SRIKHAND MAHADEV श्रीखण्ड महादेव बाइक से, भाग 7 (JALORI PASS-NIRMAND-JAON) |
जलोडी जोत (पास PASS) से चलते ही अबकी बार हमें उसी कठिन सी चढाई को उतराई में भी झेलना पडा, उतराई को मैं हमेशा कठिन कहता रहा हूँ क्योंकि चढाई पर सिर्फ़ साँस फ़ूलता है चाहे वाहन हो या इन्सान, इसके विपरीत उतराई पर अगर ढलान अगर 30 डिग्री से भी ज्यादा है तो अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता हो जाती है, जहाँ चढते समय रुकने के लिये आपको कुछ नहीं करना पडता है वहीं उतरते समय सारे तरीके अपनाने पड जाते है, अगर गलती से भी जरा सा चूके तो गम्भीर परिणाम भुगतने को तैयार रहना चाहिए। जब उतराई में वाहन से गिर कर घुटने फ़ुडवाने का डर, या फ़िसलकर खाई में टपकने का डर मन में हो तो अच्छे-अच्छों को अकल आ जाती है, ऐसे में हम जैसों की गिनती कहाँ होती है। उसकी गणना करनी पडेगी? खैर शुरु के तीन-चार किमी कुछ ज्यादा ही सावधानी सहित चलने के बाद थोडा आसान मार्ग आ गया था, जिस पर अपनी बाइक 30-40 के बीच बिना इन्जन की ताकत लगाये दौडी जा रही थी। एक खास बात मैं बाइक को भी ढलान पर इन्जन बन्द करके नहीं चलाता हूँ, कार चलाकर कई बार देहरादून, मंसूरी, धनौल्टी होते हुए चम्बा, से दिल्ली तक यात्रा की है, लेकिन सबसे ज्यादा रोमांच व खुशी बाइक वाली यात्रा में ही आई है।
जलोडी जोत से चलने के पन्द्रह-बीस मिनट बाद ही अंधेरा हो गया था, जिस कारण मोटर साईकिल बोले तो बाइक की मुख्य रोशनी-हैड लाईट जलाकर आगे की यात्रा जारी रही। हल्की-हल्की बारिश भी लगभग 10-12 किमी तक होती रही। अन्नी से आठ-दस किलोमीटर पहले जाकर ही बारिश बन्द हुई थी। इस थोडी सी बारिश के चक्कर में मेरे रैनकोट की जेब में पानी भी घुस गया था, जिससे रुपये-पैसों के साथ-साथ मेरा मोबाइल भी भीग गया था, मोबाइल तो दिल्ली आने बाद सात दिन बाद ही ठीक हो सका, तब तक नीरज जाटराम के मोबाइल में सिम डालकर काम चलाना पडा था। इसलिये आप सब को एक जरुरी सलाह यह है कि कभी रैनकोट के भरोसे ना रहे। अपना कीमती सामान जैसे मोबाइल, घडी, पैसे, कैमरा हमेशा पोलीथीन में लपेट कर छिपा कर रखे, ताकि पानी से बचा जा सके। हमारे पास बाइक पर चलते-चलते हुए ही मोबाइल चार्ज करने के पूरे इंतजाम थे। हमने कार की तरह बाइक में भी मोबाइल चार्ज करने का जुगाड लगवाया हुआ है, जिस कारण मोबाइल की बैट्री डाउन होने की कोई सम्भावना नहीं बचती है। लेकिन जब मोबाइल ही जवाब दे जाये तो चार्ज किसको करोगे? मोबाइल पास होने से आजकल बहुत आसानी हो गयी है नहीं तो पहले एस,टी,डी की तलाश में भटकना पडता था। मोबाइल से कॉल करना भी सस्ता पडता है।
