हाजी अली दरगाह-मुंबई / Haji Ali – Mumbai |
साथियों, इस श्रंखला की पिछली कड़ी में मैंने आपको अपनी मुंबई यात्रा की शुरुआत और मुंबई की जीवन रेखा कही जाने वाली मुंबई लोकल ट्रेन्स के बारे में बताया था, और अब आपको लिए चलता हूँ मुंबई के कुछ चुनिन्दा पर्यटन स्थलों की ओर. मुंबई वैसे तो पर्यटन की द्रष्टि से इतना समृद्ध है की इसे इत्मिनान से निहारने के लिए कम से कम दस से बारह दिन का समय तो चाहिए ही लेकिन हमारे पास समय कम होने की वजह से मेरे मित्र विशाल ने हमारे घुमने के लिए कुछ ख़ास जगहों को चुन कर रखा था. वैसे विशाल ने इस मामले में मुझसे हमारी मर्जी भी जननी चाही थी, सो मैंने बचपन से मुंबई की जिन टूरिस्ट जगहों का नाम सुन रखा था उनमें से कुछ को देखने की इच्छा प्रकट की और इन्ही में से एक जगह थी हाजी अली की दरगाह.
23 मार्च का दिन था और गुडी पड़वा (हिन्दू नव वर्ष) का त्यौहार, आप सब जानते ही होंगे की गुडी पड़वा महाराष्ट्र का ही त्यौहार है और महाराष्ट्र में इसे बहुत ही धूम धाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. आज सुबह से हमने प्लान किया की सबसे पहले मुंबई के सुप्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन के लिए जायेंगे. अतः सुबह होते ही हम मुंबई दर्शन के लिए विशाल के घर से निकल गए, कुछ और जगहें घूमते हुए (जिनका जिक्र मैं अपनी आनेवाली पोस्ट्स में करूँगा) हम दोपहर तक मुंबई लोकल, ऑटो रिक्शा तथा टेक्सी की सवारी का आनंद लेते हुए हम ब्रीच केंडी पहुँच गए जहाँ पर महालक्ष्मी मंदिर स्थित है. जैसे ही हम टेक्सी से उतर कर मंदिर के नजदीक पहुंचे तो हमने देखा की मंदिर के सामने बहुत लम्बी लाइन लगी है, इतनी लम्बी की कम से कम पांच घंटे में नंबर आने का चांस था. बाद में हमें पता चला की गुडी पड़वा होने की वजह से आज यहाँ इतनी भीड़ है.
वैसे हमें मंदिरों की लम्बी लाइनों से कतई डर नहीं लगता है या कह लीजिये की हम इसके आदि हो चुके हैं, लेकिन चूँकि हमारे साथ शिवम भी था और उस दिन वो कुछ ज्यादा ही परेशान कर रहा था. वास्तव में वह धुप और गर्मी से बेहाल था अतः रोये जा रहा था, इसलिए हमने ये निर्णय लिया की महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन हम कल सुबह दुबारा आकर कर लेंगे और अभी हाजी अली की दरगाह के दर्शन कर लिए जाएँ. और फिर वहां से टेक्सी लेकर हम लोग लाला लाजपत राय मार्ग पहुँच गए जहाँ से हाजी अली की दरगाह तक पहुँचने का मार्ग शुरू होता है.
वस्तुतः हमारे आराध्य देव भगवान शिव हैं लेकिन हम सभी देवी देवताओं में आस्था रखते हैं. और जहाँ तक धर्म की बात है हमें अपने सनातन धर्म में सर्वाधिक आस्था है लेकिन हम दुसरे धर्मों का और उनके देवताओं का भी बहुत सम्मान करते हैं तथा किसी भी धर्म और किसी भी भगवान की वंदना करने में कभी कोई कंजूसी नहीं दिखाते.
आपने देखा ही होगा मेरी एक पिछली पोस्ट में, जब हम नांदेड़ में तखत सचखंड हजूर साहिब के दर्शन के लिए गए थे, वहां हमने बड़ी श्रद्धा से तखत साहिब के दर्शन किये तथा लंगर में खाना भी खाया. तो हम लोग “सर्व धर्म समभाव” में विश्वास करते हैं अतः हमारे लिए हाजी अली दरगाह के दर्शन करना भी बड़े ही हर्ष का विषय था.
