SRIKHAND MAHADEV श्रीखण्ड महादेव bike से, भाग 4 (Narkanda to Jalori pass)

April 27, 2012 By:

जब निजी होटल मे कमरे की नाकाम तलाश पूरी हो गयी और हमें कमरा ना मिला तब नारकंडा के सरकारी रेस्ट हाऊस में कमरा लेने का विचार मन में आया, वहाँ जाकर देखा तो जगह तो एकदम साफ़ सुधरी चमचमा रही थी, लेकिन वहाँ कोई नजर नहीं आ रहा था। कुछ देर दरवाजे की कुन्डी बजाने पर एक बन्दा बाहर आया। हमने उससे एक कमरे की बात की। लेकिन वहाँ के रखवाले को लगा कि अरे यह तो एक कमरे का घाटा कर रहे है वह अड गया कि नहीं एक कमरे में चार-चार बन्दे नहीं ठहर सकते है आप को दो कमरे लेने होंगे। जब वो नहीं माना तो हमने उससे तीन-तीन सौ में दो कमरे रात ठहरने को कर लिये, यहाँ आराम से रात गुजारी, हाँ विपिन व नितिन की तो फ़टी हुई थी ही दोनों ने अपनी फ़टी हुई पाजामी सिलने के लिये रेस्ट हाऊस के रखवाले से सुई धागा माँगकर रात को अपनी फ़टी हुई पैंट सिलने के अच्छी कोशिश की थी। हम सब भीगे हुए थे ही जिससे ठन्ड भी लग रही थी कमरा लेने के बाद सबसे पहले हमने अपने गीले कपडे उतार फ़ैंके थे। इतनी जबरदस्त बारिश से होकर आये थे कि जूते तक भीग गये थे। हम सभी ने वहाँ हीटर के पास बैठकर जूते व अपने कपडे सुखाते रहे। रात को दस बजे के बाद सब सोने के लिये अपनी-अपनी रजाई में घुस गये। अगले दिन जब सोकर उठे तो मौसम एकदम सुहाना साफ़ था। विपिन-नितिन-संदीप तीनों बन्दों में एक समानता थी कि ये तीनों बिल्कुल भी आलसी नहीं थे जिस कारण सुबह जल्दी(पूरी यात्रा में) उठ जाते थे। सुबह उठते ही मौसम को देखकर दिल खुश हो गया। हम तीनों बाहर लॉन में आ गये। एक बार यहाँ फ़ोटो सैसन हुआ। नीरज को भी सोने से उठाने का नाकाम प्रयास किया गया था। जब नीरज ने उठने से मना कर दिया तो उसे दुबारा उठने के लिये नहीं कहा। जब हम वहाँ से चलने को तैयार थे तो तब जाकर नीरज फ़टाफ़ट उठकर तैयार हुआ। सुबह के सात बजे नारकन्डा से अपने आगे के सफ़र पर चलने को तैयार हो चुके थे। हम सबका एक साथ यह पहला अनुभव था, हम चारों ही एक दूसरे के व्यवहार व आदत के बारे में नहीं जानते थे। लेकिन पहली सुबह ही मैंने बाकि तीनों की कुछ आदतों के बारे में जान लिया था, साथ ही यह भी मान लिया कि अब पूरे सफ़र में इनकी अच्छी-बुरी आदतों को भी झेलना ही पडॆगा। ज्यादा तंग किया तो दुबारा इनके साथ आने से दूर से राम राम।

