Valley of Flowers फूलो की घाटी उत्तराखंड

February 21, 2012 By: Views: 4169 Share at Facebook

आज आपको मै फूलो की घाटी की अपनी यात्रा के बारे में आपको बताता हूं। ये बताते हुए मुझे रोमांच् हो आता है क्योंकि मैने हिमालय में तो काफी जगहे घूमी हैं पर पैदल यात्रा ट्रेकिंग कम ही की है। ये यात्रा वैष्णो देवी की चढाई की तरह नही है जिसमें हम 14 किलोमीटर चढना उतरना  एक ही दिन में कर लेते है। यहां खडी चढाई तो है ही साथ ही कोई रास्ता नही बना है बस पत्थर पडे हैं वो भी बहुत उंचे नीचे। एक तरफ तूफानी वेग से नीचे की ओर आती और भयानक आसमानी शोर करती हुई नदी और दूसरी तरफ पहाड और सबसे ज्यादा संख्या में जाते हुए श्रदालु।  मुझे पता नही था कि कभी भविष्य में इन विचारो और यात्राओ को आप सबके सामने रखना है नही तो एक एक फोटो लेता खैर ना तो उस वक्त ऐसा सोचा था इसलिये कैमरा लेकर नही गये थे। मौज मस्ती मे ऐसे ही चल पडे थे सो जो मोबाईल थे उन्ही के कैमरो से फोटो ले ली। आपके भाग्यवश् मेरे पास एन 70 था उसके फोटो ही तीनो के मोबाईल में सबसे अच्छे थे और वे ही मेरे पास रखे हैं।

 

तो हम भी चल दिये चार मित्र। घर से सुबह 6 बजे का वक्त तय हुआ चलने का और कांवड का सीजन होने के कारण हमने तय किया कि ​हरिद्धार से ना जाके बिजनौर से  जायेंगे क्योंकि कांवड की वजह से रास्ते में पुलिस वालो की टोकाटाकी ज्यादा होती है और रास्ते भी घुमा देते हैं तो अपनी टीवीएस की विक्टर मोटरसाईकिल और दूसरे मित्र आशु की बजाज बाक्सर पर सुबह 6 बजे चले तो कीरतपुर बिजनौर में जाकर हमने नाश्ता किया और पौडी में दोपहर का खाना खाया तो शाम होते होते हम पीपलकोटि पहुंचे । लगभग 350 से 400 के आसपास सफर कर लिया था और काफी थक गये थे तो सबने वहीं रूकना ठीक समझा । पहाडेा की एक सबसे बडी खूबी है कि वहां पर तवे की रोटी ज्यादातर मिल जाती है । और सादा खाना क्योंकि अक्सर बडे होटलो को छोडकर ज्यादातर लोगो ने घर कम होटल बना रखे हैं । सडक किनारे 3 या चार मंजिल नीचे से कालम पर खडी करके बिल्डिंग बनाते हैं सडक किनारे की सीध में जो मंजिल बनती है उसके बाद नीचे के कालम को भी खाली नही छोडते । उपर दुकान नीचे मकान ।
पीपल कोटि घूमने का समय ही नही मिला जैसे ही खाना खाकर होटल में पहुंचे कि बारिश शुरू हो गई । वैसे तो बारिश का ​समय किसी को पता नही होता पर बरसात के मौसम में और पहाडो में कब बारिश शुरू हो जाती है और कब बन्द ये पता नही । पूरी रात बारिश पडती रही और जब सुबह नहा धोकर तैयार हुए तो पता चला कि बारिश के कारण आगे कुछ दूर लैंड स्लाइडिंग यानि भूस्ख्लन हो गया है और रास्ता बन्द है हमने सोचा जहां तक बाइक जायेगी चलते हैं । और बरसाती पन्नी लपेटी और तैयार होकर चल दिये क्योंकि हल्की बूंदाबादी सी थी । आगे जाकर एक जगह बहुत लम्बी वाहनो की कतार लगी थी । यहां ऐसे में छोटी छोटी चाय वालो की बन आती है पता नही कितने कितने घंटे लोग इन्तजार करते हैं और तब तक क्या करें खाना पीना और क्या ।  बाइक की सवारी इसीलिये मजेदार है कि कहीं भी फंसती नही है सो हम लाइन में सबसे आगे निकल गये ।
आगे वहीं पहुच गये जहां भूस्खलन हुआ था । बडा भयानक नजारा था  जी । रात में बारिश ने सडक को तोडकर नाला बना दिया था सडक बीचोबीच कई फुट गहरी हो गई थी और पानी पूरी स्पीड से उपर से आ रहा था । दोनो तरफ कई कई किलोमीटर लम्बी लाइने लगी थी । अब क्या होगा जिससे भी पूछो बोलता पता नही । कुछ दुकानदारो ने बताया कि जेसीबी आयेगी और रास्ता सही करेगी। लेकिन पत्थरो का गिरना लगातार जारी था । हम बिलकुल सडक टूटने के मुहाने पर खडे थे और सोच रहे थे कि अब क्या किया जाये । एक दो सज्जन बाइक वाले और आ गये । तभी मन में आइडिया आया और मैने उस बाइक वाले से पूछा हां भई क्या करना है । उसका विचार भी हमारे जैसा ही था कि पता नही जेसीबी कब आयेगी और कितनी देर में सही करेगी । तो फिर  ?  फिर क्या चार ने मिलकर एक बाइक पहले उठाई और बडे बडे पत्थरो पर पैर टिकाते हुए दूसरी पार ले गये । इस बीच एक आदमी ये देखता रहा कि कहीं उपर से पत्थर तो नही आ रहा । फिर दूसरी और फिर तीसरी । उसके बाद सारा सामान और फिर हम सब हुर्रे ………….. दोनो तरफ सैकडो लोग हमारे इस काम को देख रहे थे कुछ तो फोटो भी खींच रहे थे । पर हमने किसी को नही देखा । ना हमने देखा कि हमारे बाद भी कोई आया या नही । हम तो इतने खुश और सीना फुलाये थे कि बस पूछो मत और किक मारकर चलते बने उसके बाद तो गोविन्द घाट ही रूके क्योंकि रास्ते भर ज्यादा ट्रेफिक मिला नही । हमारी साइड से तो हम अकेले थे ।