हाजी अली तक पहुँचने के लिए मेनरोड से कुछ आगे चलकर एक अंडरग्राउंड रास्ते से होते हुए हम उस जगह आ पहुंचे जहाँ से हाजी अली दरगाह के लिए समुद्र में रास्ता बनाया गया है.
चलिए अब समय है आपको हाजी अली दरगाह के बारे में जानकारी देने का, तो लीजिये प्रस्तुत है हाजी अली दरगाह का परिचय.
क्या है यह हाजी अली दरगाह?
आपने अमिताभ बच्चन की एक सुपर हिट फिल्म “कुली“ तो देखी ही होगी, इस फिल्म के क्लाइमेक्स सीन की शूटिंग यहीं इसी जगह पर की गई थी. अगर याद नहीं आ रहा तो आपको फिल्म फिजा की वह कव्वाली “पिया हाजी अली“ तो ज़रूर याद होगी, इसकी शूटिंग भी यहीं की गई है.
हाजी अली दरगाह एक मस्जिद तथा दरगाह है जो की मुंबई के दक्षिणी भाग में वरली के समुद्र तट से करीब 500 मीटर समुद्र के अंदर एक छोटे से टापू पर स्थित है.मुख्य भूमि से यह टापू एक कंक्रीट के जलमार्ग के द्वारा जुड़ा हुआ है. यह दरगाह इस्लामी स्थापत्य कला का एक नायाब नमूना है. दरगाह के अंदर मुस्लिम संत सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की कब्र है.
शायद दुनिया में यह अपनी तरह का एकमात्र धर्म स्थल है जहाँ एक दरगाह और एक मस्जिद समुद्र के बीच में टापू पर स्थित है और जहाँ एक ही समय पर हजारों श्रद्धालु एक साथ धर्मलाभ ले सकते हैं.
कौन थे ये संत?
हाजी अली की दरगाह का निर्माण सन 1431 में एक अमीर (धनवान) मुस्लिम व्यवसायी सैयद पीर हाजी अली शाह बुखारी की याद में करवाया गया था, जिसने अपनी सारी धन दौलत त्याग कर मक्का की यात्रा (हज) का रुख किया. हाजी अली मुख्य रूप से पर्शिया (अब उज्बेकिस्तान) के बुखारा नमक जगह के रहने वाले थे तथा पूरी दुनिया की सैर करते हुए अंत में 15 वीं शताब्दी के लगभग मुंबई में आकर बस गए थे.
उनके जीवन से जुडी एक किवदंती के अनुसार एक बार संत हाजी अली ने एक गरीब महिला को सड़क पर रोते हुए तथा विलाप करते देखा जिसके हाथ में एक खली डिब्बा था, उन्होंने उस महिला से पूछा की उसको क्या तकलीफ है, उसने सुबकते हुए जवाब दिया की वह तेल लेने गई थी और ठोकर लगने से उसका सारा तेल जमीं पर ढुल गया है और अब उसका पति उसे बहुत पीटेगा, संत ने उस महिला से कहा की मुझे उस जगह पर लेकर चलो जहाँ तुम्हारा तेल गिरा है, वह महिला उन्हें उस जगह पर लेकर गई संत उस जगह पर बैठ गए और अपने ऊँगली से जमीन को कुरेदने लगे, कुछ ही देर में जमीन से तेल की एक मोटी धार फव्वारे के रूप में निकली. महिला ने ख़ुशी से झूमते हुए अपना पूरा डिब्बा तेल से भर लिया.
बाद में हाजी अली को एक घबराहट पैदा करने वाला सपना बार बार आने लगा की उन्होंने दुखी महिला की मदद करने के लिए धरती मां को कुरेदकर उन्हें तकलीफ पहुंचाई है. पश्चाताप की आग में जलते हुए वे बुरी तरह से बीमार पड़ गए तथा उन्होंने अपने अनुयायियों को आदेश दिया की उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके शारीर को एक कोफीन में भरकर अरब सागर में छोड़ दिया जाये.