नारकंडा में सुबह का नजारा


सरकारी विश्राम स्थल पर मेरा भी।


सरकारी विश्राम स्थल पर दोनों साथी।


सरकारी विश्राम स्थल का मंत्रणा कक्ष।


नारकन्डा से सैंज नामक जगह चालीस किलोमीटर दूर है, नारकंडा से सैंज तक पूरी तरह ढलान वाली सडक है, अगर कोई गाडी का तेल बचाना चाहे तो आराम से तेल बचाया जा सकता है। लेकिन चार पहिया वाहन में यह खतरनाक हो सकता है? वैसे यह ढलान सैंज तक ही नहीं बल्कि उससे आगे रामपुर से कुछ पहले श्रीखण्ड जाने वाले पुल तक ही बनी रहती है। रामपुर से आगे हम गये नहीं अत: उससे आगे के बारे में हमे मालूम ही नहीं है। (लेकिन आगे के बारे में भी मैं जुलाई के बाद बता दूँगा क्योंकि बाइक से मैं हिमाचल का रिंग रोड करने जा रहा हूँ।) हम धीरे-धीरे सैंज की ओर चलते रहे मौसम बडा सुहावना-मस्ताना था हम उस मस्ती भरे मौसम में मस्त होकर (लेकिन बाइक सावधानी से चला रहे थे) चले जा रहे थे कि अचानक हमे सडक के किनारे सेब का एक बाग नजर आने लगा। सेब का बाग देखकर हमारा दिल भी बाग-बाग(garden-garden) करने लग गया। सेब के बाग में ही सडक किनारे एक झोंपडी भी दिखाई दे रही थी हमने अपनी बाइक उस झोंपडी के पास रोक दी। नितिन व विपिन उस झोंपडी वाले के पास सेब खरीदने के लिये चले गये। लेकिन झोंपडी के पास जाकर पता लगा कि वहाँ तो ताला लगा हुआ है, कोई है ही नहीं, अब क्या करते? सेब खाने के नाम पर मन तो उतावला हो रहा था। तभी एक बुजुर्ग वहाँ से जा रहे थे हमने उनके साथ एक फ़ोटो खिंचवाया साथ ही उनसे यह भी पूछा कि सेब खाने है कहाँ मिलेंगे? उन बुजुर्ग ने कहा कि सेब तो बाजार में मिलेंगे। अब सेब सामने थे बाजार कौन तलाश करता? आखिरकार नितिन व विपिन दोनों ने उसी बाग के पेड से ताजे-ताजे सेब तोड कर अपने-अपने रैन कोट व पैंट की जेब में भर लिये। सेब तोडकर हम एक बार फ़िर अपनी मंजिल की ओर चल दिये। अब हम बाइक चलाने के साथ अधपके सेब खाने का स्वाद भी उठा रहे थे। चलते-चलते मार्ग में एक जगह भी ऐसी आती है जहाँ से सतलुज नदी काफ़ी ऊपर से दिखाई देने लगती है, वैसे यहाँ पर शिमला से आते हुए सतलुज के पहली बार दर्शन होते है। हम इस जगह काफ़ी देर रुके थे। यहाँ रुक कर हमने अपने-अपने हिस्से के बचे हुए सेब खाये व सतलुज के दर्शन किये थे। नारकन्डा से लगभग घन्टे भर की मोटर बाइक यात्रा करने के बाद सैंज नाम की जगह आ गयी।

