SRIKHAND MAHADEV श्रीखण्ड महादेव, भाग 10, पैदल मार्ग (भीमडवार-पार्वती बाग-नैन सरोवर)

May 17, 2012 By:

दर्शन कर नीचे आ रहे दो-तीन भक्तों ने हमें सावधान किया कि अब आप ऊपर मत जाना नहीं तो? इस नहीं तो को सुनकर अपुन अत्यधिक चौकन्ने हो गये। हमने उनसे पूछा कि नहीं तो क्या होगा? बताइये हमें नहीं तो, हमारे पेट में दर्द होने लगेगा। वापस आने वाले यात्री बता रहे थे कि दो-तीन किमी ऊपर पार्वती बाग में दोपहर एक बजे के बाद जाने वालों को मुश्किल से ही टैंट मिल पाते है, एक तो वहाँ पर टैन्ट कम संख्या में है, देर होने पर वहाँ जगह मिलने में परेशानी बन जाती है, रात को रुकने का किराया भी भीमडवार से दुगना है, दूसरा वहाँ पर रात में ठन्ड भी भीमडवार से ज्यादा ही होती है, इसलिये हम रात को जगह ना मिलने की चिंता के कारण ऊपर पार्वती बाग तक नहीं गये। ऊपर जाकर अगर हमें रात रुकने का ठिकाना ना मिलता तो मजबूरन हमें नीचे उतरकर आना पडता। अत: हम यहाँ भीमडवार नाम स्थल पर सबसे पहले मिलने वाले टैंट में ही रुक गये थे। जिसका मालिक घनश्याम था, वह हर साल टैंट लगाता है, उसने एक रात में प्रति बन्दा रुकने का सौ रुपया, व खाने का एक बार का सत्तर रुपये लिया था। हमें भूख तो लग ही रही थी, उसको परांठे बनाने को कहा, तीनों ने दो-दो पराठे खाने के बाद आसपास की हरी-भरी विशाल घाटी व अन्य जगह घूमने के लिये चल पडे थे। सामने थोडा सा नीचे उतरते ही भीमडवार का एकमात्र भंडारा था, जिसमें जाकर हमने भी कढी चावल का प्रसाद भी ग्रहण किया गया। काफ़ी देर घूम-घाम कर शाम होने से पहले ही वापस टैट में आ गये थे। अगर ऊपर रुकने का ठिकाना मिलने की उम्मीद होती तो आज हम दो-ढाई किलोमीटर आगे, सामने पहाड की चॊटी पर दिखाई दे रहे पार्वती बाग तक जा सकते थे। हमारा मोबाइल वहां काम नहीं कर रहा था भीमडवार में सिर्फ टाटा मोबाइल का नेटवर्क ही काम कर रहा था।

भीमडवार के प्यारे नजारे।

जी करता है यही बस जाऊँ।



दिनांक 20 जुलाई सन 2011, दिन बुधवार, को हमारी यात्रा की आज सबसे कठिन मंजिल होने जा रही थी। जहाँ हम रुके हुए थे, उस टैंट में कुछ अन्य लोग भी ठहरे हुए थे, जिन्होंने हमें बताया कि असली यात्रा तो नैन सरोवर से आगे जाकर शुरु होती है, नैन सरोवर तक पहुँचने के बाद भी बंदे वापिस आते देखे गये है, हमारे साथ चल रहे एक बंदे ने बताया था कि मेरी लडकी दो बार नैन-सरोवर तक आ चुकी है, लेकिन इससे आगे जाने की उसकी हिम्मत नहीं पड रही है। मैं उसकी बात सुन कर मन ही मन डरा जा रहा था, कि यार ये नैन-सरोवर से आगे आखिर आफ़त क्या है। दो दिन से लोग हमें, सच बता रहे थे या हमें डरा रहे थे, कि बडे-बडॆ पत्थरों को पकड-पकड कर चढना पडता है, एक पूरा ही दिन की चढाई तो पत्थर ही खा जाते है, ऐसी-ऐसी बाते सुन कर मन बैठा जा रहा था। फ़िर सोचा यार, जब सिर ओखली में दे ही दिया है, तो मूसल से क्या डरना। जब अपनी शारीरिक तैयारी पर ध्यान गया तो अपना विश्वास अपने आप बढ गया। बिना कोई डर-चिंता किये आगे जाने के लिये कमर कस ली। आज हमारा सफ़र भीम-डवार से श्रीखण्ड महादेव मात्र नौ-दस किलोमीटर जाना व इतना ही वापस ढलान पर आना था। आज आना-जाना दोनों मिलाकर मुश्किल से उन्नीस-बीस किमी ही तो पैदल तय करना था। हाँ अगर हम पार्वती बाग में रात को ठहरते तो यह दूरी घटकर तेरह-चौदह किमी की रह जाती। रात को भी लोगों के आने-जाने की आवाजे आती रहती थी। कई लोगों ने तो हमारे टैंट के बाहर खडे होकर भी आवाज लगायी थी कि रात को रुकने की जगह खाली है क्या? लेकिन हमारे टैंट में क्षमता से अधिक व्यक्ति सोये हुए थे। जिस कारण कई लोगों को रात में मना किया गया था। रात के बारह एक बजे भी लोग पैदल जा रहे थे। जिस कारण मैंने भी सोची कि चलो अच्छा है रात में सुबह होने से पहले ही यहाँ से चल देंगे।

