जिम कॉर्बेट का जंगल , बाघ और हम

मुझे वन्य जीवन से बड़ा लगाव है और साल मैं दो बार मैं कही ना कही जरूर जाता हूँ, खास कर जिम कॉर्बेट मेरी पसंदीदा जगह है। अभी तक 5-6 बार मैं जिम कॉर्बेट जा चुका हूँ लेकिन एक बार ही ढिकाला रेंज मे रूकने का अनुभव हुआ और क्या कमाल का अनुभव हुआ जो कि शायद शब्दों मे ब्यान नहीं किया जा सकता फिर भी कोशिश करूगा की अपना अनुभव साझा कर सकू।

जब तक मै नौकरी कर रहा था तो हम 6 लोगो का एक ग्रुप था जो एक साथ ही घूमने जाते थे और हर 2 महीने मे कही न कही का कार्यक्रम बना ही लेते थे, अब तो ऐसे कार्यक्रम बनते ही नहीं है। हम 6 लोगो मे, मै, भगवानदास जी, मनमोहन, मनोज, योगेश, और भाटिया जी है ।

दाए से भगवानदास जी, मनमोहन, भाटिया जी, मनोज,  योगेश और मै(सौरभ)

दाए से भगवानदास जी, मनमोहन, भाटिया जी, मनोज, योगेश और मै(सौरभ)



शनिवार का दिन और अप्रैल का महिना हम सुबह 10 बजे दिल्ली से रामनगर के लिए निकले, पहले तो कार्यक्रम जल्दी निकलने का था लेकिन गाडी ही हमें विलम्ब से मिली थी । छ लोगो के लिहाज से हमने इन्नोवा गाडी से जाना पसंद किया था। हमने दिल्ली से ब्रिज्घाट, मोरादाबाद होते हुए रामनगर जाने का निश्चय किया। सभी लोग बहुत रोमांचित थे और जल्द से जल्द रामनगर पहुचना चाहते थे। मनपसंद गाने सुनना और गुनगुनाना एक अलग ही आनंद देता है और रास्ता काटने का सबसे अच्छा तरीका है। हम रास्ते के लिए पूरी तय्यारी करके ही चलते है, कोल्ड ड्रिंक्स, नमकीन चिप्स, सोडा, बर्फ इत्यादि ताकि रास्ते मे रुकना न पड़े । 3 बजे के करीब हमने एक शाकाहारी ढाबे मैं भोजन किया और बिना देर किये चल दिए। लगभग 5 बजे हम रामनगर पहुच गए वहा पहले से ही हमारे एक मित्र ने कुमायु विकास मंडल के रेस्ट हाउस मैं हमारा रूकने का इंतजाम कर दिया था, इसलिए होटल ढूँढने मैं समय ख़राब नहीं हुआ.

रूम मैं जाकर हमने कुछ देर अपनी कमर सीधी करना बेहतर समझा। इसलिए चाय का ऑर्डर दिया और आराम से लेट गए। वो एक बड़ा कमरा था जिसमे दो डबल बेड और दो सिंगल बेड थे इसलिए हम 6 लोगो को कोई परेशानी नहीं होनी थी। अपने ड्राईवर के लिए भी हमने रहने का इंतजाम अलग कमरे मे करवा लिया था। हमने 2 घंटे आराम से लेटकर टीवी देखा और फिर शाम को 7-8 बजे हम थोड़ी देर के लिए पैदल ही बाहर घूमने चले गए, गर्मियों का मौसम था लेकिन बाहर हवा बड़ी ठंडी थी जिससे शरीर को बड़ा आराम मिला। कुछ देर बाद हम वापिस रूम मैं आ गए। हम सभी 6 लोग एक साथ बैठ गए और अपनी ऑफिस की और कुछ निजी समस्या शेयर करने लगे। एक दूसरे को समझने का ये सबसे अच्छा तरीका हैं और हम हमेशा करते भी है क्योकि ऑफिस की बिजी लाइफ मैं इन् सबके लिए समय ही नहीं होता। और जब इस तरह की चर्चा हो तो हाथ मे गिलास भी होने ही चाहिए । लगभग साढ़े नौ बजे वहा के रसोई इंचार्ज ने हमसे भोजन करने के लिए कहा क्योकि वहा नौ के भोजन बंद हो जाता था, वो तो उसने हमारा लिहाज करके आधा घंटा देर से बोल था लेकिन फिर भी हममे से कुछ लोग इतनी जल्दी भोजन नहीं चाहते थे लेकिन मजबूरी थी इसलिए उसको ऑर्डर कर दिया की वो खाना टेबल पर लगाये हम आते है। खाना खाने बाद हम कुछ देर के लिए बाहर टहलने चले गए ताकि खाना भी हजम हो जाए और ताज़ी हवा भी मिल जाए। वापिस आकर लगभग 12 बजे हम खा पी कर सोने चले गए।