जाटराम नीरज व विपिन पण्डित हमसे बीस मिनट पहले चले थे, लेकिन हम इनसे दस मिनट पहले अन्नी जा पहुँचे। यहाँ आते ही एक कमरा तलाश करना शुरु किया, ताकि रात काटी जा सके। सरकारी गेस्ट हाऊस में बात करने गए तो वहाँ का केयर-टेकर शराब के नशे में टुल्ली था। वहाँ कमरे खाली तो थे लेकिन उसने मरम्मत के नाम पर कमरे देने से मना कर दिया था। वहाँ के बोर्ड से उसके उच्च अधिकारी का फ़ोन नम्बर लेकर उसकी शिकायत की गयी, लेकिन अधिकारियों का रवैया भी बेरुखा था। इसलिये वहाँ कमरे की बात ना बन सकी। तब तक विपिन व नीरज की जीप भी आ गयी थी, इनकी जीप में इन्जन की बेल्ट में कुछ परेशानी हो गयी थी, जिस कारण ये दोनों कुछ देर से पहुँचे। बस अड्डे आने के बाद पास में ही एक कमरा लिया गया। रात में हम जहाँ पर रुके थे वो जगह बस-अड्डे के एकदम पास ही थी, कमरे के पीछे ही एक नदी सी बह रही थी। कमरा नदी व बस अडडे के बीच में स्थित था। अन्नी में रात बडे आराम से गुजारी, जिस कमरे में हम ठहरे हुए थे, उसमें पूरे छ: पलंग थे, हम चार थे, जिसका मतलब दो खाली थे, ये खाली वाले पलंग हमारे कपडे सुखाने के काम आये थे। कल पूरे बीस किलोमीटर के आसपास तो पैदल चल ही चुके थे। सबने अपने मोबाइल चार्ज किये, (मुझे जाटदेवता को छोड कर) जाटराम नीरज व विपिन गौर ने अपने-अपने कैमरों की बैटरी भी चार्ज की थी, क्योंकि आगे का पता नहीं था कि कहीं कैमरे की बैटरी पैदल वाले मार्ग में चार्ज करने का मौका भी मिलेगा या नहीं। सुबह अपनी तो नींद 5 बजे से पहले बिना अलार्म लगाये ही खुल जाती है। बस जाटदेवता संदीप व नीरज जाटराम की यही इस नींद वाली बात पर गडबड होती थी। सबको साढे छ: बजे जगाया, लेकिन नीरज कल की तरह आज भी सात बजे जाकर ही उठा। आज सुबह का सब कुछ (जरुरी कार्य फ़्रेस होना, नहाना धोना, दाढी बनाना,) रात में ही तय कर लिया था, कि सतलुज के किनारे जाकर ही किया जायेगा।

हम सुबह चारों यहाँ से चलते, उससे पहले एक घटना मैंने अपनी आँखों से देखी, वो यह थी कि जिस कमरे में हम रुके हुए थे ठीक उसके पीछे की ओर तीन लोग भेड को मारकर उसका माँस व खाल निकालने में लगे हुए थे। एक भेड की गर्दन तो ठीक उसी समय एक ही वार में अलग कर दी थी, जब मेरी निगाह उन पर पडी थी। मैं ठहरा एकदम शाकाहारी उस घटना को देख कर मेरा मन कई घन्टे तक बेहद विचलित रहा। आज भी मुझे वो झटके के साथ भेड के सिर का कटना मेरी आँखों के सामने ऐसे घूम जाता है जैसे कि अभी-अभी यह घटना घटी हो। बिना नहाये धोये, बिना दैनिक कार्य निपटाये, सुबह ठीक सात बजे के बाद अन्नी से आगे की यात्रा पर सतलुज नदी की ओर चल दिये थे। जो कि अन्नी से मात्र 15 किमी के आसपास ही है। हम ठीक 8 बजे तक सतलुज नदी के किनारे पर आकर नहाने धोने के कार्य में लग गये, जिसमे पूरा एक घंटा लग गया, हम चारों में से तीन (संदीप, नितिन, विपिन) नहाये, साथ-साथ अपने-अपने कपडे, जुराबे, जूते भी सब कुछ साफ़ किया था। बस हमारे एक वीर जवान नीरज जाटराम ने जो कि खाने में भी पहले स्थान पर था, व उस खाये पीये को अपने पॆट में कई-कई दिन तक रोक कर रखने में भी उसे महारत हासिल है। उसने यहाँ भी अपना पेट हल्का नहीं किया। यहाँ सतलुज में जिस जगह हम नहा रहे थे, सतलुज में एक मोड था जिससे नहाने के लिये एक सुरक्षित स्थान बन गया था, बाइक भी सडक से उतार कर पानी के एकदम पास ही ले गये थे। तीनों ने नहाना धोना, दाढी बनाना, व अन्य दैनिक जरुरी कार्य निपटाये।