ऊपर लाईन के नीचे पार्वती बाग है। भीम डवार से पार्वती बाग, व पार्वती झरने का खूबसूरत नजारा दिखाई दे रहा है।

सुबह चलते ही, यह खोखला होता हुआ बर्फ़ आ गया था। ऐसी जगह पर सबकी हालत खराब रहती थी।

भीम-डवार से यात्री, रात्रि के कह लो या भौर के सुबह 3-4 बजे से ही यात्रा शुरु कर देते है, जल्दी चलने का फ़ायदा ये होता है कि जबरदस्त फ़ाडू चढाई को जल्दी चलने वाले ठण्ड-ठण्ड में पूरा कर लेते है, मैंने भी सुबह जल्दी चलने का सुझाव दिया तो अपने जाट राम बोले तो कुम्भकर्ण जैसी नींद के मालिक के दहाडने की आवाज आयी कि मैं अंधेरे में नहीं चलूँगा। मतलब साफ़ था कि नीरज को अपनी नींद ज्यादा प्यारी थी, मार्ग की कठिनाईयों की कोई चिंता नही थी। मैंने उसे खूब समझाया लेकिन बन्दा अपनी बात पर अडा रहा कि मैं किसी भी हालत में रात में पैदल नहीं चलूँगा। यहाँ व ऐसी किसी और दुर्गम जगह जाने वाले बंदे को एक बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि आपको अपना सफ़र हमेशा सुबह जितना जल्दी शुरु कर दोगे तो मार्ग में उतनी ही परेशानी कम होती जाती है। जितना देर से सफ़र शुरु करोगे, उतनी कठिनाई से मुकाबला भी करना पडता है। देर होने से पहाड पर चढते समय गर्मी का सामना करना पडता है। एक बार तो इतना गुस्सा आया कि नीरज को ढेर सारी सुना दूं। हम तीनों सब एक साथ गये थे तो कर भी क्या सकते थे, जाना भी साथ ही था। बीच मार्ग में कोई एक बंदा थक जाये तो उसे वही रुकने की कह आगे चल सकते है, लेकिन जब दिन की शुरुआत ही देर से हो तो शाम को अंधेरा होने का डर रहता है। मैं एक बार ऐसा भुगत चुका हूँ, जब मैं पहली बार गौमुख गया था, सन 2000 की बात है, मुझे बर्फ़ीले पहाडों पर चलने के बारे में, कोई ज्यादा खास अनुभव भी नहीं था, सुबह आठ बजे चला था, गंगौत्री से वापस आने में रात के 9 बज गये थे, मेरे एक पैर के घुटने व कुल्हे ने तो जवाब दे दिया था, मैं ही जानता हूँ कि आखिरी के 5-6 किलोमीटर एक पैर के सहारे, लगभग घिसटते हुए वो भी अंधेरे में कैसे काटे गये थे। यहाँ हमें ऐसे भाई-बंधु भी मिले जो सिर्फ़ रात को ही यात्रा करते थे, वे दिन में दस बजे के बाद पैदल यात्रा नहीं करते थे।

पार्वती बाग से भीमडवार को देखो।

पार्वती बाग से आगे पत्थर की खान कहो या घाटी बात एक ही है। जहाँ बंदे ऐसे ही पडे हुए आराम करते है।

