मनाली का सुहाना सफ़र: सुंदरनगर, मण्डी के रास्ते मनाली और माँ हिडिम्बा देवी के दर्शन

पिछली पोस्ट में हमने नैना देवी के दर्शन करे और अब आगे मनाली की तरफ चलते है। नैना देवी से स्वारघाट होते हुए हमें सुंदरनगर के रास्ते आगे बढ़ना था, बसंती की लगाम अभी भी जीजा जी के हाथ में ही थी और हम पीछे की सीट पर मनभावन नजरो का लुत्फ़ उठा रहे थे।

स्वारघाट से आगे निकलते ही सीमेंट के बहुत से ट्रको और ट्रोलों की बजह से आगे बढ़ने में बहुत समय लग रहा था, क्युकी इसी रास्ते पर आगे 3 बड़ी कम्पनियो के सीमेंट प्लांट है जिनमे बरमाना में ए.सी.सी., दरलाघाट में अम्बुजा सीमेंट और बिलासपुर में एक प्लांट जे.पी. सीमेंट का है। बड़े ट्रको और ट्रोलों की बजह से कई जगह रास्ता काफी सकरा हो जाता है और कभी-कभी जाम का भी सामना करना पड़ता है, बरमाना के बाद रास्ते में ट्रेफिक थोडा कम हुआ पर बरमाना पार करते-करते भी बहुत समय बर्बाद हुआ।

बरमाना, ए.सी.सी. के प्लांट के पास

बरमाना, ए.सी.सी. के प्लांट के पास



बिलासपुर के पास की मार्केट

बिलासपुर के पास की मार्केट

लगभग ८:३० के आसपास हमारी बसंती सुन्दर नगर पहुची, सुंदरनगर पहुचने पर हमारा स्वागत फिर से बारिश की बूंदो ने किया, सामने बड़े-बड़े पहाड़ दिखायी दे रहे थे, रास्ते के दूसरी तरफ व्यास नदी बड़ी ही तेज आवाज़ के साथ बह रही थी, और ऊपर पहाड़ो पर जोरदार बिजली चमक रही थी जिसे देखकर ही मेरा दिल थोडा सा डरा हुआ था क्युकी एक तो हमें पहाड़ो पर गाड़ी चलाने की आदत नहीं थी और दूसरा जीजा जी को भी ड्राइव करते हुए बहुत समय हो गया था, अम्बाला के बाद लगातार बसंती की कमान उन्ही के हाथ में थी जिस बजह से वो भी थोड़े थके हुए महसूस हो रहे थे।

हमने गाड़ी एक रोड साइड ढाबे पर चाय पीने के लिए रोक दी, और जब सारे लोग चाय की प्रतीक्षा कर रहे थे मैं ढाबे वाले से बात करने लगा जिसका मुख्या कारन यह था की मैं रात सुंदरनगर में गुजारकर सुबह आगे बढ़ना चाहता था जिसमे की मेरी मदत ढाबे बाले ने भी करी और उसने किसी होटल में फ़ोन करके हमारे होटल में रुकने के लिए उपलब्ध्ता के बारे में पूछा, होटल में जगह होने के कारन होटल वाले ने आपना एक कर्मचारी वही ढाबे पर भेज दिया हमें ले जाने के लिए, लेकिन जब मेरे उच्च विचारो के बारे में घरवालो को पता लगा तो दीदी ने फिर से मुझे हमेशा की तरह डटना शुरू कर दिया जिनका बखूबी साथ मेरी श्रीमती जी ने भी निभाया क्युकी दोनों का तर्क था की हम किसी अनजान जगह पर ऐसे ही किसी ढाबे बाले के कहने पर कही नहीं रुकेंगे और आपना सफ़र जारी रखेंगे और सीधे मनाली जाकर ही रुकेंगे।

