जादू मानसून का : जब छत्तीसगढ़ ने ओढ़ी धानी चुनरिया !

October 23, 2012 By:

मानसून तो विदा ले चुका है और ठंड ने हल्की हल्की दस्तक भी दे दी है। पर पिछले महिने मानसून की जो अद्भुत छटा छत्तीसगढ़ जाते हुए मैंने देखी उसे आपसे बाँटे बिना रहा भी तो नहीं जा रहा है। कार्यालय के काम से भिलाई जाने के दौरान कुछ ऐसे कमाल के दृश्य देखने को मिले कि वो कहते हैं ना कि “जी हरिया गया”। जिन दृश्यों को मैंने चलती ट्रेन से अपने मोबाइल कैमरे में क़ैद किया वो रेल से सफ़र के कुछ यादगार लमहों में से रहेंगे |

वैसे सामान्य व स्लीपर क्लॉस में यात्रा करते करते मेरा पूरा बचपन और छात्र जीवन बीता पर कार्यालय और पारिवारिक यात्राओं की वज़ह से विगत कई वर्षों से इन दर्जों में यात्रा ना के बराबर हो गई थी। पर भिलाई से राँची आते वक़्त जब किसी भी वातानुकूल दर्जे में आरक्षण नहीं मिला तो मैंने तत्काल की सुविधा को त्यागते हुए स्लीपर में आरक्षण करवा लिया। वैसे भी बचपन से खिड़की के बगल में बैठ कर चेहरे से टकराती तेज़ हवा के बीच खेत खलिहानों, नदी नालों, गाँवों कस्बों और छोटे बड़े स्टेशनों को गुजरता देखना मेरा प्रिय शगल रहता था। आज इतने दशकों बाद भी अपने इस खिड़की प्रेम से खुद को मुक्त नहीं कर पाया। भरी दोपहरी में जब हमारी ट्रेन दुर्ग स्टेशन पर पहुँची तो हल्की हल्की बूँदा बाँदी ज़ारी थी। साइड अपर बर्थ होने से खिड़की पर तब तक मेरी दावेदारी बनती थी जब तक रात ना हो जाए।

भिलाई से रायपुर होती हुई जैसे ही ट्रेन बिलासपुर की ओर बढ़ी बारिश में भीगे छत्तीसगढ़ के हरे भरे नज़ारों को देखकर सच कहूँ तो मन तृप्त हो गया। मानसून के समय चित्र लेने में सबसे ज्यादा आनंद तब आता है जब हरे भरे धान के खेतों के ऊपर काले मेघों का साया ऍसा हो कि उसके बीच से सूरज की रोशनी छन छन कर हरी भरी वनस्पति पर पड़ रही हो। यक़ीन मानिए जब ये तीनों बातें साथ होती हैं तो मानसूनी चित्र , चित्र नहीं रह जाते बल्कि मानसूनी मैजिक (Monsoon Magic) हो जाते हैं। तो चलिए जनाब आपको ले चलते हैं मानसून के इस जादुई तिलिस्मी संसार में । ज़रा देखूँ तो आप इसके जादू से सम्मोहित होने से कैसे बच पाते हैं ?



दुर्ग की बूँदा बाँदी रायपुर पहुँचने तक गायब हो चुकी थी। सामने था नीला आकाश और पठारी लाल मिट्टी पर जमी दूब से भरपूर समतल मैदान..
इसी मैदान में मवेशियों को चराता ये चरवाहा छाते की आड़ में जब सुस्ताता नज़र आया तो बरबस होठों पर गाइड फिल्म का ये गीत कौंध गया..

वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ
दम ले ले घड़ी भर ये छैयाँ पाएगा कहाँ

रायपुर से हमारी गाड़ी अब बिलासपुर की ओर बढ़ रही थी। नीला आसमान हमें अलविदा कह चुका था और अनायास ही काले मेघों के घेरे ने हमें अपने आगोश में जकड़ लिया था। तेज हवाएँ और बारिश की छींटे तन और मन दोनों भिगा रहे थे। सहयात्री खिड़की बंद करने की सलाह दे रहे थे। मन अपनी दुनिया में रमा कुछ और ही गुनगुना रहा था |

कहाँ से आए बदरा हो , घुलता जाए कजरा..कहाँ से आए बदरा..

