दिल्ली से लेह-लद्धाख बाइक पर, भाग 10 (PATNI TOP- VAISHNO MATA)

September 20, 2011 By:

आखिरकार पल्सर वाले भी हमारे साथ आ गये। इनसे पूछा गया कि रात में कहाँ थे तो इन्होंने बताया कि हम रात को बारह बजे बाल्टाल आये थे। जिस कारण सुबह जल्दी आँख नहीं खुली, रही बात मोबाइल की तो वो तो चार्ज ही नहीं था, तो मिलता कैसे, नेटवर्क भी सिर्फ़ बी.एस.एन.एल. का ही था। उनका सिम था एयरटेल का,

क्या रखा है, कश्मीर में, कश्मीर से भी अच्छे नजारे यहाँ पटनी टॉप में मिलते है। टॉप टाप नाम है इस जगह का, पत्नी टॉप बोलते है ज्यादातर लोग, वैसे है, बडी शानदार जगह, हरियाली तो कूट-कूट कर भरी हुई लगती है। जाडॆ में यहाँ जमकर बर्फ़बारी का मजा लिया जाता है, लेकिन हम ऐसी बर्फ़बारी से होकर आये है, कि अब तो हमें बर्फ़बारी के नाम से ही ठण्ड लगने लगने लगती है। यहाँ के कई फ़ोटो खींचे, हर तरफ़ हरा-हरा नजर आता है

ये है पटनी टॉप का दिलकश नजारा।

ये है पटनी टॉप का दिलकश नजारा।


वृक्षों के मध्य से पहाडी खेतों का प्यारा सा नजारा।

वृक्षों के मध्य से पहाडी खेतों का प्यारा सा नजारा।

इस लेख के शुरु में आपको बताया था, कि महाराष्ट्र के नान्देड में, बसमत के पास एक गाँव कुरुन्दा, के दो बन्दे तो इस यात्रा के शुरु से ही साथ है, लेकिन दो सिरफ़िरे और आने थे जो हमें अमरनाथ मिलने थे, लेकिन वे हमें एक दिन देरी से मिले वो भी पटनी टाप पर ना कि अमरनाथ में जहाँ की बात तय हुई थी। हमने उन्हे कहा कि चलो अब वापस आओ, अब अकेले अमरनाथ जाकर क्या करोगे, तो वे बोले नहीं हम भोले के दर्शन बिना वापस नहीं जायेंगे, हमने कहा कि तुम्हारे पास यात्रा पर्ची है, वे बोले नहीं है तो ठीक है जाओ, किस्मत अच्छी हुई तो दर्शन हो जायेंगे। कुछ देर यहाँ मस्ती करने के बाद आगे का मार्ग नापना शुरु कर दिया। रास्ते में बनिहाल, रामबन, बटोट, आये। कुड में एक जगह पर भोले का लंगर चल रहा था। हम भी लंगर में शामिल हो गये। लगंर के बाद हम धीरे-धीरे उधमपुर आ पहुँचे। ये शहर काफ़ी बडा है। हम यहाँ नहीं रुक, क्योंकि शाम के पाँच बज चुके थे, अंधेरा होने से पहले कटरा पहुँचना था। इस शहर को पार करने के बाद ऊँचे पहाड तो नहीं, पर छोटॆ-छोटे से पहाड जरुर हमारा साथ निभा रहे थे, हम इनका ही दीदार करते हुए चले जा रहे थे। हमारी रफ़तार ज्यादा, तेज नहीं थी, क्योंकि हमें सीधे हाथ पर आने वाले माता वेष्णों देवी के दरबार की और जाने वाले मार्ग पर जो जाना था, रफ़तार में ऐसे मोड नजर नहीं आते है, ये एक छोटा सा मोड है, जैसे ही वो मोड आया सब उधर ही मुड गये।

वन में किसी का प्यारा घर। काश अपना भी यही होता!

वन में किसी का प्यारा घर। काश अपना भी यही होता!

