CREMATION GHAT वाराणसी के दाह-संस्कार घाट

February 27, 2012 By: Views: 940 Share at Facebook

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति। कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥
अर्थात:सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्री सोमनाथ, श्रीशैल पर श्री मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में श्री महाकाल, ओंकारेश्वर , अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशंकर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर श्रीकेदारनाथ, और शिवालय में श्री घृष्णेश्वर को स्मरण करें। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण-मात्र से मिट जाता है। (जाट देवता संदीप पवाँर का यह कहना नहीं है ऐसा तो हिन्दू धर्म पुस्तकों में लिखा है)

राजा हरिश्चन्द्र घाट


यहाँ आने से पहले काशी के श्मसान घाट के बारे में बडी चर्चा सुनी थी, अत: बडी इच्छा थी कि इन घाटों को भी देखा जाये। कमरे से सामान लेकर एक बार फ़िर से गंगा किनारे आ गये। अब हमने यहाँ के श्मसान घाट देखने थे। यहाँ काशी/बनारस/वाराणसी में अंतिम संस्कार यानि क्रिया-क्रम करने के लिये दो मुख्य श्मसान घाट है, पहला मुख्य घाट है राजा हरिश्चन्द्र घाट व दूसरा मुख्य घाट है मणिकर्णिका घाट। कहते है कि जिसका अंतिम संस्कार काशी के श्मसान घाट पर हो जाता है, उसको जन्म-मरण के घम-चक्कर से मुक्ति मिल जाती है, इसका सीधा मतलब तो यह है कि अगर आप इस पृथ्वी से तंग आ गये हो, तो अपना अंतिम ताम-झाम यहीं करवाने का प्रबंध जरुर कर ले। यदि दुबारा यहीँ जन्म लेना चाहते है, तो जहाँ रहते है, वहीं पर ही आपका तिया-पांचा सब कुछ अपने आप ही हो जायेगा, चिंता ना करे। मैं तो अपने अंतिम ताम-झाम के लिये काशी बिल्कुल ना जाऊँ, जब तक ये सारी धरती देख ना लूं तब तक यहीं बार-बार जन्म लेता रहूँगा, यह क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि सारी पृथ्वी का भ्रमण ना कर लूं। मणिकर्णिका घाट यहाँ के श्मसानों में सबसे कम जगह में सबसे ज्यादा मुर्दे जलाने वाला स्थान है मैं एक घंटा रुक कर देख आया हूँ, कि किस प्रकार यहाँ लाशों की दुर्गति होती है। जी हाँ यहाँ लाशों की दुर्गति होती है अगर किसी को मेरी बात का विश्वास ना हो तो स्वयं वहाँ जाकर एक-दो घंटे रुक कर देख सकता है। जिस लाश(चिता) का कोई देखने वाला नहीं होता है उसे अधकचरा ही जलने देते है व बचा कुचा शव गंगा जी में चलता कर देते है, ऐसी कई अधजली लाश मैंने स्वयं देखी है। कुत्ते इन लाशों को खाने में लगे हुए थे। क्या यही मुक्ति है तो अपने जानने वालों के लिये एक संदेश है कि ऐसी मुक्ति से दूर ही रहो तो भलाई है।