सुबह हम लगभग 8 बजे सो कर उठे वैसे भी हमारे लिए सारे इंतजाम हमारे वहा के मित्र पाण्डेय जी को करने थे इसलिए हम निश्चिंत थे। हम आराम से तैयार हुए इस बीच पाण्डेय जी ने बता दिया था की 1 बजे हमें एंट्री करनी है और सबसे अच्छा हुआ की उन्होंने हमारे निजी वाहन (इनोवा) का परमिट दिला दिया था इसलिए और भी ज्यादा ख़ुशी हमें थी। हमने जल्दी-जल्दी खाना खाया और निकलने की तय्यारी शुरू कर दी। अपना सारा सामान पैक करके गाड़ी मे रखा और रेस्ट हाउस से बाहर आ गए। ढिकाला रेंज का गेट रेस्ट हाउस से ज्यादा दूर नहीं था, हमें 15-20 मिनट लगे कॉर्बेट पार्क के गेट तक पहुचने मे, वह पहुचकर हमने परमिट चेक कराया और अंदर प्रवेश किया। अंदर घुसने से पहले गेट पर गार्ड ने बोला की किसी भी दशा मे गेस्ट हाउस पहुचने से पहले गाडी से बाहर कदम न रखे, कोई भी खाने पीने का सामान गाडी से बहार न फेके, म्यूजिक न बजाये, हॉर्न न बजाये और जंगल मे अंदर अनजान रास्ते पर गाडी न ले जाए इत्यादि। गेट से प्रवेश करते ही एक रोमांच की लहर हम सभी के अंदर दौड़ गयी ।

TRC गेस्ट हाउस पर हम, पाण्डेय जी और देहरादून के साथी

TRC गेस्ट हाउस पर हम, पाण्डेय जी और देहरादून के साथी

जंगल के गेट पर मै और योगेश

जंगल के गेट पर मै और योगेश

रास्ता दिखाते हुए भगवानदास जी

रास्ता दिखाते हुए भगवानदास जी

जंगल के अंदर बोर्ड देखते हुए हमने आगे बढ़ना शुरू कर दिया, हम सभी की निगाह बाहर इधर-उधर जानवरों को ही ढूँढ रही थी खासकर बाघ को लेकिन हिरन और सांभर ही दिख रहे थे, इतनी गर्मी होने के बाद भी हवा मे एक ठंडक थी। इस समय घास भी जल चुकी थी और बहुत छोटी छोटी थी । छोटी घास का फायदा यही है की जानवर आसानी से दिख जाता है अगर आप जुलाई – अगस्त के बाद यहाँ आओगे तो लम्बी लम्बी और हरी घास हर तरफ दिखाई देगी। जंगल के रास्ते उबड़ खाबड़ होते है और गेस्ट हाउस भी मैन गेट से लगभग 30 किलोमीटर अंदर है, अभी चलते हुए लगभग एक घंटा ही हुआ था और हमने लगभग 15 किलोमीटर का रास्ता ही तय किया था की एक साथी ने लघु शंका जाने की इच्छा जाहिर की, पहले तो हमने मना किया क्योकि जंगल मे गाडी से उतरना खतरनाक है लेकिन वो इन्तजार नहीं कर सकता था इसलिए एक मैदानी जगह देखकर हमने गाडी रोक दी और सभी गाडी से बाहर आ गए और वहा पर एक दुसरे के फोटो भी खीचे हम लोग 5-7 मिनट गाडी के बाहर रहे लेकिन ये शायद हमने गलती की थी, जंगल मे ऐसे बाहर निकलना खतरनाक हो सकता है और ये बाद मे हम सभी ने स्वीकार भी किया कि आगे से ऐसी गलती नहीं करेगे।