आज एक बार फ़िर हमें चलने में देर हो गयी थी, जबकि आज तो हमें सबसे ज्यादा कठिन चढाई चढनी थी। सुबह पौने सात बजे हम तीनों आज की आगे की यात्रा के लिये चल दिये थे। पार्वती बाग सामने ऊपर की ओर ही दिखाई दे रहा था। दूरी लगभग दो-ढाई किलोमीटर ही थी, लेकिन हमें इसको तय करने में ही सवा घंटा लग गया था, इस छोटी सी दूरी में एक किलोमीटर एकदम खडी चढाई है, दो-तीन बर्फ़ के छोटे-छोटे ग्लेशियर जैसे दिखने वाले ढेर भी पार करने पडते है। चढाई एकदम खडी थी जिस पर हमारे नीरज जाट जी अब तीसरे नम्बर पर चल रहे थे, इस सफ़र में मैंने एक बात पर विशेष ध्यान दिया कि नीरज भाई ने अपने ब्लॉग पर सबको बताया था, कि यह यात्रा बडी कठिन है, ऐसी-ऐसी परेशानी आयेगी आदि-आदि, लेकिन जब नीरज हमारे साथ-साथ चल रहा था तो मुझे एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि नीरज ने इस दुर्गम यात्रा के लिये शारीरिक व मानसिक रुप से कोई खास तैयारी की हो। एक तो नीरज अपने थैले में जरुरत से ज्यादा कपडे भर कर लाया था। बता रहा था कि करेरी झील में बिना कपडे के बहुत तंग हो गये थे। मतलब कि केरेरी भी आधी-अधूरी तैयारी के साथ गये थे। लेकिन मैं यात्रा में खासकर पहाडों पर कभी भी जोखिम नहीं उठाता हूँ, अब वो चाहे रात को रुकने का हो या चलने का। अब रही बात बोझ को पैदल यात्रा में जबरदस्ती साथ-साथ ढोने की, तो नीरज की यह बात भी समझ नहीं आयी थी, उसे बहुत समझाया कि भाई मैंने व विपिन ने अपने-अपने बैंग यही भीमडवार में छॊड कर जाने है क्योंकि रात में तो यहीं वापिस आना ही है, तुम भी इस 6-7-8 किलो के बैग को यही घनश्याम के टैंट में छोड दे, पर जाट खोपडी है ना माने ही ना किसी की। बंदा किसी की बात मानता तब ना, नीरज ने हमारी भी नहीं मानी, अपना कई किलो का बैग बेवजह लाद ले जाकर ही पार्वती बाग की ओर चल दिया था, और हमें एक अजीब बात और बता दी कि इस बैग के सहारे ही मैं और सबके मुकाबले ज्यादा तेजी से उतर जाता हूँ। जबकि मैंने व विपिन ने अपना बैग वही घनश्याम के टैंट में ही छोड दिया था, अब बिना बैग के हम काफ़ी हल्का अनुभव कर रहे थे। बैग में से कीमती सामान (पैसे-मोबाइल) निकाल कर अपनी-अपनी जेब में रख लिया था। रैन कोट पहन लिया था ताकि बारिश आने पर बचा जा सके।

पत्थर की खान पार करते ही ये प्यारा सा पौधा हमें मिला था।

नैन सरोवर आ गया है।

चढाई पर विजय पाते हुए हम ठीक आठ बजे पार्वती बाग पहुँच चुके थे। यहाँ आने से पहले मैंने सोचा था कि जगह का नाम बाग है अत: यहाँ बाग में पेड-पौधे जैसा कुछ मिलेगा, लेकिन घास के अलावा यहाँ कुछ नहीं था। एक जगह गर्मा-गर्म परांठे की महक आ रही थी। दो-दो पराठे मैंने व विपिन ने खाये थे, अभी विपिन ने खाये भी नहीं थे कि तब तक नीरज भी आ गया था, नीरज के आते ही पराठों का आदेश दिया गया, पहले इसलिये नहीं दिया था कि कहीं वो बना दे और वो भी हमें ही खाने पड जाये। ऐसा एक बार जलोडी जोत पर हो चुका था। जब मैंने दुकान वाले को चार मैगी बनाने की बोल दी थी, लेकिन नीरज व विपिन मैगी छोड जीप में बैठ कर 25-30 किलोमीटर दूर अन्नी के लिये चल दिये थे, मैंने व नितिन ने ही दो-दो मैगी खायी थी। सारा हिसाब-किताब यानि मुनीम जी नीरज जाट को ही बना रखा था। टैंट वाले को बोला कि भाई हमारे पैसे भी नीरज ही देगा, जो कि अभी खा रहा है। यहाँ से आगे नैन सरोवर की ओर 500-600 मीटर तक कुछ ढलान सी ही है, अत: एक बार फ़िर धीरे-धीरे आगे की ओर चल दिये, आधा किलोमीटर तक तो कुछ छोटे-छोटे से पत्थर थे, लेकिन आधे किलोमीटर बाद बडे-बडे मोटे-मोटे पत्थर आ गये थे जिन पर कूद-कूद कर हम आगे बढते जा रहे थे। कभी ऊपर कभी नीचे इन पत्थरों ने जम कर मेहनत करवाई थी। ये पत्थर अभी पूरी तरह पार भी नहीं हुए थे कि एक दम अचानक से भडाम-भडाम जैसी आवाज आनी शुरु हो गयी। आवाज ऊपर पहाडों की तरफ़ से आ रही थी। पूरा माजरा समझा तो पता लगा कि पहाड से पत्थर गिर रहे है। हमें केवल धुँआ उडता नजर आया था। हम उस समय इस पत्थर की खान के बीच में ही चल रहे थे।