कुछ देर आराम व पहाडों को मन में भर लिया जाये।

कुछ देर आराम व पहाडों को मन में भर लिया जाये।

इस मार्ग से हर कोई पहली बार ही आया था, यहाँ से माता के भवन तक जाने के आधार कटरा तक की दूरी बीस किलोमीटर के आसपास ही थी। उल्टे-सीधे मोडों से होते हुए हम जा रहे थे कि अचानक एक गहरी खाई की ओर सडक चली गयी, साथ ही हम भी जब हम नीचे पहुँचे तो देखा कि ये तो एक नदी का पुल है पता नहीं बाण-गंगा है या कोई और, यहाँ से कटरा सिर्फ़ सात किलोमीटर दूर था, जिस मार्ग से हम आये थे। ये जम्मू की ओर से आने वाले मार्ग से अलग था। ये मार्ग हमे कटरा के हैलीपेड के पास से होता हुआ ले गया था। हम सीधे उस जगह पहुँच गये जहाँ से माता के भवन के लिये पर्ची मिलती है। एक बन्दा जा कर पर्ची ले आया, हम सीधे आगे की ओर चलते रहे। जब हम पैदल मार्ग के पास पहुँचे, तो अपनी-अपनी बाइक के लिये ठिकाना ढूंढने लगे। सामने ही एक होटल में दो-दो सौ के दो कमरे ले लिये, बाइक फ़्री में। अभी समय हुआ था, शाम के साढे सात, आज पूरे दिन में केवल चार सौ पच्चीस किलोमीटर ही बाइक चलाई थी, एक बर्फ़ीली जगह से एक गर्म जगह आ गये थे। हमने ताजे पानी से नहा कर अपनी थकान कम की। सब नहा धो-खा पी कर रात दस बजे तक माता के दर्शन करने के लिये चलने को तैयार थे।

अब आ गये है माता वैष्णों के प्रवेश द्धार।

अब आ गये है माता वैष्णों के प्रवेश द्धार।

अभी तक कोई थकावत नहीं हुई है।

अभी तक कोई थकावत नहीं हुई है।

माता वेष्णों देवी की जयकारे के साथ ही हम पैदल चल दिये। एक बात तो रह गयी, हमने तय किया कि पैदल चलते समय जो सबसे पहले बैठे, वो सबको नीम्बू पानी पिलाएगा, यहाँ हारे संतोष तिडके, सबको गन्ने का रस पिलाया, यहाँ पैदल चलने में कोई परेशानी नहीं आती है, अगर आप अपनी चाल से चले तो, बस वापस आने में ही हमेशा सावधानी बरतनी जरुरी होती है,उतरते समय वो पैदल हो या वाहन पर हमेशा सावधान रहिए। हम सब रात के दो बजे माता के दर्शन कर चुके थे।

ये ढिल्लू उर्फ़ गजानंद नहीं सुधरेगा।

ये ढिल्लू उर्फ़ गजानंद नहीं सुधरेगा।

चल मराठे कुछ देर बैठ कर आराम कर ले।

चल मराठे कुछ देर बैठ कर आराम कर ले।

रात का एक बजा था, बस इससे ज्यादा कुछ नजर नहीं आ रहा था।

रात का एक बजा था, बस इससे ज्यादा कुछ नजर नहीं आ रहा था।

 रात के डेढ बजे माता के भवन का नजारा कैसा दिखाई देता है।

रात के डेढ बजे माता के भवन का नजारा कैसा दिखाई देता है।

मैं सीधे नीचे कटरा में कमरे पर पाँच बजे आकर सो गया। बाकि सब भी साढे पाँच तक आ गये थे। आज पूरे चौबीस घंटे बिना आराम किये दिन रात, हम लगातार यात्रा पर थे पहले बाइक पर चार सौ पच्चीस किलोमीटर, फ़िर रात में माता के दर्शन पैदल किये, पैदल पूरे तीस किलोमीटर, इतनी कठिन चौबीस घंटे की यात्रा के बाद भी मन आराम करने से ज्यादा घर जाने का कर रहा था। उसके बाद भी सिर्फ़ तीन घंटे सोये, हम सब घर जाने के लिये उतावले थे।