“मरता क्या ना करता” आखिर मुझे सबकी बात माननी ही पड़ी और होटल के कर्मचारी से माफ़ी मांग हम आगे के रास्ते पर बढ़ने लगे, जीजा जी को आराम करने की सलाह देते हुए अब गाड़ी की कमान मैंने संभाल ली थी, मेरी गाड़ी की रफ़्तार तो हमेशा ही कम रहती है, और यहाँ तो मैं पहाड़ो पर था जहाँ पर रात के समय मोड़ के दूसरी तरफ पता ही नहीं होता था की रास्ता सीधा है या कोई और भी मोड़ है, बरहाल ९:३० बजे के आसपास हम मण्डी पहुचे जहाँ पर पहुचने पर हमें रास्ते के दोनों तरफ बहुत ही गजब की सजाबट मिली और बहुत ज्यादा भीड़ दिखायी दी, थोडा और आगे बढ़ने पर पता चला कि वहाँ पर “मातारानी” का बहुत ही शानदार जागरण हो रहा था और मुम्बई से कोई बड़ा गायक वहाँ भजन गाने के लिए आया हुआ था, हम पंडाल में अंदर तो नहीं जा पाये क्युकी एक तो भीड़ बहुत थी दूसरा हमे भूख तेजी से लग रही थी सो हमें कही ढाबे पर रुककर भोजन करना था और उसके आगे बहुत लम्बा रास्ता भी तय करना था इसीलिए बही सड़क किनारे कुछ देर गाड़ी रोककर माता रानी को नमन करके और कुछ फ़ोटो खीचकर हम आगे चल दिए।

जगराते में भारी भीड़

जगराते में भारी भीड़

जागरण की चमक दूर से देखते हुए

जागरण की चमक दूर से देखते हुए

रास्ता ज्योति दर्शन का

रास्ता ज्योति दर्शन का

पंडाल में लगी हुई झांकी

पंडाल में लगी हुई झांकी

लगभग ११ बजे के आसपास भुंतर पहुचने पर एक आच्छा ढाबा देखकर हमने खाना खाने के लिए गाड़ी रोक दी, ढाबे बाले ने हिमाचली गाने बजा रखे थे जो की हमें समझ तो नहीं आ रहे थे पर अच्छे लग रहे थे, यहाँ मुझे एक बात बड़ी आजीब लग रही थी की ज्यादातर ढाबे ऊँची पहाड़ियो के किनारे व्यास नदी की तरफ थे, जहाँ पर रात में नदी की आवाज़ सुनकर ही डर लग रहा था, खैर वहाँ उस ढाबे का खाना आच्छा था जिसे खाने के बाद हम फिर से मनाली की तरफ चल दिए लगभग १ बजे हम मनाली पहुच गए जहा एंट्री के लिए ₹ ३००/- की पर्ची कटवानी पड़ती है।

पर्ची कटवाने के बाद हम माल रोड की तरफ आगे बड़े यहाँ पर रात बहुत ठंडी होने के बाद भी सड़क पर बहुत चहल पहल थी जो की यहाँ के लोकल रहने वालो की थी, इनमे ज्यादातर नयी उम्र के लड़के थे जो की यहाँ देर रात में पहुचने वाले लोगो को होटल मुहैया करवाते थे, हमारी गाड़ी के माल रोड स्टैंड तक पहुचते ही कुछ लड़के गाड़ी के पास आये और हमे होटल में रूम दिलवाने की जिद करने लगे, होटल की जरुरत तो हमें भी थी पर हम ऐसे ही किसी भी होटल में उनके कहने पर रुकने के मूड में नहीं थे पर फिर भी उनमे से २ लड़को के ज्यादा जिद करने पर हमने आपनी गाड़ी उनकी बाईक के पीछे दौड़ा दी जो की हमें एक होटल में लेकर गए, ये होटल रोहतांग वाले रास्ते पर व्यास नदी के उलटे हाथ की तरफ था जो की हमें कुछ ठीक नहीं लगा इसीलिए हम वहाँ ना रूककर वापस मॉल रोड की तरफ आ गए और हिडिम्बा मंदिर वाले रोड पर हमें एक आच्छा होटल दिखायी दिया, मैं उस होटल में पूछताछ के लिए गया और वहाँ पता लगा की २ कमरे तो मिल जायेंगे पर ₹२००० /- प्रति कमरे के हिसाब से, रात ज्यादा होने और बहुत ज्यादा थकान होने की बजह से हमने वहाँ रुकने का फैसला करा, यही सोचकर की अगर अगली सुबह कोई दूसरा आच्छा होटल सस्ते में मिल जाता है तो हम वहाँ पर शिफ्ट कर जायेंगे। हमने होटल के बराबर से खली जगह पर गाड़ी पार्क करी और सामान निकालकर अपने अपने कमरे में सोने चल दिए।