दूर बादलों के पीछे एक छोटी सी पहाड़ी नज़र आ रही थी। बादलों की काली चादर के सामने उड़ता श्वेत धवल पक्षियों का समूह नयनों को जो सुकून पहुँचा रहा था उसे शब्दों का विस्तार दे पाना मेरे लिए मुश्किल है।

ये ना अंत होने वाली हरियाली तो मन में विचार जगा रही थी कि ये हरा रंग कब मुझे छोड़ेगा, मेरा दिल कब तलक ऐसा सुख भोगेगा..:)

सोचता हूँ भगवन ने जीवन में रंग ना दिए होते तो ज़िदगी कितनी बेजान और फीकी लगती। रँगरेज़ तो चुनरियाँ रंगता है पर सबसे बड़ा रँगरेज तो ऊपर बैठा है जो पूरी क़ायनात के रंगों को यूँ बदलता है कि हर बार उसके नए रूप को देखकर हम दंग रह जाते हैं।

हरे भरे थल और वर्षा जल के इस मेल को देख कर मन असीम शांति का अनुभव कर रहा था। प्रकृति को नजदीक से महसूस करने की शांति।

ट्रेन बिलासपुर स्टेशन को पार कर चुकी थी। बाहर का दृश्य बिलासपुर को ‘धान का कटोरा’ के नाम से पुकारे जाने की सार्थकता को व्यक्त कर रहा था। वैसे अगर आपको दुबराज, काली मूँछ, मासूरी या जवाँफूल जैसे नाम सुनाऊँ तो छत्तीसगढ़ से ताल्लुक ना रखने से आप थोड़े अचंभे में जरूर पड़ जाएँगे। दरअसल ये छत्तीसगढ़ में बोए जाने वाले  धान की वो किस्में हैं जो सारे विश्व में अपने स्वाद और सुगंध के लिए मशहूर हैं।

आज भले ही नीले रंग के अलग अलग शेड्स मुझे सबसे प्रिय हो पर बचपन में धानी छोड़कर कोई दूसरा रंग  पसंद ही नहीं आता था। यहाँ तो भगवन में पूरा कैनवास ही धानि रंग से सराबोर कर दिया था।

और ज़रा देखिए इन जनाब को कैसी तिरछी नज़रों से इस फिज़ा को निहार रहे हैं.. :)

तो बताइए ना अगर मैं प्रकृति की इस धानी चुनरिया  छटा को देखकर ये गा उठा तो उसमें मेरा क्या कुसूर? वैसे आप भी गाइए ना किसने रोका है :)
रंग उस के बारिश में धुल के हैं खिलते और निखरते
हो..उसके ज़मीनों के चेहरों से मिलते और दमकते
उसके अंदाज़ जैसे हैं मौसम आते जाते
उसके सब रंग हँसते हँसते जगमगाते
उड़ते बादल के साए में लहराएगी, मुझे तड़पाएगी
चली जाएगी जैसे बिजुरिया
मस्तानी…धानी रे धानी चुनरिया..

About Manish Kumar

Manish Kumar has written 24 posts at Ghumakkar.

I owe my ‘Musafir’ tag to my father who is an avid travel enthusiast. Travelling to new places always gives me a new high which I try to reflect in my travel writings. Apart from travel I am an ardent follower of Indian music & literature and regularly blog about them at 'Ek Shaam Mere Naam'.

25 Responses to “जादू मानसून का : जब छत्तीसगढ़ ने ओढ़ी धानी चुनरिया !”


  1. प्रिय मनीष,

    भाईजान, किन शब्दों में आपको थैंक यू बोलूं? ये गद्य के अन्दर छिपा कर जो कविता लिख दी है, उसने तो मन ही मोह लिया। चित्रों का तो मैं वैसे भी रसिया हूं ! दस पन्द्रह वर्ष पहले एक बार मानसून में मैं भी दिल्ली से दुर्ग तक की रेल यात्रा कर चुका हूं। जाते समय तो सारे सुन्दर सुन्दर दृश्य रात की काली चादर में छिपे बैठे थे, पर वापसी की ट्रेन अपराह्न ३ बजे थी। ट्रेन चलने के दस पांच मिनट बाद ही हल्की – हल्की बारिश भी शुरु हो गई थी । उस बारिश में भी खिड़की से बाहर गर्दन निकाले – निकाले लैंडस्केप को ऐसे ताकता रहा था कि श्रीमती जी मेरे छोटे भाई से बोलीं, “आपके भइया इतने बड़े हो गये, पर बचपना अब तक नहीं गया !”