जंगल के बीच मे फोटो (सौरभ)

जंगल के बीच मे फोटो (सौरभ)

जंगल के बीच मे फोटो (भगवानदास)

जंगल के बीच मे फोटो (भगवानदास)

जंगल के बीच मे फोटो (मनोज और योगेश)

जंगल के बीच मे फोटो (मनोज और योगेश)

उसके बाद हम वापिस गाडी मे बैठ गए और गेस्ट हाउस की और चल दिए, रास्ते मे फिर एक जगह हमारे भाटिया जी जोश मे आ गए एक सांभर को देखकर और हमारे मना करते करते भी वो गाडी से उतर गए एक फोटो खीचने के लिए, मैंने उनको थोडा गुस्से मे डाटा तो उन्होंने भी अपनी गलती मान ली।

इस फोटो के लिए इतना रिस्क

इस फोटो के लिए इतना रिस्क

ये हमारा घर है इसलिए पहले  सड़क हम पार करेगे

ये हमारा घर है इसलिए पहले सड़क हम पार करेगे

हमें रास्ता दिखाते हुए

हमें रास्ता दिखाते हुए

गेस्ट हाउस के गेट के नजदीक ही हमें हिरनों का एक झुण्ड दिखा और तभी जंगली हाथियों का एक झुण्ड भी रास्ता पार करता हुआ मिला, हम लोगो मे से कुछ डर भी रहे थे की कही हाथी नजदीक ना आ जाए। लगभग 4 बजे हमने गेस्ट हाउस मे प्रवेश किया, जैसे ही हमारी गाडी वहा रुकी 2 लोग भागते हुए हमारे नजदीक आये और बोले की हम आप लोगो की ही प्रतीक्षा कर रहे थे उन दोनों ने गाडी से हमारा सामान निकाला और बोले की आप जल्दी से चाय पी लीजिये फिर आपके लिए दो हाथी तैयार है सफारी के लिए। हम सुनकर ही रोमांचित हो गए क्योकि ये तो हमारे प्लान मे था ही नहीं हम ने जल्दी से रूम देखे और अपना रूम सेलेक्ट किया, सामान रखा और हाथ मुँह धोकर कैंटीन की और चल दिए। मै और भगवानदास जी हमेशा एक ही कमरे मे रूकते है और बाकी चारो एक कमरे मे क्योकि उन चारो को एक साथ ज्यादा मजा आता है, हम लोगो के साथ थोडा लिहाज करना होता है ।