हाजी अली ने अपनी मक्का यात्रा के दौरान अपना शरीर त्याग दिया तथा आश्चर्यजनक रूप से वह ताबुत जिसमें उनका मृत शरीर रखा था तैरते हुए इस जगह पहुँच गया तथा मुंबई में वरली के समीप एक छोटे से टापू की चट्टानों में अटककर रुक गया जहाँ आज उनकी दरगाह है, जिसे हम हाजी अली की दरगाह कहते हैं.
गुरुवार तथा शुक्रवार को यहाँ पर कम से कम 40,000 लोग दर्शन के लिए आते हैं. आस्था और धर्म को दरकिनार करके यहाँ हर जाति तथा धर्म के लोग आकर इस महान संत की दुआएं लेते हैं.
समुद्र के अंदर पगडण्डी? क्या आप कभी पैदल चले हैं समुद्र में?
दरगाह तक पहुंचना बहुत हद तक समुद्र की लहरों की तीव्रता पर निर्भर करता है क्योंकि जलमार्ग पर रेलिंग नहीं लगी हैं. जब कभी समुद्र में उच्च तीव्रता की लहरें आती हैं तो यह जलमार्ग पानी में डूब जाता है तथा दरगाह तक पहुंचा मुश्किल हो जाता है अतः दरगाह पर निम्न तीव्रता की लहरों के दौरान ही पहुंचा जा सकता है.
इस जलमार्ग से आधा किलोमीटर का यह पैदल सफ़र बड़ा ही मोहक तथा रोमांचकारी होता है, कम लहरों के दौरान पुरे रास्ते के सफ़र के दौरान तीन चार बार तो यात्रियों के पैर जलमग्न हो ही जाते है, इस सफ़र के दौरान कई बार लहरें एक बड़े फव्वारे के रूप में आती है तथा हमें भीगा कर चली जाती हैं. यह सफ़र इतना सुहाना होता है की कदमों समय की मांग के अनुरूप आगे की ओर धकेलना पड़ता है, क्योंकि हम इस सफ़र को ख़त्म होने नहीं देना चाहते.
कल्पना कीजिये आप एक पगडण्डी पर चल रहे हैं और आपके दोनों ओर से असीम समुद्र की लहरें आपके करीब आकर आपको छूना चाह रहीं हो. पुरे रास्ते में छोटी छोटी खिलोनों तथा साज सज्जा के सामान की सुन्दर सजी दुकानें. खाने पीने की दुकानें, जो कभी कभी आधी जल में डूबी हुई दिखाई देती हैं.
कैसी है दरगाह?
दरगाह सफ़ेद रंग से पुती तथा करीब 4500 स्क्वे.मीटर के क्षेत्र में फैली है और एक 85 फिट ऊँची मीनार से शोभायमान है. एक बड़े से दरवाज़े (प्रवेश द्वार) के अंदर मुख्य दरगाह स्थित है. दरगाह के अंदर मकबरा एक चटख लाल तथा हरे रंग की चादर से ढंका होता है. मुख्य हॉल में पिलरों पर कांच की सुन्दर नक्काशी की गई है. मुस्लिम पंथ के अनुसार यहाँ पर भी पुरुषों तथा महिलाओं के लिए प्रथक प्रार्थना स्थल बनाये गए हैं. लगभग 400 साल पुरानी इस दरगाह का जीर्णोद्धार कार्य प्रगति पर है. दरगाह का प्रांगण खाद्य सामग्री की दुकानों तथा अन्य दुकानों से सजा हुआ है, जो इस जगह की गंभीरता तथा नीरसता को दूर करती हैं. हाजी अली की दरगाह मुंबई की विरासत तथा भारत की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है.