    • Manish Kumar says:

      शुक्रिया सुशांत जी अपने संस्मरण को साझा करने के लिए । वास्तव में बारिश के दिनों में इस इलाके की ट्रेन यात्रा करना प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को करीब से अनुभव करने का लाजवाब मौका है !

  2. beautiful pictures and equally good narration… have only heard about the beauty of Chattisgarh never been there.. it seems need to visit… Loved the pics specially the one with beautiful mauve morning glory flowers in the meadow… thanks.

  3. Surinder Sharma says:

    काफी दिन के बाद आप का लेख पढ़ा, बहुत अच्छा लगा. इंतना सुंदर लिखने का बहुत बहुत धन्यवाद

    • Manish Kumar says:

      लेख आपने पसंद किया जानकर प्रसन्नता हुई। बीच में दो महिने जापान में ही चले गए और वापस आने के बाद भी व्यस्तता इतनी रही कि यहाँ आना संभव नहीं हो पाया।

  4. Vibha says:

    Simply beautiful Manish. :)

  5. Anil Sharma says:

    HI Mnish,
    Mia jab bhi aisi kisi tashveer ko dekhta hu to man ka mayur nachnay lagta hai aur man ko mar kar rah jata hu, kyo ki aisa sapna mera kabhi pura nahi hota kyoki na itna paisa hota na hi waqt saad nahi saath deta hai.Magar aakhir kabhi na kabhi to samay aayega hi ,bas intzaar hai………………

    • Manish Kumar says:

      देखिए अनिल जी पैसे से ज्यादा मन की इच्छा ज्यादा महत्त्वपूर्ण होती है। वो कहते हैं ना कि जहाँ चाह वहाँ राह। बस यही मनोकामना है कि आपकी घूमने की अभिलाषा जल्द ही फलीभूत हो।

  6. अति सुन्दर मनीष जी ,

    रेल का सफर लग ही नहीं रहा था .

    • Manish Kumar says:

      शुक्रिया विशाल..कुछ चित्र डिब्बे के अंदर के भी लिये थे पर उनकी कहानी कुछ अलग थी। इन ताजे हरे रंगों के विपरीत वहाँ उदासी और मायूसी थी इसलिए उन्हें इस पोस्ट का हिस्सा नहीं बनाया।

  7. Vipin says:

    मनीष जी इस बेहतरीन संगीतमय प्रस्तुति के लिए आपका हार्दिक आभार! बड़े दिनों के बाद आपकी रचना पढने को मिली. हरे भरे चित्रों और आपकी प्रकृति प्रेम से भरी पंक्तियों ने वाकई सम्मोहित सा कर दिया था…मॉनसून के जादू को आपने अपनी कलम के जादू में बड़ी खूबसूरती से पिरोया है…

    • Manish Kumar says:

      यहाँ अपनी अनुपस्थिति का कारण तो ऊपर लिख ही दिया है। शु्क्रिया इस पोस्ट को इतने प्यारे शब्दों में सराहने के लिए।

  8. jaishree says:

    Long time Manish.

    Yet another lyrical post with Dhani color photos. And it was amazing that all were taken with mobcam.
    Thanks that you shared it with us.

    • Manish Kumar says:

      Thx Jaishree for your word of appreciation. Sleeper Class..Open Window.. Mobile Cam..and the unbelievable natural beauty visible outside. It just made my day on that trip ..

  9. D.L.Narayan says:

    Beautiful post, Manish…missed your presence here.

    After reading your lyrical post, I was reminded of “Yah Kaun Chitrakaar Hai”, that lovely song written so elegantly by the poet Bharat Vyas (from Shantaram’s “Boond Jo Ban Gayee Moti”)

    हरी हरी वसुंधरा पे नीला नीला यह गगन
    के जिस पे बादलों के पालकी उड़ा रहा पवन
    दिशाएं देखो रंग भरी चमक रही उमंग भरी
    यह किस ने फूल फूल पे किया सिंगार है
    यह कौन चित्रकार है …

    तपस्वियों सी है अटल यह पर्वतों की चोटियाँ
    यह सर्प सी घुमेरदार घेरदार घाटियाँ
    ध्वजा सी यह खड़े हुए हैं वृक्ष देवधार के
    गलीचे यह गुलाब के बगीचे यह बहार के
    यह किस कवी की कल्पना का चमत्कार है
    यह कौन चित्रकार है…..