यहाँ सतलुज में नहाने धोने से निपट कर आगे बढे तो कुछ ही दूर जाकर एक पुल आता है जो सतलुज के ऊपर बना हुआ है, उस पुल से पहले किसी जगह पर एक बोर्ड पर लिखा था कि निरमुंड 92 किलोमीटर, एक स्थानीय बन्दे से मालूम किया तो जानकारी मिली कि ये मार्ग ऊपर पहाडों से बहुत घूम-घाम कर नुरमुंड पहुँचता है, आप सीधे सैंज से आगे रामपुर हाईवे से होते हुए जाओ। अगर कोई दिल्ली वाला या शेष भारत का बंदा अम्बाला, कालका, शिमला, नारकंडा से सीधे श्रीखण्ड महादेव की यात्रा पर जाना चाहता है, तो उसे जलोडी जोत जाने की आवश्यकता नहीं है। कभी कोई इस लेख को देखकर कोई जलोडी जोत पहुँच जाये और वहाँ जाकर किसी से पूछे कि श्रीखण्ड कितनी दूर है? वैसे आपने पिछले वाले लेख से यह तो देख ही लिया है कि ये जलोडी जोत व इसके आसपास कुदरत ने कितनी हसीन दुनिया बनाई हुई है। इसलिये जलोडी आना भी सोने पर सुहागा है। सैंज से जलोडी जोत पूरे 50 किलोमीटर दूर है, आपको आना-जाना पूरे 100 किमी ज्यादा यात्रा करनी पडेगी। श्रीखण्ड यात्रा पर आने वाला बन्दा एक दिन और निकाल कर जलोडी जोत देख कर आये तो उसके लिये यह यात्रा कभी ना भूलने वाली यादगार यात्रा बन जायेगी। वैसे खूबसूरत स्थल तो श्रीखण्ड पैदल यात्रा मार्ग में भी भरे पडे है, लेकिन जलोडी जोत एक बोनस अंक के रुक में आपको मिल जायेगी। ऐसी हसीन जगह के लिये दो-तीन दिन भी लगा दो तो मजा कई गुणा बढ जायेगा। कुल्लू से श्रीखण्ड आने के लिये जलोडी जोत से होकर ही आना होता है।
हाँ तो मैं आपको बता रहा था कि शिमला से श्रीखण्ड जाने के लिये थियोग होते हुए (जहाँ से हमने पैट्रोल लिया था), नारकंडा, सैंज, नीरथ होते हुए जाना होता है। जाते समय नीरथ में हमने एक पंजाबी ढाबे का बोर्ड देख कर रुक गये थे। जब अन्दर गये तो पाया कि वह ढाबा तो नहीं है लेकिन एक छोटी सी घर में बनी दुकान थी। दुकान वाले ने पूछा कि क्या चाहिए, हमने कहा कि हम तो बाहर ढाबे का बोर्ड देखकर अन्दर आये है। लेकिन यहाँ तो ऐसा नहीं लग रहा है कि यहाँ खाने-पीने का कोई प्रबंध हो। दुकान वाले ने कहा कि सब्जी बन रही है उसमें अभी थोडी देर लगेगी। नीरज जाटराम को खाने में पसंदीदा परांठे लगते है उसने परांठे के बारे में कहा, मैंने कहा कि क्या प्याज वाले परांठे भी बना सकते हो? दुकान वाले के हाँ कहते ही लगा कि चल जाटदेवता आज परांठे खा ही लो। यहाँ नीरथ में पंजाबी ढाबे में प्याज के स्वादिष्ठ परांठे मिले थे, सबने कई-कई परांठे सटक लिये थे। अब आप सोच रहे होंगे कि खाली परांठे कैसे खाये होंगे, हाँ जी बिना सब्जी के परांठे खाये थे, बस सबने एक-एक गिलास दूध चाय के स्थान पर लिया था। दूध परांठे चटकर फ़िर बाइक ले आगे की यात्रा पर चल दिये।