सब नहा धोकर, सुबह साढे नौ बजे अपने प्यारे घर की और चल दिये। आज उस मार्ग से नहीं जाना था जिससे कल आये थे। आधे घंटे बाद हम जम्मू-श्रीनगर हाइवे पर आ गये थे। जम्मू की ओर जाते समय, हमें जम्मू बाईपास से जाना था, लेकिन मेरे दोनों बाइक वाले साथी कुछ ज्यादा ही तेजी से जा रहे थे, बाईपास को देखा ही नहीं, और घुस गये जम्मू सिटी की भीड में, जबकि मैं बाईपास से होता हुआ सीधा सांबा जा निकला, व यहाँ एक भंडारे पर भोले का प्रसाद दाल मखनी व तंदूरी रोटी ग्रहण किया। जब तक उन दोनों ने जम्मू पार ही किया था। अब तय हुआ कि कठुआ या पठानकोट पार करने के बाद उस मोड पर मिलंगे, जहाँ से एक मार्ग चम्बा, धर्मशाला, मण्डी की ओर जाता है व दूसरा जालंधर, लुधियाना, अम्बाला, दिल्ली की ओर, लेकिन पठानकोट में फ़िर गडबड हो गयी। ये चारों पठानकोट से जालंधर वाले मार्ग पर ना आकर, सीधे हाथ अमृतसर की ओर चले गये। जैसे ही हमें पता चला कि मेरे अलावा, बाकि दोनों बाइक अमृतसर की ओर चली गयी, जानी भी थी, क्योंकि पठानकोट में मार्ग पर कोई बोर्ड नहीं था, जिससे ये पता चल सकता हो कि जालंधर किधर व अमृतसर किधर है, हमने पठानकोट पार करने के बाद एक पेट्रौल पम्प से बाइक की टंकी फ़ुल करायी तथा कुछ आगे जाकर अपने साथियों का इन्तजार करने लगे। जब हमें आधा घंटा हो गया तो, खोपडी खुजाने लगी कि अब तक आये क्यों नहीं, एक बार फ़िर फ़ोन मिलाया व पूछा कि अब कहाँ तक आ गये हो, उनका जवाब था कि हम पठानकोट ना आकर सीधा जालंधर जा रहे है, आप भी वहीं पहुँचों, हमें खूब गुस्सा आया क्योंकि उन्होंने हमारा आधा घंटा खराब जो करा दिया था। अब हम उनसे आधा घंटा पीछे हो गये थे, कहाँ तो उनसे चालीस किलोमीटर आगे थे।

हम काफ़ी तेजी से जालंधर की ओर आये। दोपहर का समय था, गर्मी बहुत लग रही थी, हाँ यहाँ मार्ग में एक जगह नीबू की शिकंजी की ठेली लगी हुई थी, उस पर दो-दो गिलास शिकंजी के पेल दिये, जिससे गर्मी से कुछ तसल्ली मिली। दो घंटे के बाद हम जालंधर के टी पवाइंट पर थे। यहाँ से एक मार्ग अमृतसर व दूसरा लुधियाना, अम्बाला, की ओर चला जाता है। हमने यहाँ आकर फ़िर फ़ोन किया तो पता चला कि ये लोग बीस-पच्चीस किलोमीटर आगे चल रहे है, अब तय हुआ कि अम्बाला में मिलेंगे, चलते रहो। अपनी-अपनी रफ़तार से जो अधिकतम पैसंठ-सत्तर के आस-पास रही होगी। धीरे-धीरे हम लुधियाना भी बिना रुके पार कर गये। इस शहर में अब भीड-भाड काफ़ी ज्यादा हो गयी है। यहाँ ये बताना अच्छा रहेगा कि मार्ग जम्मू से दिल्ली तक ही जोरदार है, चौडा इतना कि एक साथ पाँच-पाँच बस भगा लो। अम्बाला के पास आते-आते अंधेरा होने लगा था। यहाँ हमें पुल पार करने पर प्यारे दोस्त संतोष तिडके व गजानंद उर्फ़ ढिल्लू जी हमारा इंतजार करते मिले। यहाँ तक आते-आते रात के आठ बज गये थे। हमारे साथ-साथ चल रहे एक स्थानीय बाइक सवार की जबरदस्त टक्कर एक गाय से हो गयी, जिसमे उसे बहुत गम्भीर चोट आयी।…………..

अगली पोस्ट (इस यात्रा की आखिरी किस्त होगी) में आगे की दिल्ली तक की कहानी, रात में कब तक पहुंचे,

इस यात्रा के बारे में कैसे जाना, कहाँ रहना, कितना खर्चा, क्या परेशानी, क्या ले कर जाना है आदि-आदि सब कुछ बताया जायेगा। जिससे इस यात्रा पर जाने के इच्छुक दीवानों को फ़ायदा हो।

About Jatdevta

Jatdevta Sandeep Panwar has written 100 posts at Ghumakkar.