नैन सरोवर


जब पत्थरों की डरावनी खान पार हुई तो एक प्यारा सा पौधा नजर आया, इतनी ऊँचाई पर इस पौधे को देख कर मन खुश हो गया, जो थोडी बहुत थकान हुई थी, वो इस प्यारे से पौधे को देख कर दूर हो गयी थी। पौधे का फ़ोटो खीचं-खाच कर आगे बढे तो भैया एक बार फ़िर अपनी दोस्त साँस फ़ूलाने वाली चढाई आ गयी थी। नीरज व विपिन अभी पीछे ही चल रहे थे। हमारा जोर एक बार फ़िर लग गया था, लेकिन हम भी दो झटके में इस चढाई को पार कर ही गये थे। जब यह चढाई खत्म होने ही वाली थी तो एक बार फ़िर पहाडों के दहाडने या कहो गरजने की आवाज सुनाई दी, आवाज की दिशा में देखा कि एक जगह पत्थर गोली की रफ़्तार से नीचे घाटी की ओर जा रहा था, वो तो शुक्र करो कि उसके रास्ते में कोई यात्री नहीं आया था, नहीं तो उसका तो हो जाता राम नाम सत्य। पहाड में जब बडे-बडे पत्थर ऊपर से नीचे की ओर जाते है, तो एक तो उनकी रफ़्तार हर पल बढती जाती है, दूसरे लुढकने वाला पत्थर कई टुकडे में टूट जाता है, जिससे बडी समस्या बन जाती है। सबसे बडी दिक्कत ये की पत्थर कही भी टकरा कर अपना मार्ग बदल सकता था। लेकिन यह भी सच बात थी कि कितना भी बडा पत्थर हो मुश्किल से ही नीचे तक आ पाता था क्योंकि उसके मार्ग में पडे हुए पत्थर उसको रोकते थे जिसमें ट्करा कर वो छोटे-छोटे टुकडे में बिखर जाता था।

नैन सरोवर का एक और फ़ोटो।

एक और फ़ोटो।

जब यह चढाई पार कर सामने देखा तो हमारी आँखे फ़टी की फ़टी रह गयी थी, क्योंकि सामने ही वह बर्फ़ीला नैन सरोवर था, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ तक आने के बाद भी यहाँ से दस प्रतिशत लोग वापिस लौट जाते है। चढाई ने थोडा सा थका दिया था, अत: अब आराम करना भी जरुरी था, तो जी हम तो वही पसर/बैठ गये थे, थोडी देर बाद नीरज भी हमारे पास आ गया था, लेकिन आज तो गजब ही हो गया था। नीरज जो कभी नहीं बैठता था वो आज जमीन पर बैठ गया था। हमारी फ़ूली हुई साँस थोडी देर बाद उतर कर सामान्य हो चुकी था, हमने घूम-घूम कर इस नैन सरोवर के फ़ोटो खीचे, एक कोने से दूसरे कोने तक जा-जा कर देखा, नीरज तब भी बैठा हुआ था। यहाँ नीरज को बैठे हुए 10-15 मिनट से भी ज्यादा हो गयी थी। मैंने कहा चलो ज्यादा देर बैठोगे तो शरीर अकड जायेगा, इसलिये थोडी-थोडी देर बैठते रहो चलते रहो। मेरी बात सुन कर नीरज ने कोई जवाब नहीं दिया था। हमें नैन सरोवर के पास ही वापस आते हुए वो बिहार निवासी युवको की टोली के वे बंदे भी मिले थे, जिन्होंने हमारे साथ सिंहगाड में जलेबी खाये थी, जिन्होंने हम चारों का पैदल यात्रा का एकमात्र फ़ोटो भी लिया था। मैं तो उन जालिमों की रफ़्तार देख कर हैरत में पड गया था, मैंने उनसे पूछ ही लिया कि रात में कब चले थे तो उन्होंने बताया कि सुबह ठीक चार बजे हम पार्वती बाग से चल पडे थे।

नैन सरोवर के पास आकर बन्दे आराम करते है।

कभी ना बैठने वाला बन्दा अब तक की आने वाली सबसे कठिन चढाई को देख रहा था।

थोडी देर बाद विपिन बोला संदीप भाई जरा ऊपर देखना, हमें वही से तो नहीं जाना है ना। जब मैंने सामने के पहाड की ओर देखा तो मेरे मुँह से निकला, अरे बाप रे, यह भी कोई मार्ग है, नहीं यार ये तो शार्टकट लग रहा है, लेकिन चारों ओर देखकर भी जब मुझे अन्य मार्ग नजर नहीं आया तो देखा कि यार रंग-बिरंगे निशान तो इसी मार्ग के पत्थरों पर ही लगे है। इस यात्रा में कई किमी की यात्रा केवल पत्थरों के ढेर से होकर चलती है जिसमें लोग मार्ग ना भटके उसके लिये पत्थरों पर पेन्ट से निशान बनाये हुए थे। लोग भी उसी निशान वाले मार्ग की ओर से आ जा रहे थे। इस चढाई को देख कर एक बार तो मेरी सिटी-पिटी ही गुम सी हो गयी थी, सामने एक किलोमीटर से ज्यादा की खडी चढाई नजर आ रही थी, और चढाई भी ऐसी कि जिसके सामने डंडीधार की चढाई भी पानी माँगने लगे। बिल्कुल ऐसी, जैसे किसी दीवार के सहारे कोई डंडा तिरछा खडा कर दिया हो और उस तिरछे डंडे पर चढना हो। सच कह रहा हूँ उस खतरनाक चढाई को देख कर मेरा तो हलक/गला/सब सूख ही गया था। पहली नजर में यह दिखाई दे रही चढाई मुझे कुछ ज्यादा ही कठिन लग रही थी। शायद इस चढाई को देखकर ही नीरज ऊपर जाने को तैयार ही नहीं था।
अब अगले लेख में
आपको इस यात्रा में सबसे जोरदार चढाई के फ़ोटो व विवरण साथ में बताया जायेगा,