 

 

 

जोशीमठ से आगे और बद्रीनाथ के बीच में एक जगह पडती है गोविन्द घाट । जोशीमठ से 19 किमी0 दूर । अच्छी सुन्दर जगह है  थोडे बहुत होटल और एक गुरूद्धारा  । पास में कल कल करती नदी और उस पर बना सुन्दर सा झूले वाला पुल । लोगो ने बता दिया कि चाहे फूलो की घाटी जाना हो या हेमकुन्ट साहिब बाइक यहीं खडी कर दो पार्किंग में । सो दोनो बाइक वहीं खडी की और 11 नम्बर की बस पकडकर नदी पार करके चढना शुरू कर दिया । जाने वालो में सबसे ज्यादा सिख्  श्रद्धालु थे । काफी सारे अंग्रेज भी मिले । एक जोडा भी था जो बहुत धीरे धीरे चल रहा था और हमने आपस में हंसकर कहा कि ये कहां से आ गये इन्होने तो शायद कभी ही पैदल चला हो और हम भाग भागकर चढने लगे । हम आगे जाकर बैठ जाते और उनका इन्तजार करते और जैसे ही वे आते हम फिर से आगे के लिये चल देते । 13 किलोमीटर बाद जो जगह रूकने के लिये आ​ती है घांघरिया वहां पहुंचने के बाद ये हालत थी कि वो कछुआ  चाल से जीत गये थे और जब हम गिरते पडे वहां पहुंचे तो वे अपनी शापिंग करके अपने होटल के कमरे में आराम कर रहे थे । और एक हम थे जो होटल कौन ढूढेंगा इसके लिये लड रहे थे । क्योंकि किसी में हिम्मत नही बची थी ।

 