मैं ठहरा मनमौजी, मतवाला, घूमने के मामले में पर्यटकों (कार हवाई जहाज से साल में एक आध बार घूमने जाने वाले) से एकदम अलग हूँ। घूमने में पूरी जायज कंजूसी दिखाता हूँ। फ़ालतू की फ़िजूल खर्ची पसन्द नहीं है। अपनी मेहनत की कमाई से घूमता हूँ। रिश्वत या दान की कमाई से नहीं। रिश्वत भ्रष्टाचारी लेते है दान पुजारी व भिखारी लेते है। मेरा साल में एक-दो बार तो घूमना होता नहीं है। मैं चाय, बीडी, सिगरेट, गुटका, पान, तम्बाकू, अंडा, मीट, मछली, शराब, आलसीपन, दान और रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ।

Getaway Jungle Camp

19 Responses to “दिल्ली से लेह-लद्धाख बाइक पर, भाग 10 (PATNI TOP- VAISHNO MATA)”


  1. अब ये यात्रा अंतिम चरण में आ चुकी है सिर्फ़ आखिरी लेख बचा है,

    मैं इस यात्रा के बारे में (सलाह) बताऊँगा जैसे कहाँ रुकना ठीक होगा,

    कैसे जाना होगा, आदि आदि………………. लेकिन हो सकता है कि मुझसे कुछ बाते रह जाये,
    आपके ध्यान में आ रहा हो तो अवश्य बताये, ताकि मैं उसके बारे में भी अपने लेख में जोड सकूँ।
    अब देखते है कि कितने प्रश्न आयेंगे,
    वैसे एक बार नन्दन ने भी कुछ ऐसी ही सलाह लिखने की कही थी,
    मैं आप सबसे जैसे नन्दन जी, निखिल जी, साहिल जी, महेह सेमवाल जी, विनय जी, श्रीनिवास शर्मा जी, विभा जी, धर्मेन्द्र सांगवान जी, रितेश जी, वन्दना परांजपे जी, आरोजीत जी, विशाल राठौर जी, अभिजीत जी, आशीष जी, मुकेश भालसे जी, अमित कुमार जी, मनीष जी, स्मिता जी, प्रवेश जी, स्टोन जी, सनेज जी, अशोक शर्मा जी, विराग शर्मा जी, आदित्य जी, गजानन बापत जी, विकास कक्कर जी, सुधीर यादव जी, विजय मिश्रा जी, रश्मि कान्त जी, व अन्य सभी दोस्तों से कहना है कि आप किसी को भी कैसा भी प्रश्न मन में घूम रहा हो अवश्य बताये,

    धन्यवाद

  2. Nandan says:

    दसवां भाग प्रकाशित हो चूका है संदीप, और इस शानदार श्रृंखला का समापन होने वाला है | एक तरफ से कुछ छुटता हुआ सा आभास हो रहा है , वैसा ही जैसे की किसी लम्बे और लुभावने सफ़र से लौटने पर होता है | इक दिन में ४२५ किलोमीटर बाईक चलाना और उस पर से वैष्णो देवी की पैदल यात्रा, वाकई आप लोगों में साहस की कोई कमी नहीं है |

    मुझे उम्मीद है की जो स्वाभाविक से सवाल है, जैसे की क्या क्या लेकर जाएँ, कहाँ रुकें, क्या न मिस करिएँ इत्यादि वो तो आप कवर करेंगे ही है पर इतना जूनून लाने के लिए अगर कुछ सुझाव हो तो वो बताएं |

    अगली पोस्ट के इंतज़ार में और अगली श्रृंखला की उत्सुकता में –

    सप्रेम नंदन

    • Mahesh Semwal says:

      लेह-लद्धाख की यात्रा समापन पर आप को बहुत बहुत बधाई | आप की हिम्मत की दात देनी पड़ेगी | इस लेख के आखरी शृंखला का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा |

  3. Amit Kumar says:

    संदीप भाई आपने असंभव को संभव करके दिखाया है. जितना रोमांच आपकी यात्रा के विवरण में है उतनी ही सादगी इसके वर्णन में है.
    आपके जोश का कुछ प्रतिशत भी अगर मैं अपने अंदर ला सका तो शायद बहुत कुछ करने में सक्षम हो जाऊंगा. जैसा कि नंदन जी ने कहा “इतना जूनून लाने के लिए अगर कुछ सुझाव हो तो वो बताएं”, साथ ही आपका बेहद धन्यवाद इस यात्रा का सहभागी हम सब को बनाने के लिए.