ये कहा से ले आये मनमोहन जी

ये कहा से ले आये मनमोहन जी

ढिकाला गेस्ट हाउस पर हम लोग

ढिकाला गेस्ट हाउस पर हम लोग

गेस्ट हाउस काफी बड़े क्षेत्र मे था और हर तरफ से लोहे के तारो से घिरा हुआ था जिसमे रात को करंट छोड़ दिया जाता था जिससे की रात मे कोई जानवर अन्दर ना आ जाए। हमने जल्दी जल्दी चाय पी और हाथी पर बैठने के लिए बनाये गए प्लेटफोर्म की और चल दिए, वहा पर दो हाथी तैयार थे, हम सीडियो से चदकर प्लेटफोर्म पर पहुचे तो महावत ने हाथी को ठीक उसके सामने खड़ा कर दिया, पहले हाथी पर मनोज, योगेश, मनमोहन और हमारी गाडी का ड्राईवर बैठ गया, उनके बैठने पर महावत ने हाथी बागे बढ़ा दिया थो दुसरे महावत ने दुसरे हाथी को प्लेटफ़ॉर्म के आगे ले आये जिस पर मै, भगवानदास जी और भाटिया जी बैठ गए। उसके बाद दोनों हाथी आगे पीछे चलते हुए गेस्ट हाउस के गेट से बाहर आकर घने जंगल की और बढ़ गए, थोडा सा आगे चलते ही जंगल घना होता चला गया हम लोग घने जंगल के फोटो खीचते हुए आगे बढ़ते रहे,हाथी के ऊपर बैठना एक गज़ब का अनुभव था क्योकि हाथी अपनी मस्तानी चाल से चलता है उसको परवाह नहीं की ऊपर बैठे लोग तकलीफ मे है, हम बार बार पेड़ की टहनियों को हटा रहे थे और डर भी रहे थे की पेड़ पर कोई साप या तेंदुआ न हो, अभी हमें चलते हुए लगभग 20-25 मिनट ही हुए थे की हमारे से आगे वाले हाथी के महावत ने मुँह पर ऊँगली रखकर चुप रहने का इशारा किया, उस समय हमारे दो हाथियों के अलावा एक हाथी और भी था जिस पर 2-3 विदेशी बैठे हुए थे.

तीनो महावतो के बीच आपस मे कुछ इशारा हुआ और उन्होंने एक घनी झाडी को घेरना शुरू कर दिया, सब कुछ इतनी तेजी से हो रहा था कि हम कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे, तभी महावत ने हमें धीरे से बोला की सर झाड़ियो मे शेर है आप लोग संभल कर बैठ जाए, सुनते ही रोमांच के साथ डर की लहर अंदर तक दौड़ गयी, इसी बीच हाथियों ने चिंघाड़ना शुरू कर दिया और तेजी से झाड़ियो के इधर उधर घूमना शुरू कर दिया उनका मकसद शेर को झाड़ियो मे घेरना था जिससे की शेर डर कर बैठ जाए, इस बीच शेर के गुर्राने की आवाज़ भी आने लगी थी, ये सब इतनी तेजी से हो रहा था की हमारी कुछ समझ मे नहीं आ रहा था, हमने अपने अपने पैर ऊपर उठा लिए थे, ऐसा लग रहा था की कही शेर हमारा पैर पकड़ कर नीचे न खीच ले, तभी तीसरा हाथी कुछ पीछे हट गया और शेर के निकलने का रास्ता बन गया और वो तेजी से निकलकर भाग गया और उस पर हमारी बदकिस्मती और हमारे साथियो की खुशकिस्मती की उनको भागते हुए बाघ की झलक मिल गयी क्योकि हमारा हाथी दूसरी तरफ था और फिर वो इतनी तेजी से भागा कि हम देख ही नहीं पाए, योगेश और मनोज जोर से चिल्लाये, सर उधर देखिये लेकिन तब तक वो भाग गया, हम सभी का डर के मारे बुरा हाल था, ये सब इतना अचानक हुआ था कि हम अपने को दिमागी तौर पर तैयार नहीं कर पाए थे, हमने महावत को बोला कि भाई हमें पहले बता तो देता, तूने तो हमारा आज हार्ट फ़ैल करा देना था तो वो बोला, साहब आप जंगल मे किसलिए आये है और शेर हमें बता कर तो आएगा नहीं, आप भाग्यशाली हो कि आपने ये सब देखा नहीं थो लोग 15-15 दिन यहाँ रहते है और एक झलक भी नहीं मिलती। बात सही थी फिर हमारे महावत ने उस तीसरे महावत को डांटा कि उसने शेर को निकलने का रास्ता क्यों दे दिया तो वो बोला कि वो विदेशी लोग बहुत डर गए थे और उन्होंने ही पीछे हटना को कहा इसलिए हटना पड़ा। अब तक हमारा होश भी वापिस आ गया था तो हम भी शेर बन गए थे, हमने एक दुसरे से पुछा की किसी ने हाथी को गन्दा तो नहीं कर दिया डर के मारे। हमने महावत से पूछा की क्या चांस है फिर से बाघ के दिखने का या वो डर कर भाग गया, महावत बोल, साहब वो शेर है, वो डरता नहीं है, यही कही झाड़ियो मे होगा, किस्मत हुई तो फिर दिख जाएगा आप कैमरे हाथ मे रखिये, तब हमें होश आया की फोटो लिए या नहीं, उस वक्त कैमरा मनोज के पास था हम सभी उसके पीछे पड़ गए की उसने फोटो क्यों नहीं लिए, वो बोला, शुक्र मनाओ कि मैंने कैमरा नीचे नहीं फेक दिया, वहां अपना होश नहीं था और आप लोगो को फोटो की पड़ी है।