मणिकर्णिका घाट


मोक्षदायिनी काशी की महिमा कुछ ऐसी है कि कहा गया है कि यहाँ प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलानाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह प्राणी आवगमन के चक्र से छूट जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण में कहा गया है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवं दुखों परिपीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है। विश्वेश्वर के आनंद-कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं:-दशाश्वेमघ, लोलार्ककुण्ड, बिन्दुमाधव, केशव और मणिकर्णिका और इनहीं से युक्त यह अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है।
सनातन धर्म के ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप विदित होता है। कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अत:प्रलय होने पर भी इसका नाश नहीं होता है। वरुणा और असि नामक नदियों के बीच पांच कोस में बसी होने के कारण इसे वाराणसी भी कहते हैं। काशी नाम का अर्थ भी यही है-जहां ब्रह्म प्रकाशित हो। भगवान शिव काशी को कभी नहीं छोडते। जहां देह त्यागने मात्र से प्राणी मुक्त हो जाय, वह अविमुक्त क्षेत्र यही है। सनातन धर्मावलंबियों का दृढ विश्वास है कि काशी में देहावसान के समय भगवान शंकर मरणोन्मुख प्राणी को तारक मन्त्र सुनाते हैं। इससे जीव को तत्वज्ञान हो जाता है और उसके सामने अपना ब्रह्मस्वरूपप्रकाशित हो जाता है।
शास्त्रों का उद्घोष है- यत्र कुत्रापिवाकाश्यांमरणेसमहेश्वर:। जन्तोर्दक्षिणकर्णेतुमत्तारंसमुपादिशेत्। काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान शिव (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारकमन्त्रसुनकर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में काशीखण्ड में लिखा भी है- अन्यानिमुक्तिक्षेत्राणिकाशीप्राप्तिकराणिच। काशींप्राप्य विमुच्येतनान्यथातीर्थकोटिभि:।

मणिकर्णिका कुण्ड


वाराणसी की संस्कृति कला एवं साहित्य से परिपूर्ण है। इस नगर में महान भारतीय लेखक एवं विचारक हुए हैं, कबीर, रविदास, तुलसीदास जिन्होंने यहां रामचरितमानस लिखी। रामनगर किले में स्थित सरस्वती भवन में मनुस्मृतियों, पांडुलिपियों, विशेषकर धार्मिक ग्रन्थों का दुर्लभ संग्रह सुरक्षित है। यहां गोस्वामी तुलसीदास की एक पांडुलिपि की मूल प्रति भी रखी है। इस शहर के कुछ नामचीन प्राणी। मदन मोहन मालवीय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक, लाल बहादुर शास्त्री, भारत के पूर्व प्रधान मंत्री, बिस्मिल्लाह खां, शहनाईवादक, भारत रत्न, कृष्ण महाराज, तबला वादक, पद्म विभूषण, रवि शंकर, सितारवादक, भारत रत्न, भगवान दास, भारत रत्न, मुंशी प्रेमचंद (महान लेखक)

मणिकर्णिका कुण्ड का रंगीन जल


वाराणसी का इतिहास———-पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व की थी, जिस कारण ये आज एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। स्कन्द पुराण, रामायण, महाभारत एवं प्राचीनतम वेद ऋग्वेद सहित कई हिन्दू ग्रन्थों में इस नगर का उल्लेख आता है। सामान्यतया वाराणसी शहर को लगभग 3000 वर्ष प्राचीन माना जाता है। परन्तु हिन्दू परम्पराओं के अनुसार काशी को इससे भी अत्यंत प्राचीन माना जाता है। नगर मलमल और रेशमी कपड़ों, इत्रों, हाथी दांत और शिल्प कला के लिये व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र रहा है। गौतम बुद्ध (जन्म 567 ई.पू.) के काल में, वाराणसी काशी राज्य की राजधानी हुआ करता था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने नगर को धार्मिक, शैक्षणिक एवं कलात्मक गतिविधियों का केन्द्र बताया है और इसका विस्तार गंगा नदी के किनारे कई कि.मी. तक लिखा है।

तिरछा मन्दिर काशी करवट स्थल पर


गंगा वाराणसी की जीवनरेखा———–भारत की सबसे बड़ी नदी गंगा करीब 2525 किलोमीटर की दूरी तय कर गोमुख से गंगासागर तक जाती है। इस पूरे रास्ते में गंगा उत्तर से दक्षिण की ओर यानि उत्तरवाहिनी बहती है। केवल वाराणसी में ही गंगा नदी दक्षिण से उत्तर दिशा में बहती है। यहां लगभग 84 घाट हैं। ये घाट लगभग 5 किमी लं‍बे तट पर बने हुए हैं। इन 84 घाटों में 5 घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्हें सामूहिक रुप से ‘पंचतीर्थी’ कहा जाता है। ये हैं अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिक घाट। अस्सी ‍घाट सबसे दक्षिण में स्थित है जबकि आदि केशव घाट सबसे उत्तर में स्थित हैं। यहां दशहरा का त्यौहार खूब रौनक और तमाशों से भरा होता है। इस अवसर पर रेशमी और ज़री के ब्रोकेड आदि से सुसज्जित भूषा में काशी नरेश की हाथी पर सवारी निकलती है और पीछे-पीछे लंबा जलूस होता है। वाराणसी की देव दीपावली बडी धूम-धाम से मनायी जाती है जो दीपावली से कुछ दिन बाद मनायी जाती है।