पहाड़ों पर बर्फ

पहाड़ों पर बर्फ

अगली सुबह लगभग ६ बजे जीजा जी ने मुझे फ़ोन करके होटल के बहार का नजारा देखने के लिए कहा, आपने कमरे की बालकनी में आकर जो नजारा मुझे देखने को मिला मेरे लिए उसे शब्दो में लिखना बड़ा ही कठिन कार्य है क्युकी वो एक अनुभूति थी जो की मैंने उससे पहले कभी भी महसूस नहीं करी थी, सुबह ६ बजे होटल की बालकनी में बड़ी ही ठंडी हवा चल रही थी जो कि शरीर में कपकपी पैदा कर रही थी, होटल के नीचे की तरफ जहाँ हमारी गाड़ी खड़ी थी उसके पास ही “सेब का बाग़” था, और हमारी आँखों के ठीक सामने बर्फ के बड़े बड़े पहाड़ थे जिन्हे की हम रात को अँधेरे की बजह से देख नहीं पाये थे, बर्फ के उन पहाड़ों पर सूरज की किरणों के पड़ने के कारण वो एकदम चाँदी की तरह चमक रहे थे उनका रंग सफ़ेद ना होकर सुनहरा महसूस हो रहा था, इससे पहले मैंने पहाड़ों पऱ कभी भी बर्फ नहीं देखी थी पर आज तो पूरा बर्फ का पहाड़ ही मेरे सामने था, एक पल के लिए भी उस चमकदार पर्वत श्रंखला से नजरें हटाने का दिल नहीं कर रहा था शायद कुछ ऐसी ही अनुभूति साथ वाली बालकनी में जीजा जी भी कर रहे थे।

लम्बे लम्बे पेड़ देवदार के

लम्बे लम्बे पेड़ देवदार के

कुछ देर तक ऐसे ही उस मनभावन दृश्य को देखते हुए मैं और जीजा जी मनाली भ्रमण की तथा दूसरे होटल में रुकने के लिए जानकारी लेने की योजना बनाने लगे, लगभग १ घंटे बाद दैनिक कार्यो से निबृत होकर हम सभी जीजा जी के कमरे में नाश्ते के लिए मिले, वहाँ नाश्ता करने के पश्चात में और जीजा जी दूसरे होटल की जानकारी के लिए चल दिए जबकि बचे हुए लोग वहीं होटल में आराम कर रहे थे। होटल से बहार निकलते ही हिडिम्बा मंदिर की तरफ चलते हुए हमें एक होटल दिखायी दिया जहाँ पता करने पर हमें वहाँ के कमरे और किराया दोनों ही सही लगे ₹१२००/- प्रति कमरे के हिसाब से हमने यहाँ २ कमरे ले लिए, और पुराने होटल से चेक आउट करने के बाद लगभग ११ बजे हमने आपना सामान दूसरे होटल में शिफ्ट कर दिया।

यहाँ में सभी पाठको को ये जानकारी भी देना चाहूंगा की जिस होटल में हम रात ₹२००० देकर रुके थे उसका नाम होटल कनिष्का था जो की हिडिम्बा देवी मंदिर वाले रास्ते पर ही था और यहाँ के कमरे बहुत अच्छे और साफ सुथरे थे, इसके बाद हम जिस दूसरे होटल में रुके थे उसका नाम था सोलिटेयर इन था, ये भी हिडिम्बा देवी मंदिर वाले रास्ते पर है और यहाँ के कमरे भी बड़े और साफ सुथरे थे, बाथरूम में गर्म पानी की सुविधा भी थी, पार्किंग की अच्छी व्यवस्था थी और यहाँ का स्टाफ भी व्यवहार कुशल था । दोनों ही होटल माल रोड से पैदल की दुरी पर हिडिम्बा देवी के मंदिर की तरफ उलटे हाथ पर है पहले होटल कनिष्का पड़ता है उसके बाद में सोलिटेयर इन।