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

26 Responses to “SRIKHAND MAHADEV श्रीखण्ड महादेव, भाग 10, पैदल मार्ग (भीमडवार-पार्वती बाग-नैन सरोवर)”


  1. Stone says:

    यात्रा का विवरण हमेशा की तरह बिलकुल सटीक और कसा हुआ रहा …….
    भीम द्वार का टेंट और आस-पास के नज़ारे, खासकर पार्वती झरना का फोटो अतुलनीय है
    बहुत बहुत शुक्रिया और आप सब की हिम्मत और जज्बे को सालम.
    **
    इश्वर आपके परिवार को इस मुश्किल समय में शक्ति प्रदान करे.

  2. Surinder Sharma says:

    Really good . I am so happy to read ur post. So many times I checked this website and read about it. Bholenath ji residing on tough places but their Bhakat find them where they are. Very nice Hindi wiriting. I wish i can write in Hindi but I donot know how to write. Really appriciate your blog.

    Regards,

    Surinder Sharma
    Edmonton Canada

  3. नमस्कार संदीप जी ,

    एकदम धमाकेदार पोस्ट है. बहुत मजा आ रहा था की आपने फिर सस्पेंस में छोड़ दिया . यह अब आपके पोस्ट की खासियत बन चुकी है. लेकिन इस बार तो सस्पेंस इतना बढ़िया है की उस चढन के फोटो देखने के लिए सोच रहा हूँ चले जाऊं आपके ब्लॉग पर.

    फिर से विवरण और फोटोस दोनों के जवाब नहीं . यहाँ मेरे जाने की इच्छा पक्की है . अब आगे महादेव की मर्जी .

    यह सीरीस मेरे लिए घुमक्कर.कॉम पर सबसे बढ़िया सीरीस हो रही है.

    और ऐसी मुश्किल समय में भगवान आपके परिवार को हिम्मत और शक्ति प्रदान करे. धन्यवाद.

    @ नीरज :- भाई आखरी फोटो में आप बैठे हो और किसी दिशा में गौर से देख रहे हो. आप किधर देख रहे थे और आप क्या सोच रहे थे यह बताने की कृपा करे .

  4. Very Nice post, very good photos, lage raho mere bhai.

  5. Mayank Khanduri says:

    It is so sad that your close relative has expired. God bless the departed soul. we will be waiting for your next series.

  6. संदीप जी आपके ताऊ जी के बारे में मालूम हुआ, बहुत दुःख हुआ, भगवान् उनकी आत्मा को शान्ति दे. और आपके परिवार को इस मुश्किल घडी में दुःख सहने की क्षमता दे.

  7. Vipin says:

    आपके ताऊ जी के निधन का समाचार सुनकर बड़ा दुःख हुआ. ईश्वर ऐसे कठिन समय में आपको व परिजनों को शक्ति प्रदान करे !!!

    सुंदर सुस्सज्जित पोस्ट!!! बर्फीले नैन सरोवर को देखकर वो छण याद आते हैं जब पानी होते हुए भी आप उसे जी भरकर ना पी पाने की विवशता से जूझते हैं (जरुरत से ज्यादा ठंडा होने की वजह से)……..जबरदस्त फोटोस………

  8. Surinder Sharma says:

    Dear Sandeep,

    I was deeply saddened to hear about the death of your Tauji. Bholenath bless the departed soul and give strength to your family to accept it.

  9. Nandan Jha says:

    Sandeep – May God give you and your family strength to face this loss. Rest in peace.