आप सोचोगे कि 13 किलो​मीटर की चढाई तो ऐसी नही कि हिम्मत पस्त हो जाये । मै आपको बताना चाहता हूं कि बात सिर्फ 13 किलोमीटर की नही थी उंचाई की भी थी । समुद्र तल से 3000 मी की उंचाई  । और रास्ते में टेढे मेढे उंचे नीचे पत्थर पडे हैं । कई श्रद्धालुओ की तो हमने वहां भी और बाद में न्यूज में भी एक बार पढा कि नीचे नदी में गिरने से मौत हो गई । पर एक बात अच्छी थी कि सभी धार्मिक यात्राओ की तरह यहां भी सिख् श्रद्धालुओ के जयकारो वाहे गुरू की आवाजो मे बडा जोश था । ज्यादातर श्रद्धालु जो उपर से आ रहे थे उनके हाथ में ग्लूकोन डी था और वो इसे जबरदस्ती उपर की ओर जा रहे श्रद्धालुओ के हाथ में रख् देते । बाद में हमें पता चला कि वो ऐसा इसलिये कर रहें हैं ​क्योंकि चढते वक्त काफी पसीना निकलता है और पानी की कमी हो जाती है । एक बात और आपको बता दू कि गोविन्द घाट तक तो ठीक था पर जैसे ही चढना शुरू किया तो खाने पीने की चीजो के रेट भी चढने लगे और जैसे जैसे हम चढते गये वैसे वैसे दाम भी चढते चले गये । आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि जब हम घांघरिया में थे तो आधा लीटर की कोल्डड्रिक जो कि 20 रू की उस वक्त आती थी वो 50 रू की हो चुकी थी । चाय तो कही भी 10 रू से कम की नही थी । ये यात्रा 2006 मे की थी ।
यहां है रास्ते में छोटा सा एक गांव पडता भ्यूंडार । गोविन्दघाट से चलकर फूलो की घाटी और हेमकुन्ट साहिब जाने के लिये बीच में केवल एक ही पडाव मिलता है । जहां रूकने और खाने के लिये कुछ होटल बने हैं । कुछ इसलिये क्योंकि फूलो की घाटी 4 महीने और गुरद्धारा साहिब 6 महीने के लगभग खुलता है । बाकी साल यहां इतनी बर्फ पडती है कि कई बार बिजली की लाइन बिछाने की कोशश् की गई पर बर्फ ने तोड दिया सब इसलिये यहां के होटलो में रात के समय जेनरेटर से बिजली दी जाती है वो भी रात के 10 बजे तक ही और हां एक बात और फोन तो भूल ही जाओ क्योंकि अब का तो मुझे पता नही पर बर्फ की वजह से लैंडलाइन फोन भी नही लग पाये और वहां पर कुछ छतरी सी लगा रखी थी उसी से फोन करा रहे थे । 15 रू की एक मिनट चाहे लोकल करो या एस0टी0डी0 । और एक खास बात और उस फोन से लैडलाइन फोन तो कुछ बार ट्राई करने के बाद ही लग जाता था पर मोबाईल तो लग ही नही रहा था । लम्बी लाइने लगी थी । जैसे तैसे मैने अपने घर के लैंडलाइन पर बात की और वाइफ को बाकी साथियो के घर फोन करने को कहा ।  तब जाकर कहीं शांति हुई ।
उसके बाद हमने खाना खाया । खाना भी बहुत महंगा था । हमने तो किसी तरह पेट भरा । अंकित मेरा साथी तो कई दुकानदारो से लड भी पडता था कि ये चीज इतनी महंगी क्यों है । एक दुकानदार ने हमें बताया कि जितनी मेहनत करके आप यहां आ रहे हो उतनी ही मेहनत से खच्चरो और आदमियो से लादकर एक एक सामान यहां तक लाया जाता है इसलिये इतना महंगा हो जाता है । उसके बाद हम लोगो को भी यहां वीराने में पडा रहना पडता है पेट भरने के लिये । खाने के बाद हम छोटी सी मार्किट जो यहां पर है उसको घूमें और फिर होटल में सोने चले गये । घांघरिया में भी एक गुरूद्धारा है जिसमें रहने की सुविधा है पर हमें तो जगह मिली नही क्योंकि दिन के बारह बजे के आसपास जो लोग घांघरिया पहुंचते है वे गुरूद्धारा तो जा नही सकते बस वे घांघरिया वाले गुरूद्धारे में डेरा जमा लेते हैं हमारी तरह बाद में पहुंचने वालो को तो होटल ही लेना पडता है|
सुबह अलार्म लगाकर उठना पडा । रात को होटल वाले से तय ​कर लिया था कि सुबह गर्म पानी की बाल्टी मिलेगी । गर्म पानी बस  नाम को था पर हां उसमें नहाया जा सकता था । नहा धोकर हम सब घाटी के लिये चल दिये ।घांघरिया में एन्ट्री से पहले एक जगह खुले आसमान और पहाडो की तलहटी में काफी सारे तम्बू लगे देखे । हमने पता किया तो पता चला कि ये लोग यहां से पहाडो पर चढते हैं उसका बेस कैम्प है ।फूलो की घाटी उत्तराख्ंड राज्य में है और 1982 से राष्ट्रीय पार्क घोषित है । साथ ही ये विश्व हैरिटेज साइट भी है । यहां तीन सौ से भी ज्यादा दुर्लभ फूलो की प्रजातिया मिलती हैं ये बात विशेष् नही है खास बात ये है कि ये सभी फूल कुदरती रूप से अपने आप हर साल उगते हैं बिना किसी मानव सहायता या रोपण् बीज खाद के बगैर । और रंग बिरंगे फूलो की छटा तो बस आदमी का मन मोह लेती है यह घाटी 87 किमी0 में फैली है एक खास बात और यहां आने से तीन किलोमीटर पहले से पशुओ का और नीचे गोविन्दघाट से लगाओ तो 16 किलोमीटर से किसी भी तरह का कोई वाहन या प्रदूषण् नही होता और तो और कोई तेज आवाज किसी भौंपू की हार्न की सुनने को भी कान तरस जाये पर शान्ति और सुकून इतना कि मन करे कि हमेशा के लिये यहीं रह जायें ।
फूलो की घाटी के बारे में पौराणिक कथा भी है । ऐसा माना जाता है कि रामायण में लक्ष्मण के घायल हो जाने के बाद संजीवनी बूटी लेने के लिये हनुमान जी जिस जगह आये थे ये वही जगह है ।  बताते हैं कि सबसे पहले इसकी खोज किसी अंग्रेज ने ​की थी । वहां गांव के रहने वालो की भाषा में कहूं तो वो अंग्रेज महाशय ट्रेकिग करते करते गिर गये और जब वे उठे तो उन्होने इस खूबसूरत घाटी को देखा तो वे इसकी खूबसूरती देखते ही रह गये उन्होन इसके उपर एक किताब भी लिखी  87  वर्ग  किलोमीटर के दायरे में फैली हुई बताते हैं इस घाटी को  इतनी तो हमने घूमी नही पर जितनी भी घूम पाये तब तक घूमें जब तक हम थक नही गये । एक बात और भी थी रोमांच की वहां सब कुछ था । सुन्दर फूल , ठंडा मौसम बर्फ से ढके और सूरज की रोशनी से चांदी की तरह दमकते पहाड और बादलो की तरह का कोहरा जो कभी यहां से चला तो कभी वहां से उठा । बर्फ के पहाड को तो एक बार को देखकर ऐसा लगा कि अरे ये तो यहीं है थोडी ही दूर बस हाथ बढाओ और छू लो लेकिन उसके पास को जितना जाते रहे उतना ही और दूर लगता गया बस फिर हमने उसे छोड दिया कि तुझे अगली बार मिलेंगे । पर आज सोचता हूं कि इतनी मेहनत से जो वो यात्रा की थी शायद कुछ दिन वहीं बिताते । अब पता नही कब मौका मिलेगा ।