गेस्ट हाउस के पास हाथी

गेस्ट हाउस के पास हाथी

हाथी पर हमारी सफारी

हाथी पर हमारी सफारी

हाथी पर मनोज व् योगेश

हाथी पर मनोज व् योगेश

हम लोग ज्यादा ही बोल रहे थे इसलिए महावत ने हमें फिर से चुप रहने के लिए कहा, हम फिर से चुपचाप बैठ गए और ध्यान से झाड़ियो मे देखने लगे कि कही शेर दिख जाए। वैसे इतना बतादू की इधर जंगल मे बाघ (टाइगर) ही है लेकिन मूह से हर किसी के शेर ही निकलता है। सबसे आगे मनोज, मनमोहन वाला हाथी चल रहा था उससे पीछे हमारा और हमसे पीछे विदेशियों का। हम लोग धीरे धीरे बोलते हुए और इधर इधर देखते हुए चले जा रहे थे कि फिर से हमारे महावत ने इशारा किया और अपना हाथी पीछे करना शुरु कर दिया, हमने कारण पुछा तो उसने धीरे से कहा की साहब उधर देखिये एक जंगली हाथी है, पहले इससे निकल जाने दीजिये। हमने देखा वो एक बहुत बड़ा लम्बे लम्बे दांत वाला टस्कर था। टस्कर ऐसे हाथी को कहते है जिसको उसके साथी उसकी उद्दंडता की वजह से झुण्ड से निकाल देते है और ऐसे हाथी बहुत खतरनाक होते है। इस घटना से पहले मे जंगल मे जाते वक्त हाथी से नहीं डरता था लेकिन अब सबसे ज्यादा हाथी से ही डरता हूँ। महावत हमारे हाथी को पीछे ले आया और तीसरा हाथी हमसे पीछे ही था लेकिन तब तक पहला हाथी आगे निकल चूका था। हम प्रतीक्षा करने लगे की वो जंगली हाथी आगे निकल जाए वो जंगली हाथी सीधा निकल रहा था की अचानक पता नहीं क्या हुआ की उसने मुड़ कर हमारी तरफ देखा और रुक गया, हम कुछ समझ पाते वो पलट कर हमारी तरफ ही आ गया और हमारे हाथी के सामने खड़ा हो गया अभी थोड़ी सी दूरी थी लेकिन पीछे जाने की जगह नहीं थी इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते थे। हमारे महावत कुछ परेशान होने लगे थे, हमने उनसे धीरे से पुछा कि कोई खतरा तो नहीं है तो वो भी धीरे से ही बोला कि जब तक ये टस्कर सामने है खतरा ही खतरा है, उस समय हमें पहली बार पता लगा की हम जिस पर बैठे है वो हाथी नहीं हथिनी है और उस टस्कर को हमारे मे नहीं उस हथिनी मे ही रूचि है। महावत ने बताया की ऐसे मे टस्कर बहुत खतरनाक हो जाता है और ऊपर बैठे लोगो को नुक्सान भी पंहुचा सकता है। अब घबराने की बारी हमारी थी उस घने जंगल मे हाथी से कूद कर भाग भी नहीं सकते थे एक तो हाथी