेलेबी से शुरू होकर जलेबी पर खत्म हुयी …..यह तो जलेबी की महिमा हैं….|
मेरा उन सभी लोगो को धन्यवाद जो इतनी कठिन परिस्थतियो में भी बिना किसी सरकारी साहयता के श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का पआयोंजन करते हैं…..|
इक लंबी, सुखद जटिल यात्रा से हमें परिचय कराने के लिए आपका धन्यवाद
आप सब को एक बड़ी सलामी
तस्वीर जहाँ आप सभी जलेबी की पूजा कर रहे हैं ….yummm …सर्वोत्तम
sandeep , bhauth din ho gaye jalebi khaye …kabhi hame bhi khila do.
aap ke post mein comment likhna matlab suraj ko diya dikhana.
aap ke lekh padne ke badh hamesha ye ahsas hotha hai aap kiladi hum anadi …………..:-)
संदीप जी, कमाल ही हो गया | मतलब करीब करीब आपने श्रीखंड से पूरी उतराई एक ही दिन में कर ली | अगर सरकार इस पूरे रास्ते में केवल एक बढ़िया कैंप बना दे तो शायद कुछ लोग ये यात्रा चार दिनों में कर सकतें हैं | और हमेशा से लिखता आया हूँ की जो लोग २०१२ में यात्रा का विचार कर रहे हैं, वो अगर इस लेख तो कंठस्थ कर लें, तो ये यात्रा कई गुना आसान हो जायेगी | उन सभी श्रधालुओं के ओर से साधुवाद |
Congraulations for Featured Story for the Month of May 2012
:) jalebi and Lomdi….hehe
u guys are just travelling, its like a dream for me…
hats off…
श्रीखण्ड महादेव की पवित्र श्रीखण्ड छड़ी यात्रा 30 जून 2012 को जिला कुल्लु के निरमण्ड से आरम्भ हो रही है। छड़ी यात्रा का नेतृत्व महंत अशोक गिरी फलाहारी बाबा करेंगे। इसमें दो छडि़या होंगी जिसमें एक माता अंबिका की और दूसरी दतात्रेय महाराज की होगी। श्रीखण्ड छड़ी यात्रा एवं ग्राम सुधार समिति के अध्यक्ष देवेन्द्र पाल शर्मा और सचित कुशल राम शर्मा ने बताया कि 30 जून को छड़ी का विधि विधान से पूजन किया जाऐगा । यात्रा निरमण्ड के दशनामी जूना अखाड़े से ब्राहटी नाला तक प्रस्थान करेगी 1 जुलाई 2012 को यात्रा ब्राहटी नाला से थाचड़ु से भीमडवार पहुंचेगी । 3 जुलाई को भीम डवारी से श्रीखण्ड दर्शन के लिए रवाना होगी। उन्होने बताया कि 8 जुलाई को निरमण्ड में भंडारे का आयोजन किया जाऐगा।
जय हो श्रीखंड महादेव की.
और आपको बहुत बहुत धन्यवाद यात्रियों को जानकारी देने के लिए.