भूल कर भी न कटवाना


यहाँ आने से पहले काशी करवट के बारे में बहुत सुना था, जब यहाँ आकर देखा तो लगा कि इस तिरछे से दिखाई देने वाले मंदिर व गंगा के शानदार घुमावदार मोड का काशी करवट से क्या शानदार सम्बंध है। काशी करवट का नजारा देखकर हमने अपनी यह यात्रा आगे जारी रखी। यहाँ मैंने अपनी बडी हुई ढाडी कटवाने के लिये गंगा तट पर ही बैठे हुए नाई से कटवाने की सोची थी, इस तरह जमीन पर बैठकर दाढी कटवाने का यह मेरा पहला व आखिरी अनुभव था। जब मैं नाई से दाढी कटवाने के लिये जमीन पर बैठा तो पहले-पहल तो खूब शर्म आयी लेकिन वहाँ कौन सा मेरा ससुर मुझे देख रहा था कि मेरा दामाद कहाँ बैठ कर दाढी कटवा रहा है, जब नाई ने दाढी पर क्रीम लगाकर रगडना शुरु किया तो मुझे कुछ गडबड सी तो तभी लगने लगी कि यह नाई कुछ अलग किस्म का प्राणी है। लेकिन जब नाई ने उस्तरे यानि ब्लैड का पहला वार किया तो मेरी समझ में आ गया कि बहुत बडी गलती कर दी है, अब क्या करता पूरी ढाडी बनवाये बिना उठ नहीं सकता था, जब आधी भी बडी मुश्किल से बनवा पाया तो दर्द के मारे मेरी आँखों में आंसू आ गये थे। नरेश बोला क्या हुआ संदीप भाई तो मैंने कहा यह तो खुशी के आंसू है यहाँ गंगा तट पर अपने बाल उतरवा कर देखो तुम्हे भी बेहद खुशी होगी, लेकिन नरेश असली बात समझ गया था। यहाँ के नाई पता नहीं कौन सी फ़ैक्ट्री का ब्लेड प्रयोग में लाता था। अपने घर तो हम सस्ते से सस्ते ब्लेड से भी दो दाडी आराम से बना लेते है, उस नाई ने जो रुलाया कि सारे देवता याद आ गये, आधी दाडी में ही दूसरा ब्लेड लगाना पडा, पर वो दूसरा ब्लैड पह्ले ब्लैड का भी बाप निकला। मजबूर होकर मुझे कहना पडा कि “हट जा बची-कुची दाढी मैं अपने आप बना लूंगा”। खैर किसी तरह उसने दाढी बनायी तब जाकर मेरी जान में जान आयी साथ ही मैंने कसम खायी कि अब कभी फ़ुटपाथ पर दाढी नहीं बनवाऊँगा।