  10. आपके बडे ताउजी के बारे में सुनकर दुख हुआ संदीप भाई …

    इस पोस्ट में जितना रोमांच था उससे कहीं ज्यादा मुझे लगता है कि आगे होने वाला है । रही बात उन निशान लगे पत्थरो की तो वो तो आपने इस पोस्ट में भी दिखा दिये हैं । शायद ऐसे ही आगे भी होंगे ….एक बात और संदीप भाई इतनी कठिन यात्रा करने जो आप गये उन श्रीखंड महादेव के बारे में जितना ज्यादा हो सके जरूर बताना कि उनकी महत्ता क्या है क्येांकि मै इसके बारे में जरूर जानना चाहता हूं मेरी रूचि बढ गई है

  11. Neeraj Jat says:

    सन्दीप भाई, आपको इस पोस्ट में ताऊजी की मृत्यु के बारे में नहीं बताना था। इससे इतनी बेहतरीन पोस्ट पर आने वाले बेहतरीन कमेंटों का भाव बदल गया है। आप या तो बाद में एक टिप्पणी करके बता देते कि ताऊजी खत्म हो गये हैं या फिर फोन करके मुझसे कह देते, मैं टिपिया देता। अब सब लोग पोस्ट के बारे में लिखने से पहले सांत्वना दे रहे हैं। अगर आप सांत्वना ही लेना चाहते थे तो अलग बात है।

  12. Neeraj Jat says:

    @ विशाल भाई,
    सन्दीप भाई अति उत्साही इंसान हैं। दौड में हर हाल में आगे रहना चाहते हैं, बात सही भी है। अच्छे तजुर्बे के साथ साथ अच्छी फिटनेस उन्हें आगे रखने में मददगार होती है। ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता। लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि वहां नैन सरोवर पर नीरज बैठा ही रहता है, बैठा ही रहता है, क्यों? श्रीखण्ड जाने वाले दस प्रतिशत लोग नैन सरोवर से ही वापस लौट आते हैं, क्यों? श्रीखण्ड महादेव समुद्र तल से 5200 मीटर की ऊंचाई पर है, नैन सरोवर तकरीबन 4400-4500मीटर पर है, जब लोगबाग डण्डाधार जैसी बेहद कठिन चढाई चढकर यहां 4500 मीटर तक आ जाते हैं तो अगले बाकी के 700 मीटर नहीं चढ पाते, क्यों?
    इसका कारण उन 700 मीटर की भयानकता नहीं है, कठिनता नहीं है। रास्ता बना हुआ है, पत्थरों पर निशान लगे हुए हैं, लोगबाग आते-जाते रहते हैं, फिर भी कुछ लोग आगे बढने से मना कर देते हैं। वे इसलिये मना नहीं करते कि वे डर गये। इसका कारण कुछ और है। मैं आपको बताता हूं, सन्दीप भाई को मैं पिछले साल से बताता आ रहा हूं, लेकिन वे नहीं मानते।
    मैंने ऐसे ऐसे हट्टे कट्टे जवान देखे हैं, जो शिमला, मसूरी या नैनीताल (2000 मीटर)चले जाते हैं तो सांस लेने की दिक्कत करते हैं। मनाली जाते हैं, रोहतांग (3500 मीटर) जाते हैं, तो ऑक्सीजन के सिलिण्डर लेकर जाते हैं। इसका कारण यह है कि ऊंचाई जितनी बढती जाती है, हवा का दबाव भी उतना ही घटता जाता है। ऊपर जाने पर सांस लेने पर तकलीफ होने लगती है। मैंने इससे पहले अमरनाथ जाते समय ही 4000 मीटर की ऊंचाई पार की थी, आज 4500 मीटर पर पहुंचकर मुझे भी दिक्कत होने लगी। ऐसा नहीं होता कि आपको सांस लेने के लिये हवा नहीं मिलती। हवा होती है, लेकिन कम घनत्व होने के कारण जल्दी जल्दी सांस लेना पडता है, इससे सांस फूल जाती है। इसका सबसे बडा नकारात्मक पक्ष यह है कि दिमाग को ऑक्सीजन मिलनी कम हो जाती है। नतीजा यह होता है कि सुस्ती आने लगती है, नींद आने लगती है। कुछ भी करने को मन नहीं करता। इसे हाई एल्टीट्यूड सिकनेस भी कहते हैं। यह एक अल्पकालिक बीमारी है, जिसका किसी पर कम असर होता है, किसी पर ज्यादा। उस समय मैं इस बीमारी से ग्रसित था। कुछ भी करने को मन नहीं कर रहा था, ना किसी से बोलने बतलाने का मन था, ना आगे जाने का, ना पीछे लौटने का। नींद आने लगी थी, सोने का मन कर रहा था। लेकिन मुझे पता था कि उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसा हो जाता है, इसीलिये इसी सोच विचार में था कि क्या करूं। वहां मेरी हालत को समझने वाला कोई नहीं था। मेरे साथी आगे निकलने के चक्कर में कभी के जा चुके थे। वे खुश थे कि नीरज जैसा धुरंधर इस चढाई को देखकर डर गया है।
    और आखिरकार मैं श्रीखण्ड महादेव तक गया। यह मेरी शारीरिक अक्षमता पर मानसिक क्षमता की विजय थी। इस मुद्दे पर दोस्तों से मनमुटाव भी हुआ, जो आज तक चल रहा है। लेकिन अपने उन दोस्तों की नजर में मैं चढाई से डर गया था, तो उनका मान रखने के लिये मान लेता हूं कि हां, डर गया था। और चारा भी क्या है, एक साल से दोस्तों को समझा रहा हूं लेकिन दोस्त इसे बीमारी मानने से इंकार करते आ रहे हैं।