की ऊचाई दूसरा घना जंगल, पता लगे की शेर महाराज इन्तजार मे बैठे हो, उधर धीरे धीरे वो टस्कर बहुत नजदीक आ गया था अब सभी की हिम्मत जवाब देने लगी थी तभी उन दोनों महावतो ने अजीब सी आवाज निकलनी शुरू कर दी, उसका बड़ा फर्क पड़ा और वो हाथी वही रूक गया, कुछ देर तक हमारी तरफ देखता रहा फिर पलट कर चला गया, कुछ आगे जाने के बाद वो रुक मुड़ कर हमारी तरफ देखा जैसे कि हमसे कह रहा हो कि चलो आज थो छोड़ रहा हूँ फिर सामने मत आना, हमने भी हाथ जोड़ दिए की बाबा तुम जाओ। उसके निकलने के बाद 5 मिनट तक हमने प्रतीक्षा की और फिर हमारे महावत ने हाथी को आगे बढ़ा दिया। थोड़ी देर बाद ही महावत हाथी को मुख्य रास्ते पर ले आया जो नदी (रामगंगा) के पास है लेकिन उस समय वहा कोई जानवर नहीं था और अँधेरा भी होने वाला था इसलिए महावत ने बोल कि अब वापिस चलते है। हम तो इन्तजार कर रहे थे, बोले चलो भाई जल्दी चलो लेकिन जंगल मे अँधेरा मत कर देना वो बोला, साहेब बेफिक्र रहिये उस्सी रास्ते पर ले जाऊगा जिस पर शेर मिला था हो सकता है वापिसी मे दिख जाए, हम बोले भाई इस समय वो दोनों हाथी भी नहीं है हम अकेले है ऐसे मे रिस्क तो नहीं है तो वो बोला साहेब जंगल मे तो हर जगह रिस्क है। उसके बाद महावत घने जंगल से होते हुए वापिस गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया। एक बात और बता दूँ की जंगल के गेट से प्रवेश करने के बाद ही मोबाइल नेटवर्क खत्म हो जाता है इसलिए हम अपने साथियो से संपर्क भ नहीं कर सकते थे कि वो कहा है ।अब हम गेस्ट हाउस के नजदीक पहुच गए थे और वो मुख्या रास्ता था और वहा से गेट बस 500 मीटर दूर था लेकिन वो टस्कर गेट के पास मौजूद था, हमारी हथिनी को देखकर वो फिर से हमारी तरफ बढ़ने लगा, इस बार मैंने सोच लिया था की अगर हाथी नजदीक आया तो मे कूदकर भाग जाऊगा, फिर चाहे जो हो लेकिन हमारी अच्छी किस्मत कि गेस्ट हाउस से कुछ लोग जीप लेकर चिल्लाते हुए आये और उस हाथी को दूर भगा दिया। हम अंदर पहुचकर जल्दी से हाथी से उतरे और महावत को 100 रुपए इनाम के दिए, वैसे वो कम थे क्योकि वो हमें जिन्दा बचाकर ले आया था। हमारे साथी पहले से ही वहा थे उन्होंने बताया की वो टस्कर पीछे पड़ गया था इसलिए वो जल्दी जल्दी भागकर यहाँ पहुचे है।