शिमला से आने वाला यह मार्ग राष्ट्रीय राज्य मार्ग कहलाता है जिस कारण इसकी हालत चौडाई के साथ बहुत ही शानदार थी। कुछ आगे जाने पर नोगली आता है नोगली से एक मार्ग सीधे हाथ पहाड पर चढते हुए एक दर्रा पार कर रोहडू होते हुए, उतराखण्ड में चला जाता है। त्यूणी नामक कस्बे में यह मार्ग जाकर मिलता है, जहाँ से हर की दून HAR KI DOON व यमुनौत्री YAMNOTRI गंगौत्री GANGOTRI की ओर चला जाता है। नोगली से आगे रामपुर आता है लेकिन श्रीखण्ड जाने वाले यात्री रामपुर ना जाकर उससे तीन किलोमीटर पहले ही उल्टे हाथ पर बने पुल से, सतलुज को पार कर आगे की यात्रा पर बागीपुल के लिये जाना पडता है। सतलुज पार करने के बाद भी उल्टे हाथ की ओर वाली सडक पर ही जाना होता है। अब तक तो ढलान व मस्त चौडी सडक थी, यहाँ से रामपुर वाले पुल से सतलुज पार करने के बाद निरमुंड तक बारीक व चढाई वाला मार्ग है, दूरी है 17-18 किलोमीटर ही है, धीरे-धीरे निरमुंड भी आ पहुँचे। यहाँ आकर सबसे पहले एक टेलर यानि दर्जी की तलाश की गई। यहाँ पर जिन दो भाईयों की फ़टी हुई थी, उन्होंने अपनी-अपनी फ़टी हुई भी तो सिलवानी थी, वैसे दोनों ने अपनी फ़टी को खुद सिलने की कोशिश भी की थी, लेकिन क्या करे वे भी कल किले की चढाई-उतराई में फ़िर से फ़ट गई थी। एक सराकरी कार्यालय के पास मार्केट में एक टेलर से दोनों ने अपनी फ़टी हुई रैन कोट की पाजामी सिलवाई थी। जब तक वे पाजामी सिलवाते तब तक मैंने व नीरज ने सबके लिये 250 ग्राम वाले ग्लूकोज के 4 पैकैट ले लिये थे, जिसकी पैदल मार्ग में बहुत जरुरत पडती है।
निरमुंड से थोडा सा चले ही थे कि एक ट्रक वाला ट्रक में खुले सरिया लेकर आ रहा था। हम मोड पर उसके बाहर निकले हुए सरिया से बाल-बाल बचे थे। अगर हम थोडा सा बाइक को ना मोडे व अपने सिर को ना झुकाये तो सरिया हमारे हैलमेट व कंधों पर लगने तय थे, खैर जब तक चोट किस्मत में ना लिखी हो तब कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है। निरमुंड से आगे बागीपुल तक सडक की हालत अच्छी ही थी। धीरे-धीरे हम लोग अपनी-अपनी बाइक पर सवार बागीपुल तक पहुँच ही गये। बागीपुल में कुछ देर विश्राम किया गया था। कुछ सालों पहले तक बागीपुल से ही श्रीखण्ड की पैदल यात्रा शुरु होती थी, अब यहाँ से छ: किलोमीटर आगे जॉव नामक गाँव तक कच्ची सडक बन गयी है। अरे जॉव तक सडक भी कैसी, गजब जलोडी जोत जैसी एकदम खडी चढाई पूरे छ: किमी तक हमारी बाइक पहले गियर में ही रही। जब भी दूसरा गियर लगाने की कोशिश की, बाइक बन्द होने को हो जाती थी। जाटदेवता के पीछे बैठा जाटराम तो यही कह रहा था कि भाई बाइक आगे से घोडे की तरह उठ तो नहीं जायेगी। हा हा हा एक दो बार बाइक थोडी बहुत उछली भी थी जहाँ पर अपने जाटराम की हवा निकल जाती थी। खैर किसी तरह 15-20 की चाल से चढते (चलते हुए शब्द यहाँ ठीक नहीं) हुए वो 6 किलोमीटर की मजेदार चढाई वाला मार्ग पार किया था।