अब चलते है यहाँ से जलोडी दर्रे की ओर।


बीच सडक पर एक फ़ोटो।


एक से एक नजारे आते रहते है।

सैंज से सीधे चलते रहने पर रामपुर की ओर जाया जाता है। उल्टे हाथ की ओर जाने वाले मार्ग पर जो कि कुछ आगे जाने पर एक पुल पार करके उसके बाद अन्नी होते हुए जलोडी पास व आगे कुल्लू-मनाली तक जाया जा सकता है। हम कुल्लू जाने वाले मार्ग की ओर चले गये। यह मार्ग सतलुज के दाँये किनारे पर कई किलोमीटर तक रहता है, उसके बाद यह फ़िर से सीधे हाथ पहाडों में मुड जाता है। सैंज से बीस किलोमीटर बाद अन्नी नाम का छोटा सा शहर आता है। हम यहाँ ठीक साढे नौ बजे आ गये थे, नीरज को भूख भी सताने लगी थी जिस कारण वो यहाँ अन्नी में सबके खाने के लिये डेढ दर्जन केले ले आया, पिंजौर गार्डन के मुकाबले में यहाँ मिलने वाले केले बहुत छोटे थे। नीरज तो बस व ट्रेन का सवार रहा है जहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ आराम होता है बाइक पर आराम कम रोमांच ज्यादा होता है। जलोडी जोत जाते समय बाइक पर बैठे-बैठे जब नीरज का पिछवाडा दुखने लगा तो नीरज ने बाइक छोडकर बस में जाने की कहने लगा, जिस कारण उसने अन्नी से आगे बस में जाने की जिद पकड ली, अब विपिन को भी उसके साथ कर दिया गया। अन्नी में बस अडडे पर पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि कुल्लू/जलोडी जोत जाने वाली अगली बस दो घन्टे बाद है जिस कारण हम चारों वहाँ से बाइक पर ही चलने वाले थे कि एक बस जो कुल्लू से अन्नी के बीच चलती है आ गयी थी। तुरन्त दोनों सवारियाँ(नीरज+विपिन) बाइक से उतर गयी। अन्नी से आगे नीरज व विपिन बस में बैठ कर जलोडी जोत तक गये। अन्नी से जलोडी तक का सफ़र मस्त है चढाई जरुर है लेकिन मैंने इसी बाइक पर दुनिया के तीन सबसे ऊँचे दर्रे पास पार किये है वो भी एक सवारी पीछे बैठाने के बाद अत: मैं इस पास की ऊँचाई को ज्यादा खतरनाक नहीं मान रहा था, फ़िर भी आखिरी के चार किमी ही कुछ ज्यादा चढाई वाले लगे थे वो भी सडक ज्यादा खराब होने के कारण, नहीं तो लगभग सारा मार्ग ही मस्त लगा था। आखिर के तीन-चार किमी तो एकदम बेकार मार्ग था। कुछ दूरी पहले से यह पास दिखाई देने लगता है। जब हम जलोडी जोत आये तो मन को बडी खुशी हुई। यह जगह है तो काफ़ी ऊँचाई पर, लेकिन काफ़ी सुंदर भी है। हमने बाइक एक दुकान के सामने रोक दी थी। यहाँ जोत पर मुश्किल से चार-छ: दुकाने थी हमने यहाँ रात में रुकने के बारे में मालूम किया, एक दुकान वाला रात में ठहरने की सुविधा देता है, यह दुकान झील की ओर सबसे आखिरी वाली दुकान है। देर सवेर अगर यहाँ से आना-जाना हो तो कोई समस्या नहीं है।

सेब तोडने का सफ़ल अभियान।


देख ताऊ बतायेगा तो नहीं किसी को। नहीं तो?


सतलुज के दर्शन व सेब का भोजन।


सतलुज के दर्शन आप भी कर लो।


सेब कच्चे नही थे।


जाट देवता संदीप पवार व नितिन जाट अपनी-अपनी बाइक लेकर जलोडी पास पर आ गये थे, समय दिन के साढे ग्यारह बज चुके थे। नीरज जाट व विपिन गौड तो बस में पसरकर कर इस पास पर आये थे, जिस कारण उन्हे यहाँ आने में लगभग बीस मिनट ज्यादा लग गये थे। तब तक मैंने व नितिन ने इस जोत पर आसपास घूम कर अपना समय बिताया था उसके बाद जोत पर बनी गिनी-गिनाई दुकानों में से एक पर कब्जा जमा कर बैठ गये थे, जैसे ही ये दोनों बस से उतर कर आये तो हमने दुकान वाले को खाने के लिये मैगी बनाने के बारे में बोल दिया था। हम सबने गर्मागर्म एक-एक कटोरा मैगी खायी, जब सबने मैगी खा ली तो समय देखा दोपहर के ठीक बारह बज चुके थे। खापी कर आज की मंजिल सरेउलसर/सरोलसर झील sarolsar lake व उसके किनारे पर बने पहाडी शैली के मंदिर को देखने के लिये चल पडे। हमने अपने-अपने बैग व कील वाले लठ दुकान वाले के यहाँ ही छोड दिये थे। वैसे हमें पता ही था फ़िर भी दुकान वाले ने बता दिया था कि लगभग पाँच किलोमीटर का साधारण सा मार्ग है, कोई खास कठिन भी नहीं है, लेकिन नीरज ने फ़िर भी अपना लठ साथ ले लिया था। इस मार्ग पर लगभग आठ सौ मीटर जाने पर सीधे हाथ नीचे की ओर कुछ टैंट लगे हुए थे, जो यहाँ आने वालों के लिये ही रहे होंगे। लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ पर कोई संस्था ट्रेंकिग का कार्यक्रम करवाती है जिनके लिये यह टैंट लगवाये गये होंगे।

