दिल्ली से लेह लद्धाख बाइक पर भाग 4 (SARCHU-LEH-KHARDUNG LA/PASS) |
Table of contents for Delhi Leh Bike Trip
ट्रक ड्राइवर हमारी ही उम्र का एक मस्त इन्सान रहा। जिस अनाम जगह हम रुके थे, वहाँ से तंगलंग ला (दर्रा) नजर आ रहा था। टैंट वाले ने हमें बताया कि तंगलंग ला ऊंचाई में बारालाचा ला (पहाड़ी लोग दर्रे को ला भी कहते है) से भी ऊंचा है, किन्तु यहाँ बर्फ़ बारालाचा दर्रे के मुकाबले 10% भी नहीं है। ऐसा होने की वजह तंगलंगला दर्रा में चलने वाली तेज हवाये है, जिससे यहाँ बर्फ़ ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाती हैं। हम ऐसी जगह पर थे, जहाँ से हमें 20-25 किलोमीटर तक का मार्ग ऊपर जाता हुआ दिखाई दे रहा था। ट्रक वाले ने भी जमकर ट्रक भगाया, यहाँ से चलते ही जबरदस्त धूल मिली, क्योंकि रास्ते में कार्य चल रहा था। किसी तरह धूल पार की, तो आ गई चढाई, जिस पर आसानी से ट्रक का पीछा नहीं किया जा रहा था। ट्रक लगभग खाली ही था, ट्रक में मात्र दो टन आटा ही था। वो मोडों पर भी स्पीड में मोड रहा था, जिससे हमें डर लग रहा था, कि तभी एक मोड पर चार ट्रक लाइन में मैट्रो की तरह जाते हुए मिले, ये चारों वजन से लदे हुए थे, जिससे इनकी स्पीड भी कम थी। हमारी बाइक तो बराबर में से आगे निकल गयी, पर हमारे साथ वाला ट्रक पीछे रह गया। हमने इन्हें कहा, कि कोई जल्दी नहीं है, आराम से आओ,
ये चढाई ज्यादा खडी नहीं थी, मार्ग काफ़ी घुमा कर बढिया बनाया हुआ है। जब हम तंगलंगला के टॉप पर पहुँचे, तब ही बर्फ़ नजर आयी। मुश्किल से 500 मीटर में ही बर्फ़ थी, टैंट वाले के कहे अनुसार, हवा बडी तेज व ठंडी थी। ये दर्रा सड़क पर ऊंचाई में तीसरे स्थान पर आता है , कुछ दूरी के बाद मस्त चौड़ा रोड आ गया, साथ में ढलान भी, यहाँ किसी को भी फोटो खींचना ध्यान नहीं रहा, क्योंकि सब फ़ासले पर चल रहे थे। अंधेरा होने से पहले उपशी पहुँचने की जल्दी थी। तंगलंग ला टाप से उपशी तक मस्त सडक है, यहाँ से एक नदी सडक के साथ-साथ चलती है, तब नदी का नाम नहीं पता था, उपशी जाकर पता किया तो उत्तर मिला, “सिंधु नदी”, बड़ी खुशी हुई सुनकर। इसी नदी के किनारे पर, लेह शहर में, हर साल जून में सिंधु-महोत्सव मनाया जाता है।
अँधेरा होने से ठीक पहले तीनों बाइक उपशी आ गयी थी। यहाँ रात में रुकने का अच्छा प्रबंध है, हमें एक कमरा बिना तलाश किए मिल गया। हुआ य़ू कि, हम बाइक के पास खडे बात कर रहे थे, कि तभी वहाँ काम कर रहे बिहार के दो युवक हमारे हीरो से बोले, आप लेह जा रहे हो, उसने कहा हाँ, लेकिन आज रात यही रुकना है। वे बोले अगर आप को बुरा ना लगे तो, जहाँ हमने कमरा लिया है, वहाँ एक कमरा खाली है। हीरो ने कमरा देखा, भरतपुर के महल से कई गुणा बढिया था। किराया तय हुआ 250 रुपये रोज, छ बिस्तर, छ रजाई, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं आई। ट्रक वाले यात्री भी एक घंटे की देरी से पहुँच गये। देरी का कारण बताया कि रास्ते में किसी की एक क्वालिस गाडी, जिसमें चार सवारी थी, उपशी से 40 किलोमीटर पहले खराब हो गयी थी। उन्हें भी ट्रक में बैठा लिया गया था। उनसे किराया लिया 200 रुपये प्रति सवारी, हमने किराया पूछा तो तो ट्रक ड्राईवर बोला नहीं भाई जी, “आपको किराये के लिये थोडे ही बैठाया था”। हम फिर भी तीन बंदों के तीन सौ रुपये उसको दे आये।