चढते-चढते अपनी बाइक को विश्राम देने का स्थान भी आ गया। अपनी बाइक को एक तरफ़ खडी करने का स्थान जॉव नामक गाँव एक छोटा सा गाँव है। पूरे हिमाचल में एक बात अच्छी लगी वो यह कि यहाँ पर बसों की सुविधा थोडे-थोडे समय के अंतराल पर हर जगह के लिये उपलब्ध है। ऐसा कश्मीर व उतराँचल में मैंने नहीं देखा है। उन जगहों पर आपको निजी वाहन जीप आदि पर ज्यादा निर्भर रहना पडता है। दिल्ली से रामपुर तक तो सीधी बस सेवा है ही, हो सकता है, कि यात्रा के दिनों में बागीपुल तक भी सीधी बस सेवा मिल जाये। नींद की झप्पी लेने वाले बंदे को बस से अच्छा कुछ और नहीं लगेगा, और मुझ जैसे सिरफ़िरे को तो बाइक या कार यानि अपना वाहन ही ज्यादा सुविधाजनक लगता है, जिसमें आप अपनी मर्जी से जब चाहो, जहाँ चाहो, जैसे चाहो, रुक या चल सकते हो। हमने अपनी बाइक एक भण्डारे के ऊपर बने लेंटर पर पार्किंग स्थल पर लगा दी थी। वहाँ ज्यादातर वाहन लावारिस हालत में ही खडे थे।
अगले भाग से आप देखेंगे श्रीखण्ड महादेव पैदल यात्रा मार्ग के रोमांच का जबरदस्त वर्णन।
यहाँ से आगे की यात्रा जो कि आपको बडे आराम से बतायी जायेगी वो भी साँस ले-ले के, बैठ-बैठ के तब तक के लिये, बराटी नाला-डंडा धार की खडी चढाई, खचेडू(थाचडू), काली घाटी, तक की यात्रा पढने के लिये इन्तजार करे।



























उल्लू बनाने का ज़माना है , उल्लू बन गए , लेकिन यहाँ उल्लू बनने में मजा आ गया. मैं फोटो की बात कर रहा हूँ. ऐसे ही उल्लू बनाने का प्रयास करते रहो जाट जी.
मुझे नदी में नहाने को बहुत अच्छा लगता है. सतलेज में आप नहाते नहाते देखकर बहुत मजा आ गया. पानी ठंडा होगा ????
वह भेद की घटना बहुत दर्दनाक थी . अच्छा है की आज तक मेरी जिंदगी में मैंने ऐसी कोई घटना आपने आँखों के सामने नहीं देखी.
आगे बढ़ो यात्रा में जल्दी …………………..
ये मई का महीना है भाई और आप अप्रैल फूल बना रहे हो ? आजकल मौसम की तरह आप भी लेट चल रहे हो ………..वो 6 किमी 0 का कच्च रास्ता दिखाया नही जिस पर बाइक उठने को तैयार थी ……….जो कच्चा रास्ता दिखाया है उस पर लिखा है कि यहां से चढाई शुरू होती है ……….अपने वाहन जैसा मजा कहां कहीं भी नही जाट भाई …….बस वाला तो सोता ही रह जाता है ये जो पोस्ट 13 भाग में लिखोगे तो इसीलिये क्योंकि अपने वाहन से थे और ये खूबसूरत नजारे सबको दिखा रहे हो नही तो सोते जाते और सेाते आते ………..अगली पोस्ट जल्दी लिखो
भाई इस दुनिया में हर तरह के लोग है….कुछ शाकाहारी तो कुछ मांसाहारी…ऐसे ही ये दुनिया चलती है….उस घटना को दिल पर मत लो…
तुम्हारी बंजारों की जिंदगी देखने, सुनने और महसूस करने में बड़ी अच्छी है.
मजा आया सब पढकर
संदीप जी…..