दरगाह के पीछे चट्टानों से टकरातीं समुद्र की लहरें:
दरगाह के पीछे चट्टानों का एक समूह है जिनसे समुद्र की लहरें टकराती हैं और एक कर्णप्रिय ध्वनि उत्पन्न करती हैं और एक अत्यंत रोचक दृष्य उपस्थित करती हैं. यहाँ से एक ओर दूर दूर तक बाहें फैलाये समुद्र तो दूसरी ओर मायानगरी की गगनचुम्बी अट्टालिकाएं दर्शन देतीं हैं. दरगाह के दर्शन के बाद दर्शनार्थी यहाँ पर इन नजारों को देखने के लिए कुछ समय बिताते हैं.
दरगाह में हम:
जैसा की मैंने बताया की हम हर धर्म का पुरे दिल से सम्मान करते हैं. अतः हमने हाजी अली बाबा को चढाने के लिए बाहर से ही एक चादर खरीदी और चल पड़े जल में आधी डूबी उस पगडण्डी पर जो हमें दरगाह तक लेकर जाने वाली थी. पुरे रास्ते हम समुद्र की लहरों का आनंद लेते हुए और फोटोग्राफी और विडियोग्राफी करते हुए दरगाह तक पहुंचे. दरगाह पहुँच कर वहां की खूबसूरती देखकर हम अभिभूत हो गए. अंदर मजार पर जाकर अपना माथा टेका, यहाँ पर उपस्थित मौलाना जी ने मेरी पीठ पर मोरपंख से गठा हुआ एक लट्ठा मारकर कहा “जा खुदा के बन्दे आज तेरी सारी बलाएँ बाबा ने अपने ऊपर ले ली हैं और तुझे दुआ दी है की तू हमेशा खुश रहे ” ………………….मौलाना के यह शब्द सुनकर मेरी आँखों से अनायास ही आंसुओं की बूंदें टपक पड़ीं.
दर्शन के बाद कुछ देर दरगाह के पीछे समुद्र की लहरों का आनंद लेने के बाद हम उसी ख़ूबसूरत रास्ते से वापस अपनी अगली मंजिल की ओर चल दिए………………………
पिया हाजी अली, पिया हाजी अली, पिया हाजी अली पिया हो…………………………………………………………
फिर मिलते हैं जल्दी ही अगली कड़ी में मुंबई की ऐसी ही किसी सुन्दर जगह पर.








































बढिए ज्ञान से भरी पोस्ट रही, पानी वाला मार्ग जब ज्वार भाटे के समय पानी में डूब जाता होगा तो बहुत अच्छा लगता होगा, सिद्दीविनायक भी देखना है, और बहुत कुछ ढेर सारा उसे भी दिखाओ,
अपुन का जब भी इधर जाना हुआ तो जरुर यहाँ भी जाना होगा, फिलहाल तो इंदौर आ रहा हूँ
संदीप भाई,
सुन्दर शब्दों में की गई इस प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद. जी हाँ पुरे रास्ते में कई बार समुद्र की लहरें यात्रियों के कपडे भिगो देती है. बड़ा सुन्दर नज़ारा होता है यह. मुंबई की और भी बहुत सारी जगहें आनेवाली पोस्ट्स में सिलसिलेवार दिखाऊंगा, बस थोडा सा इंतज़ार.
वाह ! मुकेश जी ,
भले ही मैं आपको हाजी अली दरगाह पर ले गया लेकिन इसकी सही अध्यात्मिक यात्रा आपने करवाई. मुझे हाजी अली कहाँ स्थित है , यही पता था . लेकिन उसकी क्या कहानी है कौन है हाजी अली , यह सब आपने बताया.इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद . आपको पता है की मुझे किसी भी स्थल के इतिहास के बारे में जानने की कितनी रूचि है. हाजी अली ने अंत में मुंबई शहर में बसकर यहाँ के लोगो पर काफी मेहेरबानी की. लोग आज भी जाते है एक विश्वास लेकर की उनकी मुराद पूरी हो जायेगी………..
बाकी चित्र बहुत अच्छे है और विवरण भी बढ़िया है………………..