ढिल्लू महाराज की तबीयत भी ट्रक के अंदर इंजन की गर्मी पा कर सुधर गयी। यहाँ उपशी में मजा आ गया, यहाँ का मौसम गर्म था, ठण्ड छूमंतर हो गयी थी। कल की रात और आज की रात में जमीन आसमान का अंतर था। आज सबने जी-भर, पेट-भर कर खाया। आज अलार्म नहीं लगाया, क्योंकि सुबह उठने की कोई जल्दी नहीं थी। कल का कार्यक्रम लेह से ऊपर खर्दुन्गला टॉप (दुनिया की सबसे ऊंची सडक) का था। जहाँ जाने के लिये लेह के डी.सी. दफ़्तर से सुबह 10 बजे इजाजत मिलती है। सुबह आराम से उठे, आज सुबह उपशी के चौक पर फोटो सैसन का कार्य हुआ। ठीक 8 बजे लेह की ओर धावा बोल दिया। 50 किलोमीटर की दूरी तय करने में मात्र एक घंटा का समय लगा। उपशी से लेह जाते समय, लेह के चौक से उल्टे हाथ की ओर जम्मू तथा सीधे हाथ की ओर दुनिया की सबसे ऊंची सडक व लेह के डी.सी. आफ़िस की ओर मार्ग जाता है। हम डी.सी. आफ़िस पहुँचे, खार्दूगला व पैंन्गोंग लेक जाने की लिखित आज्ञा ली। यहाँ पहचान पत्र की फोटो कापी की भी जरुरत पडती है।
आज्ञा लेते समय कई लोगों ने डराया कि “वहाँ पर आक्सीजन कम है, सर दर्द होगा, उल्टी आ सकती है”, सुनकर एक बार तो लगा ढिल्लू के साथ फिर कैसे होगा? पर हम सभी के बुलंद-पहाड जैसे हौसलों के चलते, हम निकल पड़े दुनिया की सबसे ऊँची मंजिल की ओर। डी.सी. आफ़िस से 200 मीटर चलते ही उल्टे हाथ की ओर एक गुमनाम सा मार्ग खर्दुन्गला की ओर जाने के लिये मिला।
अब तक हमने पार किया है, रोहतांग 13050 फुट, बारालाचा ला 16500 फुट, तंगलंग ला 17582 फुट आज बारी है, खर्दूंगला 18380 फुट और कल जायेंगे चांग ला 17586 फुट।
साँप की तरह बलखाती हुई सड़क पर यहाँ से जो चढाई शुरु होती है, वो सीधी 40 किलोमीटर के बाद खर्दुन्गला टॉप (दुनिया की सबसे ऊँची सड़क) पर जाकर समाप्त होती है, पूरे रास्ते जहाँ सुनसान नंगे-गंजे, मटमैले रंग के पहाड़ के सिवाय कुछ भी नहीं था। इसी मार्ग के मध्य में एक आर्मी चेक पोस्ट पर डी.सी. आफ़िस से ली गयी इजाजत की फोटो काफ़ी देना पड़ती है। प्रकृति की लीला भी गजब-अपरम्पार है, जैसे जैसे ऊँचाई बढती जाती है, बर्फ की मात्रा भी बढती जाती है। चारों ओर बर्फ ही बर्फ का खूबसूरत नजारा था ।

इस बुलेट वाले नैनीताल के दोस्त जो रास्ते में मिले थे, अगर कोई इन्हें जानता हो तो मुझे अवश्य बताये, मेरे फ़ोटो इनके पास है।
हवा इतनी ठंडी थी, कि हाथ-पैर की अंगुलियाँ सुन्न पड़ने लगी थी, दस्ताने तो थे, पर इस ठण्ड में किस काम के, हेलमेट पर भी बर्फ जम चुकी थी, लेकिन सबके मन में बहुत ही जोश था, जैसे एवरेस्ट फतह करने जा रहे हो। हम छ भटकती आत्माएं दुनिया की सबसे ऊँची सडक पर जाये और बर्फ़ ना पडे, ऐसा असंभव कैसे हो सकता था। खर्दुन्गला टॉप अभी 15 किलोमीटर दूर था, कि हमारी प्यारी दोस्त बर्फ़बारी हाजिर हो गयी, धीरे-धीरे हमारा स्वागत करते हुए, हमे डराते हुए, मानो कह रही हो कि भाग जाओ नहीं तो फिर फंस जाओगे। लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे, परन्तु संतोष तिडके व ढिल्लू महाराज की बाइक बर्फ़ की पहली फुआर के साथ ही वापस लेह की ओर फ़ुर हो गयी थी। वैसे ये ठीक ही रहा नहीं तो, दुबारा बीमार होने में कितनी देर होती?