अब यात्रा में रोमांच बढ़ता जा रहा हैं …बहुत अच्छा लिखा आपने….|
उल्टा फोटो लगा कर पूछ रहे हो की इसका रहस्य बताओ…..यह भी खूब रही…हा हा हा | यात्रा लेख के फोटोओ में प्राकृतिक सुंदरता भरपूर नजर आ रही….बहुत सुन्दर फोटो..|
चलते रहो मनमौजी… मजा बरकार है
उतराई में गाडी का इंजिन बंद नहीं करना चाहिए , इस बात पर मैं आपसे इतेफाक रखता हूँ | इंजिन के चलते रहने में कण्ट्रोल ज्यादा रहता है और आजकल की नयी गाड़ियों में जिसमे पॉवर ब्रेक होता है उनमे तो बिलकुल नहीं करना चाहिए |
बैक में चार्जर के बारे में पहली बार सुना , थोडा और विस्तार से बतायेया या फिर किसी आगे की पोस्ट में अगर कोई फोटो आ सके तो और भी बढ़िया | तीन महीने पहले, घुम्मकड़ी में काम आने वाले यंतर-जंतर के बारे में एक संपादकीय में चर्चा हुई थी |
http://www.ghumakkar.com/2012/02/01/from-the-editor-the-age-of-the-gadgets/
सतलुज के किनारे दाढ़ी बनाना आपके असली घुमक्कड़ व्यतित्व तो दर्शाता है |
एक सुझाव और है की गूगल मेप लगाया जा सकता है , हर यात्रा के साथ , शायद इससे लोगों को रास्ता समझने में सहूलियत रहे |
फोटो वाला जवाब सही था मेरा :-) |
चले चलो |
संदीप जी,
प्याज के पराठे और दूध का कम्बीनेशन पढ़कर अच्छा लगा. कई दिन लम्बी आपकी घुमक्कड़ी में खाने की तो सचमुच बड़ी दिक्कत होती होगी मैं समझ सकती हूँ पर अपने शौक के liye इन्सान को कई तरह के समझौते भी करने पड़ते है. जैसे जैसे यात्रा आगे बढती जा रही है रोमांच भी बढ़ते जा रहा है. अगली कड़ी के इंतज़ार में.
संदीप जी,
बनारस में हरिराम नाई से दाढ़ी बनवाने के बाद आपने अच्छा सबक लिया जो अब खुद ही अपनी दाढ़ी बनाने लगे. और फोटो के राज़ का पर्दाफाश हो ही गया, सचमुच us paheli का sahi jawab koi nahin de sakta tha. khair post सचमुच badi sundar bani thi tatha फोटो bhi bahut achchhe लगे. aaj google transliterate saath nahin de raha isliye aise ही chala lo, और nahin chale to wapas kar do.
@ Mukesh – I gave the right answer. It is a reflection. Ok , may be half the answer. :-)
भाई सचमुच बहुत ही बढ़िया पोस्ट है, जो रोमांच तुमने (या आप कहूँ ?) वहाँ महसूस किया वही हम यहाँ इसे पढ़ के महसूस कर पा रहें हैं. इससे ज्यादा आपकी पोस्ट की तारीफ़ मैं और क्या लिखूं ?
सचमुच बहुत हे सजीव चित्रण किया है, और फोटो खासकर जो फूल पतियों वाले हैं बहुत हे सुंदर है…
बढे चलो….
JatDevta, Ab mai kya kahoon is khobsoorat yatra ke bare me, har photo ek khoosoorat nazaara hai aur har pangti ek behtareen varnan…Mai Vipin se to mil chuka hoon aur aasha karta hoon aap se aur Neera Jaat se bhi jaldi hi milna hoga…agar plan kar ke nahi mile to kisi na kisi yaatra me zaroor mulakaat hogi… Ek baat aur…sariye le jane wale trucks ke peeche bahut hi saavdhani se chalna chiye kiyonki ye wakai bhut ki khatarnaak ho sakta hai…oopar wale ka shukar hai ki aap sabhi loog surakshit rahe…
संदीप भाई राम राम, यात्रा वृत्तान्त अच्छा हैं, सतलज के किनारे दाढ़ी बनाने का, और नहाने का अलग मज़ा हैं.
फोटोकी मजा पढकर गम्मत वाटली [मजा आया] मराठी समजते हो? नान्देडके मित्र है न? चलो आगे पढती हु!