 

 

 

 

 

फूलो की घाटी नवम्बर से अप्रैल मई तक बर्फ से ढकी रहती है और जून में बर्फ पिघलने के साथ ही हरियाली शुरू हो जाती है जुलाई में फूलो की खुश्बू आने लगती है। अगस्त में ये अपने खूबसूरती के चरम पर होती है। फूलो की घाटी सिर्फ चार महीने के लिये खुलती है । घाटी से काफी दूर पहले गेट बना रखा है जहां टिकट बनता है । फूलो की घाटी में कोई घोडा खच्चर वगैरा नही जा सकता । जबसे ये संरक्षित क्षेत्र माना गया है तबसे ये रोक टोक हो गई हैं| फूलो की घाटी जाने का रास्ता घांघरिया से रास्ता बडा मनमोहक है कई बार पानी की धारा आती है उस पर बने पुलो को पार करना पडता है । सरकार ने एक फुट के करीब चौडा रास्ता क्या रास्ता भी नही कह सकते पगडंडी बना रखी है जिससे कि पर्यटक इधर उधर घूमकर फूल पौधो को बर्बाद नही करें । फूलो की घाटी में वैसे तो अनेक दुर्लभ किस्म के फूल है पर वहां और हेमकुन्ट साहिब पर उस क्षेत्र में मिलने वाला ब्रहमकमल सबसे दुर्लभ् और मशहूर फूल है हमें बताया गया कि ये फूल केवल 8000 फुट या इससे उपर की उंचाई पर ही खिलता है । और यहां पर खिलने वाले फूलो में से ज्यादातर लुप्तप्राय प्रजातिया हैं । मतलब जो कि कम ही और कभी कभी देखने को मिलती हैं ।
यह जगह समुद्र तल से 3962 मीटर की उंचाई पर है । एक और बात जो सबसे हैरान कर देने वाली थी वो ये कि हमें कुछ लोगो ने बताया कि यहां पर खिलने वाले फूलो का बदलना भी चलता रहता है यानि की आज जो आप फूल देख रहे हो 10 से 12 दिन में हो सकता है कि उसकी जगह कोई दूसरा फूल खिला हो । है ना ​कुदरत का करिश्मा ? इनमें से कई फूल दुर्लभ होने के साथ साथ औषधीय रूप से भी मूल्यवान हैं । पार्क में बर्फीला तेंदुआ और कस्तूरी मृग जैसे दुर्लभ जानवर भी देखे गये हैं । नंदा देवी पहाड जिसके नाम पर इस पार्क का नाम रखा गया है जिसके साथ फूलो की घाटी संयुक्त रूप से सम्मिलित है , भारत का दूसरा सबसे उंचा पहाड है।  इस घाटी की सबसे ज्यादा सुन्दरता अगस्त के महीने में मिलती है । घाटी गढवाल के चमोली जिले में स्थित है । यहां आने के लिये ​हरिद्धार या ऋषिकेश से बद्रीनाथ के लिये बसे चलती है । कार व टैक्सी की भी सुविधा है। फूलो की घाटी के पास ही हिन्दुओ के चार धाम में से एक बद्रीनाथ धाम भी है । साथ ही घाटी के बहुत पास सिखो का प्रसिद्ध तीर्थ हेमकुन्ट साहिब भी है ।
जब हम फूलो की घाटी की ओर जा रहे थे तो सोच रहे थे कि अब आयी घाटी अब आयी लेकिन फूलो की घाटी अपने रास्ते में से कही से दिखाई नही देती । वो तो एकदम से परदा सा खुलता है और आप अपने आप को खडा पाते हैं बिलकुल खुले में । वो जो जाने का रास्ता है वो तो पेडो और झाडियो मे से होकर जाता है पर जब घाटी आती है तो एकदम खुली जगह कोई बडा पेड नही कोई झाडी नही बस छोटे बडे फूल और चारो ओर से पहाडो से बहती छोटी छोटी धाराए जिन्हे झरने भी कह सकते हैं । नीले पीले और कई रंगो के फूल दिखाई देने लगते हैं कुछ फूलो का तो नाम लिखा है जगह जगह बोर्ड लगाकर पर कुछ का तो पता ही नही लगता पर हां हैं एक से एक खूबसूरत । ज्यादातर फूल छोटे हैं । आगे चलकर उन अंग्रेज महाशय की कब्र भी बनी हुई है । घाटी केवल चार बजे तक ही खुलती है क्योंकि उसके बाद जंगली जानवरो का भय हो जाता है। एक छोटी सी धारा भी उपर से बहकर आ रही है जो ​कि छोटे छोटे कई झरने जो कि बर्फ का पानी पिघल कर आ रहा है से मिलकर बनी है । वो धारा बीच में से जमी हुई थी । पानी उसके नीचे को बहकर जा रहा था । तीन घंटे तक हम वहां रहे । हमारा तो जाने को मन ही नही कर रहा था । पर क्या करें जाना तो था । तो फूलो की घाटी को अलविदा बोलकर हम वापस घांघरिया के लिये चल दिये|