आखिरकार, हम जीत ही गये और दुनिया की सबसे ऊंची सडक पर बर्फ को झेलते (15 किलोमीटर तक झेली) हुए पहुँच ही गए। अब ऊपर टॉप पर पहुँचने पर ऐसा लगा जैसे हिमालय की चोटी पर आ गए हों। ठण्ड से हमारे हाथों की अंगुलियाँ जाम हो रही थी, यहाँ हमारे साथ वे दोनों बन्दे नैनीताल वाले जिनका ढक्कन सरचू के पास खो गया था। याद आये, साथ-साथ यहाँ टॉप तक आये। मुश्किल से 15-20 मिनट टाप पर रुके, क्योकि बर्फ तो रुक नहीं रही थी, इसलिए हमने फोटो सैसन किया।
ये मार्ग यहाँ से आगे दुनिया के सबसे ज्यादा ऊंचाई पर स्थित लड़ाई का मैदान सियाचिन ग्लेसियर, व अति सुन्दर नुब्रा घाटी (यहाँ दो कूबड़ वाला ऊँठ पाया जाता है) की ओर भी चला जाता है नीचे फोटो में दूरी की सारी जानकारी है। 15-20 मिनट जी भर के यादगार खूबसूरत न भुला पाने वाले लम्हें दिल व आँखों में समा कर नीचे लेह उतरने के लिए बाइक की तरफ बढ़ने लगे।
हम सब बर्फ़बारी का स्वाद(सहन करते हुए)लेते हुए नीचे लेह शहर की ओर आ गए बर्फ 15 किलोमीटर से ज्यादा दूरी में नहीं थी। आगे का सारा मार्ग बिल्कुल सूखा पड़ा हुआ था। जब हम नीचे लेह आये तो, अपने मोबाइल से ढिल्लू जी को फोन कर तलाश करने लगे, तो पता चला कि, वो स्टेडियम में डेरा जमाये हुए थे। शाम के चार बज चुके थे, सब सही सलामत वापस उपशी वाले कमरे पर आ गए, क्योंकि कल हमको पेंगोंग लेक जाना था, ये वही लेक है, जहाँ हिंदी फिल्म थ्री इडियट की आखिरी सीन की शूटिंग हुई थी।
अगले लेख में पेंगोंग जाते हुए चांग ला की बर्फ़बारी में फिर फ़ंसे ढिल्लू महाराज व पेंगोंग की दुखभरी+सुखभरी यात्रा का इंतज़ार करे जिसमें हमारे हीरो साथी ने जाट देवता को धोखा दे दिया।



























संदीप भाई जी ,
पढ़ कर मज़ा आ गया | आखिर इस बार आप हमको खर्दुन्गला पास तक ले ही गए | ऐसे ही लगे रहो संदीप भाई |
साहिल
साहिल भाई इस यात्रा की वापसी भी बडी मस्त है, जिसमें पत्थर साहिब, जोजिला टॉप, अमरनाथ यात्रा, डलझील, वैष्णो देवी भी शामिल है।
bahut badhiya sandeep bhai sahab,
aapki himmat ke kya kahane.
lage raho….