सैंज से आगे अन्नी की ओर जाते हुए।


जलोडी जोत तो आ गयी है।


जब हम झील की ओर जा रहे थे तो हमें इस पैदल मार्ग में एक ऐसा खोखला पेड भी मिला, जिसके तने में आराम से कोई भी मोटा-ताजा बंदा आराम से घुस कर बैठ सकता है, इसके तने में घुसने से पहले इसमें अच्छी तरह देख लिया था कि अंदर कोई शिकार(साँप-छछून्दर) या शिकारी तो मौजूद नहीं है। जिसमें सबसे पहले जाटदेवता संदीप ने जाकर जाँच पडताल की थी। सबसे आगे तो मैं ही चल रहा था, अत: मुझे ही जाना था मेरे पीछे-पीछे सारे के सारे इस पेड में घुस गये, तीनों सिरफ़िरे जाट तो एक साथ ही घुस गये थे, बात फ़ोटो की जो थी, आप अंदाजा लगा सकते हो कि कितना बडा पेड रहा होगा। इस मार्ग पर हमारे अलावा भी कुछ प्रकृति के दीवाने, यहाँ झील दर्शन को आ-जा रहे थे। सरोलसर झील से आधा किलोमीटर पहले एक जगह मार्ग से थोडा सा (दस बीस मीटर) हटकर पहाड के अंदर दो-तीन मकान बने हुए थे, लेकिन सब के सब खाली थे, मैंने स्वयं जाकर देखे थे। वैसे हो सकता है कि अब यहाँ कोई रहता ही नहीं हो। कुछ देर बाद हम चारों इस झील के किनारे तक जा पहुँचे। जब हम इस झील पर पहुँचे तो देखा कि एक छोटी सी गोलाई में बनी हुई प्यारी सी झील है, इसके किनारे पर एक मंदिर भी बना हुआ है।

एक फ़ोटो यहाँ भी हुआ, इस स्वर्णिम चतुर्भुज का (गप्पू जी द्धारा दिया गया नाम)