सभी फोटो व वीडियो कैमरा नोकिया एन 70 मोबाईल

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manu prakash tyagi has written 23 posts at Ghumakkar.

यात्रा का चस्का लगे तो मुश्किल से छूटता है ऐसा ही कुछ अपना हाल है । चार धाम हिन्दुस्तान के ,चार धाम उत्तरांचल,नौ देवियां ,नौ ज्योर्तिलिंग,15 शक्तिपीठ, 18 राज्य 4 यूनियन टेरिटरिज ,सैकडो शहर हिल स्टेशन अब तक घूम चुका हूं । लिखना अभी अभी शुरू किया है ताकि मेरे जैसे जिज्ञासु लोगो के कुछ काम आवे आप सभी की प्रतिक्रियाओ का इन्तजार रहेगा

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46 Responses to “Valley of Flowers फूलो की घाटी उत्तराखंड”


  1. Silentsoul says:

    b’ful photos and good narration. welcome to Ghumakkar

    • than sir . कोई कमी रही हो तो वो भी बताईयेगा

      • Silentsoul says:

        कमी सिर्फ एक है त्यागीजी की इतनी सुन्दर जगह पर कैमरा लेकर जाना चाहिये था… मोबाइल से चित्र आ तो जाते हैं पर Details गुम जाती हैं… मैं अन्दाजा लगा सकता हूं कि अगर कैमरे से चित्र लिये जाते तो ये लेख कहां पंहुचता इतने सुन्दर दृष्यों के साथ।

        और यहां काफी लोग बड़ी मेहनत से लिखते है.. बाकियों के लेख पढ़िये व टिप्पणी लिख कर उनका हौसला भी बढा़यें

        • सर मै आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं पर गलती ये नही कि कैमरा नही ले गये बल्कि गलती ये थी कि मैने ये नही सोचा था कि भविष्य में मुझे कभी इन विवरणो को लिखना होगा सो इसलिये ऐसा हुआ । आप सब के लेख मै पढता रहता हूं लेकिन मैने हिन्दी यूनीकोड में लिखनी एक महीने से ही सीखी है और अंग्रेजी थोडी कमजोर होने के कारण कमेन्ट नही लिख पाता था । पर अब ऐसा नही होगा आपकी सलाह पर ध्यान दूंगा ।