सोलिटेयर इन में सामान रखने के बाद हम लोग हिडिम्बा देवी के मंदिर गए जो की यहाँ का सबसे मुख्या मंदिर है, यह मंदिर देवदार के बहुत से लम्बे लम्बे पेड़ो के मध्य घिरा हुआ है और मंदिर के भवन का निर्माण भी लकड़ी से ही हो रखा है, यहाँ की दीवारो पर तरह तरह के जंगली जानवरो के सींग भी लगा रखे है और गर्भ गृह में एक शिलाखंड के नीचे की तरफ हिडिम्बा देवी विराजमान है जिनके दर्शन के लिए शिलाखंड के नीचे की तरफ झुकना या बैठना पड़ता है।

हिडिम्बा देवी का सम्बन्ध महाभारत के काल से बताया जाता है और जैसा की हमारी जानकारी में आया हिडिम्बा देवी ५ पांडवो में से एक भीम की पत्नी थी, हिडिम्बा देवी मंदिर की संरचना १५५३ में देवदार के जंगल के मध्य एक बड़ी सी चट्टान के ऊपर के ऊपर हुई थी, यहाँ गर्भ गृह में एक शिलाखंड के नीचे जहाँ हिडिम्बा देवी विराजमान है उस स्थान पर देवी के पैरों की छाप की पूजा की जाती है, लकड़ी से निर्मित इस मंदिर में बड़ी ही सुन्दर नक्काशी की गयी है और ऐसा माना जाता है की जिस क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है वहाँ निकट के संपूर्ण घाटी क्षेत्र में एक विशाल पैर की छाप देखी जा सकती है।

एक नजारा मंदिर का

एक नजारा मंदिर का

कोई मेरी चप्पल ले गया

कोई मेरी चप्पल ले गया

लम्बी लाइन हिडिम्बा देवी के दर्शनों के लिए

लम्बी लाइन हिडिम्बा देवी के दर्शनों के लिए

जिस समय हम मंदिर पहुँचे वहाँ पर वहाँ दर्शनों के लिए लाईन लग रही थी पर हमारा भी नंबर जल्द ही आ गया था और हमने भी देवी के दर्शनों का लाभ उठाया और कुछ देर तक वहीं मंदिर के आसपास शोरगुल से दूर प्राकृतिक सोंदर्य का लाभ उठाया।

11 Comments

  • Dr.Rakesh Gandhi,Advocate says:

    Beautiful description in details……but only few clicks……..requires more to post……Thanks a lot Jatinder Ji….Awaiting remaining post.

  • om prakash laddha says:

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    • Jitendra Upadhyay says:

      Laddha Jee,

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  • Nandan Jha says:

    So finally after a real long drive, you reached Manali. For such long distance trips, I guess it is important to keep a strong tab of time and probably one can better plan the stops. From what I have experienced, night driving in hills is safer than day since one can sense an oncoming vehicle from a distance (because if headlights) but in general we try to avoid driving in night.

    Thanks for giving information about the hotels. It is a very useful information to have.

    So where do you take us in Manali now , after Hidimba temple.

    • Jitendra Upadhyay says:

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  • arun says:

    Welldone boss, keep writing…..

  • Dear Jitendra,
    Nice log and good information. But ,There are many mistakes which irritates. I have picked some of them so that they can be avoided in next post.I have tried to write the correct word in brackets. Please don’t take it otherwise.
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    • Jitendra Upadhyay says:

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  • Arun Singhal says:

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  • AJAY SHARMA says:

    Dear Jitendra,
    At the outset let me thank to all the fellow Ghumakkars who have taken the pain to read your log so sensibly and pointed the petty mistakes. Its a great feeling that people in this site are so supportive that they try their bits to promote and excel others too with so much of humility and generosity. Hats off to all such critics. Hope you take it in a very positive manner and be open to learn from all. About your post, its well written and good amateur pics. Manali is an all time favorite to all and knowing about as many times is as good as the first time. Keep it up dear.

    Keep traveling
    Ajay

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