कबीर दास जी के मंदिर के पास ही ये लोहे का पुल है।


अब यहाँ से कुछ दूरी पर दिखाई दे रहे संत रविदास मंदिर की ओर चल दिये, इस मंदिर के पास गंगा किनारे एक बाबा रहा करते थे, बाबा तो आज जीवित नहीं है लेकिन उनके शिष्यों ने आज के दिन दूध-मेवा मिला कर लोगों में बाँटने के लिये लगाया हुआ था। सबसे पहले हमारे जवान नरेश ने जाकर एक गिलास (कुल्हड) दूध लिया व गटक लिया और एक कुल्हड पीते ही तुरन्त दुबारा कुल्हड फ़िर से आगे कर दिया, जो महाराज दूध देने की व्यवस्था की देखभाल कर रहा था, वह नरेश को ऐसे घूर रहा था, जैसे कोई खजाना माँग रहा हो, पर नरेश भी कुल्हड जब तक आगे किये रहा, जब तक उसमें दूध फ़िर से भर ना दिया गया। अब दूध लेने की बारी हमारी थी, हम एक-एक कुल्हड दूध से भरवा कर एक तरफ़ जाकर बैठ गये साथ ही घूरने वाले महाराज ने हमको दॆशी घी से बना हुआ हल्वे का प्रसाद भी दिया था। दूध व हल्वा खा-पीकर हम सारनाथ के लिये चल दिये। हम सारनाथ जाने के लिये संत रविदास मंदिर से गंगा की दिशा के विपरीत सामने सीधे नाक की सीध में (उल्टे हाथ जाने पर नहीं) एक तिराहे की ओर चल दिये। इस तिराहे पर जाकर पता चला कि सारनाथ अभी आठ किलोमीटर दूरी पर है। इस तिराहे से सीधे हाथ बिहार की ओर व उल्टे हाथ सोमनाथ व वाराणसी कैन्ट की ओर जाया जाता है। पहले सोचा कि पैदल चला जाये, फ़िर समय का हिसाब लगाया तो पता लगा कि अभी दोपहर के 12 बजे है, गाडी से जाने में ही भलाई है। क्योंकि शाम 7 बजे की वापसी की ट्रेन से घर (दिल्ली) भी तो जाना है। एक थ्री व्हीलर को रुकने के लिये इशारा किया, उसने किराया माँगा पूरे सौ रुपये, जो हमें ज्यादा लगा, किसी ने कहा कि कुछ 500 मीटर आगे जाने पर एक तिराहे पर जाने से आपको दस-पंद्रह रुपये प्रति सवारी के हिसाब से आटो मिल जायेंगे। हम तुरन्त उस अगले तिराहे पर चले गये वहाँ से बताये गये किराये पर एक आटो में बैठ गये।

अब चलते है सारनाथ


वाराणसी बौद्ध धर्म के पवित्रतम स्थलों में से एक है, और गौतम बुद्ध से संबंधित चार तीर्थ स्थलों में से एक है। सारनाथ, कुशीनगर, बोध गया और लुंबिनी हैं। वाराणसी के मुख्य शहर से हटकर ही सारनाथ है, जहां भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन दिया था। इसमें उन्होंने बौद्ध धर्म के मूलभूत सिद्धांतों का वर्णन किया था। अशोक-पूर्व स्तूपों में से कुछ ही शेष हैं, जिनमें से एक धामेक स्तूप सारनाथ में अब भी खड़ा है, हालांकि अब उसके मात्र आधारशिला के अवशेष ही शेष हैं। इसके अलावा यहां चौखंडी स्तूप भी स्थित है, जहां बुद्ध अपने प्रथम शिष्यों से मिले थे। अगले लेख में सारनाथ यात्रा वृतांत……………………………..

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MOBILE-09716768680, कभी-कभी मुझे लगता है कि ऊपर वाले ने मुझे क्या सोचकर इस पृथ्वी पर भेजा है और जब भेजा ही है तो चलो ऊपर वाले की बनायी, इस दुनिया को तसल्ली से देख ही लिया जाये ताकि ऊपर वाला भी कहे कि क्या-क्या देखा, जब बताने बैठूँगा तो ऊपर वाला भी सुन कर आश्चर्य में पड जायेगा कि मैंने तुझे वहाँ भेजा था, सजा देने को (मृत्यु लोक में सब सजा पाने के लिये ही तो आते है) और तूने वहाँ पर की मौज। अब क्या करे ऊपर वाला भी। मैं ठहरा मनमौजी जाट, सिरफ़िरा जाट, सनकी जाट, पागल जाट, दीवाना जाट, मतवाला जाट, मेहनती जाट, पक्का-घुमक्कड जाट हूँ। मैं घूमने के मामले में एकदम सिरफ़िरा हूँ। ना पीने को पानी चाहिए, ना खाने को खाना, मुझे चाहिए बस घूमना ही घूमना, ना थकावट ना कोई परेशानी, जहाँ भी घूमने जाता हूँ, पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। कब कितने दिन बाद मेरी खोपडी कही बाहर घूमने के लिये तडफ़ उठे मैं खुद नहीं जानता? मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ। जाट रे जाट तेरे तो हो गये ठाट ही ठाट, हाय जाट!, सौलह दूनी आठ, नहीं यार "जहाँ जाट वही ठाट"। अरे! छोडो! जिस काम से जाट देवता संदीप के पास आये हो वो तो बताओ।