फ़ूल देखो।

देख लो मार्ग।

थोडी सी खुली जगह नजर आयी।

देखो जी इस पेड में कैसे घुसे खडे है, ये सिरफ़िरे मस्ताने जाट

पहाड में जहाँ जरा सी जगह नजर आयी, वहीं घर बना दिया जाता है।

जलोडी जोत से चलने के बाद एक किलोमीटर तक मार्ग समतल सा ही है, उससे कुछ आगे जाने पर पूरे एक किलोमीटर तक उतराई-ही उतराई थी, इससे आगे जाने पर मार्ग कभी ऊपर की ओर व कभी नीचे की ओर जा रहा था, यानि पूरा उबड-खाबड मार्ग था। एक पचास साल के व्यक्ति जो हमारे से कुछ पहले ही पैदल चले हुए थे, हमें ढलान शुरु होते ही मिले थे, उनकी रफ़्तार इतनी तेज थी तेज मतलब बहुत धीमी थी कि जब हम इस झील को देख कर वापस आ रहे थे तो तब तक भी ये हमें झील की ओर जाते हुए मिले थे, वो भी झील से आधा किलोमीटर पहले। इन महाशय का नीरज ने नामकरण किया “शामली एक्सप्रेस” जो इन पर पूरी तरह फ़िट बैठता था। शामली एक्सप्रेस हमारे यहाँ सबसे धीमी चलने वाली ट्रेन को कहा जाता है। यह ट्रेन कहने को एक्सप्रेस है लेकिन इस गाडी की गति सवारी गाडी जितनी है। झील की ओर जाते समय एक लंबी सी ढलान आती है जहाँ मुझे भागने की सूझी तो मैं भागने लगा मैं लगातार कई सौ मीटर तक भागता ही रहा कुछ दूर जाकर मैंने मुड़कर देखा तो बाकी तीनो आराम से आ रहे थे। जब हम तीन किमी पार कर चुके तो बारिश आणि शुरू हो गयी बारिश का खतरा तो पहले से था ही जिस कारण हमने अपने-अपने रैन कोट पहने हुए ही थे, एक बड़े से विशाल पत्थर के नीचे हम कुछ देर रुक गए थे, थोड़ी देर बाद ही हम वहाँ से रवाना हो गए। जब हमें पहाड पर खाली मकान मिले तो हमने उन्हें देखने की सोची, जैसे ही हम उस ओर चले तो बारिश के कारण वहाँ फिसलन हो गयी थी जिससे बहुत सावधानी से चलकर उन मकानों तक जाना पड़ा था कुछ लोग वापस आ रहे थे। हमने उनसे पुछा की झील कितनी दूर है तो उन्होने कहा की बस सामने ही तो है सौ मीटर दूर भी नहीं बची हुई है यह सुनकर अपुन बड़े खुश हुए की अरे आ गयी हम तो सोच रहे थे की अभी तो दूर होगी। झील के दर्शन अगले लेख में कराये जायेंगे, अगर इसी लेख में झील दिखाऊ तो यह लेख ज्यादा लंबा हो जाएगा।

शामली एक्सप्रेस बीच में।


आ ही गयी सरेउलसर/सरोलसर झील।


अगले लेख में झील दर्शन व् हो सकता है एक रघुपुर किले के अवशेष भी नजर आ जाये, जिसके बारे में अगले लेख में। (वैसे आज भी मेरे परिवार के लिए खास दिन है)

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

12 Responses to “SRIKHAND MAHADEV श्रीखण्ड महादेव bike से, भाग 4 (Narkanda to Jalori pass)”


  1. SilentSoul says:

    Nice …lol

    सतलुज की फोटो बहुत अच्छी है…. लगे रहो संदीप भाई MBBS

  2. मजा आ गया संदीप भाई ……….कितना खाते हो आप लोग ……….जब से चले हो दुनिया भर के सेब और केले खा गेरे ………..ये अच्छा किया कि सेब तोडने का फोटो खींच लिया अब सबूत हाथ में हैं ……….

    सतलुज का फोटो वाकई में मस्त है ……..इन बादलो का दृश्य मुझे सबसे सुंदर लगता है ……..खोखले पेड को देखकर भी अच्छा लगा ………झील के दर्शन कराओ अब

  3. संदीप जी राम राम, आपका यात्रा वृत्तान्त इतना अच्छा होता है की ऐसा लगता हैं, जैसे हम लोग ख़ुद घूम रहे हो, बाग़ से फल तोड़कर खाने का अपना एक अलग आनंद हैं. पेड़ के अन्दर तीनो जाट बहुत अच्छे लगे, पहाड़ी चट्टान के अन्दर का फोटो बहुत अच्छा हैं, अगली पोस्ट कि प्रतीक्षा रहेगी।

  4. sarvesh n vashistha says:

    हैप्पी बर्थडे मर्निका I
    चार व्यक्ति साथ में हो तो सेब तोरने की हिम्मत आ ही जाती हे I सरकारी विश्राम गृह में नीरज जी (सरकारी आदमी) सोते ही रहे. I जोत मंदिर के बारे में नहीं लिखा I