    • @ नीरज जी आपकी प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

      पहली बात आप श्रीखंड महादेव चड गए , इसका मतलब आपको डर नहीं लगा , अगर आपको डर लगा भी होगा तो आपने ऊपर तक चड कर आपने डर पर विजय प्राप्त कर ली. दोनों ही स्तिथी में डर आपके साथ नहीं जुड सकता क्यूंकि आपने आखरी लक्ष्य हासिल किया . तो उसपर कोई भी बहस नहीं हो सकती , यह मेरा मानना है . आपने ५२०० मीटर तक की यात्रा की श्रीखंड महादेव की , वोही मेरे लिए काफी है क्यूंकि मैंने अभी तक नहीं की . कर पाऊँगा की नहीं वोह भी पता नहीं.इसलिए मैं नहीं मानता की आप डरे हुए होंगे . मेरा पूंछना था की आप क्या सोच रहे थे.

      दूसरी बात आपने “हाई एल्टीट्यूड सिकनेस’ के बारे में काफी अच्छी तरीके से बताया. मुझे पढकर बहुत मजा आया और एक अलग ज्ञान मिला. वैसे हाई एल्टीट्यूड सिकनेस के बारे में नेट पर काफी कुछ मिल सकता है. लेकिन मेरा यह कहना है की आप एक घुमक्कड पर एक पोस्ट लिखो इन्सैट्स सेक्शन में इस हाई एल्टीट्यूड सिकनेस बिमारी के बारे में और उसके उपाय भी बताओ की कभी ऐसा हो जाये मुश्किल में तो क्या करना चाहिए विस्तार में . इससे मेरे जैसे लोगो को काफी जानकारी मिलेगी क्यूंकि अब में भी हिमालय की यात्राए शुरू करने जा रहा हूँ. एक अनुभवी और प्रायौगिक घुमक्कड के द्वारा अगर हमें जानकारी मिले इससे बेहतर और क्या होगा ?

      • Neeraj Jat says:

        भईया, मैंने बताया तो है कि मैं क्या सोच रहा था। कुल मिलाकर सोचने की ताकत खत्म हो गई थी, सोने का मन कर रहा था। कभी सोचता कि आगे जाऊं, कभी सोचता कि वापस जाऊं। कभी सोचता कि यही बैठा रहूं। बस इसी सोच-विचार में पौन घण्टा निकाल दिया।
        मैं कोई स्पेशलिस्ट नहीं हूं कि इस बारे में इन्सैट्स के लिये हजार दो हजार शब्द लिख दूंगा। जितना मालूम है, उतना बता दिया। बचने का तरीका यही है कि एकदम से ऊंचाई वाली जगहों पर नहीं जाना चाहिये। हालांकि हम पहले दिन करीब 3000 मीटर ऊंचे जलोडी पास तक गये थे, इसलिये शरीर काफी हद तक ऊंचाई के अनुकूल हो गया था। फिर भी भईया, नैन सरोवर पर पहुंचकर मेरी मशीनरी खत्म हो गई तो … हो गई। मैं क्या कर सकता था?

        • Surinder Sharma says:

          Dear Neeraj,

          You reached up to Nain Sarover and it was great job. You did the efforts, work hard and you were there. You can think how much you enjoyed that visit.

          Next time you can go with all preparation and just pray before your Journey and Bhole Shanker will fullfill your wish.

          Regards

        • Mukesh Bhalse says:

          नीरज जी,
          हाई एल्टीट्यूड सिकनेस के बारे में आपने जो अपनी कमेन्ट में लिखा उसे पढ़ कर मैं भी प्रभावित हो गया, आपने बहुत अच्छे ढंग से इस प्रॉब्लम के बारे में बताया, वैसे मैं पहले भी कैलाश मान सरोवर यात्रा के लोगों के अनुभवों में इस समस्या के बारे में पढ़ चूका हूँ.
          विशाल कहना चाहता है की जब हमें आपका कमेन्ट पढ़कर ही इतना अच्छा लगा तो आपको इस सिकनेस के बारे में कुछ अपने अनुभवों के आधार पर तथा कुछ नेट से या किताबों से रिसर्च करके एक पोस्ट घुमक्कड़ इनसाइट्स (जो की घुमक्कड़ पर हर महीने 22 तारीख को प्रकाशित होता है) के अंतर्गत लिखनी चाहिए जिससे पहाड़ों की सैर के शौक़ीन नए लागों को आप जैसे धुरंधरों के अनुभवों से लाभ मिले.

          और पहाड़ों की सैर के दौरान आनेवाली समस्याओं के स्पेशलिस्ट आप लोग नहीं हैं तो और कौन है? हम तो पहाड़ का “प” भी नहीं जानते, बस यही एक छोटी सी विनती विशाल ने की थी और आप उस बेचारे पर नाराज़ हो गए.