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13 Responses to “CREMATION GHAT वाराणसी के दाह-संस्कार घाट”


  1. अति सुन्दर वर्णन संदीप जी , जैसा कि शास्त्रो में बताया गया है उसमें से कुछ भी आपने नही छोडा है । आपने सही कहा मैने भी ये लाशो की दुर्गति देखी है और इसमे मुख्य हाथ उन घरवालो का होता है जिनमें से ज्यादातर इसलिये गंगा किनारो पर दाह संस्कार करते है क्यो​कि इसके बाद फूल चुगना वगैरा जैसी क्रियाए नही करनी पडती और उन पर अपने प्रिय की लाश के पूरा जलने तक रूकने का टाइम नही होता
    आगे सारनाथ की यात्रा वृतान्त के इंतजार में …..

  2. Neeraj Jat says:

    Shaving story is really shocking. What was the need of that urgent shaving, you should wait for next day and all would be well. I do so always.
    You couldn’t enjoy Banaras. Ok, next post will be about Sarnath and that will be remaining charm and attraction of this journey. Waiting for next…

  3. Sahi description Jat devta jee

    waiting for next…………

  4. Kavita Bhalse says:

    संदीप जी.
    क्या खूब लिखा हैं आपने तो आँखे खोल दी . सच अगर मोक्ष इस तरह मिलता हें तो नहीं चाहिये पर हमारे पुराणों में जो हैं उसे सिर आँखों पर क्योकि धरती वासियों ने पण्डे पुजारियों ने अपने फायदे के लिए बदनाम कर दिया हैं
    पोस्ट बहुत अच्छी लगी .
    धन्यवाद .

  5. Ritesh Gupta says:

    बहुत बढ़िया संदीप भाई …..
    अपने ने पूरा साशास्त्र ही खोल दिया …इतनी शास्त्रों के बाते कहाँ से लाए….
    अब कभी ऐसे फुटपाथ पर कभी दाढ़ी मत बनवाना ….

  6. sarvesh n. vashistha says:

    गुरु ग्रेट हो. दाद्दी पर तथा मुर्दों पर पूरा लेख लिख
    दिया. बहुत अच्छा लिखा.

  7. Mukesh Bhalse says:

    संदीप भाई,
    हमेशा की तरह आपकी यह पोस्ट भी अंतर्मन (ज़मीर) को हिला देने वाली थी.

    मैंने आपके द्वारा वर्णित इन पंक्तियों को कई कई बार पढ़ा, बड़ा मार्मिक विवरण था ” जी हाँ यहाँ लाशों की दुर्गति होती है अगर किसी को मेरी बात का विश्वास ना हो तो स्वयं वहाँ जाकर एक-दो घंटे रुक कर देख सकता है। जिस लाश(चिता) का कोईदेखने वाला नहीं होता है उसे अधकचरा ही जलने देते है व बचा कुचा शव गंगा जी में चलता कर देते है, ऐसी कई अधजली लाश मैंने स्वयं देखी है। कुत्ते इन लाशों को खाने में लगे हुए थे।”

    दूसरी बात, आपकी उस दर्दनाक हजामत के हादसे को पढने के बाद तथा उस दर्द को महसूस करने के बाद ऐसा लग रहा है की अब कई दिनों तक दाढ़ी ही न बनाई जाए.