फिर से हाजी अली के दर्शन के लिए धन्यवाद……………
महालक्ष्मी मंदिर का इन्तेज़ार……………
विशाल जी,
कमेन्ट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. इस यात्रा में आपका सहयोग भी अतुलनीय रहा. पोस्ट आपकी अपेक्षाओं पर खरी उतरी, मेरे लिए यह अत्यंत हर्ष का विषय है. एक बार फिर से इस प्यारी सी कमेन्ट के लिए आभार.
पहली बार हाजी अली के चित्र पूरी इतिहास कहानी के साथ देखे …..अगर एक ही लेख में पूरा वर्णन हो तो अच्छा लगता हे . शायद आगे भी आप मुंबई के दर्शनीय स्थानों के इसी प्रकार यात्रा करवाएँगे .
कुछ फोटो धुंधले थे
सर्वेश जी,
पोस्ट पढने तथा प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभार. मैं भी आपसे सहमत हूँ, किसी एक जगह का वर्णन एक ही पोस्ट में आ जाये तो अच्छा लगता है.
धन्यवाद.
बढिया ज्ञान से भरा लेख , हाजी अली पर मैने ऐसा आलेख चित्रो सहित पहले नही पढा है और अक्षय कुमार की मूंछो की तरह अपने विशाल का ट्रेडमार्क गले में मोबाईल भी बढिया है
आगे के इंतजार में
मनु,
पोस्ट को पसंद करने तथा टिप्पणी करने के लिए धन्यवाद. हाँ यात्रा के दौरान विशाल जी अपनी विशिष्ट वेश भूषा में होते हैं, टी शर्ट, केपरी,गले में लटकता मोबाइल फ़ोन और केमेरा.
very good post,good pics.great personalities are always welcome and respected.It doesn’t matter, which specific religion they follow.most important is the humanity which all of them believe in.keep travelling and sharing your valuable experiences and go on spreading love and happiness that we all need a lot.
Ashok Sir,
Thank you very much for your really sweet words. Your comments encourages us to write better always. Do you recollect long ago I had requested you to write your post on ghumakkar, also you had assured me to do so but so far I didn,t see any story of yours on Ghumakkar.
Very informative post !
I have been to Haji Ali around 03 years back. Use to cross through it while gong to Jaslok Hospital at least 3-4 times in a year when ever I visit Mumbai for my official work.
http://www.ghumakkar.com/2009/07/13/an-evening-in-haji-ali-dargah-mumbai/
Mahesh ji,
Thanks for your lovely comment.
Yes I had gone through your post on Haji Ali, It was too nice.
Thanks.
वाह वाह मुकेश जी आपने सचमुच में हाजी अली दरगाह के दीदार करवा दिए. फोटो बहुत ही उमदा और सराहनीय हैं. वर्णन कमाल का है . मुझे तो मुंबई में टेक्सी वाले ने रोड पर से ही बता दीया था कि सामने हाजी अली दरगाह है. कभी दिन में आ कर दर्शन कर लेना क्योंकि उस समय लेट नाइट का टाइम था. आप का बहुत बहुत धन्याबाद .
शर्मा जी,
आपके इन सुन्दर शब्दों के लिए ह्रदय से आभार. अब कभी मुंबई जाएँ तो ज़रूर दर्शन कीजियेगा हाजी अली दरगाह के, सचमुच बड़ी सुन्दर जगह है.
धन्यवाद.
मुकेश जी मुंबई घूमना तो हमेशा से ही अच्छा लगता है. पर मुंबई यात्रा की शुरुआत यदि आप महालक्ष्मी मंदिर, या फिर सिद्धि विनायक मंदिर से करते तो और भी अच्छा लगता. मुंबई और समुन्द्र के फोटो बहुत अच्छे हैं. रौडी राठोर जी का फोटो अच्छा हैं. उम्मीद हैं अगली कड़ी में सिद्धि विनायक और महालक्ष्मी जी के दर्शन होगे.