  2. Mukesh Bhalse says:

    मनु,
    आपका घुमक्कड़ पर स्वागत है. बड़ा मनोरंजक लेख तथा सुन्दर छायाचित्र, मैं तो ये कहूँगा की आपकी एंट्री धमाकेदार है. भूस्खलन से जूझते हुए आप चार लोग मिल कर मोटरसाइकिल को हाथों से उठाकर दूसरी पार ले गए? आपके हौसले की दाद देनी होगी,एकता में बल है की कहावत को आपने चरितार्थ कर दिया.
    आपका परिचय भी बड़ा अच्छा लगा, बस एक बात नहीं समझ में आई आपने लिखा है 22 यूनियन टेरीटरिज की आपने यात्रा की है?? ऐसे ही घूमते रहीये और घुमक्कड़ पर लिखते रहीये.
    धन्यवाद.

    • मुकेश जी , हौंसला अफजाई के लिये धन्यवाद । हिंदी में जब से ब्लाग देखे तभी से मुझे शौक लगा कि मै भी लिखूं । ब्लाग का फीता कटवाया नीरज जाट जी से दिल्ली मिलने गया । डिजाइन बनाना पोस्ट करना सीखा । संदीप पंवार उर्फ जाट देवता जी से घुमक्कड पर पोस्ट डालने को सीखा । आपने सही कहा वो गलती से हो गया है मै लिखना चाहता था 18 राज्य और 4 यूनियन टेरे​टरिज को मिलाकर कुल 22 राज्य । अब मुझे ये भी पता नही है कि ये सही कहां से होगा ? 6 साल पहले की यात्राओ से लिखना शुरू किया है आप बडो के आर्शीवाद ,सलाह और हौंसला अफजाइ की ऐसे ही जरूरत होगी । मैने उस सीन का वीडियो भी डाला था पर कोई भी वीडियो नही आया । क्या घुमक्कड पर वीडियो डल ही नही सकते या यू टयूब पर मेरे चैनल या वीडियो के लिंक भी नही डाल सकते इसे जरूर बताईयेगा

  3. sarvesh n. vashistha says:

    मनु जी पहले ही लेख में मजा आ गया
    आपकी तो पूरी पुस्तक तेयार हे
    हिंदी में एक और घुम्माक्कर आ गया

    • धन्यवाद सर , ऐसा लगता है कि एक दूसरे परिवार में आ गया हूं जहां सब लोग उत्साह बढा रहे है ऐसा ही चलता रहा तो किताब जल्द ही लिख दूंगा

  4. Ranjeet says:

    बहुत हू अच्छा लगा…यादें ताजा हो गयी. घुमाक्कर परिवार में सु-स्वगाताम्
    मैं भी वाहन गया था और कुछ विडियो भी बनाया था… आप इसे http://www.ranjeetkumar.com पर देख सकते हैं.

    दिल्ली से घाटी कि ओर :

    http://youtu.be/LtRTDxeDibY

    http://youtu.be/VD8bRykAYh4

    http://youtu.be/zhy-RH0MwJk

    http://youtu.be/0j2EqzO5hFA

    पैदल चढाई :

    http://youtu.be/SNMaBuEL25Q

    http://youtu.be/SHit4vMr5gk

    http://youtu.be/RlZIIaky-Nk

    फूलों कि घाटी :

    http://youtu.be/UOhu35fu8Oc

    http://youtu.be/TOvKJ9VCLCE

    http://youtu.be/l8TUufUj5ug

    http://youtu.be/NmHelVKJiNs

    हेमकुंड :

    http://youtu.be/Xv_dYFB2EnY

    http://youtu.be/oYPYsL_fdC0

    Landslide :

    http://youtu.be/a8I6PCPn8dw

    श्री बद्रीनाथ जी :

    http://youtu.be/D4VgwTexVkc

    • हां जी ये ही हैं । बडे ही अच्छे और सुन्दर वीडियो हैं। स्वर्ग है धरती पर फूलो की घाटी जैसे । मेरे वीडियो चैनल की मुझसे सैटिंग नही हो पाई है यह मेरे यू टयूब चैनल का एड्रेस है http://www.youtube.com/user/manuprakashtyagi/videos हमारे टूर के वक्त तो इतना कोहरा हो गया था कि वीडियो या फोटो खींचना भी मुश्किल था । अगर साइट वालो ने छापी तो अगली पोस्ट हेमकुंट की ही है सर

  5. Ritesh Gupta says:

    मनु,
    घुमक्कड़ परिवार में आपका स्वागत हैं…एक और नए हिंदी लेखक को पढ़कर बहुत खुशी हुई…