बहुत ही उतम लेख. पढ़ कर आनंद आ गया . मेरी भी तामाना है की अपनी गाड़ी से एक बार इस रास्ते का मज़ा लूँ पर बच्चों के साथ हिमत नही कर पता.
जून आखरी हफ्ते में मेरे साले साहब भी लेह गये थे अपनी बाईक से , फोटोग्रॅफ्स देखने के बाद लगा की लेह देखने का मज़ा अपनी गाड़ी से ही है.
महेश जी अपनी गाडी से जाने का मजा ही कुछ ओर होता है, बस वाले क्या जाने उस बात को।
Excellent article Sandeep. The entire series is full of adventure and humour. Very engaging indeed. Keep them coming.
-Vibha
विभा जी, अभी कई पोस्ट बाकि है इस यात्रा की।
सुन्दर। साहसिक यात्रा का सजीव आनन्ददायक वर्णन।
ऐसी ही, बल्कि इससे भी जोरदार यात्रा कर के वापस आ गया हूँ। जिसमें बाइक मात्र १३०० किलोमीटर ही चली है।
Bahut sahi hai Sandeep bhai. I really love your style of narration. Lines like ’2 ton atta’ and ‘Leh ki taraf dhawa’ are good to read. Plain and simple and engaging and humorous and genuine and from heart … Excellent! Keep them coming.
Cheers!
Nik
निखिल भाई, सच में जो मन में यादे बसी है, वो ही लिखता हूँ, कोई अलग से नहीं।
Majaa aa gaya Sandeep bhayi. Kafi jankaariyo se bhara lekh hai, aur photos ke kya kehne.
10 mein se 10 number.
संदीप भाई अभी श्री खंड महादेव के यात्रअ पर निकले है हैं इसलिए थोडा इंतज़ार करना होगा अगले लेख का |
मैं बही तक लेह नहीं जा पाया हूँ पर मैंने लेह पर लिखे है कई यात्रा वृतांत पढ़े है और आश्चर्य की बात ये है की बराचा ला का ज़िक्र तो हर लेख में मिला पर मुझे तंग्लंग दर्रा का उल्लेख याद नहीं पड़ता. जान पड़ता है की आप उपेशी में रुके बजाये लेह रुकने के, इसके पीछे कोई विशेष कारन ?
आपके साथ के यात्रा बहुत ही रोमांचक है संदीप | आपकी श्री खंड महादेव की यात्रा सफल रहे और जल्द ही आपकी तरफ से कोई खबर मिले, इसी आशा में |
नंदन झा
आ गये है वापस आज ही दोपहर को, अजी बर्फ़ को झेल कर आये है। जय श्रीखण्ड महादेव की, मजा तो आया, लेकिन बहुत सताया इस महादेव की चढाई ने।
bhai ji chang la top humna raat ma 10 baja cross kiya tha us time -20 temprature tha sari body suun ho gayi thi wasa acha laga kyonki ya ek alag si felling thi or facebook par meri id ma pura leh trip ki photo bi ha sunej malik ka name sa id ha
मलिक भाई
अपनी यादे भी हमारे साथ बाँट लो दोस्त इससे मजा और बढ जाता है।
bhai ji muja ya is type sa account ni banana ata
Res Sandeep Ji
Aapka delhi se leh laddakh series padi lekin 4 bhago ke bad ki link hi nahi mil rahi hai.
etane shandar lekh ke liye aapko bahut bahut badhaeya.
ham jese logo ke liye leh ek sapne ke saman hi tha lekin aapki series ne swapn ko sach me badal diya.
please send next link for this series.
bhupendra
my E-mail address : [email protected]
भूपेन्द्र जी यहाँ तो यह यात्रा पूरी लगायी थी हो सकता है कि किसी तकनीकी समस्या के कारण अभी उपलब्ध नहीं हो रही है, जब तक यहाँ की समस्या दूर नहीं होती हओ तब तक आप मेरा निजी ब्लॉग देख सकते है वहाँ पर भी यह यात्रा मौजूद है।
I can see all the parts but it seems the connection is broken somehow. Please see at the below page as well.
http://www.ghumakkar.com/author/jatdevta/page/5/