हमारे पसंदीदा  राईवर

हमारे पसंदीदा
राईवर

पोस्ट की लम्बाई काफी ज्यादा हो गयी है और अभी दूसरा दिन भी बचा है इसलिए बाकी की कहानी अगले पोस्ट के लिए बचा कर रख लेता हूँ।

धन्यवाद!

24 Comments

  • Very good story, we had somewhat similar experience in Corbette, when we saw tiger totally forgot to click pictures…

    • Saurabh Gupta says:

      Thanks desi Travler Ji.

      Experience of wild life is always unforgettable. At the moment we forget to click the picture.

  • Deepak says:

    I love Corbett myself and have been there 3 times every time staying in Dhikala. 2 times with my own car and last time in a hired gypsy. I was sad to find out that now all personal vehicles are banned, however, it is interesting to find that you got a permit for your vehicle. As far as I know, it doesn’t happen. Along with this, having elephants ready for you in Dhikala is as VIP as it gets. How did you manage it? Ye Pandey ji kaun hain? I just cant seem to get a stay inside Dhikala anymore, apparently for common man, you need to book 2 months in advance and still, you cant take your vehicle and have to hire a Gypsy costing approx Rs 3500 per day!!! Let me know if I can avail Pandey Ji’s help :)
    Coming back to Corbett, as I have only experiences stay inside Dhikala, I just cant think about stating outside in the private resorts etc. The real charm is in Dhikala. Its beautiful, its unparalleled, and its beyond words …

    • Saurabh Gupta says:

      Deepak Ji, Conditions are totally changed now. No personal vehicle is allowed inside. At that time the condition was different. Since Sunday I Was at Ramnagar (Dhela guest house) but not possible to go Dhikala without prior booking. Once you must try to stay outside in private/govt resorts. Experience is awesome when you go out on road after 12 of night.

  • ashok sharma says:

    nice post filled with adventure.

  • Nandan Jha says:

    Wow. I have been to Corbett at least 20 times :-) and have stayed in a lot of TRH but have never come any close to a Tiger. So you were indeed one lucky guy. It must have been one special experience to be so close to a Tiger and then an Elephant. Though Tiger is the King, Elephant is the most dangerous of all.

    Dhikala is like a five star inside. We realised that after our stay at Sultan, Gairal (pretty good), Khinna-nauli (erstwhile great place) and Sitavani (the other side of river), few times in Bijrani and so on. You did a wonderful thing by staying inside, it is altogether a different experience.

    The park is closed by late June so it is out of bounds during July/Aug.

    @ Deepak – Yes, now the personal car is banned (I guess for quite some time now).

    • Saurabh Gupta says:

      Thanks for the comment Nandan Ji.

      Everyone of us can never forget this experience. I have tried to explain this but we can’t express our feeling, we had at that time. From the last 2 days I was at Ramnagar in Dhela (TRC Guest House) but have option only to go for Bijrani or Jhirna but I don’t have good experience on these gates so not gone inside the park but the experience was again awesome when we go out after 12 of night on road.

      Elephant is most danngerous animal as I heared few stories when I was In Raja Ji park. It is always risky to go infront of elephant.

  • Nirdesh Singh says:

    Hi Saurabh,

    Seems like an adventure. Crossing paths with both tiger and tusker in a single day. Wow!

    I have never been to Corbett.

    • Saurabh Gupta says:

      Thanks Nirdesh Ji.

      Once you must go Corbett and make night stay there. You will never forget that experience.

  • Abheeruchi says:

    Good Post.

    We missed this place when we were in Delhi…

    Shayad future me kabhi jaane ko mauka mil jaaye…

  • Thanks Saurabh ji for taking us virtually on adventures tour. The place has been added to my must visit list.

  • Saurabh Gupta says:

    Thanks a lot Naresh Ji.

    Wildlife is always adventures. You should definitely go and write your experience of there

  • Excellent post, seeing the big cat in your own eyes – you are extremely, extremely lucky and fortunate.

    Just crossed Ramnagar few days back and saw the direction of Jim Korbett ~ 34 km from there. We planned to go there during August, but it seems to be cancelled as Nandan mentioned Jul / Aug it is out of bound for tourists. We will have to plan it again.

    ‘ll look forward to your next.

  • Saurabh Gupta says:

    Thanks a lot Amitava Ji.

    From 15th June the park will be closed due to rainy season so can’t make plan in august but definitely you should go there.

    Last part will be published on 17th hope you will like that.

  • SilentSoul says:

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  • Saurabh Gupta says:

    Thanks a lot SS Ji.

  • Ritesh Gupta says:

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    ?????….

  • Saurabh Gupta says:

    Thanks a lot Ritesh Ji.. ……………..

  • sakshi says:

    april mei hows the temperature, are woolens reqd.?

  • sakshi says:

    are woolens reqd in apr, is milk available in dhikala canteen?

  • Saurabh Gupta says:

    It’s hot in day time but at morning & evening will be good weather but not required woolen.

    Tea/Milk is available there in Dhikala canteen.

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