    कुदरत की इस पवित्रता को तुम निहार लो
    इसके गुणों को अपने मन में तुम उतार लो
    चमकालो आज लालिमा अपने ललाट की
    कण कण से झनकती तुम्हे छबी विराट की
    अपनी तोह आँख एक है उसकी हज़ार है
    यह कौन चित्रकार है…..

    • Manish Kumar says:

      I was quite busy first preparing my trip of Japan (20 June-4 th Aug) which was almost 7 weeks long. Even after coming back there were lot of pending works to be done. Anyways the song u quoted is apt for this post.

  10. Dear DL,

    Thanks a ton for writing this all time favourite song of mine here as a comment. I badly needed the full lyrics but didn’t know where to find them. This song + Sundarkand are partly the reasons why I love Mukesh as a singer and include him as my most favourite singer. Really, while travelling in Chhattisgarh Express back from Durg, I was mesmerized by the natural scenery. God is really the greatest of artists.

    Sushant Singhal

  11. Mukesh Bhalse says:

    बड़ा ही काव्यमय वातावरण निर्मित हो गया है, ऐसे में मेरा कवी ह्रदय भी मचल रहा है कुछ कहने को…………………

    दिन में देखो सूरज निकला रात में चमके तारे,
    ये तो हैं सौंदर्य गगन के लगते कितने प्यारे,
    कभी टिमकते तारे दीखते कभी चांदनी रात,
    ऐसा लगता है जैसे हो जनम-जनम का साथ,
    सूरज तो प्रकाश देकर करता नवयुग का उजियारा,
    शाम को ढलता सूरज देखो लगता कितना प्यारा,
    धरती पर हरियाली आये जब बादल गरज के बरसे,
    सोच – सोच मन तड़प उठे बादल होने को तरसे,
    कही सुनहरी धुप खिली है कही बरसते बादल,
    कही हवा बर्फीली है कही सुखा धरती का आँचल,
    रहते हैं सब एक गगन में अलग -अलग ये सारे,
    मनभावन, मनमोहक ये सूरज, चाँद, सितारे,
    ये तो हैं सौंदर्य गगन के लगते कितने प्यारे.

    • Manish Kumar says:

      मुकेश जी प्रकृति की ये सुंदरता तो आम आदमी को कवि बना दे फिर आप जैसा कवि हृदय अपने आप को कैसे रोक पाएगा?

  12. Nandan Jha says:

    मनीष जी, काफी दिनों बाद दिखे पर पूरे मूड में दिखे | तो लेखक के साथ साथ पाठक गन भी मस्ता चुकें हैं इस धानी में , बहुत बढ़िया | कभी छत्तीसगढ़ जाने का अवसर नहीं मिला , हालांकि झारखण्ड और रांची घूमना हो पाया है पर रायपुर के बारे में बहुत कुछ सुना है | चावल की किस्मों के जानकारी पूर्ण रूप से नयी थी |

    कुछ हटमल टैग्स के कारण ले आउट ख़राब हो गया था तो उसे दुरुस्त कर दिया गया है |
    कमेंट्स के जवाब की प्रतीक्षा में | जय हिन्द |

    • Manish Kumar says:

      पहले जापान जाने की तैयारियाँ, फिर जापान की वज़ह से सात हफ्ते गायब रहने के बाद वापस आने पर भी व्यस्तता बनी रही इसलिए यहाँ आना संभव नहीं हुआ।

      जब ये पोस्ट प्रकाशित हुई तब मैं दक्षिण महाराष्ट्र में था। वहाँ से निकला तो मसूरी में एक ब्लॉगर कांफ्रेंस में चला गया जहाँ हिंदी में ट्रैवेल ब्लागिंग पर मुझे बोलना था। कल ही लौटा हूँ

  13. रेल, स्लीपर कोच, मानसून और विंडो सीट. मुझे तो आपसे ईर्ष्या हो रही है. :) बहुत अच्छा लिखा है आपने.

  14. SANDEEP SHARMA says:

    are sir,
    kya baat hai,
    kya likha hai koi kavi lagte hain.
    kya photo lete hai.
    kamal hain



Leave a Reply


six − = 3