प्रवीण जी,
उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया. मुझे ख़ुशी है की आप भी घुमक्कड़ के उन चुनिन्दा लोगों में शामिल हो गए जो अपनी बहुमूल्य कमेंट्स के माध्यम से हर लेखक के प्रयास की सराहना करते हैं, और उत्साहवर्धन करते हैं (घुमक्कड़ पर ऐसे बहुत कम लोग हैं).
धन्यवाद.
डियर मुकेश,
बहुत ही अच्छा विवरण है. इस से पहले मुझे हाजी अली दरगाह की कोई ख़ास जानकारी नहीं थी. आपने बहुत ही प्यार, श्रद्धा ,भक्ति और पूरे समर्पण के साथ अपना बेस्ट दिया. इसी तरह से आगे भी जानकारियों के साथ यात्रा वर्णन लिखते रहिये………… : )
Best of Luck……….. :)
Thanx…….:)
कविता,
सुहाने शब्दों से प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धन्यवाद. मेरे हर अच्छे कार्य और सफलता की प्रेरणा तो तुम ही हो, तुम्हारे लगातार उत्साहवर्धन और प्रेरणा की वजह से ही यह सब संभव हो पाता है.
थैंक्स.
Hiee Papa,
Nice place and nice post………
Though being in Mumbai for 2-3 days i could not visit to Haji Ali and am feeling guilty for this…………
Really missing myself in this post ………..Amazing place !!! :)
Thanxx…..
Sanskriti,
Thanks for comments. Yeah we too were missing you there, but no problem its due for next time, If lord call us.
Thanks.
मुकेश जी…..
हाजी अली की दरगाह मुंबई के प्रसिद्ध स्थानों में से इक हैं और हाजी अली के दरगाह को टेलीविजन और फिल्मो कई बार देख चुके हैं…..पर इस दरगाह की एतिहासिक जानकारी कही नहीं सुनी थी…पर आज इस पोस्ट के माध्यम से यह कमी भी दूर हो गयी और आपने बहुत अच्छे सुन्दर शब्दों के साथ हाजी अली दरगाह की जानकारी दी….मुझे तो बहुत अच्छा लगा जानकार |
आपके विचार “सर्व धर्म समभाव” को जानकर अच्छा लगा और कुछ ऐसे ही विचार मेरे भी हैं…..हमें अपने धर्म का सम्मान सर्वोपरि रखते हुए दूसरे धर्मो का भी भरपूर सम्मान करना चाहिये ….क्योंकि हमें विश्वास हैं की सबका पालन हार और सबका मालिक इक हैं |
दरगाह तक जाने का समुंदरी रास्ता बड़ा सुरम्य लगा और बड़ा ही दिलचस्प नजारा रहता होगा | हाजी अली की दरगाह में मत्था टेकने और चादर पोशी को जाते भक्तो के पैर समुंद्र के द्वारा पखारे जाते हैं, सुनकर अलग ही श्रद्धा भाव का एहसास हुआ ……… |
मुंबई की हाजी अली दरगाह से परिचय कराने के लिए बहुत – बहुत धन्यवाद…..|
रितेश जी,
एक बात कहना चाहूँगा, मुझे और कविता हम दोनों को आपकी कमेन्ट बहुत अच्छी लगती है, विषय से पूर्णतः सम्बंधित (To the point), संयमित एवं संतुलित भाषा, सौम्य शब्दों में त्रुटियों की ओर ध्यानाकर्षण, विवादों से सर्वथा दूर, उचित प्रशंसा और उत्साहवर्धन से परिपूर्ण, विस्तृत समीक्षा सबकुछ होता है आपकी कमेन्ट में जो लेखक के दिल को छू जाता है.
धर्म के बारे में आपके विचार जानकर बहुत अच्छा लगा …………………..”हमें अपने धर्म का सम्मान सर्वोपरि रखते हुए दूसरे धर्मो का भी भरपूर सम्मान करना चाहिये” हम भी इसी सिद्धांत का पालन करते हैं.
अंत में आपकी रत्नजडित बहुमूल्य टिप्पणी के लिए धन्यवाद.
मुकेश जी….