    • मुकेश भाई दाढी बनवाते रहना, पता नहीं मेरी दाढी भी मेरी तरह तेज चाल से बढती रहती है और नीरज की दाढी देखना बिल्कुल उसकी रफ़्तार से बढती है जिसे वह 10-15 दिन तक भी ना बनवाये तो पहचान में आ जाता है, जबकि अगर मैं 4-5 दिन भी दाढी ना बनवाऊँ तो भईया ऐसा लगता है जैसे कभी दाढी बनवाई ही ना हो। हा-हा-हा-हा वो दिन जब भी याद आता है तो एक सिंहरन सी दौड जाती है।

  8. Nandan says:

    ये लेख काफी अलग तरह का रहा, हिन्दू धरम, श्लोक इत्यादि | लगता है की मुकेश और SS का प्रभाव पड़ रहा है :-) | मुझे ये ज्यादा समझ में नहीं आता है इसलिए इस बारे में मुझे चुप ही रहना चाहिए |

    मेरे ख्याल से वहां दाढ़ी बनवाना थोडा रिस्की भी है क्योंके अगर ब्लेड दोबरा उसे हो रहा हो तो पकड़ना मुश्किल है | अब चलें , सारनाथ की और |

  9. SilentSoul says:

    @ Nandan “ये लेख काफी अलग तरह का रहा, हिन्दू धरम, श्लोक इत्यादि | लगता है की मुकेश और SS का प्रभाव पड़ रहा है :-) | मुझे ये ज्यादा समझ में नहीं आता है इसलिए इस बारे में मुझे चुप ही रहना चाहिए ”

    आप स्वंय तो गीता के संस्कृत में श्लोक लिख रहे हो…( कविताजी की पोस्ट में).. और यहां sanskrit challenged की एक्टिंग कर रहे हो …

    @ बाकि लोग – पुराण खास समय में खास लोगों के लिये, व खास उद्देश्य से लिखे गये थे. कहा गया है कि कलियुग में सब नदियां व तीर्थ स्थान अपनी महत्ता खो देंगे, सरस्वति नदी लुप्त हो चुकि है, यमुना, वजीराबाद के बाद लुप्त है, व गंगा भी अपने लोप के कगार पर है…. अतः पुराणों में गलत नहीं लिखा, किसी समय में काशी मुक्ति का केन्द्र था, पर कलियुग में बाकि और तीर्थों की तरह महत्ता खो रहा है…

  10. Sharma Shreeniwas says:

    श्लोक आदि लिखने में चाहे जिनका भी प्रभाव हो, प्रभाव के बारे में जिनके भी चुहल भरे कमेण्ट हों, सन्दीपभाई इनका प्रयोग आप यथासम्भव करते रहियेगा। लाशों के बारे में एक दूसरा नजरिया भी है जिसके वशीभूत एक पंथ में तो इन्हें चाह कर पेड़पर लटकाया जाता है कि मरनोपरांत भी यह किसी के काम आये। वैसे गंगा के किनारे केवल मुखाग्नि क्रिया को करने के पश्चात अधजली लाश को गंगा में विसर्जित करना यथेष्ट माना गया हैं। पर्यावरण व गंगा मे प्रदूषण को रोकने के उपायों के फलस्वरूप आपके द्वारा देखी गई घटना हुई होगी।

  11. Giriraj Shekhawat says:

    सुन्दीप जी
    आपने बहुत व्यवहारिक बातों पर अपना दृष्टिकोण बड़े अछे अंदाज़ में दिया है ……. धर्म का अर्थ ये नहीं की आप जीवनदायिनी नदी को प्रदूषित कर उसका जल विष रूपी बना दो . ….. ये कुछ धर्म के ठेकेदार कभी भी बाज़ नहीं आयेंगे ……..
    दाढ़ी का वृतांत बहुत ही हासस्य्पद था ……….. आपको दाढ़ी कटवाने के बाद का फोटो ज़रूर दिखाना चाहिए ………

    बहुत ही सुन्दर वर्णन देने के लिए आपका धन्यवाद

  12. anupam.mazumdar says:

    Beautiful description of Varanasi cremation ghat

    Regards
    Anupam Mazumdar



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