    फूलो की घटी के बारे में आपका लेख और फोटो बहुत अच्छे लगे….आगे से अपनी किसी नयी यात्रा में कैमरा का ही प्रयोग करना जिससे फोटो और भी अच्छे आये. आगे भी ऐसे लिखते रहिये…

    रीतेश …. :)

    • धन्यवाद रितेश जी अभी तो कुछ महीने पहले ​दक्षिण भारत के 6 राज्य कर्नाटक , तमिलनाडु,केरल ,गोआ,आन्ध्रा आदि घूमकर आये है। 25 दिन की यात्रा थी । मै कन्फयूज हो गया कि लिखना कहां से शुरू करूं । फिर 2006 की ये यात्रा लिखनी शुरू की । आज मुझे खुद पछतावा है कि मै कैमरा क्यों नही ले गया

  6. Ranjeet says:

    मैं अपने ट्रिप में विडियो कैमरा का स्टैंड (tripod) ले जाना भूल गया था. दोबारा तो अवश्य ही जाना है. इसलिए सोनी का नया tripod लिया हूँ ताकि फूलों कि बेहतरीन विडियो बना सकूँ..

    • कब जा रहे हो ? एक कसक मन में रह गई थी । जब हम गये तो एक खूबसूरत जगह औली वहां से थोडी सी ही दूर थी । हमने पूछा भी तो बरसात का मौसम था सब बोले अब बर्फ का नाम तक नही और बर्फ बिना मजा नही इसलिये चल दिये वापिस । वो जरूर देखनी है । जब जब सर्दियो में वहां की खबरे न्यूज में आती है मेरा मन मचल उठता है वहां जाने के लिये

  7. ashok sharma says:

    its beautiful.keep it up.

  8. अत्यन्त ही रोचक वर्णन था जो की इंगित कर रहा है की आप केवल घुमक्कर ही नहीं अपितु अच्छे लेखक भी हैं. त्यागी जी में कॉर्बेट नेशनल पार्क से हूँ तथा घुमक्कर के सभी लेख पढता हु.. आपका लेख बहु पसंद आया… कभी कॉर्बेट नेशनल पार्क भी पधारिये और अपनी लेखनी के जादू से दुनिया को हमारे इस वन्य जीवों से समृद्ध क्षेत्र का परिचय करिए… आपके इस रोचक लेख के लिए पुनः साधुवाद .

    • बहुत बहुत धन्यवाद पांडे जी , आप तो रहते ही उस जगह हैं जहां प्रकृति का सौन्दर्य और जादू बिखरा पडा है । वहां कौन नही जाना चाहेगा । और अंधे को क्या चाहिये दो आंखे । घुमक्कड को अगर मेजबान मिल जाये तो सोने पर सुहागा हो जाता है । सो जैसे ही नौकरी से समय मिलेगा आपके पास जरूर आना होगा

  9. Pradeep Narayan says:

    Beautiful, I have visited ‘Valley of Flowers’ 18 years back. Yaade Taza ho gai.
    Keep writing

  10. Welcome to Ghumakkar family Manu jee with the bang………………..

    Nice pics n description………………………

    keep it up……………….

  11. kavita Bhalse says:

    मनु, जी
    आपके लेख को पढ़कर मन खुश हो गया ,बहुत ही सुन्दर लिखा है और फोटो भी बहुत ही खुबसूरत हैं ,
    धन्यवाद

    • धन्यवाद कविता जी । आपने दोना ने पढा और पसन्द किया मेरे लिये खुशी का विषय है ।

  12. Neeraj Jat says:

    इसे कहते हैं धमाकेदार एंट्री। भई, जाटों के चेले बनोगे तो ऐश करोगे ही। यू-ट्यूब का चक्कर छोडो, फोटो ही लगाते जाओ। वैसे भी यू-ट्यूब से वीडियो डाउनलोड करके देखने की फुरसत किसे है? मुझे तो है नहीं।
    लगे रहो।

    • चेले तो हम हैं थारे । पर पडौसी भी हैं और यार भी । इसे ना भूल जाइयो । ये तो लेखन का फीता भी आपने ही काटा है नीरज जी । पर उसके बाद से पकड में नही आ रहे । तैयार हो लो ​जल्दी मिलने आउंगा

  13. त्यागी भाई आपने सच में विस्तार से लिख कर एक अलग ही अनुभव प्रदान किया है, होता है ऐसा भी जब कोई सिरफ़िरा कही भटकने जाता है तो वो मोबाइल या कैमरे के चक्कर में नहीं पडता है, लेकिन यहाँ नेट पर लिखने के लिये फ़ोटो साथ हो तो आनंद कई गुणा बढ जाता है। ऐसे ही विस्तार से लगे रहिए। मुझे सबसे बडी खुशी तो इस बात की है कि आप भी बाइक से ही ज्यादातर घूमने जाते है।