  4. Mukesh Bhalse says:

    संदीप भाई.
    एक मनपसंद सीरियल का आखिरी एपिसोड ?? …………………. बड़ा बुरा लग रहा है, खैर ऐसा भी बुरा मानने वाली बात नहीं है अपने संदीप भाई सलामत है तो ऐसी कई और यात्रायें पढने, देखने को मिलेंगीं, हम तो बस यही दुआ करते हैं की ईश्वर आपको हिम्मत और हौसले से लबरेज रखे ताकि आप खूब यात्रायें करें और हमें मुफ्त में उनका लुत्फ़ उठाने को मिले. आपके हौसले को देखकर किसी विचारक की यह पंक्तियाँ अनायास ही याद आ जाती हैं:
    ” साधनों की स्वल्पता, परिस्थितियों की विकटता होते हुए भी प्रचंड संकल्प शक्ति और अदम्य साहसिकता के बल पर मनुष्य बहुत कुछ कर सकता है”
    धन्यवाद
    मुकेश भालसे

  5. Nandan says:

    Mukesh – I hope to see your next write-up in Hindi. I have been reading your comments and having this kind of control over Hindi is not something common. Please try to write your next log in hindi.

  6. Yaar sandeep jee meri hindi itni achi nahin specially likhne mein………………….

    Lekin mein avashya prayatna karoongaa…………………..

    bahut achha post tha .badhiya photos the and kahani kaa jawaab nahin………………..

    bahut majaa aa gyaaa……………..

    Keep travelling keep posting………………..

  7. vinaymusafir says:

    इंसान की तरह एक पोस्ट भी नश्वर है, एक दिन ख़तम हो ही जायेगा! अब कुच्छ और लेकर जल्दी ही आईयेगा! इंतज़ार रहेगा!

  8. Mukesh Bhalse says:

    Nandan- Thank you very much for appreciation. Yes I’ll certainly try to write my next post in Hindi after 15th October (After returning from my next tour Aundha Nagnath-Parli Vaijanath-Nanded-Bhimashankar-Mahabaleshwar).

    Thanks.

  9. मुकेश जी,
    मैं भी औंढा-नागनाथ तीन साल पहले जा चुका हूँ,
    इस यात्रा पर मेरे साथी इसी जगह से थोडी दूर बसमत तालुका के पास स्थित गाँव कुरुँदा से ही बाइक पर इस यात्रा को सफ़लतापूर्वक सम्पूर्ण किया था,
    जिनमें से एक का नाम हमने ढिल्लू रख दिया था,
    वैसे हमें बाद में पता चला था कि ढिल्लू तो आगरा से वापस भाग रहा था, संतोष तिडके किसी तरह दिल्ली तक लाया था।

  10. sandeep jee kaunsi jagah pe aap nahi gaye ho?????????????????????????????????

    • विशाल जी अभी तो भारत में बहुत कुछ देखना बाकि है,
      वैसे पूर्वी भारत मुझसे अभी तक अछूता है,
      भारत में इतना कुछ है कि एक जन्म कम पड जायेगा,
      दूसरा जन्म लेकर शायद पूरा देख पाये।

  11. Ritesh Gupta says:

    संदीप जी , मैंने आपके सभी पोस्ट दिल्ली से लेह-लद्धाख बाइक पर को पढ़ा हैं . आपकी ये यात्रा काफी रोमांचक रही और पढने में मज़ा भी आया . हमारे मन में कोई प्रश्न नहीं हैं आपके लेख में ही अधिकतर सभी सवालों के जबाब हैं….. धन्यवाद

  12. Stone says:

    Bahut bahut shukriya , itni interesting series likhney ke liya, aur aasha hai ke aage bhi aapko yaha padhtey rahe gey.

    Aapki posts padhkar , mann karta hai ke aapke saath aisi hi kisi yatra kari jaye.