आपने तो मेरी ढेर सारी प्रशंसा ही कर डाली..उसके लिए धन्यवाद….|
एक बात और मेरे दिल में जो कुछ भी आता या होता हैं उसे मैं एक विषय वस्तु पर रहते हुए टिपण्णी रूप उजागर कर ही देता हूँ | मुझे लेख से सम्बन्धित टिप्पणी करने में ही बड़ा आनंद आता हैं…| वैसे आप मेरे पसंदीदा लेखक हो और मुझे आपके संतुलित और हिंदी के चुने हुए सुन्दर शब्दों में लिखे गए लेख मेरे मन को बहुत भाते हैं….|
great post indeed…with full details too..ur last mumbai local was also fantastic…hope u njoyed a lot..and really my heart wishes u greeting,as u respect all the religons.. i wish all Indians to be same one day..njoy..god bless you… :)
m on facebook with email id- [[email protected]]
Abhishek,
Thank you very much for going through and liking my post. Keep visiting ghumakkar.com and keep commenting.
Thanks.
हिन्दू कोई धर्म नहीं अपितु जीवन पद्यति तथा जीवन विज्ञानं है. सनातन धर्म एकेश्वर को मान्यता देता है इसलिए प्रत्येक हिन्दू पद्यति को मानाने वाला किसी भी धर्मं में अविश्वाश कर ही नहीं सकता. ‘जैन’, ‘बौद्ध’, ‘सिक्ख’, ‘शैव’, ‘वैष्णव’ आदि सभी धर्मं जो हिन्दू पद्यति से प्रेरित हैं, किसी भी धर्मं में अविश्वास नहीं करते. यह तो मानव को जीवन से मोक्ष तक ले जाने की श्रेष्ठतम तथा वैज्ञानिक पद्यति है जिसको कुछ ‘तलवारों’ तथा ‘हथियारों’ के दम पर विकसित तथाकथित धर्मो ने कलुषित किया जिस की वजह से हम इस श्रेष्ठतम जीवन पद्यति को जान ही नहीं पाए हैं. कृपया महान लेखक ‘नंदलाला दशोरा’ जी का साहित्य पढ़ें तथा जाने की कितनी महान है ‘सनातन धर्मं संस्कृति’ और गर्व करें की आप इस को मानते हैं ….. गर्व करें की आप सभी धर्मों को मानते हैं….. गर्व से कहें ‘हम हिन्दू हैं’ .
कौस्तुभ जी,
इतनी सुन्दर कमेन्ट के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद. आपकी कमेन्ट से धर्म के बारे में आपका विस्तृत ज्ञान झलक रहा है. कमेन्ट की अंतिम दो पंक्तियाँ अत्यंत प्रभावी तथा आकर्षक थीं.
मुकेश, हाजी अली के बारे में मेरी जानकारी कितनी सतही थी ये मैं ये लेख पढ़ कर जाना | :-) धन्यवाद | मेरे हिसाब से कुछ फोटोस कम किये जा सकते थे उससे शायद लेख और कसा हुआ रहता | आगे कहाँ लेकर जा रहे हैं ?
नंदन,
आपकी सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. इसके बाद आपको लेकर जा रहा हूँ मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर और उसके बाद मुंबई की कुछ और झलकियाँ.
धन्यवाद.
इतना सुन्दर और मोहक विवरण ! मुआलाना का आशीर्वाद और आपके आंसू के बारे में पढ़ कर मेरी भी आखें भर आयीं.
प्रयाग जी,
इतने भावुक शब्दों में प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धन्यवाद.
The location of majar is eye catching and your fotos have shown the real beauty of the area.
about religious/spiritual – no comments
thanks ……for visiting it throw urs …it’s a beautiful journey….thanks
Dear Mukesh Bhai,
Although I have been to Mumbai several times, it seems quite unintentional that we never made a plan to visit Haji Ali Dargah. Whenever we passed from that road which leads to the Dargah, we had a glimpse of it from distance but didn’t venture to go there.
However, after reading this post of yours, I have put it in my wish list and during my next visit to Mumbai, I will definitely plan a visit to Haji Ali. Thank you for generating an interest in me for this place.
Thanks Indian SS Ji for reading and liking this old post.