  5. Ritesh Gupta says:

    मजा आ गया लेख पढ़कर ……..जैसे जैसे आपकी यात्रा आगे बढ़ती जा रही हैं वैसे वैसे रोमांचक होती जा रही हैं…लगे रहो ……| संदीप जी यह बताओ कि सारी यात्रा में केवल फल और मैगी से पेट भरा या फिर कही खाना भी खाया कि नहीं ? मुझे लगता हैं कि नीरज जी स्वभाव बाकी तीन यात्रियों से बिल्कुल भिन्न हैं वो तो अपनी मन की सुनते हैं और वही करते , आप सब लोग चलने के लिए तैयार हो तब वह जाने के लिए उठे ……| फोटो तो सभी अच्छे थे पर सतलुज और खोखले तने में जाटो का फोटो बहुत अच्छा लगा…..|

  6. Vipin says:

    संदीप भाई, चलते रहो मजा आ रहा है………नारकंडा की सुबह का दृश्य आज भी मुझे कुदरत के सबसे बेहतरीन दृश्यों में से एक लगता है……..अविस्मर्णीय व मनमोहक सरोल्सर झील के दर्शन की प्रतीक्षा में………….

  7. ऐसा लग रहा है की आप चारों में मैं क्यूँ नहीं. क्या मजे कर रहे हो. सेब खा रहे हो , सतलेज के दर्शन कर रहे हो. वो बड़ा पेड.सरकारी रेस्त हॉउस . शामली एक्सप्रेस. वाह बहुत मजा आ रहा है. आगे जल्दी कराओ यात्रा.

    आज तो आपका जनम दिन होगा. या तो आपकी धरम पत्नी का ??
    या आपकी बेटी का ???? या फिर शादी की साल गिराह ?????
    लेकिन हम सबसे ज्यादा खुश होंगे तब जब आपका प्रोमोशन होगा………………………………….

  8. Harish Bhatt says:

    Wakai me mazaa aa gaya Sandeep Ji…Ab shayad pahadon me jane se apne aap ko jada di nahi rok paunga…mujhe aapse eersha ho rahi hai…Apple ka photo sabse badiya laga….Bahut maza aaya….

  9. vibha says:

    मज़ेदार पोस्ट है सन्दीप जी। हालाँकि फोटोग्राफ्स आपकी कहानी पर थोडी हावी हो रहीं हैं। कहानी की लम्बाई के हिसाब से थोडी ज़्यादा हैं।

    सेब सचमुच बहुत ही स्वादिष्ट लग रहें हैं। समझ में आता है कि आप लोग बाग में घुस कर उन्हें तोङने से अपने आप को क्यों नहीं रोक पाये। मगर आपने कोशिश तो की थी पूछने की। पेङ में तीनों जाटों कि फोटो बहुत अच्छी है।

  10. Nandan says:

    तो जलोरी पास से पहले साथ छूट गया , :-). खैर कोई बात नहीं है , लम्बा सफ़र है , आगे पीछे चलता है | हिमाचल के रिंग रोड से आपका मतलब shimla – काज़ा – मनाली सर्किट है क्या ? मैं गया हूँ इस तरफ ४ साल पहले | घुमक्कड़ पर लिखा भी है , पर वो सफ़र कार से था , बाइक से एक अलग ही बात होगी |

    आज के खास दिन के बारे में सर्वेश जी ने भेद खोल दिया है |

  11. vandana paranjape says:

    सन्दीपभाई,खुश कर दिया आपने ,हिमालय हैही देव भूमि! बहुतही सुन्दर्,आपके दोस्त थक गये क्या? चलता है!

  12. सतलज का फोटो देखकर दिल खुश हो गया. जब इतने हसीन नज़ारे रास्ते में आते होंगे तो क्या बाईक चलाने में ध्यान नहीं भटकता होगा :)



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