  13. Sharma Shreeniwas says:

    सन्दीपजी आपके भ्रमण में साहस है तो लेखन में झलकती जीवटता से रोंगटे खड़े कर देने वाली परीस्थिति भी सरल-स्वाभाविक बन पाठक को भ्रमण के लिये प्रेरित करती है, डराती नहीं है। हिन्दी के प्रति आपके प्रेम ने आपकी लेखनी को काफी सौम्य बनाते हुये आंचलिक स्तर से ऊपर उठा राष्ट्रीय स्तर तक पठनीय बना दिया है जिसमें प्रयुक्त स्थानीय उद्गार-शब्द अब “आँचलिक-मिट्टी की सुगन्ध” का आभास देते हैं।
    बाइक पर आप क्या-क्या सामान लेकर चलते थे ? किस चीज का आपको अभाव महसूस हुआ ? बाईक पर दो का होना सुविधाजनक रहता है या हरेक के पास बाइक का होना आदि बातों का समावेश आपकी अगली कड़ी में अपेक्षित है।
    आपने दुरूह यात्रायें की हैं । लम्बी दूरी की यात्राओं में विश्राम, विशेषकर रात्री-विश्राम के लिये सुरक्षित, आवश्यक सुविधायुक्त व उचित मूल्य पर आवास की आवश्यकता रहती है। शहरों-कस्बों में स्थित होटल-धर्मशालायें पर्यटकों की उपयोगिता को ध्यान में रख बनाई हुई होती हैं। जो कि रोड-साइड की अपेक्षा पर्यटक स्थलों के नजदीक होती हैं। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये रोड-साईड पर बने काफी स्थान हैं परंतु उनके संगठित नही होने से उनके बारे में पूर्ण विवरण किसी एक स्थान पर उपलब्ध नहीं है और उनके सुरक्षित होने में भी सन्देह बना रहता है। ‘घुमक्कड़.कॉम’ के मेम्बरों द्वारा इस विषय में सोचना-करना एक सार्थक कदम सिद्ध होगा।
    आशा है कि पूर्व की तरह आप अपने भविष्य के ट्यूर के विषय में भी समुचित जानकारी देंगें। शुभ कामनाओं के साथ……

    • शर्मा जी नमस्कार,
      आप जैसे हिम्मत वाले इंसान से ही मैं प्ररेणा प्राप्त करता हूँ, हमारे एक हिन्दी के अध्यापक 56 साल की उम्र में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण मात्र 35 दिन में कर के आये थे और उनका वाहन था 100cc सी.सी की बाइक, आज 64 साल के हो चुके वे अध्यापक प्रत्येक अमावस्या व पूर्णिमा को दिल्ली से हरिद्धार अपनी पत्नी के साथ बाइक से ही जाते है।

      मैं आपके द्धारा अपेक्षित सभी प्रश्नों का भी समाधान करने का प्रयत्न करूँगा।

      मैं गुरुनानक जी से बहुत ज्यादा प्रभावित हूँ। उनके जैसा घुमक्कड मैंने नहीं देखा है। अगर-अगर मैं उन जैसा कुछ प्रतिशत भी बन पाया तो मेरा ये जीवन सफ़ल हो जायेगा।

      • Sharma Shreeniwas says:

        सन्दीपजी आपसे आपके हिन्दी के अध्यापक के बारे में जानकर उनके अनुभवों के बारे में जानने की और इच्छा है। उनकी साहसिकता व आस्था से प्रभावित होना स्वाभाविक है। घूमने के प्रति आपके विचारों को ईश्वर सफलता प्रदान करे और घुमक्कड़ परिवार को आपके अनुभवों का आनन्द मिलता रहे, यह हम सब की कामना है ।

  14. AUROJIT says:

    Hi sandeepji,

    यात्रा के अंतिम पड़ाव में माता के दर्शन – यह तो बिलकुल ही आदर्श समापन है किसी भी यात्रा का.

    बड़े ही रूचि के साथ आपके विवरणों को पढ़ रहा था – या यो समझिये आपके साथ मै भी यात्रा कर रहा था.

    मेरा अभिनन्दन इस समूचे रोमांचकारी लेख के लिए.

    यह लेख निश्चय ही हम सब घुमाक्कारो के लिए जो लेह के रस्ते पर जाना चाहते है बहुत ही महत्वपूर्ण होगा.

    आपके दिल्ली पहुँचने के इंताजर में,
    असंख्य धन्यवाद्

  15. Nandan says:

    Sandeep – Looking fwd to get the last kisht of this great travel saga.

    …….इस यात्रा के बारे में कैसे जाना, कहाँ रहना, कितना खर्चा, क्या परेशानी, क्या ले कर जाना है आदि-आदि सब कुछ बताया जायेगा। जिससे इस यात्रा पर जाने के इच्छुक दीवानों को फ़ायदा हो।………



Leave a Reply


2 × four =