  13. sarvesh n vashistha says:

    सहयात्री को पीछे पर्वतारोही ही छोड़ते है जबकि घुमक्कड़ सहयात्री एक दुसरे को मदद करते हुए साथ लेकर ही चलते हें . यहाँ चार सहयात्री थे पर एक को वापस भेज दिया तथा दुसरे की बहादुरी पर शक किया .
    कभी केदारनाथ जी दर्शन खुलने से एक मास पहले जा कर दिखाओ .
    वह्ह्हह्ह …..

    • Neeraj Jat says:

      सर्वेश जी, किसे कह रहे हो कि केदारनाथ के कपाट खुलने से एक महीने पहले जाकर दिखाओ। मैं अपनी जिन्दगी में मात्र एक बार ही केदारनाथ गया हूं और कपाट खुलने से एक महीने पहले ही गया था 2011 में। उस समय वहां दस फीट तक बरफ थी। इसके बारे में मैंने विस्तार से अपने ब्लॉग पर भी लिखा है और दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 29 अप्रैल को मेरी यह कथा भी छपी थी। और सन्दीप भाई को कह रहे हो तो अलग बात है।

    • JATDEVTA says:

      जब सहयात्री चलने लायक ना रहे तो उसे जबरदस्ती खीच कर ले जाना ना तो घुमक्कड़ करते है ना ही पर्वतारोही, एक बार हमने इसी परकार की गलती कर दी थी उसके बाद उस को मजबूरन लाद कर लाना पडा था, हां यदि वापसी उस मार्ग से ना होती तो किसी भी हालात में साथी को आगे ले जाया जाता है, ऐसी दुर्गम जगह बहादुरी दिखाने के लिए नहीं होती है, रही बात केदारनाथ जैसी हल्की फुल्की जगह एक महीने पहले जाने की वो कारनामा दस साल पहले हो चुका है अपुन को उसमे भी कुछ फर्क नहीं लगा था, अब ऐसे कारनामे बच्चो का खेल लगते है, तो वो बच्चो के लिए रहने दिए गए है बार बार एक ही बात दोहराने से कुछ नहीं मिलता इस दुनिया में बहुत कुछ बाकी है उसका भी नंबर आना चाहिए, जैसे कि आदि कैलास, रूपकुंड आदि आदि

  14. Neeraj Jat says:

    और सन्दीप भाई, यह भीम डवार नहीं है। इसे भीमद्वार कहते हैं। द्वार मतलब गेट, किवाड।

  15. Ritesh Gupta says:

    संदीप जी…..
    बड़ा ही रोमांचक और जबरदस्त यात्रा विवरण किया आपने भीम द्वार से पार्वती बाग-नैन सरोवर का |
    आपका लेख पढ़कर अंदाजा लगाया जा सकता हैं की कितना खतरनाक रहा होगा यहाँ तक रास्ता और इतनी अधिक ऊँचाई पर यात्रा करना को आसान का नहीं हैं | आपके द्वारा लगाये गए सभी फोटो लाजबाब हैं ….|

    नीरज जी ने सही बताया हैं ….अधिक ऊँचाई पर होने वाली इस हाई एल्टीट्यूड सिकनेस’ बीमारी के बारे में….| इससे पहले भी मैं इसके बारे में पढ़ चुका हू …|

    आपके ताऊ जी के बारे में सुनकर अफ़सोस हुआ …भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे ….|

  16. Nandan Jha says:

    सुबह तडके निकलने वाली बात बहुमूल्य है | यहाँ तो एक दुर्गम यात्रा की बात है पर एक छोटी सी सड़क यात्रा , जैसे की दिल्ली से नैनीताल, के लिए भी मैं ५ बजे तक निकलने के पूरी कोशिश में रहता हूँ | शायद अगर आप सुबह निकल पाते तो हो सकता है की उस दुसरे दल के तरह आज ही हमे श्रीखंड जी के दर्शन हो जाते :-). संदीप जी, लेख बहुत ही अच्छा बन कर आया है और फोटोस तो कमाल के हैं ही | कुछ फोटोस में आपने हमारी सुविधा के लिए लाइन वगैरह डाला है, उसके लिए स्पेशल थैंक्स | लेख लिखते वक़्त इस तरह का परिश्रम आपके अनुशाशन (ठीक सुबह उठने ही वाली बात के ही तरह) और परिश्रम (आपकी शारीरिक तयारी) को दर्शाता है | साधुवाद , मनु के तरह कहें तो |

    हमारी काज़ा के ट्रिप में मेरी वाइफ को भी AMS ki दिक्कत आयी थी और सच में काफी कष्टदायी हो जाता है, मामला | अब चलें अगले भाग के ओर |

  17. vandana paranjape says:

    बस्,सिर्फ आगे पढना है!

  18. Pradeep Kumar Thakur says:

    jai shrikhand mahdav ki ji

  19. Pradeep Kumar Thakur says:

    jai mahadev



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