  14. धन्यवाद संदीप जी । आपकी सोमनाथ यात्रा के विवरण का इन्तजार रहेगा

  15. Nandan says:

    मनु, घुमक्कड़ पर ज़ोरदार स्वागत है | वास्तव में धमाकेदार एंट्री है | इतनी सुन्दर घटी के दुर्लभ और सुन्दर फूल दिखने के लिए धन्यवाद |
    नीरज और संदीप को भी एक सलाम , फीता काटने और घुमक्कड़ में लिखने का उत्साह दिखाने के लिए |

    आपके प्रोफाइल में शायद आपने या संपादिका जी ने १८ राज्य वाली दिक्कत सही कर दी है, रही बात विडियो की तो आप चुनिन्दा लिंक्स भेज दें , मैं उन्हें पोस्ट ही में दाल दूंगा, लेख के साथ हे देखे जा सकेंगे |

    लेख में थोडा घूमने के काम आने वाले तथ्यों को और बढाया जा सकता था, जैसे की होटल का किराया, दूरी वगैरह |
    हेमकुंठ साहब के इंतज़ार में

  16. धन्यवाद सर मैने आज तक अपने आपको इतना गर्वित फील नही किया जितना कि घुमक्कड में लिखने के बाद से । मैने लेख भेजा था नीरज जी के कहने पर पर मुझे पता नही था कि छप भी जायेगा । मै कोशिश करूंगा कि आगे भी आपकी उम्मीदो पर खरा उतर सकूं और आप सबका इतना प्यार​ मिले । मै आज रात या कल सुबह तक हेमकुंट साहिब की पोस्ट डाल दूंगा कुछ अच्छे विडियो के साथ । आपके सहयोग एवं कमेंटस के लिये एक बार फिर धन्यवाद हार्दिक आभार

  17. Tarun Talwar says:

    Dear Manu,

    Very well written post with useful details for other ghumakkars . It’s great to see more and more people writing in hindi. Waiting for more travelogues from your treasure.

  18. thanx Tarun ji . It’s my pleasure that I found your comments. God willing, so you’ll read better

  19. R S SHARMA says:

    very good

  20. घुमक्कड पर स्वागत है. आपका लेख बहुत ही रोचक लगा. घूमते रहिये…लिखते रहिये…

  21. Very well written. Great details. Thoroughly enjoyed. Keep it up, Manu Ji.

  22. Chandra says:

    Excellent Manu Ji, After reading your article planning to have trip to this Valley of Flowers.
    Hindi mein vivran ke liye dhanyavaad.

  23. धन्यवाद सर , शुभकामनाऐं आपकी यात्रा के लिये

  24. Dear Manu,

    This is the second great post of yours which I read with great enjoyment. You would be amazed to know that I took a print out of the Patnitop story (text only) and asked my wife to read and enjoy it. Specially because both of us are leaving for Srinagar today evening and I wanted her to know that I am collecting as much information about the places where we would be visiting as seems possible.

    Your straight forward way of writing with great honesty is really heart touching. Having been introduced with Ghumakkar, now I also know for sure where to post my travelogues. Very soon I would write about my trips of Udaipur / Mount Abu and of course, Srinagar. Good bye.

    Sushant Singhal

  25. आप कश्मीर घूमिये और फिर लिखिये सुशान्त जी , घुमक्कड डाट काम एक अच्छा प्लेटफार्म है लिखने वालो और पढने वालो दोनो के लिये । आपकी यात्रा मंगलमय हो साथ ही फोटो खींचने में कंजूसी मत करना सर ।

    मेरी यात्रा को इतने अच्छे तरीके से पढने के लिये धन्यवाद

  26. Monty says:

    Tyagi ji, lagta hai bade maje mare hai uttrakhand me?

  27. घुमक्कडी अपने आप में एक मजा है मोंटी जी चाहे उत्तराखंड हो या कहीं और

  28. B.S. Gusain says:

    Tyagi ji itni achhi yatraye karne aur yatra vratant likhne ke liye koti koti sadhuwad…..photograph bahut sundar hain……
    bahut shubhkamnayen….
    yatra mangalmay ho….
    ghumakkarhi jari rahe….
    yatra-vratant dlikhte rahiye…
    jai hind…

    • धन्यवाद ……..आपके कमेंट ने मेरे खजाने में एक और नग की वृद्धि की है ये मेरी सबसे पहली पोस्ट थी और आशा करता हूं कि आप आगे भी मेरे लेख पढ रहे होंगे घुमक्कड पर ……मै आपसे मिले इस कमेंट की आगे भी आशा करूंगा

      धन्यवाद



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